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संवाद प्रतिवाद : क्या साहित्य का कोई केन्द्र होता है?

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भाई और कवि बद्रीनारायण, ‘कथादेश’ के जुलाई अंक में तुम्हारा लेख ‘साहित्यिक दुनिया का वर्तमान’ देखा और पढ़ा, जो साहित्यिक संसार के शक्ति-केंद्रों पर लिखा गया है. बेशक लेख में जताई गई चिंताएं वास्तविक हैं और बहस तलब भी. इसमें भी शक नहीं कि जो अपनी युवावस्था के आरंभिक काल में अपने आरा शहर में तुम्हें अनुभव हुआ था- जहां साहित्यिक शासकों को किसी न किसी रूप में साहित्यिक टैक्स देना पड़ता थाµ वह आज भी मौजूद है. हकीकत तो यह है कि साहित्यिक टैक्स वसूलने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. साहित्य के सूबेदार हिंसक तरीके से अपना कारोबार चला रहे हैं और बढ़ा रहे हैं. हालाँकि टैक्स लेने की कई विधियां हैं. कुछ लोग टैक्स नहीं लेते बल्कि दान-दक्षिणा लेते हैं. बड़े साहित्यकार साहित्य के जगीरदार की तरह व्यवहार कर रहे हैं. दिल्ली और अन्य महानगरों में बैठे ये जागीरदार कभी मठ के महंत का रूप घर लेते हैं तो कभी अपने से बड़े और ताकतवर साहित्यिक जागीरदार के दलाल. ऐसे में कई बार युवा लेखक दिशादीन हो जाता है.

बद्री, फिर भी मुझे लगता है कि साहित्य के संसार में व्याप्त तमाम तरह की सड़ाध के बावजूद एक चीज है जो साहित्य की मूल प्रतिज्ञा और अस्मिता को कभी नष्ट नहीं कर सकती. मेरे विचार से समस्या यह नहीं है कि कितने सत्ता-केंद्र हिंदी साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं या टैक्स वसूलने वाले या दान-दक्षिणा लेने वाले अपने-अपने स्वार्थ के लिए क्या-क्या कर रहे हैं, समस्या यह है कि वातावरण में यह बात फैल रही है कि बिना किसी शक्ति-केंद्र का साथ पाए या किसी साहित्यिक मठाधीश का आशीर्वाद लिए साहित्य की दुनिया में जगह बनाना असंभव है. विश्व साहित्य का इतिहास बताता है कि यह एक भ्रांत धारणा है. सच्चा लेखक कभी छिपता नहीं, छ०ा लेखन ज्यादा जीता नहींµ यह अटल सत्य है.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि साहित्य में मठाधीशी बढ़ रही है और मठाधीश बढ़ रहे हैं. पर इसी का दूसरा पहलू यह है कि नए और उभरते युवा रचनाकारों का एक बड़ा वर्ग भी हमारे यहाँ है जो ‘साहित्यकार’ का सार्टिफिकट पाने के लिए बेताब है फिर कई अफसरों-अध्यापकांे के लिए साहित्य एक्स्ट्रा केरिकुलर एक्टिविटी की तरह है. ऐसे लोगों के लिए सबसे सुगम रास्ता यह बनता है कि वे किसी मठाधीश से सर्टिफिकेट ले लें. जब सर्टिफिकेट लेना है तो या तो टैक्स चुकाना पड़ेगा या दान-दक्षिणा देना पड़ेगा. इसलिए साहित्य में पंडे बढ़ रहे हैं.

साहित्य में बुनियादी सवाल यही रहा है और यही रहेगा कि ‘आप लिखते क्यों हैं. जिसके पास कुछ कहने के लिए है और जितनी निष्ठा कहने पर है, यानी अभिव्यक्ति पर है, उसके लिए मठाधीशों या साहित्य के सामन्तों का कोई मतलब नहीं है. कबीर और तुलसी से लेकर मुक्तिबोध तक का साहित्य इसका प्रमाण है. पर मुक्तिबोध के बाद दुनिया बदलने लगी और उचक्कापन बढ़ने लगा. मुक्तिबोध-परसाई-नागार्जुन-त्रिलोचन की पीढ़ी शायद आखिरी साहित्यिक पीढ़ी थी जो अपने लेखन में भरोसा करती है. उसके बाद ऐसे लेखकों की तादाद बढ़ने लगी जो अपने लेखन का प्रमाण अपने लिखे को नहीं, बल्कि अपने लिखे पर लिखी गई ‘समीक्षा’ को मानते हैं. कोई माने या न माने, बड़े-बड़े साहित्यिक मठाधीश भी रात के अंधेरे में अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं, वे भी यही विलाप करते हैं कि उनका सही मूल्याकंन नहीं हुआ और वे उपेक्षित हैं. दिन के उजाले में वे टैक्स वसूल लेते हैं, दान-दक्षिणा वसूल लेने हैं पर यह बात उनको चुभती रहती है कि वे अंदर से खोखले हो चुके हैं. रात में वे हिंसक रूप से दूसरों को गलियाना या करुण रूप से विलाप करना शुरू कर देते हैं. हिंदी साहित्य में उनका कुछ नहीं हुआ.

हरिशंकर परसाई का एक बहुत अच्छा व्यंग्य है ‘टार्च बेचने वाले.’ इसी तर्ज पर आज एक व्यंग्य लिखा जा सकता हैµ ‘साहित्य में सर्टिफिकेट बांटने वाले.’ लेकिन ये सर्टिफिकेट बांटने वाले ऊपर ही ऊपर कितने भी शक्तिवान या ताकत वर क्यों न दिखंे अंततः वे बड़े कमजोर और दयनीय होते हैं. उनका खोखलापन कई बार आक्रामक तेवर अख्तियार कर लेता है पर वे भी अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं. उनके इस रूप में अमूमन लोग अनजान होते हैं इसलिए उनको मठाधीशों या टैक्स कलेक्टर के तौर पर साहित्य-नियंत्राक समझ लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है.

इसलिए साहित्य के बारे में लिखने-पढ़ने वालों को यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह माहौल बनाते रहे हैं कि अच्छे लेखन का कोई विकल्प नहीं है. अगर ऐसा न होता तो दुनिया की छोटी कही जानेवाली भाषाओं में आज भी श्रेष्ठ लेखन न हो रहा होता. साहित्य में चाहे कितने भी शक्ति केंद्र न बन जाएंµ कल्पनाशीलता के आगे वे भुरभुरे साबित होंगे और सारे मठाधीश और टैक्स कलेक्टर जोकर के रूप में तब्दील हो जाएंगे.
वैद का सम्मान होगा या अपमान?

हालाँकि अभी तक यह अघोषित है फिर भी चर्चा में दम है कि कृष्ण बलदेव वैद को हिंदी अकादमी (दिल्ली) का ‘शलाका सम्मान’ देने में अड़चनें खड़ी की जा रही हैं. जैसी कि सूत्रों के हवाले से खबर आई थी कि हिंदी अकादमी की पिछली कार्यकारिणी ने लेखक कृष्ण बदलेव वैद को ‘शलाका सम्मान’ देने का फैसला किया था. वैसे वैद जैसे वरिष्ठ लेखक को यह सम्मान कई वर्ष पहले मिल जाना चाहिए था पर शर्मनाक बात यह है कि दिल्ली के छोटे नेताओं ने देरी से दिये जाने वाले सम्मान की राह में रोड़ा अटका दिया है.साहित्यिक हल्के में यह चर्चा है कि एक पुराने धूल धूसरित नेता ने दिल्ली के मुख्यमंत्राी को पत्रा लिखकर कहा है वैद को सम्मान नहीं दिया जाना चाहिए. मामला तब से अटका पड़ा है.

वैसे यह आश्चर्य की बात नहीं है कि छुटभैये नेता हिंदी अकादमी में यह दखलन्दाजी करते रहे हैं. लेकिन यह शायद पहला मौका है जब किसी छुटभैये नेता की वजह से हिंदी के सर्वाधिक वरिष्ठ लेखकों में से एक कृष्ण बलदेव वैद के खिलाफ इस तरह का अभियान चलाया जा रहा है.

खैर, उस छुटभैये नेता के कहने पर दिल्ली सरकार झुकती है या नहीं, यह देखना है. पर जिस तरह से फैसले पर विलंब किया जा रहा है उससे तो साफ जाहिर है कि हिंदी में श्रेष्ठ लेखकों को भी राज्य के हाथों अपमानित किया जा सकता है.

कृष्ण बदलेव वैद एक अराजनैतिक लेखक रहे हैं इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि उनके बारे में किसी राजनैतिक मकसद से इस तरह का अभियान चलाया जाएगा. वजह साफ है छुटभैये नेता का छोटा सा स्वार्थ. छोटे-छोटे स्वार्थ बड़े लेखकों को अपमानित करने लगे हैं. अगर हिंदी अकादमी वैद को सम्मान नहीं देती है तो आरटीआई के तहत यह सवाल दिल्ली सरकार से पूछा जा सकता है कि आखिर क्या वजह रही कि कार्यकारिणी का फैसला होने के बाद भी राजनैतिक स्तर पर यह फैसला रोका गया?

कृष्ण बलदेव वैद न सिर्फ हिंदी के बड़े उपन्यासकार और नाटककार हैं बल्कि के वे अमेरिका में भी हिंदी साहित्य का अध्यापन कर चुके हैं. उनका सम्मान इतना है कि एक चित्राकार मनीष पुष्कले ने अपने संसाधन से एक लाख का पुरस्कार ‘कृष्ण बलदेव वैद सम्मान’ देने का सिलसिला शुरू किया है. इसलिए वैद किसी राज्य सरकार के पुरस्कार के आकांक्षी ही नहीं हो सकते. लेकिन राजनीति करने वाले स्थितप्रज्ञों को भी अपना निशाना बनाने में नहीं चूकते. ये है दिल्ली महानगरी, जहां छोटे-छोटे नेता बड़े लेखकों पर पत्थर फेंकते हैं.

संपेरों की कौन सुनेगा?

हमारे समाज में कई ऐसे सवाल हैं जो लगभग अचर्चित रह जाते हैं और कारण समाज के एक बड़े वर्ग को और उससे जुड़े सांस्कृतिक पक्षों को गुमनामी की मौत मरनी पड़ती है. ऐसा ही एक पक्ष है संपेरा और बीन. संपेरा और बीन भारतीय समाज और इतिहास की सबसे प्राचीन स्मृतियों में एक है. पश्चिम में तो लंबे समय तक भारत को संपेरों का देश समझा जाता था. पर अब? संपेरा भी और बीन भी संकट में.

भारत के संपेरा जाति दुर्दिन में जी रही है. कानून ने संपेरों को ऐसा डंस लिया है कि वे सांप पालने लायक नहीं बचे न बीन बजाने लायक. जब सांप ही नहीं बचे तो बीन किसलिए, किसके लिए? संपेरे अपने को नाथ संप्रदाय से जोड़ते हैं. उनकी एक धार्मिक अस्मिता भी है. पर ऐसी अस्मिता का क्या जो न जीवन दे सके न वजूद. वैसे संपेरों को लेकर कई सवाल उठ सकते हैं फिलहाल यहां उनके सांस्कृतिक पक्ष से जुड़े सिर्फ एक सवाल को उठाया जा रहा है.

हिंदी फिल्मों में बीन और नागिन की कहानी कई बार कही गई है. इस तरह बीन जिसे भारत में सिर्फ संपेरे ही बजाते हैंµ भारतीय लोकप्रिय संगीत का एक महत्वपूर्ण वाद्य है. लेकिन क्या वजह है कि आज तक इस वाद्य का विकास नहीं हुआ जबकि कई पारंपरिक वाद्यों में कई तरह की चीजें जोड़ी गईं. क्या इस वाद्य को अब तक इसलिए उपेक्षा मिली कि यह उस जाति का वाद्य है जिसकी पहचान ताकतवर जाति की नहीं है. क्या खुद हमारी केंद्र और राज्य सरकारों के सांस्कृतिक विभाग इस दिशा में कोई सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं. बीन, अन्य शास्त्राीय वाद्यों की तरह एक पारंपरिक वाद्य है और इसे भी सम्मान मिलना चाहिए. अगर बीन में कुछ सुधार करके इसे परिभाषित किया जाए तो शायद संपेरों की हालात भी कुछ सुधर सके.                    

वसुंधरा, गाजियाबाद



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