24.6.08
दिन की शुरुआत अच्छी हुई, ऑफिस जल्दी पहुँच गई जिससे बुधवार यानी कल की कला डायरी के लिए कुछ काम कर सकूँ. पर खबरें करते-करते ही इतना वक्त हो गया कि कब साढ़े तीन बज गए पता ही नहीं चला. इतने में सुनील आ गया. आते ही रोबावी शुरू कर दिया, दरअसल मेरे लिए एक फोन था किसी पीआरओ का, उसने मेरा ईमेल आइडी पूछा, मैं बता रही थी तो सुनील ने इशारे से कहा “मेरा भी बताओ”. उसके चेहरे पर अजीब भाव थे. मैंने दे दिया. फोन रखने के बाद तो शुरू हो गयी उसकी बकवास जो जिस भी थ्नदबजपवद में जायेगा वहां अपनी ई-मेल आई डी के साथ मेरा भी कांटेªक्ट नं. और ईमेल आइडी देकर आएगा वरना उसकी खबर नहीं लगेगी और जो जहां जाएगा, वहां पर जो भी गिट मिलेगा वो मुझे आकर बताएगा, जिससे मुझे यह पता रहे कि उसने कुछ दिया है, तो मैं उसकी खबर कम से कम डस्टबिन में नहीं फेंकूँ.“ यह विशेषतः मेरे लिए ही था क्योंकि मैं ही ऐसी बीट देखती हूँ जिसमें एजेंट/पीआरओ होता है. उसके बाद मेरी ई-वर्शिपिंग वाली खबर पर जब मैंने कहा कि कालका मंदिर के प्रेस सचिव से बात करती हूँ, तो सुनील ने कहा कि ”हम उससे बात नहीं करेंगे, सीधा महंत से बात करो, छोटे लोगों से बात हम क्यों करें.“ मैंने सोचा इसमें छोटे बड़े की क्या बात है, जो जिस काम के लिए है, उससे उसी संदर्भ में बात की जाएगी ना. फिर भी थोडा़ तेरा भला हो! तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात. सुनील ने मुझे कहा कि कल ‘मुझे दो सिनेमा घरों के रेट की लिस्ट चाहिए. मैंने कहा.”फ्राइडे को मेरा वहां जाना होता है उसी दिन बता दूंगी“ उसने कहा, ”नहीं कल ही चाहिए“ तो मैंने उसे समझाया ”सिनेमाघर वाले सिनेमा परिसर में बिना टिकट घुसने ही नहीं देते मैं अन्दर कैसे जाऊँगी“. उसने बड़े प्यार से रोबीले अंदाज में कहा, ”अरे तुम जाओ उनसे कहो कि मैं केयरिंग सर्विसेस से आई हूँ. उत्तराखंड में एक काॅम्पलेक्स बन रहा है यहां जैसा, तो हमें वहाँ की कैंटीन का काॅन्ट्रेक्ट मिला है, हमें देखना है आपकी पैकिंग कैसी, है, क्या देते हो इत्यादि. इसलिए अन्दर जाना है. अगर ज्यादा कुछ कहे तो अपना नाम रीटा शर्मा बता देना. एडरेस 17-ए, न्यू डिफेंस काॅलनी, नई दिल्ली बता देना. बस फिर कोई नहीं रोकेगा.“ उसके बाद हँसते हुए सामने बैठे प्रकाशचंद्र आॅफिस में कार्यरत सर को मुस्कुराते देख उनकी ओर देखते हुए कहा ”हाँ ये सब तो करना ही पड़ता है इस फील्ड में.“ उन्होंने कहा ”हाँ-हाँ ये तो है ही!“
मुझे अब से पहले यह एहसास नहीं था कि सुनील इतना गिर सकता है कि वो साफ-साफ शब्दों में मुझे झूठ बोलकर खुद के लिए गड्ढा खोदने की बात करेगा. एकदम सोच से परे एक शैतान है जो मेरे ईद-गिर्द मँडराता है मुझे तबाह करने, परेशान करने के लिए. आज मुझे अपनी ”कला डायरी“ के लिए सुनील ने कहा कि वो भी आज से मेरे फोल्डर में डाल देना, जरा देखूं तो क्या लिखती हो कला डायरी में.“ मैं सोचूंµ इसको क्या जरूरत पड़ी कला डायरी पढ़ने की जबकि यह तो पहले मुझे कहता था कि ”अरे जो रुटीन खबरें देती हो उसी को पेल दो कला डायरी में. क्या उसके लिए फालतू मेहनत करती हो.“
25.6.08
आज सुबह नोएडा आॅफिस गई, वहाँ से कला डायरी बनाकर (आधी) गे्रट इंडिया प्लेस गई जहां हरमन वाबेजा आया था. वहाँ से सीधा आइ एन एस आफिस तकरीबन 3 बजे पहुंची. पहुंचते ही लिस्ट बताने के लिए सुनील को फोन किया. उसने फोन पर ही झिड़की दे दी ”अब लिस्ट बताओगी तुम मुझे, रखो फोन, मैं पहुँच रहा हूँ.“ पहुँचकर उसने कहाµ खबरों की लिस्ट मुझे 12 बजे मिल जानी चाहिए. जबकि मेरे कुलीग कोई भी 1-2-3 बजे से पहले फोन करके लिस्ट नहीं बताते थे. मैं चुप रह गई. आने के बाद भी उसने मुझे कितना सुनाया. हड़बड़ी में और उसके आदेश के पालन में कि मुझे बावेजा के प्रोगाम में नहीं जाना, यह कह दिया कि मेरी गाड़ी खराब हो गई थी निजामुद्दीन ब्रिज पे. उसने कहा तो फिर मुझे फोन करके बताती कि गाड़ी खराब हो गई तो मैंने कहा कि बेलेंस नहीं था. तो बोला ”मुझे मिस काॅल कर देती या एक मैसेज मार देती.“ मैंने कहाµ ठीक है सर आइंदा मिसकाॅल कर दिया करूंगी. तो वो आंखंे फाड़कर हाथ और गरदन व्यंग्य में हिला हिलाकर कहता हैµ”कर दिया करूंगी नहीं, कभी-कभी आकेजनली वर्ना तुम मुझे फोन करके बताओगी“. मंै बिना कुछ कहे आफिस से बाहर आ गई. लगभग डेढ़ घंटे बाद सुना कि वो मेरे यहां रिपोर्टर उत्तम से कह रहा था. ”अरे यार उत्तम तुम्हारा एयरटेल टू एयरटेल फ्री है ना देना जरा बात है“ उत्तम ने झट से जबाव दिया ”सर में फ्री थोड़े ना है और वैसे भी अब फ्री मिनट्स बचे नहीं हैं फिर भी एकाध मिनट है सर कर लीजिए“ उसका मुंह ही बन गया. अभी थोड़ी देरे पहले मुझे कह रहा था कि उसे फोन करके बताऊँ जो भी बात हो और अब उसके पास खुद के रिश्तेदार को फोन करने के लिए दूसरों से फोन उधार लेना पड़ रहा है. मुझे फोन के वाकये से जुड़ी हर बात याद आने लगी.
हते में दो बार तो वह मुझे केवल फोन करने के लिए ही डाँटता रहता था. ”कुछ भी हो मुझे“. मैं क्यों फोन करूं उसे कभी समझ ही नहीं आया. वैसे तो बहुत दिनों तक टालती रही अचानक एक दिन उसने मुझे कहा कि ”मैंने तुम्हें एक ई-मेल भेजा है चेक कर लो.“ मैंने कहा ठीक है. उसकी बात पर ध्यान दिये बिना 2-3 दिन तक उस ई-मेल को पढ़कर भी शांत रही. उस मेल में लिखा था कि मैं फोन नहीं उठाती यह बहुत बड़ा अपराध है, मुझे इसका जबाव देना होगा. मन किया कि लिख के दे दूँ ”तेरे बाप ने दिलाया है क्या फोन जो तुझे फोन करूं या फोन उठाऊं. हमार मर्जी है नहीं उठाएंगे. बस“. फिर उसने मुझे टेकाµरीतिका उस ई-मेल का जबाव देना’. मैंने कहाµठीक और दतर से निकल आयी. अगले दिन मैंने एक ई-मेल जवाबी तौर पर दे दिया जिसमें मैंने फोन ना उठाने का कारण गाड़ी चलाते रहना या किसी प्रोग्राम में होना लिखा.“ उसके ई-मेल में ध्यानार्थ बिग बाॅस को था. इसलिए मैंने भी ध्यानार्थ बिग बाॅस करके डेस्क पर इस्तेमाल हो रहे बिग बाॅस की आईडी पर भेज दिया. बस फिर क्या था वहां वो खुला और सुनील के पास फोन ही फोन आने लगे. उसकी शक्ल देखने लायक थी. जब वह बाहर निकलकर गया बात करने के लिए तो मैं समझ गई ”लल्लू आज आया है अंटे में“. मजा आया उसकी शक्ल देखकर, बहुत मजा आया. गुस्से में भिनभिनाते हुए दतर में आया और लगा चिल्लाने,. उसका पूरा मुंह बंदर की तरह लाल हो गया था और सुटुककर उसकी बंदर जैसे मुंह का आकार भी हो गया था. मुझे बुलाया ‘यहां सुनो’. मैं गई. ”तुमने वो बिग बाॅस जी की आई डी पर भी भेजा था“. मैंने कहा, हाँ. तो पूछा ‘क्यों’ मैंने कहा उसमें ‘ध्यानार्थ’ लिखा था, ‘ध्यानार्थ’ का तो मतलब ही यही होता है कि तीसरा व्यक्ति बिना किसी सीधा संवाद के उस कम्यूनिकेशन में शामिल है. उसने कहा, ”ज्यादा स्मार्ट मत बनो, काम करने आई हो, काम करो, तुमको मौका मिला है सीखने का सीखो, तुम तो मुझे प्रताड़ित करने में लगी हो. वहां डेस्क पर सब तुम्हारी चिठ्ठी को पढ़कर मजे ले रहे हैं, इससे मेरी नहीं तुम्हारी बदनामी हो रही है.“ मैंने मन ही मन कहा साले मेरी बदनामी होगी कि तेरी हो रही है, वैसे ही मुँह लाल हुआ पड़ा है, सबके सामने तेरी करतूत तो खुल रही है कि किसी को परेशान करने के लिए कितनी साधारण बात को कितना हाईप दे रहा है. मैंने मुंह पर कुछ कहा नहीं चुपचाप खड़ी रही. फिर वो बोला ‘‘चलो भागो यहां से.’’ मन किया कि चप्पल से मुंह रंग दूँ पर बिना कुछ कहे आ गई. इसके बाद ‘ओपन वार’ शुरू हो गया. उसने सभी सहकारियों से कह दिया’ इसके काम में कोई नहीं मदद करेगा, कोई इसे कम्प्यूटर नहीं देगा इत्यादि. मैं जब इन ‘बातों को सुनती, मुझे महसूस होता यह अपने आपको बड़ा पत्राकार कहने वाला व्यक्ति मुझसे कितना आतंकित है जैसे मैं कोई तोप हूँ. जब मुझे वश में करने का कोई उपाय नहीं मिला तो अपने पद का इस्तेमाल करके दूसरे लोगों को निर्देश देने लगा. हद है ना! यह ई-मेल का वाकया तब हुआ जब गुरुवार के छुट्टी के दिन मैं किसी काम से नोएडा वाले दतर गई और वहां बिग बाॅस मिल गया. मुझे बुलाकर पूछा. कोई दिक्कत तो नहीं है. मैंने उससे कहा कि सुनील जी का व्यवहार अच्छा नहीं है, वो मेरे काम के बारे में ही ततीश करें तो ठीक है पर वो तो मेरे ब्याॅयफ्रेंड, व अन्य पर्सनल चीजों के बारे में पूछते हैं. मुझे पंसद नहीं कि सुनील जी मेरे कपड़ों या साज-सज्जा पर कोई कमेंट करें पर वो तो रुककर, मुड़कर, पलटकर कमेंट करने से नहीं चूकते कि मैं पार्टी में जा रही हूँ क्या, बड़ा अच्छा मेक-अप या ड्रेस पहना है. इसके अलावा मुझे शाम को आॅफिस से पिक करने कौन आता है, मैंने बताया मेरा भाई तो रहता है भाई या कोई और इसके अलावा जब भी मैं किसी लड़के से बात करती हूँ तो वो उसके साथ मेरा अफेयर बताता है और भरी दतर में कुछ भी बोल देता है.“ इतना बोल देने के बाद मुझे लगा कि बिग बाॅस शायद चिंतित होगा पर वो बहुत मुस्कुराकर कहता है कि अरे यह सब छोटी-छोटी बातें हैं इन पर ध्यान मत दो, तुम अलग कल्चर से आई हो इसलिए तुम्हें अजीब लगता है, ये तो नार्मल बातें हैं उसने फिर मुझे एक कहानी सुनायी जो इस प्रकार है.
”एक बार में टोपाज ब्लेड के मालिक की बेटी की शादी में गया. वहाँ देखा कि प्रवेश द्वार पर टोपाज मालिक और दूसरी ओर उसकी पत्नी खड़े रहकर आनेवालों का अभिवादन कर रहे थे. मुझे बड़ा अजीब लगा ये देखकर कि आनेवाली महिला मेहमानांे को पति गले मिलकर, गालों पर चूमकर स्वागत करता है और पत्नी इसका ऐसा ही पुरुष मेहमानों के साथ पेश आ रही थी. तो ऐसे में यदि मैं वहां से लौट आता तो मेरा ही नुकसान होता ना इसलिए मैंने भी आगे बढ़कर वही किया जो सब कर रहे थे और तभी मैं आज इस संपादक की कुर्सी पर बैठा हूँ. इतना मैनेज तो करना पड़ता है. कुछ मत सोचो केवल काम पर ध्यान दो जो सुनील बोलता है उसे हल्के से ठीक है ठीक है कहकर जाने दो वरना तुम्हारा प्रोग्रेस प्रभावित होगा. किसी का कुछ नहीं जाएगा.“ मन किया लात ही लात जमाऊँ साले में, ऐसे सम्पादक बना है तो मैं जीवन भर सम्पादक बनना नहीं चाहूंगी. खैर जो भी हो इस घटना के बाद मंैने जान लिया कि स्वभाव में यह सुनील का बाप है इसलिए इससे कुछ नहीं कहूंगी और अपने दम पर सुनील की बातों कड़ा जबाव देते हुए सामना करूँगी.
सुनील से कुछ मुलकातों के बाद ही उसका व्यवहार मुझे कुछ ठीक नहीं लगा. हुआ यूँ कि मेरे शुरुआती दिनों के रिपोर्टिंग में कोई वयस्क महिला सिने कलाकार का प्रोग्राम कवर करके आयी. मैंने उसी अभिनेत्राी का फोटो मैंने दिखाया उसके मांगने पर तब वह कहता है कि ”कौन है ये झुमका“ उम्रदराज औरतों को झुमका कहते हैं हम. मन में आया मुंह रगड़ दूँ उसका जमीन में. पर चुप रही और बुरा-सा-मुंह बनाकर वहां से चल दिया. मेरे जाते-जाते वह अट्टहास करता रहा देर तक. मैंने सोचाµकैसा इंसान है जो व्यवस्था और औरत को एक साथ लज्जित कर रहा है सरेआम! इसे कोई शर्म है या नहीं. ठीक अगले दिन मैं फिल्म रिव्यू के लिए फिल्म देखकर आयी. वहां सब पत्राकारों को ‘मिनी फिल्म रिपोर्टर मैग्जीन मिलती थी. जिसमें भोजपुरी व अन्य फिल्मों का प्रचार पोस्टर रहता था. मंै लेकर आई तो वह आदतानुसार मुझसे माँगा. मैंने दे दिया तो वह मुझे बुलाकर कहता है कि इसे पढ़ो. वहां भोजपरी फिल्म ‘एक बलम जी’ का एड था. मैंने पूछा ‘क्यों’ तो वो कहता है पढ़ो ना एक काम ह.ै मैंने कहा ”क्या“ तो कहता है ”झुमका“ ”मेरा आदेश है इसे पढ़ो,“ मैंने साधारण तरीके से पढ़ाµ‘ए बलम जी’ तो उसने मुझे कहा एक बार फिर से पढ़ो. मैंने फिर से पढ़ा, ऐसा उसने 3-4 बार करने को कहा और बार-बार कहता रहाµठीक से पढ़ो, मैंने अपनी साधारण भाषा में बिना कोई बदलाव लाये एक फिल्म का नाम पढ़ने जैसा हर बार पढ़ा. हारकर उसने कहा ”तुम वैसे नहीं बोल रही हो जैसे भोजपुरी भाषा में इसका उच्चारण होता है अपने पति को बुलाने के लिए.“ उसके बाद तमाशा देख रहे सहकारियों की ओर देखकर खुद ही बोला. ”ऐ बलम जी“ और फिर बोला कि ”ऐसे बोलो“. मैंने कहा मुझे नहीं आता ऐसे बोलना तो बोला ”चलो भाग जाओ यहां से.“ उसे दस लोगों के बीच अपनी बात नहीं माने-जाने का अफसोस चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था. उसके बाद पूरी शाम वो मुझसे चिढ़-चिढ़ कर बोलता रहा किसी और चीज के लिए.
6.8.08
रक्षाबन्धन के लिए राखियों पर स्टोरी करके लाई थी चाँदनी चैक से. आॅफिस पहुँचकर मैं स्टोरी कम्पोज करने लगी. वो आया. मैंने नहीं गौर किया. मैं पिछले कुछ दिनों से जब से मैं ज्यादा असहज महसूस करने लगी थी, मैंने उसका अभिवादन करना छोड़ दिया था, बस जब काम होता था तभी बोलती थी वर्ना जाते वक्त ही बोलती थी कि सर निकल रही हँू. खैर आज उसने आते ही पूछाµक्या स्टोरी है तुम्हारी, मैंने कहा ”आज राखी पर दूंगी स्टोरी.“ वो बोलाµठीक है. फिर मौसम, इसरार इत्यादि से बातें करने लगा, उसकी बातचीत में मैं इनवाल्व नहीं थी. अचानक उनसे बोलते-बोलते मुझसे कहता है कि ”तुमने कितनी राखियाँ खरीदीं हैं वहां से. मैंने कहाµसर महँगी थीं, इसलिए नहीं खरीदी. बाद में ले लूंगी. तो कहता हैµ तुम रक्षाबंधन के दिन सबके लिए राखियां लाओगी और दतर के सब लड़कों को बांधोगी“, यह लगभग आॅर्डर देने जैसा था फिर भी मैंने कुछ ध्यान दिये बिना कह दिया ”ठीक है“ तो वो चिंहाड़ के कहता है ”ठीक है नहीं तुम लाओगी और सब लड़कों को बांधोगी , सब...समझ लो सब.“ मैं झेंप गईं मैंने कहाµ”सर मैंने कहा तो हां बांध दूँगी इसमें क्या है.“ तो वहाँ बैठे इसरार ने कहा ”सर ‘मैं’ उस दिन छुट्टी पर रहूंगा.“ सुनील कहता है ”हां तू तो रहेगा ही और भी जितने लड़के हैं सब छुट्टी पर ही रहेंगे उस दिन और ठठाकर हंसने लगा. इतने में शरद ने कहा ”पहले सर बोलने वाला बंधवाएगा.“ सुनील ने कहा - मुझे कोई प्राब्लम नहीं है इत्यादि - इत्यादि फिर मुझे बहुत तेज गुस्सा आया. मैंने कहा ”सर मैं सबको बांधने के लिए तैयार हूँ पर आपको भी यह आॅर्डर देना होगा कि सब लड़के बंधवाएंगे सोच लीजिये.“ तो कहता है” देखो मैं तो सिर्फ बोल ही सकता हूँ. जहां तक मेरा सवाल है मैं बंधवा लूंगा, बाकी को तुम मनाओ.“ तो मैंने कहा ”फिर आप क्यांे मुझे आॅर्डर दे रहे हैं कि मैं राखी लाऊँ और सबको बांधू. इतनी नीच सोच है क्या यहाँ सब लड़कों की बहन ना हो तो किसी लड़की को इज्जत से नहीं देखने की कसम खाई है.“ उसने कहाµ”ठीक है काम करो.“ मैं काम करने लगी फिर शाम को राम सिंह दतर आया, वे हमारे यहां डीडीए, एमसीडी, हेल्थ देखता है. उसके आने पर सुनील ने मुझे बुलाया और कहता है.µ”तो रीतिका ला रही हो ना तुम राखी“ मैं उसका मुंह देखने लगी कि दुबारा फिर उसी टाॅपिक पर आ गया तो कहता है धीमे से ”बोलो ना...बोलो ना राम आ गया है, उसे इस तरह चिढ़ाने में मजा आएगा.“ मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा मैंनेµ”क्या सर छोड़िए ना एक ही बात को क्या बार-बार बेकार में रिपीट कर रहे हैं. उनको सुनाकर क्या होगा.“ कहकर मैं अपना काम करने लगी. उसका मुँह बन गया, मैं उसका ताज्जुब मानने लगी कि वह व्यक्ति इतना निर्लज्ज है कि एक साधारण व्यक्ति में और राम दोनों को बेकार की बातों से परेशान करने के लिए कुछ भी कर सकता है, इतनी ओछी हरकत कि (मुझसे जिससे उसका बैर है) उससे भी प्यार से और अपने पक्ष में बोलवाने के लिए मजबूर होता है. मैं तो हद मानती हूँ उसकी हिम्मत पर कि तो उसकी बेइज्जती उसके मुंह पर करने के बावजूद उसे समझ नहीं आती.
आज प्रमोद श्रीवास्तव दतर आये थे. कल शनि पूजा थी तो आज के अखबार में उसकी तीन काॅलम खबर गई. अखबार देखते हुए उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि शनि जयंती जैसे धार्मिक चीजों पर हम एक या दो कालम की ही स्टोरी देंगे, अब से ध्यान रखना और सुनील को बता देना, मैंने कहा ‘ठीक’ है’, शाम को सुनील आया, मेरे पास दो ही खबरें थीं तो सुनील नेे बुलाकर कहा कि ”केवल दो खबरें हैं, ऐसे नहीं चलेगा, कम-से कम तीन खबरें रोज अनिवार्य हंै, काम करने आई हो तो काम करो, इससे जीवन में कुछ सीख पाओगी. (आज खबरों में पुस्तक विमोचन और नाटक रिव्यू दिया) धर्म-कर्म की तो भूल ही गयी हो तुम“. तो मैंने कहा कि आज प्रमोद सर आये थे शनि जयंती की खबर पर बिगड़ रहे थे कि धर्म-कर्म की खबर इतनी बड़ी नहीं जाएगी और बे वजह भी नहीं जाएगी.“ तो उसने कहा कि ”तुमने मुझे बताया कि ऐसा कह रहे थे, तुम तो मुझे लिट ही नहीं देती आजकल, सबसे बात करती हो, मुझसे नहीं करती हो, आॅफिस में सब मुझसे बताते हैं कि क्या चल रहा है आॅफिस में मेरे पीछे, तुम तो कुछ बताती ही नहीं, कौन क्या कह रहा था, सब एक धारा की ओर है, तुम पता नहीं किस धारा में बह रही हो, आजकल हैलो-हाय भी नहीं करती, मैं इतना बुरा हूँ क्या देखने में जो मुझे भाव ही नहीं देतीं“ फिर अपने आप ही ही करके हँसने लगा. मैं घर के लिए निकल गई.