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शुभ फलदायक है मंगलागौरी व्रत

mangla-gauri-vrat

अनिरुद्ध शर्मा

श्रावणमास में जितने भी मंगलवार पड़े उन सभी को मंगलागौरी-व्रत एवं मंगलागौरी-पूजन  करने को कहा गया है। इस व्रत में मंगलवार के दिन शिव की पत्नी गौरी अर्थात् पार्वती  की पूजा की जाती है। इसी कारण इसे मंगलागौरी-व्रत कहते हैं। यह व्रत विवाह पश्चात् प्रत्येक विवाहिता द्वारा पाँच वर्षों तक करना शुभफलदायक माना गया है। इस व्रत को विवाह के प्रथम श्रावण में पिता के घर (पीहर) में तथा शेष चार वर्ष पति के घर (ससुराल) में करने का विधान है।

प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर तथा नित्यकर्मो से निवृत हो नये वस्त्र धारणकर घर के ईशानकोण (पूर्व एवं उत्तर दिशा के बीच का कोण) में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुखकर शुद्ध आसन ग्रहण कर निम्न संकल्प करना चाहिए -
‘मम पुत्रापौत्रासौभाग्यवृद्धये श्रीमंगलागौरीप्रीत्यर्थं पंचवर्षपर्यन्तं मंगलागौरीव्रतमहं करिष्ये।’
उक्त प्रकार संकल्प कर शुद्ध आसन पर भगवती गौरी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए तथा उनके सम्मुख सोलह बत्तियों वाला घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए।

तत्पश्चात् स्वस्तिवाचन एवं गणेश-पूजन कर सोलह-सोलह प्रकार के पुष्प, मालाएँ, दूर्वादल, वृक्ष के पत्ते, धतूरे के पत्ते, अनाज, सुपारी, पान, इलाइची, धनिया तथा जीरा आदि भगवती गौरी को समर्पित करें। ताँबे के पात्र में जल, अक्षत एवं पुष्प रखकर माँ गौरी को अघ्र्य दे प्रणाम करें तथा सौभाग्य-सूचक वस्तुएँ एक बाँस की टोकरी में रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान करें। पूजा के अन्त में सोलहमुखी दीपक से भगवती गौरी की आरती कर उक्त प्रतिमा को किसी पवित्र तालाब, सरोवर या कूएँ में विसर्जित करना चाहिए। ऐसा करने वाली व्रती स्त्री को अखण्‍ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार उक्त व्रत करते हुए पाँचवें वर्ष इसका उद्यापन करना चाहिए अन्यथा यह व्रत निष्फल हो जाता है। चार वर्ष के सोलह मंगलवारों के पश्चात् पाँचवें वर्ष के किसी भी मंगलवार को उद्यापन किया जा सकता है। उद्यापन में गौरी पूजा के पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वारा हवन करवाना चाहिए तथा सोलह ब्राह्मणों को उनकी पत्नी सहित भोजन कराकर सौभाग्यपिटारी एवं दक्षिणा प्रदान करें। अन्त में अपनी सासजी को सोलह लड्डुओं का वायना देकर उनके चरण स्पर्श कर अक्षयसौभाग्य का आर्शीबाद प्राप्त करना चाहिए। 
इस व्रत को प्रत्येक विवाहिता को करना आवश्‍यक माना गया है। इस व्रत को करने से पति से कभी भी वियोग नहीं होता तथा पति-पत्नी दोनों को ही दीर्घआयु व सर्वसुख की प्राप्ति होती है। पति-पत्‍नी दोनों का प्रेम अक्षय, अटल व चिर-‍स्‍थाई बना रहता है।

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