नई दिल्ली, 21 मार्च
'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं.' और 'दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए.' जैसे सदाबहार गीतों को लिखने वाले मशहूर शायर और गीतकार अखलाक मोहम्मद खान 'शहरयार' का कहना है कि उनके लिए मौजूदा समय में फिल्मी गीत लिखना मुनासिब नहीं है। उन्होंने कहा कि वह खुद को पेशेवर गीतकार भी नहीं मानते हैं।
73 वर्षीय शहरयार ने कहा, "आज के दौर में जिस प्रकार के गीत चलन में हैं, मैं वैसे गीत नहीं लिख सकता। ऐसी बात नहीं है कि मैं ऐसे गीतों के खिलाफ हूं लेकिन ऐसे गीत नहीं लिख सकता। "
लंबे समय से फिल्मों से दूर रहने वाले शहरयार ने कहा, "उमरावजान के बाद मैंने और फिल्मों के लिए गीत लिखे, जिनमें एक फिल्म अंजुमन थी। इसका निर्देशन मुजफ्फर अली ने किया था लेकिन दुर्भाग्यवश यह फिल्म प्रदर्शित नहीं हुई।"
शहरयार ने कहा, "बॉलीवुड से दूरी बनाए रखने की एक वजह यह भी है कि मैं खुद को पेशेवर गीतकार नहीं मानता हूं। साथ ही मुंबई में भी नहीं रहता हूं।"
शहरयार अलीगढ़ में रहते हैं। वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के अध्यक्ष थे। उन्होंने वर्ष 1996 में अवकाश ग्रहण किया। उन्हें 'ख्वाब का दर बंद है' के लिए 1987 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।
मौजूदा दौर के गीतों के बारे में शहरयार का कहना है, "मौजूदा दौर में सदाबहार गीतें नहीं लिखे जाते हैं। कुछ दिन तो यह गीत काफी लोकप्रिय होते हैं लेकिन बाद उन्हें कोई सुनता भी नहीं है।"
शहरयार ने कहा कि समाज में कला, संस्कृति, संगीत और कविता का विशेष महत्व होता है। उन्होंने कहा, "आप ऐसे व्यक्ति को शिक्षित नहीं कह सकते हैं, जिसने कला, संस्कृति, संगीत या कविता में से किसी एक क्षेत्र में काम नहीं किया है। "
शहरयार भले ही अब फिल्मी गीतों से दूर हो गए हैं लेकिन उन्होंने वर्ष 1981 में प्रदर्शित फिल्म 'उमरावजान' के लिए एक से बढ़कर एक गीत लिखे थे। इन गीतों को आज भी लोग सुनना पसंद करते हैं।
'उमरावजान' में आंखों की मस्ती, दिल और जान की बात करने वाले शहरयार सादगी से यह भी कहते हैं, "जिंदगी जब भी तेरी बज्म में लाती है हमें/ ये जमीं चांद से बेहतर नजर आती है हमें.हर मुलाकात का अंजाम जुदाई क्यूं है, अब तो हर वक्त यही बात सताती है हमें..।"