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मकर संक्रांति से सम्बंधित कुछ विशेष बातें...

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मकर संक्रांति से सम्बंधित कुछ विशेष बातें...

13 जनवरी 2012

रीवा/डभौरा। जब कोई ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण या गमन करता है तो तो उसे संक्रांति कहते हैं। ग्रहों का राजा सूर्य छह मास तक क्रांतिवृत्त से उत्तर की ओर उदय होता है और छह मास तक दक्षिण की ओर निकलता रहता है। प्रत्येक छह मास की अवधि का नाम अयनकाल है। सूर्य के उत्तर की ओर उदय की अवधि को उत्तरायण और दक्षिण की ओर उदय की अवधि को दक्षिणायन कहते हैं।  उत्तरायण काल में सूर्य उत्तर की ओर से उदय होता हुआ दिखता है और उसमें दिन का समय बढ़ता जाता है। दक्षिणायन में सूर्योदय दक्षिण की ओर दृष्टिगोचर होता है और उसमें रात्रि की अवधि बढ़ने लगती है। मकर राशि की संक्रान्ति के समय से प्रकाश की मात्रा बढ़ने लगती हैए इसलिए उत्तरायण विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है और उत्तरायण के आरम्भ दिवस मकर संक्रान्ति को भी अधिक महत्व दिया जाता है। मकर संक्रान्ति नामक यह पर्व सामान्यतरू १४ या १५ जनवरी को मनाया जाता है। इस पर्व को बहुत ही  मंगलमय माना गया है। इसीलिए यह पर्व लगभग देश के हर प्रांत में बहुत धर्मनिष्ठाए भक्तिए उत्साह और आनंद के साथ मनाया जाता है। पंजाब में यह पर्व लोहड़ी और माघी के नाम से प्रसिद्ध हैए जबकि दक्षिण भारत में पोंगल के नाम से। असम में यह बिहू कहलाता है। बंगाल में संक्रांति और समस्त भारत में मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। भारत के लिए यह पर्व सर्वप्रांतीय है।

वेदों पुराणों में मकर संक्रांति को  देवताओं की सुबह  कहा गया है । और इसके बाद से देवताओं का दिन आरंभ हो जाता है । उत्तरायण सूर्य अपने साथ नयी उर्जा लेकर आता है । प्रकृति और मनुष्यों में नव चेतना का संचार करता है । मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक वातावरण में अधिक मात्रा में चैतन्य होता है। साधना करने वाले जीव को इसका सर्वाधिक लाभ होता है। इस चैतन्य के कारण जीव में विद्यमान तेज तत्व के बढ़ने में सहायता मिलती है।  इस दिन रज.तम की अपेक्षा सात्विकता बढ़ाने एवं उसका लाभ उठाने का प्रत्येक जीव प्रयास करे। मकर संक्रांति का दिन साधना के लिए अनुकूल है। इसलिए इस काल में अधिक से अधिक साधना कर ईश्वर एवं गुरु से चैतन्य प्राप्त करने का प्रयास करें।  वैदिक युग में सूर्योपासना दिन में तीन बार की जाती थी। पितामह भीष्म ने भी सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपना प्राणत्याग किया था। हमारे मनीषी इस समय को बहुत ही श्रेष्ठ मानते हैं। इस अवसर पर लोग पवित्र नदियों एवं तीर्थस्थलों पर स्नान कर आदिदेव भगवान सूर्य से जीवन में सुख व समृद्धि हेतु प्रार्थना व याचना करते हैं। मकर संक्रांति सामाजिक समरसता का पर्व है। मान्यता है कि तिलए घीए गुड़ और काली उड़द की खिचड़ी का दान और उसका सेवन करने से शीत का प्रकोप शांत होता है। दक्षिण भारत में बालकों के विद्याध्ययन का पहला दिन मकर संक्रांति से शुरू कराया जाता है। प्राचीन रोम में इस दिन खजूरए अंजीर और शहद बांटने का उल्लेख मिलता है। ग्रीक के लोग वर.वधू को संतान.वृद्धि के लिए तिल से बने पकवान बांटते थे।
पं.हनुमान मिश्रा



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