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टिकट खिड़की पर ‘रॉकेट..’ का दूर तक उड़ना मुश्किल : फिल्म समीक्षा

टिकट खिड़की पर ‘रॉकेट..’ का दूर तक उड़ना मुश्किल : फिल्म समीक्षा

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फिल्म रॉकेट सिंह सेल्समैन ऑफ द ईयर

कलाकार- रणबीर कपूर, शहजान पद्मसी, मुकेश भट्ट, गौहर खान, प्रेम चोपड़ा
निर्देशक- शीरीत अमीन
लेखक- जयदीप साहनी

 

लेखक जयदीप साहनी और निर्देशक शिरीत अमीन की फिल्म रॉकेट सिंह सेल्समैन ऑफ द ईयर कुछ हद तक लीक तोड़ने की कोशिश जरुर करती है, लेकिन फिल्म चक दे के आसपास भी नहीं ठहरती। कॉमेडी फिल्म की श्रेणी में रखी गई इस फिल्म में दर्शकों को हंसाने के लिए कुछ मसाला है, लेकिन फिल्म पूरी तरह कॉमेडी नहीं है। और, व्यंग्य भी उतना पैना नहीं कि इसे व्यंग्यात्मक कहा जाए। फिल्म में गानों के लिए कोई जगह नहीं रखी गई है, और शायद यह लेखक-निर्देशक जोड़ी का अपना अंदाज है। सीधे सीधे कहें तो रणबीर कपूर की बहु-प्रतीक्षित फिल्म रॉकेट सिंह टिकट खिड़की पर कमाल करने की स्थिति में नहीं दिख रही।

 

फिल्म लीक से हटकर इस मामले में हैं कि युवा धड़कनों में बसे रणबीर कपूर की फिल्म में गानों के लिए कोई जगह नहीं है। गाने सिर्फ बैकग्राउंड तक सीमित रहते हैं। फिल्म में हीरोइन भी सिर्फ इसलिए है, क्योंकि भारतीय फिल्मों में ऐसा होना लगभग आवश्यक माना गया है। वरना, शहजान पद्मसी की भूमिका सिर्फ चंद दृश्यों तक सीमित है और वो फिल्म की कहानी में कोई खास जगह नहीं बना पातीं। फिल्म में अगर लगातार हंसी के फुव्वारे छोड़ते सीन नहीं हैं, तो कोई एक्शन दृश्य भी नहीं है।

 

दरअसल, रॉकेट सिंह की कहानी में ऐसा कुछ नहीं है, जितना प्रचारित किया गया था। कहानी हरप्रीत सिंह बेदी नाम के एक सेल्समैन की है, जो कप्यूटर बेचने वाली एक कंपनी से अपना करियर शुरु करता है। शुरुआत में ही सेल्समैन की जिंदगी के कड़वे सच से वो रुबरु होता है। इनमें झूठ बोलने से लेकर रिश्वत देने तक सब शामिल है। लेकिन, स्कूली दुनिया में नंबरों के गणित से दूर रहा हरप्रीत यानी रणबीर कपूर इस गोरखधंधे में खुद को फिट नहीं कर पाता। अलबत्ता कंपनी के एक बड़े क्लाइंट की शिकायत जरुर कर देता है, जिसके बाद उसका करियर बनने से पहले ही ठहर जाता है। लगातार अपमान सह रहे हरप्रीत की जिंदगी में अचानक ऐसा मोड़ आता है, जहां वो अपना धंधा शुरु करता है। लेकिन, कंपनी की छत के नीचे से ही। यहां उसे कंपनी के भीतर ही अपना हक हासिल न कर पाए लोगों की मदद मिलती है। या यूं कहिए कि ये सभी रॉकेट सिंह कॉर्पोरेशन के पार्टनर बनते हैं। सस्ते कंप्यूटर, सच्चे वादे और बेहतरीन सर्विस के बूते रॉकेट सिंह कॉर्पोरेशन जल्दी ही एवाईएस कंपनी के कई ग्राहकों को दूर कर देता है। हालांकि, ये कंपनी उनके ग्राहकों को तोड़ती नहीं है अलबत्ता बेहतरीन सर्विस देकर ग्राहकों को जोड़ती है।

 

हरप्रीत का आत्मविश्वास और कंपनी की बेहतरीन सर्विस के बूते कंपनी जल्दी ही तरक्की करती है। लेकिन, एवाईएस कंपनी के एमडी पुरी के माथे पर शिकन पड़ती है, तो वो पूरी धांधलेबाजी को पकड़ लेता है। खुद को और अपने सार्थियों को जेल से बचाने के लिए  हरप्रीत को रॉकेट सिंह कॉर्पोरेशन को सिर्फ एक रुपए में वापस पुरी को बेचना पड़ता है।

दरअसल,  इस मोड़ के बाद को लगता है कि हरप्रीत कुछ ऐसा काम करेगा कि वो वापस हीरो साबित हो। लेकिन, होता कुछ और है।

 

फिल्म के पहले हाफ में जो रफ्तार है, वो दूसरे हाफ में नहीं दिखायी देती। शहजान के बजाय गौहर खान ज्यादा प्रमुख भूमिका में दिखायी देती हैं, जो रॉकेट सिंह की एक पॉर्टनर हैं। एक और पार्टनर मिश्रा यानी मुकेश भट्ट ने बेहतरीन एक्टिंग की है। इसी तरह दूसरे हाफ में हरप्रीत से ज्यादा फुटेज एवाईएस कंपनी के एमडी पुरी बटोर ले जाते हैं।

 

जहां तक एक्टिंग का सवाल है, तो सिख की भूमिका में रणबीर जंचे हैं। उनकी एक्टिंग क्षमता में गुणात्मक सुधार हुआ है, लेकिन फिर में उन्हें फिल्म में ऐसा कुछ करने का मौका नहीं मिला, जिससे वो छा जाएं। इसके उलट एवाईएस कंपनी के मालिक की भूमिका में पुरी की भूमिका जानदार है।

 

फिल्म एक बार देखी जा सकती है, लेकिन अब तक छप्पन और चक दे जैसी फिल्में लिख चुके जयदीप साहनी के फैन्स को फिल्म देखकर निराशा हो सकती है। फिल्म सेल्समैन की जिंदगी की झलक जरुर दिखाती है, लेकिन उसकी जिंदगी में कायदे से झांक नहीं पाती। हां, बिजनेस का मतलब नंबर नहीं, लोग हैं-जैसा एक आध डायलॉग कुछ दूर साथ चलता है, और शायद एक लाइन में यही फिल्म का फलसफा भी है।

 



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