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चरित्र अभिनेताओं के लिए फिल्मों में जगह घटी :विश्वजीत प्रधान

interview vishwajeet pradhan

स्टार प्लस पर ‘मर्यादा-लेकिन कब तक’ धारावाहिक के एसएसपी ब्रह्मानंद यानी विश्वजीत प्रधान परिचय के मोहताज नहीं है। 170 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय कर चुके विश्वजीत ने करियर की शुरुआत शाहरुख खान के साथ टीवी सीरियल फौजी से की थी। मूल रुप से मेरठ के निवासी विश्वजीत ने थिएटर, टेलीविजन और फिल्म सभी जगह अपने अभिनय के जौहर दिखाए और इन दिनों एसएसपी ब्रह्मानंद के नकारात्मक किरदार से लोकप्रियता के नए आयाम छू रहे हैं। उनसे बात की पीयूष पांडे ने।

सवाल-‘मर्यादा…लेकिन कब तक’ में आपके किरदार की लोकप्रियता बाकी किरदारों पर भारी पड़ रही है।
जवाब-ब्रह्मानंद जाखड़ का किरदार लिखा बहुत अच्छा लिखा गया है। फिर, एक्जीक्यूशन के स्तर पर बहुत बढ़िया काम हो रहा है। लेकिन, सच यही है कि यह टीम का सामूहिक प्रयास है। मेरे साथ सीरियल में इंद्राणी हलदर जैसी अदाकारा हैं। कामया पंजाबी भी बेहतरीन है। टेलीविजन मूलत: लेखक का माध्यम है और मर्यादा की टीम बेहतरीन काम कर रही है।

सवाल-फिल्मों में आपने बहुत काम किया, लेकिन ज्यादा किरदार आपके याद नहीं है। जबकि टेलीविजन पर आप छा गए।
जवाब-फिल्मों में मैंने बहुत काम किया है। ऐसा नहीं है कि मेरे किरदार बिलकुल याद नहीं लोगों को। यलगार,मोहरा,दस्तक जैसी फिल्मों में मेरे काम को आज भी लोग याद करते हैं। लेकिन, फिल्मों में मामले में एक बात है। वह यह कि फिल्म अच्छी हो तो याद रहती है। जरुरी यह है कि फिल्म अच्छी हो, आपका रोल अच्छा हो और रोल जिस रुप में फिल्माया गया, उसी रुप में फिल्म में रखा जाए। कई बार यह सारी बातें हो नहीं पातीं। कई सारी फिल्मों में मेरा काम कमाल का था, लेकिन फिल्म नहीं चली। कुछ रिलीज ही नहीं हुईं। तो कई सारे फैक्टर हैं।

सवाल-लेकिन, टेलीविजन?
जवाब- टेलीविजन का यह है कि हर रोज डेली सोप में आप लोगों तक पहुंच रहे हैं। फिल्म एलोपेथिक ट्रीटमेंट की तरह हैं। डेलीसोप होम्योपेथी की तरह है। आहिस्ता असर करती है और परमानेंट असर करती है। सीरियल रोज पहुंच रहा है तो दर्शक ने भले तीन हफ्ते नहीं देखा तो चौथे हफ्ते देख लेगा। एक बार करेक्टर से जुड़ गया तो फिर जुड़ा रहता है। इसमें ऐसा नहीं है कि फिल्म हिट हुई तो देखी वरना नहीं देखी। आज मर्यादा में मेरे किरदार पर हिन्दुस्तान के बाहर भी लोग रिस्पांस कर रहे हैं। फिल्म में लिमिटेशन है। वहां सलमान , शाहरुख, कैटरीना, अनुपम या कोई और है। चरित्र भूमिकाएं करने वाले कहीं न कहीं खो जाते हैं। टीवी में कहानी आपके इर्द गिर्द घूमती है। बतौर कलाकार भी यह संतुष्टि देता है। लोग भी जानते हैं। हालांकि, टेलीविजन आसान नहीं है। फि्लम का कोई भी विलेन उठा लीजिए। उसे सिर्फ दो घंटे खेल दिखाना है। आज गब्बर सिंह को अगर रोज सीरियल करना पड़े तो वो क्या बोलेगा। तेरा क्या होगा कालिया या कितने आदमी थे जैसे डायलॉग कितनी बार बोलेगा। टीवी में लेखक को बहुत काम करना होता है।

सवाल-आप मेरठ के रहने वाले हैं तो मेरठ से मुंबई का सफर कैसे तय हुआ।
जवाब-मेरे पिता जी राजनीति में थे। कांग्रेस में थे और काफी साल विधायक रहे। चौधरी चरण सिंह और हेमवंती नंदन बहुगुणा के वह काफी करीब थे। मेरी शुरुआती पढ़ाई लिखाई मेरठ से हुई। बाद में इलाहाबाद चला गया। ग्रेजुएशन किया। लॉ किया। परिवार वाले चाहते थे कि आईएएस की तैयारी करुं। लेकिन मेरा मन पढ़ाई लिखाई में ज्यादा नहीं लग रहा था। मैं उन्हीं दिनों थिएटर करने लगा था। हालांकि, ये नहीं सोचा था कि कभी मुंबई जाऊंगा। उस वक्त दिल्ली में फौजी सीरियल के लिए ऑडिशन चल रहे थे। मेरा चयन हो गया। दिल्ली में सफदर हाशमी के साथ काफी वक्त तक थिएटर किया। उसी दौरान उनकी हत्या हो गई। वह काफी मुश्किल वक्त था। इसके बाद मुंबई आ गया। शुरुआत में मॉडलिंग की। नसीरुद्दीन शाह के ग्रुप के साथ जुड़ गया और फिर पहली फिल्म यलगार मिली और सफर चल निकला।  
 
सवाल-आपने फौजी से करियर की शुरुआत की। तो इन दो दशकों के लंबे करियर में आप टेलीविजन के बदलते चेहरे को किस तरह देखते हैं।
जवाब-टेलीविजन फिल्म से बड़ा हो गया है। आज टीवी में न केवल पहचान है, बल्कि अच्छा खासा पैसा है। अभी तक टीवी के लिए ऑफर मिलते थे तो कई बार मना कर दिया था। सोचते थे कि फिल्म वाले हैं तो टीवी क्यों करें। वो तो कभी भी कर लेंगे। उस वक्त टीवी काफी छोटा था। फौजी के सिर्फ 13 एपिसोड प्रसारित हुए थे। फौजी में शाहरुख खान थे,तो शायद इसलिए आज भी लोगों को याद है। लेकिन, आज टीवी सीरियल हफ्ते में पांच दिन प्रसारित हो रहा है। कुछ फिल्मों को छोड़ दें तो मुंबई-दिल्ली जैसे शहरों में होर्डिंग्स सीरियलों का विज्ञापन करते दिखते हैं। आज फिल्मों को भी बड़ी कमाई टेलीविजन अधिकार बेच कर होती है।

सवाल-तो क्या चरित्र अभिनेताओं के लिए फिल्मों में जगह नहीं रह गई।
जवाब-नहीं ऐसा नहीं कह सकते। लेकिन, जगह कम तो हुई ही है। हमारे सीनियर्स बताते हैं कि एक जमाने में शशि कपूर या धर्मेन्द्र जैसे कलाकार एक साथ 30-30 फिल्में करते थे। इंडस्ट्री में हमेशा पांच-छह सितारे रहे हैं। आज भी केवल पांच-छह बड़े हीरो हैं। उनमें तीन चार खान हैं। और एक बड़ा सितारा साल में एक या दो फिल्में करता है। पहले तीस फिल्में करता था तो एक साथ 150 से ज्यादा फिल्में अंडर प्रोडक्शन होती थीं। करेक्टर आर्टिस्ट को बहुत मौका मिलता था। लेकिन, आज ऐसा नहीं है। फिर, ज्यादातर निर्माताओं के अपने बैनर हैं। उनकी अपनी टीम है। बड़े बैनर की फ्रेंजाइजी खुल गयी हैं। यानी करण जौहर ने फिल्म बनायी तो फिर उनके बैनर में ही उनके असिस्टेंट को मौका मिल गया। स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए मौके कम हुए हैं।

सवाल-फिल्म के सैट पर आपके साथ दो बार बड़े हादसे हुए। तो क्या इसके बाद भाग्य पर भरोसा ज्यादा हो गया। या कहूं कि अब ज्योतिषियों की सलाह ले रहे हैं आप?
जवाब-सच कहूं तो भाग्य पर भरोसा हमेशा से है। ज्योतिष पर भी है। लेकिन, मैं आज तक सही बंदे से टकराया नहीं हूं। ज्योतिष विज्ञान ठीक है, लेकिन उसका इंटरपिटेशन करने वाले लोग ठीक नहीं हैं या कहूं कि मुझे ठीक लोग कभी मिले नहीं है। इसलिए मैं अपने काम पर यकीं करता हूं। उसी को शिद्दत से निभाता हूं।

सवाल-इन दिनों कौन सी फिल्में कर रहे हैं।
मर्यादा सीरियल काफी टाइम ले जाता है। महीने में 20 दिन निकल जाते हैं इसकी शूटिंग में। तो फिल्में ज्यादा नहीं कर रहा हूं। एक दो फिल्में हैं, जिनमें रोल अच्छा है तो बस वही है।

सवाल-इतने लंबे करियर में कभी निर्देशन के बारे में नहीं सोचा।
जवाब-नहीं। निर्देशन या निर्माण में मेरी दिलचस्पी नहीं है। मैं बतौर कलाकार ही खुश हूं।
 
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