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जातीय संघर्ष में प्रमुख नाम ब्रह्मेश्वर मुखिया का

brahameshwar mukhia

1 जून 2012

पटना। बिहार में रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ ब्रह्मेश्वर मुखिया का नाम जातीय संघर्ष में प्रमुखता से लिया जाता है। ब्रह्मेश्वर की शुक्रवार सुबह चार बजे आरा जिले के कतिरा मुहल्ले में अज्ञात लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। रणवीर सेना ऊंची जातियों का संगठन माना जाता रहा है। बिहार में जातीय संघर्ष के दौर में ऊंची जाति के लोगों ने अपने हितों की लड़ाई लड़ने के लिए सितम्बर 1994 में ब्रrोश्वर मुखिया के नेतृत्व में रणवीर सेना का गठन आरा के पेलाउर गांव में किया था। धीरे-धीरे इस संगठन का वर्चस्व भोजपुर, बक्सर, औरंगाबाद, गया, भभुआ, पटना सहित कई जिलों में हो गया।

बिहार में कई नरसंहारों में रणवीर सेना का हाथ माना जाता रहा है। ब्रrोश्वर के नेतृत्व वाली इस सेना पर पहली बार 29 अप्रैल 1995 को भोजपुर जिले के संदेश प्रखंड के खोपिरा गांव में पांच दलितों की हत्या का आरोप लगा। कालांतर में इस संगठन की खूनी भिड़ंत नक्सली संगठनों से होने लगी। बाद में राज्य सरकार ने इस संगठन को प्रतिबंधित कर दिया गया।

नब्बे के दशक में बिहार के कई जिलों में नरसंहार का दौर प्रारंभ हुआ था, जिसमें सबसे बड़ा दिसंबर 1997 में हुआ जहानाबाद जिले के लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार था। इसमें 58 दलितों की हत्या कर दी गई थी।

गौरतलब है कि इस मामले में न्यायालय ने 18 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, जबकि ब्रह्मेश्वर साक्ष्य के अभाव में बरी हो गया।

बिहार में करीब 277 लोगों की हत्या से सम्बंधित 22 अलग-अलग नरसंहारों में मुखिया को आरोपी बनाया गया था, जिसमें धीरे-धीरे कर 16 मामलों में उसे साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया। जबकि छह अन्य मामलों में वह जमानत पर था। हाल ही में ब्रह्मेश्वर को बथानी टोला नरसंहार में बरी किया गया था।

गौरतलब है कि ब्रह्मेश्वर पर राज्य सरकार ने पांच लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था। उसे 29 अगस्त 2002 को पटना के एक्जीबिशन रोड से गुप्त सूचना के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया। करीब नौ वर्ष बाद ब्रrोश्वर 10 जुलाई 2011 को न्यायालय के आदेश के बाद जेल से बाहर आया।

जेल से बाहर आने के बाद पांच मई 2012 को ब्रह्मेश्वर ने भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के नाम से एक संगठन बनाया और कहा कि अब वह किसानों की हित की लड़ाई एक बार फिर लड़ेगा।

उल्लेखनीय है कि ब्रह्मेश्वर के साक्ष्य के अभाव में अधिकांश मामलों में बरी हो जाने के बाद वर्तमान सरकार पर भी उसकी मदद करने का आरोप लगने लगा था।

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