साइकिल से
समाचार फेंकता हुआ लड़का
जाता है-
हवा से आग के पास
आग से पानी के पास
पानी से पृथ्वी के पास
पृथ्वी से चन्द्रमा के पास
चन्द्रमा से सूरज के पास
एक के बाद दूसरा और
दूसरे के बाद फिर पहला
चलता है यह क्रम
लगातार निरंतर प्रतिदिन
समाचार पहुँचाने से पहले
वह ढूंढ़ता है एक खास समाचार अपने
लिए
साइकिल पे कसता है अपनी मुट्ठियाँ
भारता है जोरदार पैडिल
गोली की तरह छूटती है साइकिल
लोगों को अब समाचारों की नहीं
घरों में समाचार पत्रों को जल्दी पहुचने की
चिंता रहती है
चार बजे जब सोयी रहती है दुनिया
अंधेरे में हिलती है साइकिल
पाँच बजे बजती है पहली घंटी
माँ बच्चे से
लड़का-माँ से
पति-पत्नी से
और दादा-पोती से
मांगता है समाचार पत्रा
पूरा समाचार आता है एक कप चाय में
चाय खत्म, समाचार खत्म.
‘‘कुछ नहीं रह गया है दुनिया में’’
दादा कहता है पोती से
पति कहता है पत्नी से
लड़का कहता है माँ से
और माँ कहती है हवा से
फिर भी दुनिया घूमती रहती है अपने अक्ष
पर
प्रकाश छांटता है अंधेरा
गर्मी के बाद बरसात
बरसात के बाद बसंत आता रहता है
सूदखोर के ब्याज की तरह
चलती रहती है साइकिल
बजती रहती है घंटी
रोज एक खास खबर को ढूंढ़ती रहती है
उसकी आँखें
और बरसात के बाद बसंत के आने की
प्रतीक्षा में
चलती रहती है साइकिल
अनवरत निरंतर लगातार.