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राजनीति : फिल्म समीक्षा

प्रकाश झा की राजनीति की बात करने से पहले एक सवाल कांग्रेस के नेताओं से किया जा सकता है कि इस फिल्म की कौन सी छवि उन्हें कांग्रेस या सोनिया गांधी के खिलाफ जाती दिखायी दी? फिल्म को सेंसरबोर्ड में अटकाने की कोशिश और फिर कुछ सीनों के साथ कांट छांट की बात ने फिल्म को पब्लिसिटी ही दिलायी, अलबत्ता पहली बात तो यह कि फिल्म की कहानी का कांग्रेस या सोनिया गांधी से कहीं कोई लेना देना नहीं है।

अब,जहां तक फिल्म “राजनीति” की बात है, तो फिल्म में कई दिग्गज कलाकार हैं, लेकिन फिल्म में अपनी उपस्थिति को जिस एक कलाकार ने सबसे सशक्त अंदाज में दर्शकों के सामने पेश किया-वो है मनोज बाजपेयी।
 
“महाभारत” की कहानी के खांचे में डालकर गढ़ी गई इस फिल्म में मनोज बाजपेयी दुर्योधन हैं, और वो अर्जुन बने रणबीर और कृष्ण बने नाना पाटेकर समेत सभी पर हावी हैं।

फिल्म की कहानी लगातार पलटती रहती है, मोड़ लेती रहती है। इतना, कि आप अंदाज नहीं लगा सकते कि आगे क्या होने वाला है। यह फिल्म न सिर्फ मनोरंजन करती है, बल्कि समझ भी बढ़ाती है। हालांकि,भारतीय राजनीति को इस फिल्म से आंकना या इस फिल्म को पूरी तरह भारतीय राजनीति का आइना मानना गलत होगा। हां,फिल्म कुछ राजनीतिक हथकंडों को सामने लाती है और बताती है कि नेता कई बार किस हद तक गिर जाते हैं।

“राजनीति” एक अच्छा निर्माण है। प्रकाश झा, उच्चस्तरीय सिनेमा के लिए जाने जाते हैं और यह फिल्म उन्हीं के अंदाज की है। हां, फिल्म में मनोरंजन की डोज कुछ कम है, और फिल्म की लंबाई एक निगेटिव प्वाइंट है।

फिल्म में भास्कर सान्याल (नसीरुद्दीन शाह) एक  तेजतर्रार वामपंथी नेता है। वह अपने दम पर बड़े से बड़े नेता को चुनौती देने का दमखम रखता है इसलिए उससे लोग डरते हैं।राज्य के मुख्यमंत्री की बेटी उससे बहुत प्रभावित है। भावनात्मक पलों में दोनों के बीच रिश्ते बन जाते हैं, और इसे भास्कर अपना दोष मानते हुए स्वनिर्वाजित जिंदगी जीने निकल पड़ता है।

फिल्म लौटती है वर्तमान में- पृथ्वी (अर्जुन रामपाल) एक ताकतवर राजनीतिक परिवार का उत्तराधिकारी है और सर्वोच्च पद पाने के लिए बेकरार है। लेकिन उसका चचेरा भाई वीरेन्द्र ( मनोज वाजपेई) उसका सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतिद्वंदी साबित होता है। वह एक ऐसा शख्स है जो मानता है कि उसका जन्म ही शासन करने के लिए हुआ है और वह शिखर तक पहुंचने के लिए कुछ भी करने से नहीं हिचकेगा। 

परिवार और राजनीतिक प्रतिद्वंदी का सामना करता हुआ वीरेन्द्र एक नया खेल खेलता है। वह सूरज (अजय देवगन) को चुनता है जो दिल में गुस्सा और दिमाग में नेतृत्व लिए हुए एक युवक है। सूरज को वीरेन्द्र की असली पहचान का पता नहीं है। पृथ्वी का भाई समर ( रणबीर कपूर) इन सबसे अलग-थलग है। उसकी कोई राजनीतिक मह्त्वाकांक्षा नहीं है लेकिन वह पारिवारिक प्रतिद्वंद्विता के भंवर में फंस जाता है। लेकिन, यही समर फिर उभरता है राजनीतिक युद्ध का मंजा हुआ खिलाड़ी बन कर। इंदु (कैटरीन कैफ) एक धनी उद्योगपति की बेटी है। वह भी इसी भंवर में फंस जाती है। और इन सबके बीच है बृज गोपाल (नाना पाटेकर), जो दिन पर दिन खूनी होते जाते राजनीतिक्र युद्ध में समर और पृथ्वी का गुरु बनता है।

इतने दिग्गज सितारों को इकट्ठा करना और ऎसी कहानी चुनना जो इनकी अभिनय प्रतिभा के साथ न्याय कर सके, आसान नहीं। लेकिन प्रकाश झा इस चुनौती पर खरे उतरते हैं।

लभभग तीन घंटे की यह फिल्म दर्शकों को शुरू से अंत तक बांधे रखती है। अंजुम राजाबली और प्रकाश झा की पटकथा कसी है, और गीतों को ज्यादा जगह नहीं दी गई है। वैसे, गानों के लिए ज्यादा जगह थी भी नहीं। 
 
कुल मिलाकर फिल्म एक बार देखने लायक है।

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