अपने दुख मुझको ई-मेल करो,
एक बड़ा सम्मिलित आवेदन लेकर हम
जाएंगे ईश्वर के दफ्तर“, उन्होंने कहा.
हम उन्हें घेर बैठे गए.
आखिर वे ईश्वर के पी.ए. थे.
कितनी बातें पूछनी थीं हमें
उसके बारे में.
कितने बजे लंच करता है ईश्वर.
कौन कह रहा था ये सच है क्या
इन दिनों वह डायटिंग पर है
खाता है केवल सलाद.
कहां-कहां हाॅलिडे मनाता है.
मेमसाहब कैसी हैं ईश्वर की.
उसके बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं.
हिंदी तो आती नहीं होगी.
कृषिभवन में बैठता है कि शास्त्राी भवन में
फाइलों पर क्या कविताई ही करता है.
किस ब्राण्ड की होती हैं उसकी शर्टें.
अनुसूचित देवताओं से पेश कैसे आता है.
माक्र्स देवता, सात्र्रा देवता, देरिदा देव;
कैसे हैं इसके समीकरण
छोटे-बड़ों से.
ईश्वर हमारा स्टार जो ठहरा,
ईश्वर के बारे में बतियाते
हम अपने दुःख भूल जाते.
इस तरह
जहां-का-तहां रहता ईश्वर
जहाँ के तहाँ रहते दुःख सारे,
बदलते तो बस अपनी सीट हम बदल लेते
आगे-पीछे उस चटाई पर
और जारी रहता है वो तमाशा
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बुलेटिन के पहले.