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सरकार से परेशान अन्ना हजारे फिर करेंगे अनशन

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16 जून 2011 

नई दिल्ली। गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने केंद्र सरकार पर सामाजिक संगठनों के साथ धोखा करने का आरोप लगाते हुए 16 अगस्त से फिर से अनशन आरम्भ करने की बात कही है। हजारे का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त लोकपाल विधेयक तैयार करने के वादे से सरकार पीछे हट गई है।

विधेयक का मसौदा तय करने के लिए बनी केंद्र सरकार और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों की 10 सदस्यीय समिति की बुधवार को हुई सातवीं बैठक बेनतीजा रहने के बाद हजारे ने गुरुवार को यहां एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "जंतर-मंतर पर मैंने अपना अनशन इसलिए खत्म किया था क्योंकि सरकार ने हमारी मांगों को मान लेने का वादा किया था। अब सरकार अपने वादे से मुकर रही है। मैं 16 अगस्त से फिर से अनशन पर बैठूंगा।"

बेनतीजा रही बैठक के बाद सरकार की ओर से यह घोषणा कर दी गई कि सहमति व असहमति से जुड़े मुद्दों पर दोनों पक्षों के अलग-अलग मसौदे केंद्रीय मंत्रिमंडल को भेजे जाएंगे।

हजारे ने कहा, "सरकार ने अचानक अपना रुख बदल लिया है। यदि दो मसौदे ही तैयार करने थे तो उन्होंने संयुक्त समिति गठित ही क्यों की थी। यही करना था तो वे इसे पहले ही कर देते।"

उन्होंने कहा, "इतना समय बर्बाद करने की क्या जरूरत थी। इससे स्पष्ट हो गया है कि सरकार भ्रष्टाचार मिटाने को लेकर गम्भीर नहीं है।"

केंद्र सरकार पर वादों से मुकरने का आरोप लगाते हुए अन्ना हजारे ने कहा, "जब मैं अनशन पर बैठा था तो उन्होंने कहा था कि मैं जैसा कहूंगा, वे वैसा ही करेंगे। सरकार के वादे पर मैंने अपना अनशन खत्म किया। चूंकि सरकार गम्भीर नहीं है, मैं 16 अगस्त से फिर से अनशन पर बैठूंगा। चाहे मुझे मरना ही क्यों न पड़े। मुझे इसकी परवाह नहीं।"

उल्लेखनीय है कि इससे पहले पांच अप्रैल से नौ अप्रैल तक अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर लगभग 98 घंटे का अनशन किया था। इसी का नतीजा था कि सरकार लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए 10 सदस्यीय समिति बनाने को तैयार हुई, जिसमें सामाजिक संगठनों के पांच सदस्यों को भी शामिल किया गया।

सूचना का अधिकार कार्यकर्ता और समिति में सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि अरविंद केजरीवाल ने कहा कि विभिन्न बैठकों से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार सख्त लोकपाल विधेयक लाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती से पेश आने को तैयार नहीं है।

उन्होंने कहा, "देश को एक अच्छा विधेयक देने का एक बड़ा मौका यह सरकार गंवा रही है। अब तो जो भी हुआ नौटंकी था। सरकार का जो विधेयक है वह लोकपाल नहीं बल्कि जोकपाल विधेयक है।"

मसौदा समिति में सरकार और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर असहमति है। सामाजिक संगठन प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाने की बात कर रहे हैं जबकि सरकार के प्रतिनिधि इसके पक्ष में नहीं हैं।

इसके अलावा समिति की बैठकों का लाइव प्रसारण करने को लेकर भी दोनों पक्ष असहमत हैं। सामाजिक संगठन के प्रतिनिधि इसके लाइव प्रसारण के पक्ष में हैं जबकि सरकार के प्रतिनिधि इसका विरोध कर रहे हैं। सरकारी पक्ष कार्रवाई की ऑडियो रिकॉर्डिग करने के पक्षधर हैं।

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