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हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता : अनंत चतुर्दशी पर विशेष

Anant Chaturdashi

अनिरुद्ध शर्मा

भारत देश की पवित्र भूमि अनेक प्रकार के अनूठे व्रत और पर्वों के लिए प्रसिद्ध है। ऐसा ही एक प्रसिद्ध और कल्यारणकारी व्रत है अनन्तह चतुर्दशी-व्रत। भादों मास की शुक्ल चतुर्दशी विश्व  में अनन्तचतुर्दशी के नाम से विख्याअत है। इस दिन श्रीहरि के विराट रूप भगवान अनन्त की पूजा की जाती है तथा अलोना (नमक रहित)-व्रत रखा जाता है, जिसमें एक समय भोजन किया जाता है। इस व्रत में उदयव्यापिनी तिथि ली जाती है। इस दिन पूर्णिमा का समावेश होने से व्रत का फल हजार गुना बढ़ जाता है। इस व्रत को करने से सम्पूर्ण दरिद्रता, भय एवं क्लेश का नाश होता है। भगवान अनन्त ही सूर्य, चन्द्र, ग्रह, काल, नक्षत्र, लव, काष्ठा, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष, युग, कालव्यव आदि रूप में सर्वत्र व्याप्त है तथा वे ही आदि, मध्य, अन्तरहित श्रीकृष्ण, विष्णु, शिव, ब्रह्मा, वैकुण्ठ, भास्कर, सोम, सर्वव्यापी, ईश्वर, विश्वरूप तथा महासृष्टिसंहारकारक है। भगवान अनन्त में ही चौदह इन्द्र, आठ वसु, बारह सूर्य, ग्यारह रुद्र, सप्तऋषि, सप्तसमुद्रपर्यन्त नदी, वृक्ष, दिशा, भूमि, पाताल, भूर्भुवादि लोक विद्यमान हैं।

व्रती पुरुष को प्रातः काल स्नान पश्चात् एक सेर गेहूँ के आटे में शक्कर और घी  मिलाकर एवं पकाकर पूआ तैयार करने चाहिए। पूआ एवं नैवेद्य सहित किसी पवित्र नदी अथवा सरोवर आदि के तट पर जाना चाहिए तथा व्रत के लिए संकल्प करना चाहिए। यथाः-
‘ममाखिलपापपूर्वकशुभुफलवृद्धये श्रीमदनन्तप्रीतिकामनया अनन्तव्रतमहं करिष्ये।’

उक्त प्रकार संकल्प कर नदी तट की भूमि को गो-गोबर से लीपकर कलश स्थापित कर पूजन करना चाहिए। उसके उपरान्त भगवान विष्णु की शेषशय्या पर विराजमान स्वर्ण, रजत, कांस्य, ताम्र अथवा मिट्टी की मूर्ति रख कर मूर्ति के सम्मुख चैदह ग्रन्थियुक्त (गाँठ वाला) कपास अथवा रेशम का सुन्दर अनन्तसूत्र (डोरा-धागा) रखना चाहिए। तत्पश्चात् गन्ध, चन्दन आदि उपचारों द्वारा ‘¬ अनन्ताय नमः’ मंत्र से भगवान विष्णु एवं अनन्तसूत्रा का षोडशोपचार विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए तथा भगवान श्रीहरि का निम्न मंत्र द्वारा ध्यान करना चाहिए। यथाः-

नमस्ते देवदेवेश नमस्ते धरणीधर। नमस्ते सर्वनागेन्द्र नमस्ते पुरुषोत्तम।।

पूजा उपरान्त पुराने अनन्तसूत्र को बाँह से उतारकर तथा उसका पूजन कर उक्त नदी अथावा सरोवर में विसर्जन कर देना चाहिए। तत्पश्चात् नये अनन्तसूत्र को निम्न मंत्र उच्चारण द्वारा पुरुष को दाहिने हाथ तथा स्त्री को बायें हाथ में बाँधना चाहिये। मंत्र:-
अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान् समभ्युद्धर वासुदेव।
अनन्तरूपे विनियोजितात्मा ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते।।

अनन्तसूत्र धारण करले के बाद ब्राह्मण को दक्षिणा सहित उक्त पूआ एवं नैवेद्य देकर आर्शीवाद ग्रहण करना चाहिए। पूजा में सम्पूर्ण परिवार के साथ पूर्ण सुख एवं समृद्धि देने वाली अनन्तव्रत-कथा सुननी चाहिए। कथाः-

पूर्वकाल में वसिष्ठगोत्र में उत्पन्न सुमन्तु नाम के एक ऋषि थे, जिनकी पुत्री का नाम शीला था। शीला स्वभाव से परम उदार थी। सुमन्तु जी ने उसका विवाह कौण्डिन्यमुनि के साथ कर दिया। शीला ने भादों मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनन्तभगवान का व्रत एवं पूजन किया तथा अनन्तसूत्र को बायीं भुजा में धारण किया। भगवान श्री अनन्त की कृपादृष्टि से शीला एवं कौण्डिन्य का घर सभी प्रकार के धन-धान्य एवं सुख-समृद्धि से पूर्ण हो गया। एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाहु में बँधे अनन्तसूत्र पर पड़ी। पति को वश में करने की कोई चीज समझ कौण्डिन्यमुनि ने क्रोधवश उक्त अनन्तसूत्र को तोड़कर आग में फेंक दिया।

अनन्त भगवान ने अपने इस अपमान के फलस्वरूप कौण्डिन्यमुनि की समस्त सम्पत्ति एवं एश्वर्य नष्ट कर दिया। दरिद्रता को प्राप्त होने पर कौण्डिन्यमुनि दुःखी रहने लगे तथा अनन्त भगावान से क्षमा-प्रार्थना हेतु वन को प्रस्थान किया। वहाँ वन में अत्यन्त दुःखी मन से विलाप करते हुए वृक्षों, लताओं, जीव-जन्तुओं आदि से श्री अनन्तदेव का पता पूछने लगे तथा श्री हरि को पुकारने लगे। तव भगवान विष्णु ने एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश रखकर  उन्हें एक गुफा में जाने को कहा। गुफा में प्रवेश करने पर कौण्डिन्यमुनि को भगवान अनन्त ने चतुर्भुजरूप में दर्शन दिये तथा अनन्तसुत्र के तिरस्कार के दोष निवारण हेतु चौदह वर्ष तक अनन्तव्रत का पालन करने का निर्देश दिया। कालान्तर में मुनि ने उक्त व्रत को अपनी भार्या शीला सहित विधिपूर्वक किया तथा अक्षय सुख-समृद्धि को प्राप्त किया। इस कथा को उक्त तिथि को सुनने अथवा पढ़ने से व्रती पुरुष सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।

पूर्वकाल में जब युधिष्ठर अपने भाईयों एवं द्रोपदी सहित वनवास में कष्ट सह रहे थे, उस समय उनके कष्ट निवारण हेतु श्रीकृष्ण ने ही उन्हें अनन्तव्रत करने का निर्देश दिया था तथा कहा कि जो कोई व्यक्ति संसाररूपी गुफा में सुख एवं आनन्द पूर्वक विहार करना चाहता है, तो वह अनन्तदेव की पूजा कर अनन्तसूत्र हाथ में बाँधे। भगवान अनन्त सर्वत्र एवं सर्वव्यापक है, किंतु जब तक मनुष्य की आसक्ति संसार एवं शरीर में रमी रहती है तब तक भगवान अनन्तदेव के दर्शन होना दुर्लभ है। सांसारिक विषयों से अन्तर्मुख होकर भगवान का साक्षात्कार सुलभ हो जाता है।

इस उत्तम ‘अनन्त-व्रत’ को करने से अनन्त फल, सुख एवं पुण्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत का चौदह वर्षों तक पालन करना किया जाता है। चौदहवें वर्ष पीवाम्बर से आच्छादित भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने होम कर एवं पूर्ण आहुति देकर, चैदह ब्राह्मणों को मीठे पकवान भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिए।

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