
क्या होता है जब एक किशोर के हाथों में बंदूक थमा दी जाती है। बाल हिंसा की बढती घटनाएं, चाहे वो अमेरिका के किसी स्कू ल में किसी छात्र द्वारा अपने साथियों के ऊपर गोलीबारी की हो या तालिबान द्वारा अपनी आतंकी कार्रवाइयों में बच्चों का आत्म घाती हमलावरों के रुप में इस्तेसमाल, इस बात का गवाह हैं कि बच्चों के मासूम मस्तिष्को पर समाज में फैली अव्य वस्थाह और हिंसा का गंभीर असर पड़ता है। इतना ही नहीं, कई बार ये बच्चेा समाज के तथाकथिात ठेकेदारों की हाथों का खिलौना बनकर रह जाते हैं।
आने वाली 28 अगस्तस को रीलीज हो रही फिल्म सिकंदर में इसी कथानक को दिखाया गया है।निर्माता सुधीर मिश्रा और निर्देशक पीयूष झा की फिल्म ‘सिकंदर’ कहानी है एक बच्चे की, जिसके माता-पिता आतंकवादियों के हाथों मारे जा चुके हैं। फिर भी, वह अपने चाचा-चाची के साथ मजे से जिंदगी गुजार रहा होता है। सिकंदर का एक ही सपना है, बड़ा होकर फुटबॉल खेलना। लेकिन एक दिन अपनी स्कूाल टीम के लिए फुटबॉल का एक मैच खेलकर घर लौटते वक्तत उसे रास्तेी में एक बंदूक मिल जाती है। दोस्तों के मना करने के बावजूद सिकंदर वह बंदूक अपने हाथों में उठा लेता है और इसके बाद फिल्मा की कहानी ऐसा मोड़ लेती है कि 14 साल का सिकंदर एक के बाद एक मुश्किलों में घिरता चला जाता है और उसकी जिंदगी तबाह होकर रह जाती है। वह चाहकर भी इस जलजले से खुद को बाहर नहीं निकाल पाता है और एक अबोध जिंदगी के शुरू होने से पहले ही खत्मच हो जाने की संभावना नजर आने लगती है।
फिल्म का कथानक कश्मीर की वादियों में केंद्रित जरूर है, लेकिन निर्देशक पीयूष झा का मानना है कि इसका कश्मीर में फैले आतंकवाद से विशेष लेना-देना नहीं है। हालांकि, उन्होंने कश्मीर समस्या के अलग-अलग पहलूओं को छूने की कोशिश जरूर की है। लेकिन उनका कहना है कि इस फिल्म में सिकंदर के साथ जो कुछ होता है, वह कहीं भी और कभी भी किसी के साथ हो सकता है। पीयूष कहते हैं कि फिल्मल में बच्चों के कोमल मस्तिष्कह पर उनके आस-पास फैली हिंसा का पड़ने वाले असर को दिखाया गया है और यह फिल्मफ इसी मुद्दे पर एक गंभीर बहस छेड़ने की कवायद है।
फिल्म में सिकंदर की भूमिका परजान दस्तूइर ने निभाई है जो इससे पहले परजानिया में अपने अभिनय की छाप छोड़ चुके हैं। इसके अलावा आयशा कपूर, माधवन और संजय सूरी भी महत्वोपूर्ण भूमिकाओं में हैं। शंकर-एहसान-लॉय ने सिकंदर के लिए संगीत तैयार किया है। फिल्मम की एक बड़ी खासियत उसका खूबसूरत छायांकन है। निर्माता-निर्देशक ने कश्मीहर की खूबसूरती को अपने अंदाज में दर्शकों के सामने पेश करने की कोशिश की है। अच्छीन बात यह है कि लंबे समय बाद कश्मीसर में फिर से फिल्मों की शूटिंग शुरू हुई है, जो न केवल दर्शकों के लिए अच्छीम खबर है, बल्कि आतंकवाद का दंश झेल रहे कश्मीर के सुधरते हालातों की कहानी भी बयां करता है।