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मुंबई के शुरुआती दिन डराते थे : जयंत देशमुख

interview with jayant deshmukh

हिन्दी सिनेमा के चुनिंदा कला निर्देशकों में एक हैं-जयंत देशमुख। रायपुर के मूल निवासी जयंत बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। वह अभिनेता भी हैं, चित्रकार भी और सबसे अहम कला निर्देशक। मक़बूल,आंखें,राजनीति और आरक्षण समेत 50 से ज्यादा फिल्मों में कला निर्देशक रह चुके जयंत देशमुख का मानना है कि नए लोगों को सिनेमा की इस विधा में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है। करियर, मुंबई तक के सफर और पत्रकारिता से जुड़े तमाम मसलों पर पीयूष पांडे ने उनसे खास बात की।

सवाल-आप रायपुर के रहने वाले हैं। करियर की शुरुआत आपने पत्रकारिता से की तो फिल्मी दुनिया में कैसे पहुंच गए?
जवाब-मैंने रायपुर के दुर्गा कॉलेज से पढ़ाई की। बीए किया और फिर पत्रकारिता में डिग्री ली। फिर ‘युगधर्म’ अख़बार में काम किया। वहां एक कॉलम भी लिखता था उभरते कलाकारों पर। देशबंधु अखबार में डिजाइनिंग का काम किया। उस दौरान ऑफसेट प्रिटिंग नयी नयी शुरु हुई थी। पे-ले आउट डिजाइन करने का काम था। पत्रकारिता के विद्यार्थियों को ले-आउट डिजाइनिंग वगैरह पढ़ाता भी था। रायपुर में एक परिचित थे अशोक मिश्रा, जिन्होंने बाद में श्याम बेनेगल की कई फिल्में लिखीं। उनका थिएटर ग्रुप था-रचना। रचना के साथ थिएटर का काम शुरु हुआ। हमारे एक और मित्र हैं-राजकमल नायक। हम दोनों ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली में एडमिशन की कोशिश की। वहां वी कारंत डायरेक्टर थे। उन्होंने कहा कि भोपाल में भारत भवन बन रहा है और हम चाहते हैं कि मध्य प्रदेश के लोग वहां एडमिशन लें। फिर हम लोग भारत भवन चले गए। 1982 से 91 तक वहीं प्रोफेशनल एक्टिंग की।

सवाल-आप कलाकार थे तो कला निर्देशक कैसे बन गए?
जवाब-दरअसल, चित्रकारी का शौक बचपन से है। रचना ग्रुप में थिएटर करते हुए बैकड्रॉप बनाने का काम शुरु हुआ। श्रीकांत वर्मा की एक कविता की थी हम लोगों ने। तो थिएटर के दौरान यह काम शुरु हो गया। हमारे एक मित्र हैं तिग्मांशु धूलिया। उस वक्त शेखर कपूर फिल्म बना रहे थे बैंडिट क्वीन। तिंगमांशु ने पूछा कि फिल्म में काम करोगे। तो फिर मैं बतौर क्रॉप मास्टर काम किया और लौट आया भोपाल। फिर मेरे दोस्त हैं राजा बुंदेला। उनके अलावा श्वेता मुखर्जी..असीम तिवारी। ये लोग भोपाल आए नाटक के लिए। एक नाटक के बाद राजा बुंदेला ने कहा कि अब तुम मुंबई चलो। मैंने कहा कि मैं वहां नहीं रह पाऊंगा तो उन्होंने कहा कि चलो देखते हैं। उन लोगों ने एक ग्रुप बनाया था-प्रयास। तो फिर मैं उनके साथ मुंबई चला गया। वीरेन्द्र सक्सेना के साथ मुंबई में रहता था। प्रयास एक प्रोडक्शन हाऊस था, जिसके जरिए टेलीविजन का काम मिलना शुरु हुआ। एक के बाद दूसरा फिर तीसरा। इस बीच मैंने जगमोहन मूंदड़ा की एक फिल्म की बवंडर बतौर आर्ट डायरेक्टर। लेकिन, बड़ा ब्रेक मिला आंखें से। निर्माता दोरंग जोशी थे और निर्देशक विपुल शाह। विपुल की यह पहली फिल्म थी। मेरी पहली बड़ी कमर्शियल फिल्म थे। सिनेमेटोग्राफर थे अशोक मेहता। उन्होंने कहा, थिएटर का लड़का है..पता नहीं कर पाएगा या नहीं। मैंने कहा कि एक सैट बनवाकर देखो....। अच्छा लगे तो काम देना वरना मत देना। दोरंग ने हिम्मत दिखायी और एक सैट बनवाया। उन्हें काम पसंद आ गया। फिर तो बैंक बनायी, ट्रेनिंग सेंटर बनाया, अंधों का घर बनाया..। आंखें के बाद इंडस्ट्री में एक पहचान बनी। फिर तेरे नाम में काम पसंद किया गया। फिल्मों में पहचान बनती गई और काम मिलता गया। इसी दौरान टेलीविजन में भव्यता बढ़ रही थी। मैंने एक सीरियल घर की लक्ष्मी बेटियां के लिए सैट बनाया। इसने सीरियलों में सैट का परिदृश्य बदल दिया। धारावाहिकों में अलग किस्म की भव्यता दिखने लगी। फिर बिदाई और ये रिश्ता क्या कहलाता है, जैसे सीरियल किए। हाल में प्रकाश झा की आरक्षण का भी सैट मैंने बनाया।

सवाल-मुंबई में शुरुआती दिनों को कैसे याद करते हैं?
जवाब-सच कहूं तो बहुत डर लगता था। सोचता था कि कुछ हो पाएगा या नहीं। आर्ट डायरेक्शन या प्रोडक्शन डिजाइन के बारे में कोई कोर्स नहीं किया था। ड्राइंग पेटिंग करता था, लेकिन कंस्ट्रक्शन के बारे में ज्यादा कुछ नहीं मालूम था। लेकिन,मेरी किस्मत अच्छी थी। थिएटर के किए काम की बदौलत शुरुआत में काम मिला और फिर काम मिलता रहा तो मैं सीखता गया। फिल्मी दुनिया कमर्शियल दुनिया है। जोखिम बहुत है। आपको काम दिया गया और आप ठीक से नहीं कर पाए तो बहुत नुकसान होता है। फिर, कला निर्देशक की चुनौती यह है कि हर सैट दूसरे से अलग होता है। उसकी छटा अलग होती है। राजनीति का सैट आरक्षण से अलग है। मक़बूल में मैंने बिलकुल अलग काम किया। अमिताभ बच्चन और संजय दत्त की दीवार में मुंबई में ही पाकिस्तान बनाना था। लेकिन काम मिलने से विश्वास बढ़ता चला गया।

सवाल-आप रायपुर के हैं। अपेक्षाकृत छोटे शहर और हिन्दी भाषी होने के बाद मुंबई की अंग्रेजीदा इंडस्ट्री में सामंजस्य बैठाना कितना मुश्किल रहा या कहूं कि किस तरह का अनुभव रहा।
जवाब-सच कहूं तो बहुत डर लगता था। मैं आज भी धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल सकता। लेकिन, अब काम बोलता है इसलिए भाषा कोई मायने नहीं रखती। मैं छोटे से स्कूल में पढ़ा था। मुंबई पहुंचा तो लगा कि कैसे अपनी बात इन लोगों को समझा पाऊंगा। लेकिन, कुछ काम करने के बाद लोगों की नजर मेरे काम पर जाने लगी। मैं अब टेलीविजन के अंग्रेजी बोलने वाले लोगों को भी हिन्दी में ही समझाता हूं। वे अंग्रेजी बोलते हैं पर मैं जवाब हिन्दी में देता हूं। मुझे लगता है कि मैं हिन्दी में ही बेहतर तरीके से खुद को अभिव्यक्त कर सकता हूं।

सवाल-अच्छा सरल शब्दों में बताइए कि ये आर्ट डायरेक्शन और प्रोडक्शन डिजाइन एक ही चीज है या अलग अलग है।
जवाब-दोनों एक ही हैं। अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में कैटेगरी बन गई हैं। दरअसल, प्रोडक्शन डिजाइन को थोड़ा विस्तृत मान सकते हैं,जहां पूरे इनवॉयरमेंट सैट करना होता है। फिल्म की कहानी और मूड के हिसाब से कैसा माहौल या इनवॉयरमेंट तैयार करना है-ये देखना होता है। इसमें मैं कॉस्ट्यूम डिजाइनर को निर्देश दे सकता हूं कि बैकग्राउंड ऐसा होगा तो ड्रेस उसके मुताबिक होनी चाहिए। मेकअप मैन को बोल सकता है। कैमरामैन को बता सकता हूं ताकि वो लाइटिंग उसी हिसाब से करे। पर्दे पर एक टोन सैट होती है। मसलन बैंडिट क्वीन का टोन अलग था और आरक्षण का अलग। अशोक मेहता ने समझाया था कि बैंडिट क्वीन में ग्रीन कलर का इस्तेमाल नहीं करना। बीहड़ मटमैला,खुरदुरा होता है। और आर्ट डायरेक्टर काम सैट डिजाइन करना और बनाना है। कहानी के हिसाब से सैट बनाना हो या वास्तविक लोकेशन को फिल्म के हिसाब से तैयार करना हो। कुछ लोग समझते हैं कि वास्तविक लोकेशन है तो फिर क्या दिक्कत। लेकिन ऐसा होता नहीं है। फिल्म के मुताबिक उस लोकेशन को भी तैयार करना होता है। आज कोई भी फिल्म आर्ट डायरेक्शन के बिना संभव नहीं।

सवाल-शुरुआती दौर और अब के आर्ट डायरेक्शन में कितना बदलाव आया है।
जवाब-बहुत ज्यादा। एक तो हम अंतरराष्ट्रीय सिनेमा देख रहे हैं अब। टीवी का फलक बड़ाह आ है। कंटेंट के साथ बाकी बातों पर भी ज्यादा ध्यान देना पड़ रहा है क्योंकि यह विजुअल मीडियम है। दूसरा इंटरनेट ने चीजें बदल दी हैं। पहले हम एक सैट बनाने से पहले कई दिन रिसर्च करते थे। मान लीजिए कि एक बैडरुम भी डिजाइन करना है तो सोचते थे कि रंग कैसा होगा..बैड कैसे रखा जाएगा वगैरह वगैरह। लेकिन अब एक क्लिक के साथ सैकड़ों बैड़रूम के डिजाइन सामने आ जाते हैं। तो हमारा काम चुनना रह जाता है बस। आज अगर 1857 के वक्त का कोई सैट बनाना है तो भी नेट पर बहुत जानकारियां मिल जाएंगी। मैं दो दिन में सैट का डिजाइन बनाकर दे दूंगा। पहले यह संभव नहीं था। आज आर्ट डायरेक्शन के कोर्स हो रहे हैं। मैं भी जाता हूं पुणे इंस्टीट्यूट में पढ़ाने। पहले शूटिंग के वक्त कैमरामैन ही देख पाता था कि सीन पर्दे पर कैसा दिख रहा है। अब मॉनीटर पर बाकी लोग भी देख पाते हैं तो उसी के हिसाब से तैयारियां कर लेते हैं। दरअसल, अब बड़ा काम यह होता है कि बजट में सैट बनाकर दे दिया जाए।

सवाल-तो क्या रचनात्मकता प्रभावित हुई है?
जवाब-बिलकुल हुई है। पहले बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। अब मेहनत इस काम के लिए ज्यादा करनी पड़ती है कि तमाम उपलब्ध डिजाइन में कौन सा चुनना है और उनमें क्या फेरबदल करना है। कैसे इसे बजट में बनाना है।

सवाल-कुछ लोगों की जिज्ञासा है कि आखिर फिल्म पूरी होने के बाद महंगे सैट का होता क्या है। क्या इन्हें तोड़ दिया जाता है।
जवाब-तोड़ भी दिया जाता है या उसके हिस्सों को दोबारा इस्तेमाल भी कर लिया जाता है। अब एक फिल्म में जो सैट दिखा दिया, बिलकुल उसी तरह का सैट दूसरी फिल्म में नहीं दिखाया जा सकता। आखिर, कहानी अलग है, लोकेशन अलग है। लेकिन, सैट के निर्माण में लगी कई चीजें दोबारा इस्तेमाल में आ जाती हैं।

सवाल-बतौर कला निर्देशक आप अपनी किस फिल्म को श्रेष्ठ मानते हैं?
जवाब-मुझे सब फिल्में करने में आनंद आया। और मैंने पूरी मेहनत से काम किया। सैट छोटा हो या बड़ा-मैंने पूरी शिद्दत से बनाया। फिर भी नाम लेना हो तो तेरे नाम, दीवार, आंखें और आरक्षण जैसी फिल्मों का नाम ले सकता हूं। अच्छी बात यह रही है कि मैंने अलग अलग तरह की फिल्में की..। मसलन मक़बूल बिलकुल अलग फिल्म थी तो दीवार बिलकुल अलग।

सवाल-आपकी शुरुआत पत्रकारिता से हुई तो क्या अब भी लिखना होता है कुछ।
जवाब-नहीं। काम की व्यस्तता बहुत है।

सवाल-आने वाली फिल्में कौन सी हैं।
जवाब-एक फिल्म है गली गली में चोर है। दूसरी विक्रम भट्ट की है, जिसमें करिश्मा कपूर हैं। एक फिल्म ड्राइडे है, जिसमें कादर खान, जॉनी लीवर और राजपाल यादव साथ आ रहे हैं।

सवाल-आपको थिएटर का, आर्ट डायरेक्शन का इतना अनुभव है तो कभी फिल्म निर्देशन का नहीं सोचा।
जवाब-सोचता हूं। लेकिन, अभी उसमें थोड़ा वक्त लगेगा।

 

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