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पश्चिम की नकल न करें भारतीय फिल्मकार : गेरिन (साक्षात्कार)

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12 नवंबर 2013
कोलकाता|
भारतीय फिल्मों के गानों और नृत्यों का इंडोनेशियाई फिल्मों पर बड़ा प्रभाव है, लेकिन पश्चिमी फिल्मों की ज्यादा नकल के कारण हाल ही में भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता बहुत घट गई है। यह कहना है इंडोनेशियाई फिल्मकार गेरिन नूग्रोहो का।

गेरिन को लगता है कि भारतीय फिल्मकार जब अपने देश की धनी संस्कृति और विरासत से प्रेरित फिल्में बनाते हैं तो ये दक्षिणपूर्वी एशियाई दर्शकों को ज्यादा समझ में आती है।

गेरिन यहां रविवार को शुरु हुए 19वें कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (केआईएफएफ) में प्रतिनिधि के रूप में मौजूद थे। इस महोत्सव में इस साल उनकी सात फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है। इन फिल्मों में दक्षिणपूर्व एशिया पर विशेष प्रकाश डाला गया है।

उन्होंने एक साक्षात्कार के दौरान आईएएनएस को बताया, "अगर आप 20 साल पहले के भारतीय सिनेमा से तुलना करें तो आप पाएंगें कि यह बहुत लोकप्रिय था, लेकिन अब यह लोकप्रियता घट रही है क्योंकि आजकल वे पश्चिम के रास्ते जा रहे हैं।"

उन्होंने कहा, "भारत के लिए एशिया बहुत बड़ा बाजार है। भारतीय निर्माता पहले मजबूत थे लेकिन अब एशियाई बाजार में वह घाटा खा रहे हैं।"

केआईएफएफ में गेरिन की फिल्मों में 2006 में आई फिल्म 'ओपरा जावा' का चुनाव भी हुआ है। यह फिल्म रामायण के सीता हरण से प्रेरित है, जो टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, वेंकूवर अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव सहित कई फिल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हुई है।

गेरिन का कहना है फिल्म ने साबित कर दिया कि इंडोनेशियाई लोग भारत के महाभारत और रामायण पसंद करते हैं।

गेरिन का कहना है कि इंडोनेशिया में हिंदू धर्म की व्यापकता के कारण दोनों देशों की संस्कृतियों में समानता है, जिसके कारण वहां भारतीय फिल्में पसंद की जाती हैं।

उन्होंने कहा, "मेरे देश में भारतीय फिल्में बहुत लोकप्रिय हैं और इन फिल्मों ने हमारे सिनेमा को गहराई से प्रभावित किया है। महाभारत, रामायण और नाच-गाना वहां पसंद किया जाता है।"

उन्होंने बताया कि इंडोनेशिया में शाहरुख खान के बहुत से प्रशंसक हैं। इसके साथ चमकीली पोशाकों के साथ नृत्य भी प्रमुख आकर्षण है।

"भारतीय नृत्य हॉलीवुड से प्रेरित हैं और इंडोनेशियाई नृत्य के लिए नए परिप्रेक्ष्य में तब्दील होते हैं।"

हलांकि उन्होंने कहा कि वर्तमान में उनके देश के दर्शक भारतीय समानांतर सिनेमा से दूर होने लगे हैं।

उन्होंने कहा, "वर्तमान फिल्मों के साथ समस्या है कि हम भारत की सिर्फ लोकप्रिय फिल्मों को ही जानते हैं। हमें वैकल्पिक फिल्में नहीं दिखती। भारत को अपनी खुद की संस्कृति दिखाने की जरूरत है, इससे इन फिल्मों को पूरे एशिया में अधिक स्वीकृति मिलेगी।"
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