‘विशाल भारत’ के जनवरी 1928 के अंक में एक रपट छपी है. रपट के लिखने वाले पंडित सुन्दरलाल थे. उन्होंने लिखा है कि लोकमान्य तिलक की जेल की सजा के विरोध में एक सभा की गई. वक्ता दो थे. पंडित सुन्दरलाल और बालकृष्ण भट्ट. पंडित सुन्दरलाल ने तिलक पर व्याख्यान दिया और उनके जेल जाने पर दुःख प्रकट किया. भट्ट जी बोलने उठे भावावेश में खड़ी बोली से अवधी पर आ गये
”का तिलक-तिलक करत हौ. अपने देश के लिये गये हैं फिर आई जइ हैं. हमको दुःख उन लोगन का है जो कभी हमसे आयकर न मिलि हैं.जो बिन खिले ही मुरझाय गये. हमको दुःख खुदीराम बोस का है.“
खुदीराम बोस का नाम सुनकर पंडित सुन्दर लाल डर गये. उन्होंने भट्ट जी का पल्ला खींचना शुरू किया भट्ट जी चिल्ला कर बोले ”मेरा पल्ला काहे खींचते हौ.“ श्रोताओं की सम्बोधित करके बोले ”हमार पल्ला खींचते हैं. हमरे हिये में आग लगी है हम कही काहे न“
खबर शिक्षाविभाग के अफसरों तक पहुंची. डायरेक्टर साहब ने बुला भेजा डायरेक्टर साहब ने बोलना शुरू ही किया था कि भट्ट जी ”राम-राम हमका अस नौकरी न चाही“ कहते हुए बाहर निकल आये. रपट के अन्त में लिखा हैµभट्ट जी को कायस्थ पाठाशला की प्रोफसरी से हाथ धो डालने पड़े. उनके जीवन के अन्तिम छः बरस बड़े दी आर्थिक कष्ट में बीते.“
बी.5 एफ-2 दिलशाद गार्डन, दिल्ली 95