जिस सिद्धांत के तहत आजकल ”प्रेस“ को लोग मीडिया कहने लगे हैं, उसी परपंरा के मुताबिक कविता का नाम बदलकर अब लाफ्टर चैलेंज हो गया है. मेरे शहर के एक होनहार कवि को एक होनहार श्रोता ने कहा कि बीस साल से कागज गोद रहे हो अभी तक एक भी ठिकाने की कविता नहीं लिखी. दम है तो लाफ्टर चैलेंज में जाकर दिखाओ. गुरु, मान जाएँगे. उस श्रोता की सलाह का कवि के दिमाग पर ऐसा असर हुआ कि वह कविता छोड़कर ”मिमिक्री“ करने लगा है, तथा शोले के गब्बरसिंह की आवाज ”हूबहू“ निकल लेता है. ”क्यों रे कालिया कितने आदमी थे.“
मैं शुरू से ही कविता के पचड़े में नहीं पड़ा. अपना ऐसा है कि थोड़ी बहुत शेर शायरी पढ़ लेते हैं और मूड बन जाये तो कभी कभार अफसरों की विदाई समारोह में तुकबंदी कर लेते हैं. कविता को लेकर ज्यादा माथापच्ची करना अच्छली बात नहीं है. लेकिन पिछले दिनों एक स्वनाम धन्य पत्रिका के संपादक का बयान पढ़ा तो मैं थोड़ा सीरियस हो गया. उसने कहा कि (सम्पादक ने) कविता अब हाशिये की विधा बनती जा रही है और स्थिति यदि ऐसी ही रही तो वह हाशिये से भी खदेड़ दी जाएगी. इस समस्या से निपटने के लिए संपादकजी ने आठ दस छँटे हुए कवियों की कविताओं को अपनी पत्रिका में बहुत सम्मानपूर्वक छापा और एक झटके में कविता को हाशिये से खींचकर मुख्यधारा में ला खड़ा किया. बाद में पता चला कि ये सभी कवि संपादकजी के परम मित्रा हैं और उनकी कविताएँ ऐसी ही छपती रहीं तो उन लोगों की मित्राता और भी घनिष्ठ हो जाएगी. कविता का जो भी हो दोस्ती बड़ी चीज है.
परसों एक विचार गोष्ठी में एक बुद्धिजीवी ने कविता के बारे में तो बहरहाल कुछ नहीं कहा लेकिन मीडिया को काफी भला बुरा कहा. (भला तो खैर बिल्कुल नहीं कहा ज्यादातर बुरा ही कहा). उसने बताया कि मीडिया के आचरण को संतुलित करने की जरूरत है क्योंकि वह आम आदमी की जिंदगी में जरूरत से ज्यादा हस्तपेक्ष कर रहा है. इस बयान को सुनकर मीडिया वाले कैमरा लेकर उस बुद्धिजीवी के घर पहुँच गये तथा तत्काल उसका एक इंटरव्यू ले डाला. बुद्धिजीवी ने नया सूट पहनकर बहुत प्रसन्नतापूर्वक इंटरव्यू दिया तथा मीडिया की सजगता की जमकर तारीफ की. मीडिया का आचरण एक झटके में संतुलित हो गया.
कविता के बारे में हालाँकि मैं ज्यादा नहीं जानता पर मीडिया का बहुत सम्मान करता हूँ. आजकल मैं अपने खान-पान से लेकर पहनने ओढ़ने तक के सभी मुद्दों पर मीडिया पर निर्भर होता जा रहा हूँ. परसों मीडिया ने पेट्रोल के दाम गिरने की खबर सुनायी और मैं फटाकदिनी से गाड़ी उठाकर पेट्रोल पंप की दिशा में प्रस्थान कर गया. पेट्रोल के दाम चाहे आठ आने गिरे हों पर अपना दिल बल्लियों उछल पड़ा. मीडिया वाले भले ही मेरा इंटरव्यू न लें, मैं मीडिया की सक्रियता के आगे नत मस्तक हूँ. आदमी यदि सीखना चाहे तो मीडिया से बहुत कुछ सीख सकता है. जैसे पिछले दिनों मैंने यह सीखा कि यदि बोरिंग कराये तो तो गड्डे का मुँह खुला छोड़ देना चाहिए ताकि उसमे ंकोई बच्चा गिरकर फॅस जाये. बच्चे को थोड़ी तकलीफ जरूर होगी पर मीडिया को, सारे देश में दया, करुणा और वात्सल्य जैसे मूल्यों को स्थापित करने में मद्द मिल जाएगी. जब भी मेरे इलाके में कोई बोरिंग कराता है, मैं प्रभु से यही प्रार्थना करता हूँ कि वह गड्ढे का मुँह खुला छोड़ दे. और उसमें कोई गरीब, फटेहाल, निरीह सा बच्चा गिर जाये. भई रिस्क तो लेनी पड़ेगी. बच्चा जब फॅसेगा ही नहीं तो मीडिया वाले क्यों आएंगे. और मीडिया वाले नहीं आये तो देश के लोगों का ध्यान गरीब बच्चों की तरफ कैसे जाएगा. सोचिये. प्रेम, सौहार्द और सहानुभूति के लिए बोरिंग के गड्ढे जरूरी हैं. मैं तो कहता हूँ चाहे आपका फँसे या हमारा फँसे, देश की एकता के लिए बच्चे का बोरिंग के गड्ढे में फँसना बहुत जरूरी है.
प्रेम के मामले में भी यह देश काफी पिछड़ा रहा है. वर्षों से लोग चुपचाप प्रेम करते थे और चुपचाप पिट लेते थे. बचपन से सुनते आ रहे थे कि ”प्रेम गली अति साँकरी है और प्रेमी और प्रेमिका इसमें इकट्ठे नहीं समा सकते. लेकिन पिछले कुछ वर्षांे से मीडिया ने इस अवधारणा को तोड़ दिया. मीडिया ने प्रेमियों को अँधेरी, सँकरी गलियों से निकालकर पार्कों, और चैड़ी सड़कों पर उतार दिया. अब वैलेन्टाइन डे के मुबारक मौके पर लोग खुले आम प्रेम करते हैं. कतिपय सामाजिक संगठन इन पे्रमियों पर जमकर डंडे बरसाते हैं जिसके जवाब में पुलिस वाले इन डंडे बरसाने वालों पर लाठियाँ चलाते हैं. इस प्रकार सारे देश में एकाएक गतिशीलता आ जाती है. कतिपय शहरों में तो इतनी धमाचैकड़ी मचती है कि यही पता नहीं चलता कि कौन किस पर लट्ठ चला रहा है. जो भी हो मीडिया ने ”प्रेम“ जैसे निजी चीज को सार्वजनिक बनाकर प्रेमियों पर बहुत उपकार किया है. यह मीडिया की ही जागरूकता का सुपरिणाम है कि अब काॅलेज का एक प्रौढ़ प्रौफेसर अपनी युवा छात्रा से सरेआम प्रेम इत्यादि कर सकता है और इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी कर सकता है. ये नहीं कि वर्षों तक टेक्स्ट बुक में चुपचाप लव लेटर फँसाकर दिये जा रहे हैं. सामने वाली फस्र्टइयर से फाइनल में पहुँच गयी और नतीजा वही ढाँक के तीन पात. मामला नैन मट्टका से आगे ही नहीं बढ़ा अरे यार, प्रेम कर रहे हो तो मटुकनाथ की तरह छाती ठोक कर कहो ना कि हाँ कर रहे हैं. और क्या गलत कर रहे हैं वर्षों तक मतिराम, देव, बिहारी, कबीर, पढ़ाते-पढ़ाते ऊब गये तो थोड़ा सा प्रेम कर लिया. पढ़ाई की मोनोटोनी तोड़ने के लिए बिचारा प्रोफेसर प्रेम नहीं करेगा तो क्या घास छीलेगा. जबकि छीलने के लिए ससुरी घास भी नहीं बची है आजकल कालेजों में.
अभी पिछले दिनों बम्बई में माहिम के समंदर का पानी मीठा हो गया था. यहाँ भी मीडिया ने अपनी जागरूकता का अभूतपूर्व परिचय दिया. सुबह-सुबह जब लोग ठीक से जागे भी नहीं थे, यों ही बिस्तर पर आॅखें मिचमिचा रहा थे कि इस चमत्कार से उनके नेत्रा अचानक विस्फारित हो गये. जैसे चित्राकूट के घाट पर कभी संतन की भीड़ मची थी, उसी स्टाइल में माहिम के ”बीच“ को यारों ने कैमरों संे पाट दिया. लोग मीठे पानी में नहा रहे थे और हर नहाने वाले के पीछे अथवा आगे जहाँ भी सेट हो सका एक कैमरा तैनात कर दिया. हर किसी से पूछा जा रहा था, ”बताइये आपको यहाँ आकर नहाना कैसा लग रहा है? इससे पहले आप कब नहाये थे.“ इत्यादि. फकत चड्डी पहने हुए लोग और चड्डी को भी उतार देने को आतुर जनसमुदाय गर्व के साथ मीडिया से मुखातिब है. मीठे पानी में नहाने की ऐसी रेलमपेल मची कि हजारों लोग एक झटके में नहा लिये. गनीमत है कि दोपहर तक समंदर का पानी वापस खारा हो गया. वरना मीडिया उस पानी में आग लगाने के चमत्कार भी दिखाता.
इधर कुछ दिनों से मीडिया की खोजी दृष्टि ने पुनर्जन्मों के प्रकरणों की भी पड़ताल की है. हर दो चार दिन में एक दो पुनर्जन्म के मामले सामने आ रहे हैं. लोग दिल खोलकर अपनी याददाश्त को सक्रिय करने में लगे हंै कि वे पिछले जन्म में वे आखिर थे तो क्या थे. ऐसे-ऐसे लोग दिखाई पड़ रहे हैं जिन्हें यह तक पता है कि वे पिछले जन्म में साँप अथवा बंदर थे और एक अदद पीपल के इर्द गिर्द रहते थे. चैनलों पर पुनर्जन्म की वारदातें देखकर मैं अपने इलाके के कई लोगांे के पिछले जन्मों के बारे में अजीब तरीके से सोचने लगा हूँ.एक आबकारी का दरोगा मुझे ऐसा लगता है कि वह पिछले जन्म में नोट छापने के कारखाने का मालिक रहा होगा. एक युवा नेता को देखकर लगता है कि वह अपने पिछले जन्म में मगरमच्छ अथवा सियार रहा होेगा. और भी कई लोग है जिन्हें देखकर उनके पिछले जन्म की अपार जिज्ञासाएँ हैं. मैं मीडिया वालों को बहुत गंभीरतापूर्वक अपने शहर में आमंत्रित करना चाहता हूँ कि वे यहाँ आकर पुनर्जन्म के मामलों की जाँच पड़ताल करें.
इन दिनों देवी देवताओं की मूर्तियों से आँसू अथवा भभूत निकलने वाली घटनाओं पर विशेष तौर से मीडिया अपनी ”स्टोरी“ कर रहा है. मेरी माँ ने बताया कि भैया लगता है सतयुग आ रहा है. आदमी रोता है तो कोई आँसू पोंछने वाला नहीं मिलता और मूर्तियों की आँख में आँसू देखने अपार जनसैलाब उमड़ पड़ा. मीडिया इस दिशा में भी (सुनते हैं) प्रयासरत है कि जिस मूर्ति से भभूत निकल रही है आगे चलकर वहाँ से खाद्यान्न आदि भी बरामद हो सकता है. सभी मूर्तियाँ यदि इस चाले में पड़ गयीं तो देश में भुखमरी की समस्या फट से सुलझ जाएगी. मुझे लगता है मीडिया सही दिशा में जा रहा है. तभी तो कहता हूँ कि मुझे अपने देश की मीडिया पर पूरा भरोसा है. अभी परसों पत्नी ने कहा कि, लगता है गर्मी के दिन आ रहे हैं. मैंने कहा तुम्हें कैसे मालूम.
देखो ना, आँगन में नीम की पीली पत्तियाँ गिरने लगी हैं. पतझड़ शुरू हो रहा हैं. मैंने कहा नीम की पत्तियों से कुछ नहीं होता. ठहरो मैं टी.वी खोलता हूँ. जैसे ही टी.वी. खोला पता चला उत्तर में बर्फ पड़ रही है. सैलानी लोग बर्फ के पहाड़ों पर जा रहे हैं तथा उनके पीछे मीडिया वाले कैमरा टाँगे घूम रहे हैं. मैंने झट स्वेटर पहना और धूप में जाकर बैठ गया.