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वट सावित्री व्रत (4 जून) का महात्म्य

vat savitri vrat 2012

पं.हनुमान मिश्रा

वट सावित्री व्रत की तिथि को लेकर कुछ भिन्न्ता है। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार यह व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को किया जाता है जबकि निर्णयामृत आदि के अनुसार इस व्रत को ज्येष्ठ मास की अमावस्या को करने की बात कही गई है। हालांकि विष्णु उपासक इस व्रत को पूर्णिमा को करना ज्यादा उत्तम मानते हैं। यदि हम स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के मत का अनुसरण करें तो यह व्रत इस वर्ष 4 जून 2012 को सोमवार के दिन सम्पन्न होने वाला है। यह व्रत स्त्रियों के लिए अति लाभकारी कहा गया है। भारतीय संस्कृति में तो यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। इस व्रत को सौभाग्य और संतान की प्राप्ति में सहायता देने माना गया है। नारी वर्ग के लिए इस व्रत का बहुत ही अधिक महत्त्व है। कहा गया है कि स्त्री की कुण्डली में कितना भी सौभाग्य नाशक दोष क्यों न हो, इस व्रत को करने से वह दोष नष्ट होता है और सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसी बात को शास्त्रों में इस श्लोक के रूप में कहा गया है कि-

सावित्र्यादिव्रतादीनि भक्त्या कुर्वन्ति याः स्त्रियः ।
सौभाग्यं च सुहत्त्वं च भवेत् तासां सुसङ्गतिः ॥

इस व्रत को सभी स्त्रियां कर सकती हैं। स्कंद पुराण में कहा गया है कि-

नारी वा विधवा वापि पुत्रीपुत्रविवर्जिता ।
सभर्तृका सपुत्रा वा कुर्याद् व्रतामिदं शुभम् ॥
 
अर्थात् स्त्री सधवा हो या विधवा पुत्र-पुत्री से हीन यो या युक्त अर्थात सभी को यह व्रत अवश्य ही करना चाहिए. इस व्रत के करने से अखंड पातिव्रत्य पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति एवं अकाल मृत्यु से बचाव आदि सुफल प्राप्त होते हैं।

जैसा कि इस व्रत के नाम अर्थात वट सावित्री से ही प्रतीत होता है कि इस व्रत में 'वट' और 'सावित्री' दोनों का विशेष महत्त्व है। वट अर्थात बरगद का पेड़। पुराणों में कहा गया है कि वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। वट वृक्ष के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव रहते हैं। अत: इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। साथ ही वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है। यदि सावित्री की बात की जाय तो इन्हें देवी स्वरूपा माना गया है। इनके बारे में आगे दी गई कथा के माध्यम से जाना जा सकता है।

वट-सावित्री व्रत की कथा इस प्रकार है कि एक समय मद्रदेश  में अश्वपति नामक महान् प्रतापी और धर्मात्मा राजा राज करते थे। उनके कोई संतान न थी। उन्होंने संतान हेतु यज्ञ कराया जिसके प्रताप से उनके घर एक कन्या ने जन्म लिया जिसका नाम सावित्री रखा गया। जब वह विवाह योग्य हुई तो उसने वर की खोज में स्वयं ही द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पति के रूप में वरण कर लिया। जब नारद जी को पता चला तो वे राजा के पास आए और कहा कि तुम्हारी पुत्री ने वर खोजने में भूल की है। सत्यवान गुणवान व धर्मात्मा जरूर है किन्तु एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो सकती है। राजा ने सावित्री को बहुत समझाया किन्तु वह अडिग रही। अंत में राजा अश्वपति विवाह का सारा सामान और सावित्री को लेकर उस वन में गए जहां राज्यश्री से नष्ट, अपनी रानी और राजकुमार सहित द्युमत्सेन रहते थे। अत: विधिपूर्वक सावित्री-सत्यवान का विवाह हो गया। वह वन में सास-ससुर व पति की सेवा में लीन हो गयी। जब पति के मरणकाल का समय समीप आया तो वह उपवास करने लगी। एक वर्ष पूरा होने पर एक दिन सत्यवान कुल्हाड़ी लेकर वन में लकड़ी काटने जाने लगा तो सावित्री भी सास-ससुर की आज्ञा लेकर उसके साथ चली गयी। जब सत्यवान पेड़ पर चढऩे लगा तो उसके सिर में तीव्र पीड़ा होने लगी और वह अपना सिर सावित्री की गोद में रखकर उस वट वृक्ष के नीचे लेट गया। सावित्री ने देखा कि अनेक दूतों के साथ हाथ में पाश लिए यमराज खड़े हैं। वे सत्यवान के अंगुष्ठ प्राण जीव को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल  दिये। सावित्री भी उनके पीछे चल दी।
यमराज ने उसे लौट जाने को कहा तो वह बोली, ‘ जहां तक मेरे पति जाएंगे, वहां तक मुझे भी जाना चाहिए। यही सनातन सत्य है।’ यमराज ने उसकी धर्म परायण वाणी सुनकर वर मांगने को कहा तो सावित्री बोली, ‘मेरे सास-ससुर अंधे हैं, उन्हें आप नेत्र ज्योति प्रदान करें।’ यमराज ने वर दे दिया किन्तु फिर भी सावित्री यम के पीछे-पीछे चलती रही। यम ने फिर वर मांगने को कहा तो उसने मांगा कि ‘मेरे ससुर का खोया राज्य उन्हें वापस मिल जाए।’ यह वर देने के बाद उसे लौट जाने को कहा किन्तु वह न मानी। सावित्री की पति-भक्ति और निष्ठा देखकर यमराज द्रवीभूत हो गए और उसे एक और वर मांगने को कहा। तब सावित्री ने यह वर मांगा कि ‘मैं सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती हूं, कृपया मुझे यह वर दें।’ फिर यम ने प्रसन्न होकर वर देते हुए सत्यवान को अपने पाश से मुक्त कर दिया और अदृश्य हो गये। सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आयी जहां सत्यवान लेटा था। तभी उसके मृत शरीर में जीवन का संचार हुआ और वह उठकर बैठ गया। सत्यवान के माता-पिता की आंखें ठीक हो गयी और उनका खोया राज्य भी वापस मिल गया। इससे सावित्री के अनुपम व्रत की कीर्ति सारे देश में फैल गयी। अत: तब से यह मान्यता स्थापित हुई कि सावित्री की इस पुण्यकथा को सुनने पर तथा पति-भक्ति रखने पर महिलाओं के संपूर्ण मनोरथ पूर्ण होंगे और सारी विपत्तियां दूर होंगी। तभी से इस व्रत को रखने  का प्रचलन हुआ। यह घटना एक वट-वृक्ष के नीचे सावित्री के साथ घटित हुई अत: इस व्रत को वट सावित्री व्रत के नाम से जाना जाता है।

व्रत कैसे करें:-
इस व्रत का प्रारंभ त्रयोदशी तिथि से ही हो जाता है, जिसमें संकल्प के उपरांत तीन दिन तक उपवास किया जाता है, यह संभव न हो तो त्रयोदशी को रात्रि भोजन, चतुर्दशी को अयाचित और अमावस्या को उपवास करके शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को यह व्रत समाप्त करें। यदि किसी कारण से इतना यह भी संभव न हो तो अपने मतानुसार पूर्णिमा/अमावस्या के दिन विधिपूर्वक वट वृक्ष के नीचे इस व्रत को किया जा सकता है।
अपने मतानुसार पूर्णिमा/अमावस्या के दिन वट के समीप बैठ कर बांस के पात्र में सात प्रकार का अनाज भर कर उसे दो वस्त्रों से ढंक दें और दूसरे पात्र में देवी सावित्री तथा सत्य सावित्री की मूर्ति स्थापित करके धूप, दीप, गंध, अक्षत आदि से पूजन किया जाता है। तत्पश्चात वट को सूत लपेटकर विधि पूजा करके परिक्रमा की जाती है। तत्पश्चात इस मंत्र का जप करके अर्घ्य दिया जाता है और सावित्री से अहिवात ( सौभाग्य ) की रक्षाके लिये भक्ति, श्रद्धा और नम्रता सहित प्रार्थना की जाती है। मंत्र है-

'अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते । पुत्रान पौत्राश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥'

तत्पश्चात् वट वृक्ष की आराधना इस मंत्र से की जाती है -

'वट सिञ्चामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमैः । यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले । तथा पुत्रैश्च सम्पन्नां कुरु मां सदा॥'
तथा पुत्र-पौत्र की इच्छा करने वाली स्त्री इस मंत्र का भी जाप करे। मंत्र है-
पुत्रैश्च पौत्रेश्च संपन्नं कुरू मां सदा।।

इसके बाद वट वृक्ष की परिक्रमा 108, 54 या 17 बार श्रद्धा पूर्वक करना करें।

इसके पश्चात् दीन-हीन एवं ब्राह्मणों को यथोचित वस्त्र आदि देकर भोजन कराएं एवं उनसे आशीर्वाद लें। यदि वहां गाय या अन्य पशु-पक्षी हों, तो सभी को भोजन कराएं। पूड़ी, लड्डू, शर्बत आदि का भी दान करना घर में संपन्नता लाता है। अत: होने पर यह कार्य भी करें। इस दिन कुछ जगहों पर रात्रि में चौदह द्विज दंपतियों अर्थात ब्राह्मण-ब्राह्मणियों को भोजन भी कराया जाता है। स्त्रियों को इस दिन मधुर एवं सुंदर रीति से पकाया भोजन ग्रहण करना चाहिए। बह्मा प्रिया सावित्री एवं बह्मा को भी मधुर भोजन का भोग लगाना चाहिए। इस दिन अपने घर आकर पितरों का श्रद्ध भी करना चाहिए, ताकि उनका आशीर्वाद मिलता रहे।

स्त्रियों को घी एवं दूध में बने पुए, सेवई, खजूर के पुए एवं गुड़ के पुए बनाकर खाना एवं खिलाना चाहिए। इससे स्त्रियां अत्यंत प्यारी धन-धान्य युक्त होती हैं एवं उनका सुहाग अचल रहता है। 

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