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मैं तो आकर फौरन पिछड़े काम में डूब गया, यात्रा अत्यन्त व्यस्त रहकर भी प्रीतिकर रही थी कि थकान नहीं स्फूर्ति ही लेकर आया था. अंक पूरा तो नहीं कर पाया पिछली शनि को पर बहुत सा काम निबटा लिया है और रायपुर/भोपाल के भाषणों का लिखित रूप भी कुछ-न-कुछ कर ही लिया है- सिया रामायण वाले भाषण के और अस्मिता वाले के. इन की टेप
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यात्रा बुक्स और जनतंत्र जैसी अपनी सहयोगी संस्थाओं के साथ इस बार जब हमने बहसतलब के दूसरे हिस्से को आम आदमी के इर्दगिर्द रखा, तो नामवर सिंह चहके.
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कबीर पर लिखी गई पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’ पिछले कई महीनों से तीखी बहस और विमर्श का सबब रही है. हिन्दी में अकसर आलोचना की पुस्तकें बेहद नीरस और उबाऊ होती हैं और उनको पढ़ना भी कष्ट साध्य होता है. इसके विपरीत यह पुस्तक बतरस के रस से भरी है और इसे पढ़ना कई तरह के इतिहासों, किंवदंतियों, विश्वासों, दृष्टियों और मान्यताओं से गुजरना है. हालाँकि पुस्तक के कई पक्ष हैं और उन सब पर संक्षेप में बात करना भी एक स्तम्भ में न संभव है न वांछनीय. इसलिए यहाँ उसके कुछेक पहलुओं पर ही चर्चा होगी.
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‘‘आधुनिकता दृष्टि है, मूल्य नहीं आधुनिक रंगमंच की बात करते हुए हमारा पहला आशय एक दृष्टि सम्पन्न रंगमंच से है. एक ऐसा रंगमंच जो हमारे समय को, हमारे समाज को,.......हमारे जीवन के जितने अंतद्र्वन्द्व हैं, तनाव हैं, सुख-दुःख हैं, .......संवेदनाएँ हैं, मनुष्य के सारे प्रपंच हैं; इन सबको समेटे हुए हो. एक ऐसा रंगमंच जो मनुष्य के रूप में हमें ज्यादा बेहतर बना रहा हो. ऐसा रंगमंच, चाहे वह देश के किसी कोने में, शहर या कस्बा या गाँव में, कहीं भी हो रहा हो,
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अस्मिता-विमर्शों के बारे में एक सेमीनार की तैयारी के दौरान इंटरनेट छानते हुए अचानक ही एक वेबसाइट मिली जिस पर इस बात की खोज चल रही थी कि ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ यानी ‘व्यक्तिगत और राजनीतिक अभिन्न हैं’ का विचार आया कहाँ से?
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ईश्वर का अपना देश’ कहा जाने वाला केरल प्रदेश पिछले कुछ दशकों से विकास ‘अध्येताओं और नीति-निर्माताओं के बीच विशेष चर्चा का विषय रहा है. यह चर्चा ‘केरल मॉडल’ के नाम से मशहूर है. सामाजिक विकास के जो मानक निर्धारित किए गये हैं
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‘कथादेश’ का मई अंक. प्रसंगवश में अर्चना वर्मा का ‘फिर वही भाषा’ लम्बा और शास्त्रीय हो गया है, एक बोझिल गद्य की तरह. राजेश मलिक की कहानी ‘गांधी रोज बिकता है’ में कृत्रिमता है. रामकुमार सिंह की कहानी ‘बेटियों का घर’ में रिडमल का किरदार रोचक और मौलिक है किन्तु कहानी के अन्त में रिडमल को लांछित कर पता नहीं सिंह क्या हासिल करना चाहते हैं. अनुराग शुक्ला की कथा ‘कस्बाई कन्फेशंस एण्ड फेल्ड मैसेज’ अंक की अच्छी कहानी इस अर्थ में है कि इसमें सृजनात्मकता लिये हुए मौलिकता और इंटरनेटीय आधुनिकता है.
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भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा), इकाई-अशोकनगर द्वारा आयोजित ग्रीष्मकालीन किशोर एवं बाल नाट्य कार्यशाला का समापन आयोजन, दिनांक 25 मई 2010 को इप्टा के 68 वें स्थापना दिवस के अवसर पर किया गया. इस समापन समारोह का उद्घाटन जाने-माने नाट्य निर्देशक अरुण पाण्डेय (जबलपुर) तथा नाटककार इससार मोहम्मद खान (उज्जैन) ने किया.
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1981 में फिर एक बार रायपुर जाना हुआ. इस बार वहाँ की एक दूसरी नाट्य मंडली अवन्तिका ने अपने सदस्यों के साथ एक प्रस्तुति करने के लिए बुलाया था. इस नाट्य मंडली के संचालक निर्देशक मिर्जा मसूद थे जो मेरे साथ पिछले साल रायपुर में विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा’ में कथावाचक की भूमिका कर रहे थे.
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माँ, क्या तुम अभी तक जीवित हो?
मैं जिंदा हूँ, और तुम्हें शुभकामना भेजी है मैंने
और हो सकता है
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