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श्रीराधा अष्टमी (5 सितंबर 2011) पर विशेष

sri radha ashtami 011

अनिरुद्ध शर्मा

संसार रूपी भवबंधन से मुक्त करने वाली संजीवनी का नाम ही श्रीराधा है। राधा का नाम सम्पूर्ण अमंगल का नाश करने वाला है। ब्रज में धारण है कि राधा नाम लेने से समस्त अधूरे कार्य स्वतः ही पूरे हो जाते हैं।

श्रीराधाजी का प्रार्दुभाव श्रीकृष्ण के वाम-पार्श्र्व से हुआ। श्रीराधाजी प्रकृति से परे स्थित सच्चिदानन्दमयी है। श्रीराधा का चरित्र अत्यन्त गोपनीय सुखद तथा श्रीकृष्ण-भक्ति प्रदान करने वाला है। इनका चरित्र अत्यन्त पुण्यदायक तथा दुर्लभ है। श्रीराधाजी का वर्ण प्रभातकाल के सूर्य के समान स्वर्णमयी है तथा इनका प्रत्येक अंग अत्यन्त कोमल और अद्वितीय सौन्दर्य से परिपूर्ण है। श्रीराधा और श्रीकृष्ण भिन्न-भिन्न शरीर धारण करके भी अभिन्न हैं। जैसे- दूध और उसकी धवलता तथा पुष्प और उसकी सुगन्ध को अलग-अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही श्रीराधा-कृष्ण में भेद करना असंभव है। श्रीराधाजी श्रीकृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं तथा सदा श्रीमधुसूदन के हृदय में वास करती हैं। श्रीकृष्ण की आराधिका अर्थात राधिका। श्रीराधा कृष्ण की आराधना करती हैं तथा श्रीकृष्ण राधा की। वे दोनों परस्पर आराध्य और आराधक हैं। ये दोनों एक दूसरे को अपना इष्टदेव मानते हैं। पद्म पुराण के अनुसार श्रीराधा श्रीकृष्ण की आत्मा हैं। एक समय श्रीराधाजी श्यामसुन्दर से मिलने को अत्यधिक उत्सुक हुईं तथा श्रीकृष्ण को देखते ही बड़ी वेग से उनके सामने दौड़ी गयीं, चूँकि उन्होंने श्रीकृष्ण की ओर धावन किया था, इसीलिए उनका नाम राधा हुआ। भक्त ‘रा’ शब्द के उच्चारण मात्र से दुर्लभ मुक्ति को पाता है तथा ‘धा’ शब्द के उच्चारण से श्रीहरि-चरणों के सामीप्य को प्राप्त होता है। ‘रा’ का अर्थ पाना तथा ‘धा’ का अर्थ मोक्ष है। अतः जिस नाम के जप से मनुष्य को निर्वाण की प्राप्ति होती है, उसे ‘राधा’ कहते हैं।

जो मनुष्य पवित्र तन-मन से एकाग्रचित्त होकर ‘ऊं श्रीराधायै स्वाहा’ मन्त्र का जाप सवा लाख बार करता है, वह पृथ्वी पर श्रीनारायण के तुल्य तेजस्वी होता है तथा राजसूय यज्ञ का फल पता है। श्रीकृष्ण भी हर पल इसी मन्त्र का जाप करते रहते हैं। यह मन्त्र कल्पवृक्ष के समान फलदायक है। जिस प्रकार श्रीकृष्ण के समान कोई देवता नहीं, गंगा के समान नदी नहीं, पुष्कर के समान तीर्थ नहीं, शिवजी से बढ़कर योगी नहीं, उसी प्रकार श्रीराधा से बढ़कर कोई आराधिका अर्थात प्रेमिका नहीं। राधा का प्रेम श्रीकृष्ण के प्रेम से भी अधिक महान है। एक बार द्वारका में रुक्मिणीजी ने भूलवश श्रीकृष्ण को अत्यधिक गर्म दूध पीने को दे दिया, जब इस गर्म दूध को श्रीकृष्ण ने पीया तो बृज में उनके ध्यान में मग्न बैठीं श्रीराधाजी के मुख में फलक (छाले) हो गये। यह श्रीराधा के असीम प्रेम का उदाहरण मात्र है।

श्रीराधा के रोमकूपों से सभी गोपियों का तथा श्रीकृष्ण के रोमकूपों से सम्पूर्ण गोपों का प्राकट्य हुआ। सभी भक्तों को राधा नाम का उच्चारण करने के पश्चात् कृष्ण नाम का उच्चारण करना चाहिए। इस क्रम में उलटफेर करने से मनुष्य पाप का भागी होता है। श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि ‘रा’ शब्द का उच्चारण करने वाले मनुष्य को मैं उत्तम भक्ति प्रदान करता हूँ तथा ‘धा’ शब्द का उच्चारण करने वाले के पीछे-पीछे इस कारण घूमता हूँ, कि पुनः ‘राधा’ शब्द का श्रवण हो जाये। श्रीराधे से भी अधिक प्रिय मुझे उनका नाम लेने वाला लगता है। अतः राधा नाम का जप करने वाले मनुष्य के मैं अधीन हो जाता हूँ। एक बार गोलोक में श्रीकृष्ण विरजा देवी के समीप थे। श्रीराधा को यह ठीक नहीं लगा। अतः वह श्रीकृष्ण को खरी-खोटी सुनाने के लिए वहाँ जाने लगीं तब श्रीदाम ने उन्हें रोका। इस पर श्रीराधा ने क्रोधित हो श्रीदाम को असुर होने का शाप दिया, फलस्वरूप श्रीदाम ने भी राधाजी को मनुष्य योनि में जन्म लेने तथा श्रीकृष्ण से विछोह सहने का शाप दिया। आगे जाकर श्रीदाम देवी तुलसी के पति शंखचूड़ नामक राक्षस हुए तथा श्रीराधाजी बरसाने में वृषभानु वैश्य के घर प्रकट हुईं। श्रीकृष्ण से असीम प्रेम होने तथा ब्रह्माजी द्वारा वृंदावन में गुप्त रूप से श्रीकृष्ण के साथ विवाह कराये जाने पर भी राधाजी को अपने प्रियतम से विछोह सहना पड़ा। उधर विरजा देवी नदी हो गयीं उनके श्रीकृष्ण के द्वारा जो सात पुत्रा (लवण, इक्षु, दुग्ध, घृत, सुरा, दधि, जल) हुए वे सात समुद्र हो गये। चूँकि राधाजी श्रीकृष्ण की अपेक्षा गोलोक से पृथ्वी पर पहले आयीं थी, इसीलिए आयु में श्रीकृष्ण से बड़ीं थीं।

राधा, रासवासिनी, कृष्णप्राणाधिका, कृष्णस्वरूपिणी, कृष्णा, परमानन्दरूपिणी, रासेश्वरी, कृष्णप्रिया, रसिकेश्वरी, कृष्णवामांगसम्भूता, वृंदा, वृंदावनी, वृंदावनविनोदिनी, चन्द्रावली, चन्द्रकांता, वृषभानुनन्दिनी, वृषभानुसुता, शरत्चन्द्रप्रभावना ये श्रीराधाजी के अठ्ठारह (18) पवित्र नाम हैं। उक्त नामों में से किसी भी एक नाम का वृंदावन की पवित्र भूमि पर जाप करने से व्यक्ति भवबंधन से मुक्त हो श्रीकृष्ण के धाम को प्राप्त होता है। मुनि गर्गजी के अनुसार राधा का ‘रेफ’ करोड़ों जन्मों के पापों का नाश करता है, ‘आकार’ अकाल-मत्यु तथा रोगों को दूर भगाता है, ‘धकार’ आयु की वृद्धि करता है तथा ‘आकार’ इस मिथ्या जगत से छुटकारा दिलाता है। श्रीराधा का नाम श्रवण-स्मरण करने से जीवन शक्ति का संचय होता है।

श्रीराधाजी का प्राकट्य वृषभानु वैश्य के घर भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यान्हः काल में (12 बजे) अनुराधा नक्षत्र के योग में यज्ञभूमि से हुआ था। अतः उक्त तिथि को राधाअष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। उस समय वृषभानु जी मथुरा (उ.प्र.) के गोकुल महावन कस्बे के निकट रावल नामक स्थान पर रहते थे, जोकि मथुरा से 12 किमी दूर है। किंतु बाद में कंस के अत्याचारों से तंग आकर वृषभानु जी रावल से बरसाना आकर रहने लगे। बरसाना दिल्ली-आगरा राजमार्ग पर स्थित कोसीकलां से 7 किमी दूर है। चुंकि राधाजी अयोनिजा थीं, अतः माता के गर्भ से पैदा नहीं हुईं थीं। इनकी माता का नाम कीर्तिदा था। वृषभानु तथा कीर्तिदा पूर्वजन्म में भी सुचन्द्र एवं कलावती नाम से पति-पत्नी थे। श्रीराधाजी की जन्मतिथि होने के कारण उक्त दिन राधा-व्रत किया जाता है। इसे करने से व्रती मनुष्य समस्त एश्वर्यों से परिपूर्ण एवं पुण्यवान होता है तथा वृज के रहस्य को जानकर राधा परिकरों में निवास करता है।

बरसाने के श्री जी मंदिर में राधा अष्टमी की पूर्वरात्रि से राधा-राधा की रट लगाकर रात्रि जागरण होता है। प्रातःकाल मंदिर में राधाजी की प्रतिमा को सफेद साड़ी पहनाकर सवा-सवा मन दूध, दही, घी, बूरा आदि से बने पंचामृत द्वारा स्नान कराया जाता है। चूंकि राधाजी का जन्म मूलों में हुआ था, अतः 27 कूओं का जल, 27 वृक्षों की पत्तियाँ आदि के द्वारा विधि-विधान से मूलशान्ति की जाती है। तत्पश्चात् राधाजी को स्वर्ण-पालने में विठाकर महाआरती होती है। आरती पश्चात् बधाई-गायन तथा दधिकांदौ मनाया जाता है, जिसमें भक्तगण एक-दूसरे पर दूध, दही, हल्दी, केसर डालकर खुशी मनाते है तथा खिलौने, रुपये, बर्तन, कपड़े आदि लुटाये जाते है। मध्यान्ह (12 बजे) जय भोग आरती होती है।

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