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मंगलमूर्ति मोरया : 1 सितंबर की गणेश चतुर्थी पर विशेष

ganesh chaturthi 2011

अनिरुद्ध शर्मा

जो छोटे कद वाले, तोंद वाले, मोटी त्वचा वाले, हाथी के से मुख वाले, विशाल शरीर वाले, अग्नि सरीखे कान्तिमान, एकदन्त, समस्त ज्ञानियों और योगियों को भी ज्ञान प्रदान करने वाले हैं, एैसे उमापुत्रा श्री गणेश की पूजा व अर्चना करने से निश्चय ही मनुष्य के समस्त दुःखों व कष्टों का निवारण हो जाता है।

वैसे तो श्री गणेश का पूजन-भजन हर समय फलदायक होता है, किन्तु भादौं मास की शुक्ल चतुर्थी को श्री सिद्धिविनायक-व्रत का पालन करने़ से विशेष फल की प्राप्ति होती है। यह व्रत समस्त संकटों का नाश करने वाला है। इस व्रत में आवाहन आदि समस्त उपचारों द्वारा श्री गणेश का पूजन करना चाहिए। सर्वप्रथम मन पर संयम रखकर एकाग्रचित्त हो श्री सिद्धिविनायक का ध्यान करें। वे एक दाँत वाले है, तथा उनके कान सूप के समान चौड़े एवं बड़े है, उनका मुख हाथी के मुख के समान जान पड़ता है तथा वे चार भुजाधारी हैं। उन्होंने हाथों में पाश और अंकुश धारण कर रखे हैं। उनकी अगं-कान्ति तप्त-सुवर्ण के समान देदीप्यमान है। श्री गणेश के इक्कीस नामों के उच्चारण के साथ उन्हें भक्तिपूर्वक इक्कीस पत्ते समर्पित करें।

‘सुमुखाय नमः’ कहकर शमीपत्र, ‘गणाधीशाय नमः’ से भँगरैया का पत्ता, ‘उमापुत्राय नमः’ से बिल्वपत्र, ‘गजमुखाय नमः’ से दूर्वादल, ‘लम्बोदराय नमः’ से बेर का पत्ता, ‘हरसूनवे नमः’ से धतूरे का पत्ता, ‘शूर्पकर्णाय नमः’ से आम का पत्ता, ‘वक्रतुण्डाय नमः’ से सेम का पत्ता, ‘गुहाग्रजाय नमः’ से अपामार्ग का पत्ता, ‘एकदन्ताय नमः’ से भटकटैया का पत्ता, ‘हेरम्बाय नमः’ से सिंदूर वृक्ष का पत्ता, ‘चतुर्होत्रो नमः’ से तेजपात का पत्ता, ‘धूम्रवर्णाय नमः’ से अगस्त्य का पत्ता ’विकटाय नमः’ से कनेर का पत्ता, ‘इभतुण्डाय नमः’ से अश्मात का पत्ता, ‘विनायकाय नमः’ से आक का पत्ता, ‘कपिलाय नमः’ से अर्जुन का पत्ता, ‘वटवे नमः’ से देवदारु का पत्ता, ‘भालचन्द्राय नमः’ से मरुआ का पत्ता, ‘सुराग्रजाय नमः’ से गान्धारी का पत्ता और ‘सिद्धिविनायकाय नमः’ से केतकी का पत्ता चढ़ावे तथा दो दूर्वादल, गन्ध, अक्षत, पुष्प के साथ पाँच मोदक अथवा मोतीचूर के लड्डू भी अर्पण करें।

घ्यान रखें ! गणेश पूजन में तुलसी सर्वदा निषेध है इसीलिए कभी भी गणेश जी को तुलसीदल अर्पित न करें। माना जाता है कि एक समय जब गणेश जी पुष्कर में तपस्या कर रहे थे, तो वहाँ से गुजर रही देवी तुलसी उनके नव-यौवन एवं रूप-रंग पर मोहित हो गयीं और गणेश जी का ध्यान भंग करते हुए उनसे विवाह का आग्रह किया, जिस पर क्रोधित हो गणेश जी ने उन्हें शाप दिया कि तुम सदा के लिए वृक्ष बन कर धरती पर निवास करोगी तथा मेरे लिए सर्वथा त्याज्य रहोगी।

इस चतुर्थी में चन्द्र दर्शन का दोष पाराशर ऋषि ने कहा है। यदि मनुष्य इस तिथि को अज्ञानवश भी चन्द्रमा का दर्शन करता है तो वह एक वर्ष तक मिथ्या कलंक से पीडि़त रहता है। पौराणिक मान्यता है कि एक बार जब श्री गणेश यात्रा करते हुए चन्द्रलोक से गुजर रहे थे तो अचानक गिर पड़े। गणेश जी को गिरा हुआ देख चन्द्रमा बड़े उच्चस्वर से हँसा, इस पर क्रोधित हो गणेश जी ने चन्द्रमा को शाप दिया कि तुम अपने को अति सुन्दर, दर्शनीय स्वरूप मानते हो और अति गर्वित हो। अतः इसका फल तुम्हें अवश्य मिलेगा। आज से जो तुम्हें अज्ञानवश भी देखेगा वह मिथ्या कलंक से संयुक्त होगा। इसके बाद म्लानबदन चन्द्रमा जल में जाकर छिपा और कुमुद में वास किया। ब्रह्माजी के कहने पर चन्द्रमा ने गणेश जी की आराधना की, जिस पर प्रसन्न होकर गणेश जी ने अपने शाप को केवल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के लिए सीमित कर दिया। कहा जाता है कि उक्त तिथि को श्री कृष्ण ने अज्ञानवश चन्द्रमा के दर्शन कर लिए जिसके फलस्वरूप उन्हें एक वर्ष तक स्यमन्तकमणि की चोरी, बन्धुवध तथा कई अन्य मिथ्या कलंकों को भोगना पड़ा। यदि इस रात भूलवश चन्द्र दर्शन हो जाये तो उस दोष की शान्ति के लिए इस मन्त्रा का पाठ करें।

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।

माहाराष्ट्र प्रान्त में तो गणेश चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी तक गणेश उत्सव की विशेष धूम रहती है। हर गली, मौहल्ले में बड़े-बड़े पड़ांल सजते हैं। गणपति की मिट्टी की विशालकाय प्रतिमायें स्थापित की जाती हैं तथा इस दौरान विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस उत्सव की शुरुआत लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने सन् 1893 ई0 में स्वतन्त्राता संग्राम के लिए लोगों को एकजुट करने की दृष्टि से की थी।

शुक्ल चतुर्थी को प्रत्येक परिवार अपनी श्रद्धा अनुसार गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति लाकर पूजाघर के विशेष मंड़प में विराजित करता है तथा दस दिनों तक प्रत्येक सुबह नये-नये फलों द्वारा व प्रत्येक शाम नये-नये मिष्ठानों द्वारा गणेश पूजन कर आरती की जाती है। अनन्त चतुर्दशी का दिन प्रतिमा-विसर्जन का होता है। अतः इस दिन अन्तिम प्रसाद के रूप में गणेश जी का प्रिय मिष्ठान ‘मोदक’ उन्हें भेंट किया जाता है तथा सिन्दूर से अभिषेक कर पीताम्बर अर्पित किया जाता है।

गणेश विसर्जन के सम्बन्ध में एक बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि जब प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया जाये तो घर से पूर्ण रूप से बाहर निकलने तक प्रतिमा का मुख घर की ओर ही होना चाहिए। घर से थोड़ी दूर चलने के पश्चात् मुख सामने की ओर बदल देना चाहिए। प्रतिमा विसर्जन अपने समीप के किसी भी स्वच्छ तालाब, नदी, सरेवर अथवा समुद्र में दोनों हाथों से कंधे झुकाकर नम्रतापूर्वक किया जाना चाहिए तथा गणपति को अगले वर्ष जल्द से जल्द फिर आने का निमन्त्रण भी देना चाहिए।

एैसा करने से मनुष्य को इस लोक और परलोक के समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। श्री गणेश जी की पूजा से ब्रह्मा, विष्णु, शिव-पार्वती, सूर्य और अग्नि ये सम्पूर्ण देव पूजित होते हैं। किसी भी भय, रोग, शोक व कष्ट से पीडि़त मनुष्य यदि इन दस दिनों में ‘ ऊं गं गौं गणपतये विघ्नविनाशिने स्वाहा’ का एक हजार बार जाप करता है, तो निश्चय ही उसको परम शान्ति प्राप्त होती है। श्री सिद्धिविनायक के पूजन से समस्त मनोरथ पूर्ण होते है तथा शत्रुओं पर विजय की प्राप्ति होती है।

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