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भारतीय सिनेमा अब भी एक कुटीर उद्योग : राकेश मेहरा

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14 फरवरी 2013

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा जगत की तीन अरब डॉलर सालाना कमाई और 1000 फिल्मों के सालाना उत्पादन के बावजूद फिल्मकार राकेश ओम प्रकाश मेहरा को लगता है कि भारतीय सिनेमा एक कुटीर उद्योग है। उनका मानना है कि सिने जगत की प्रगति तभी संभव है, जब यह अपने मानसिक दिवालियेपन से उबर पाए। 

एक तरफ भारतीय सिनेमा ने अपने 100 साल पूरे किए और दूसरी तरफ मेहरा का कहना है कि यह भारतीय सिनेमा का शुरुआती दौर है। यह ऐसा ही है जैसे कोई बच्चा पहली बार अपने पैरों से चलना सीखता है। मेहरा ने फिल्म जगत को 'अक्स' 'रंग दे बसंती' और 'दिल्ली-6' जैसी फिल्में दी हैं।

मेहरा ने आईएएनएस को बताया, "यह मेरे लिए बड़े सुकून की बात है कि कम से कम अब भारतीय फिल्मों में एक युवक और युवती के प्रेम संबंधों के अलावा भी कई विषयों के लिए अवसर हैं।"

मेहरा कहते हैं, "भारतीय सिनेमा जगत मानसिक दिवालियेपन के दौर से गुजर रहा है। मैं इस देश का इतिहास याद करता हूं, यहां 'महाभारत' और 'मेघदूत' जैसे महापुराण लिखे गए हैं। लेकिन उसके बाद से यहां कुछ भी ऐसा नहीं हुआ।"

वह कहते हैं, "पश्चिमी देशों को देखिए, वे लोग ज्यादा से ज्यादा कल्पनात्मक और रचनात्मक चीजें करते हैं। चाहे वह वास्तविक विषय पर हो, सामाजिक विषय हो या फिर पूरी तरह कल्पनात्मक विषय हो। मुझे लगता है कि इस देश की परिस्थितियों के बदलाव के लिए कुछ करना होगा। अतृप्त देश में कला का विकास असंभव है।"

मेहरा की फिल्म 'रंग दे बसंती' (2006) को दुनिया भर में दर्शकों और समीक्षकों की प्रशंसा मिली थी और ब्रिटिश एकेडेमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन आर्टस में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म की श्रेणी में नामांकन भी मिला था।

उनकी आनेवाली फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' भारतीय धावक मिल्खा सिंह की जीवनी पर आधारित है। मेहरा कहते हैं कि अपनी फिल्मों के लिए ऑस्कर पुरस्कार पाना ही उनका आखिरी सपना नहीं है। वह चाहते हैं कि उनकी कहानियां ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे।
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