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तीस साल बाद आतंकवाद नहीं होगा कोई मुद्दा : पॉल रोजर्स

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 ब्रिटेन की ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी में पीस स्टडीज के प्रोफेसर पॉल रॉजर्स अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के जानकार हैं। पिछले तीस साल से इस विषय पर काम कर रहे रॉजर्स २६ किताबें लिख चुके हैं। उनकी हालिया किताब ‘वाई वी आर लूजिंग द वॉर ऑन टेरर’ खासी चर्चित हुई है। सीएसडीएस के निमंत्रण पर रॉजर्स उस वक्त भारत आए हैं,जब अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने कार्यकाल का एक साल पूरा कर रहे हैं। ओबामा के सामने पेश आती नयी चुनौतियों से लेकर भारत के नक्सलवाद पर अपनी राय रखने वाले पॉल रॉजर्स से खास बात की नरेंद्र पाल सिंह ने।
 
सवाल-अपनी किताब “लूजिंग कंट्रोल-ग्लोबल सिक्यूरिटी इन ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी’ में आपने सुरक्षा को लेकर पश्चिमी दुनिया के देशों के नजरिए पर पुनर्विचार करने की जरुरत बताई है। ऐसा क्यों?
जवाब- देखिए, असल समस्या है आतंकवाद को सेना के जरिए हल करने के नजरिए की। राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के दौर में इसी नजरिए से इस समस्या को हल करने की कोशिश की गई। आज आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी लड़ाई के आठ साल हो गए हैं। हमने दो मुल्कों की सत्ता को ध्वस्त होते देखा है। अफगानिस्तान और ईराक। अफगानिस्तान में पहले एक लाख और अब एक लाख चालीस हजार सैनिक तैनात हैं। लेकिन हिंसा कम होने का नाम नहीं ले रही है बल्कि बढ़ ही रही है। सैन्य कार्रवाई के जरिए हिंसा को नियंत्रित करने की पश्चिमी सोच नाकाम रही है। मेरा हमेशा मानना रहा है कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर दुनिया को एक नयी सोच अपनानी होगी। सिर्फ सैन्य कार्रवाई से आतंक पर काबू नहीं पाया जा सकता।
 
सवाल-गुजरे बीस साल में भारत में नीति निर्माताओं का एक तबका लगातार कहता रहा है कि दुनिया एक ध्रवीय हो चली है। इस विचार के अनुरूप हिन्दुस्तान की विदेश नीति में भी बदलाव आए हैं। इरान के मामले में या फिर भारत अमेरिका परमाणु करार के मामले में यह साफ नजर आया। क्या आपको लगता है कि भारत या फिर किसी भी देश के लिए विदेश नीति के मामले में अमेरिकी नीतियों का मुखर विरोध संभव नहीं रहा।
जवाब- आपकी बात कुछ हद तक सही है कि दुनिया एकध्रुवीय हो चली है। लेकिन, साथ ही कई महाशक्तियां तेजी से उभार ले रही हैं। भारत,चीन और ब्राजील जैसे देश इनमें शामिल हैं। हालांकि, अभी भी पश्चिम के एक देश का प्रभुत्व है, लेकिन ऐसा आने वाले दिनों में नहीं होगा क्योंकि दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। ऐसे में भारत जैसे देशों के लिए जरुरी है कि वो खुद को किसी दूसरे शक्तिशाली गुट से जोड़कर नहीं देखे। लेकिन, दुनिया की तरक्की के बीच हमें वैश्विक सामाजिक और आर्थिक खाई को भी देखना होगा, क्योंकि सचाई यही है कि आज वैश्विक विकास के बावजूद करीब छह अरब लोग हाशिए पर हैं। भारत की ही बात करें तो करीब दस करोड़ लोग वैश्विक आर्थिक तरक्की का फायदा उठा रहे हैं, लेकिन बाकी लोग उपेक्षित हैं। जरुरी है कि हम इस खाई को पाटने की कोशिश करें। सामाजिक-आर्थिक खाई ही लोगों की अंसुष्टि की असल वजह है।
 
सवाल-क्या ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद विश्व में शांति बहाली को लेकर अमेरिकी नीतियों मे कोई रेडिकल बदलाव नजर आता है।
जवाब-निश्चित तौर पर ओबामा प्रशासन का नजरिया काफी बदला है। जॉर्ज बुश के वक्त ऐसा नहीं था। उनके पास दुनिया को देखने का सिर्फ एक नजरिया था-अमेरिकी नजरिया। वो सिर्फ अपनी दृष्टिकोण से दुनिया को देखना चाहते थे, चलाना चाहते थे। ऐसा आठ सालों तक रहा। इसी वजह से अमेरिका कुछ बड़ी मुश्किलों में पड़ा। ईराक और अफगानिस्तान में। आप कह सकते हैं कि ओबामा प्रशासन के सामने चुनौती बड़ी है। लेकिन, सवाल यही है कि क्या ओबामा इन चुनौतियों से पार पा पाएंगे। वैसे, इसमें शक नहीं कि उनके पास कुछ नए विचार हैं।

सवाल-इस्लामिक देशों से सुलह की कोशिश में ओबामा के दिए भाषणों को महज सद्भावना बटोरने की कोशिश कहा जा सकता है।
जवाब-बिलकुल। काहिरा में दी गई कैरियो स्पीच काफी अहम है। ये बुश के विचारों से बिलकुल अलग थी। ये स्पीच एक अलग संदेश दुनिया को देती है। ये भी सही है कि ओबामा ईराक से सेना को हटाना चाहते हैं। हालांकि,अफगानिस्तान के बारे में उनका यह दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता। इजराइल को लेकर तो वो अमेरिका की पुरानी नीति पर ही कायम हैं। लेकिन, वो इस्लामिक दुनिया को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं,ये बात अहम है। हां, वो कितना आगे जा पाते हैं,ये देखना होगा।
 
सवाल-आप मानते हैं कि भारत के नक्सलवाद पर नजर रखना बहुत जरुरी है क्योंकि इसमें विश्व शांति के लिए जरुरी संकेत छिपे हैं। आप इस विषय पर विस्तार से कुछ कहना चाहेंगे।
जवाब- नक्सलवाद को लेकर जो मेरा नजरिया है,वो विवादास्पद भी हो सकता है। लेकिन, मेरा मानना है कि तीस साल में भारत में नक्सलवाद ने जिस तरह पैर पसारे हैं,वो अप्रत्याशित है। नक्सलवाद के शुरुआती दिनों यानी नक्सलबारी के दिनों को याद करें तो उस वक्त जो विद्रोह हुआ था, उस पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया था। लेकिन, नक्सल आंदोलन जिस तरह पूरे देश में वापस लौटा, वो निश्चित तौर पर देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। लेकिन, अहम बात यह है कि नक्सलियों और माओवादियों को हाशिए पर पड़े लोगों से खासा समर्थन मिला है। आदिवासी इलाकों में उन्हें जबरदस्त समर्थन है। इसके अलावा, जिन लोगों की जमीन खदानों के लिए दे दी गई,वो भी उनसे जुड़े। भारत में अगर नक्सल समस्या को पुलिस से, पैरामिलिट्री फोर्स से नियंत्रित करने की कोशिश होगी, तो यह ठीक नहीं है। सच पूछें तो स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ जाएगी। होना यह चाहिए कि भारत अपने विकास में हाशिए पर पड़े लोगों को साथ ले। संपन्न लोगों और हाशिए पर पड़े लोगों के बीच खाई जितनी अधिक पाटी जा सके, वो ही सही रास्ता है। भले भारत के दस करोड़ लोग वैश्विक विकास से फायदे में हों,लेकिन एक बड़ा तबका उपेक्षित हैं। ये हालात दुनियाभर में है और खतरनाक है।
 
सवाल- तो क्या आर्थिक असमानता भी एक तरह का आतंकवाद है। जवाब- दरअसल,सवाल ये है कि असुरक्षा को आप किस तरह परिभाषित करते हैं। डायरिया से होने वाली मौतों से, गरीबी से, कुपोषण जैसी तमाम वजहों से आम आदमी आज असुरक्षित है। इसकी अलग अलग आर्थिक वजह हैं। ये आज पूरी दुनिया में लोगों के लिए आतंकवाद से ज्यादा अहम मसला है। यह खाई लगातार बढ़ रही है। एक ओर संसाधनों से लैस कुछ गिने चुने लोग हैं। ठीक दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे बहुसंख्यक हैं। लेकिन, ठीक इसी दौर में शिक्षा, साक्षरता और संचार में बहुत सुधार हुआ है। इससे हाशिए पर पड़े लोगों को मालूम चल रहा है कि वो मुख्यधारा से कितना बाहर खड़े हैं।
 
सवाल-क्या आतंकवाद के खिलाफ जंग सिर्फ सैन्य शक्ति और आक्रामक कार्रवाई के जरिए जीती जा सकती है या इससे निपटने के लिए एक राजनीतिक प्रक्रिया की जरुरत है।
जवाब-मुझे नहीं लगता कि आप आतंकवाद के खिलाफ जंग को सेना के जरिए जीत सकते हैं। ये काफी नहीं है कि आप जिन्हें आतंकवादी कहते हैं, उन्हें मार दें। आपको यह समझना होगा कि वो कहां से आते हैं,उनकी सोच क्या और क्यों हैं। सबसे बड़ी बात यह कि उन्हें लोगों के बीच से समर्थन क्यों मिलता है। भले की यह मदद दबीछिपी क्यों न हो। आप अलकायदा का उदाहरण लें तो जानना जरुरी है कि उसका उद्देश्य क्या है। वो क्या हासिल करना चाहता है। वो क्यों एक बड़े समुदाय को जोड़ने में कामयाब हो जाता है। अगर आपको उससे पार पाना है तो उसके उदेद्श्यों की काट करती अपनी राह तैयार करनी होगी। राजनीतिक और नैतिक तर्कों के सहारे उसे परास्त करना होगा। आप आतंकवादियों को सैन्य कार्रवाई के बूते जितना खत्म करने की कोशिश करेंगे, लोग उनसे उतना ही जुड़ेगे। अफगानिस्तान की बात करें तो वहां पश्चिमी सेना की मौजूदगी तीन साल में काफी बढ़ी है। पश्चिमी सेनाएं वहां अपनी मौजूदगी जरुर दर्ज करा रही हैं, लेकिन तालिबान की गिरफ्त से देश को छुटकारा दिलाने में नाकाम साबित हुई हैं। इस दौरान सेना का विरोध बढ़ा ही है,घटा नहीं। आज तालिबान लड़ाके तीन साल पहले के मुकाबले ज्यादा ताकतवर हो गये हैं और ज्यादा हिस्से में फैल चुके हैं। सैन्य शक्ति को इस सच के आइने में देखें तो सेना के इस्तेमाल से हालात बदतर हुए हैं,बेहतर नहीं।

सवाल-भारत में मुंबई हमले के प्रति वैश्विक नजरिया क्या रहा?
जवाब-मुंबई हमले को पूरी दुनिया में जबरदस्त मीडिया कवरेज मिली। पश्चिमी देशों में इस हमले के बाद भारत की स्थिति को समझा है। उन्होंने जाना है कि आतंकवाद भारत के लिए कितनी बड़ी समस्या है। इस हमले का पश्चिमी देशों पर असर तो हुआ, लेकिन अफगानिस्तान, ईराक और गाजा के हालात के चलते भारत से ध्यान हट गया। फिर, वहां लोगों की एक धारणा यह भी है कि भारत में सुरक्षा संबंधी समस्याएं हैं।
 
सवाल- आज दुनिया जिस तरह आतंकवाद से निपट रही है, उस बीच क्या हम लोग सुरक्षित महसूस कर सकते हैं। और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ होने के नाते आपकी क्या भविष्यवाणी है कि आंतक के खिलाफ जंग कब तक चलेगी।
जवाब-देखिए, सुरक्षित को कोई भी नहीं है। न अमेरिका, न भारत और न ब्रिटेन। जहां तक आतंक के खिलाफ जंग का सवाल है तो मुझे लगता है कि अगर सेना के जरिए इस समस्या से निपटा गया तो अभी तीस साल और लगेंगे।

सवाल-आखिरी सवाल, फिर तीस साल बाद दुनिया की शक्ल कैसी होगी।
जवाब- निश्चित तौर पर तीस साल बाद दुनिया बिलकुल अलग होगी। कई वजहों से। क्योंकि उस वक्त जलवायु परिवर्तन का मुद्दा सबसे अहम होगा। इतना महत्वपूर्ण कि इसके सामने आतंकवाद जैसे कई बड़े मुद्दे भी गौण हो चुके होंगे। दुनिया का हर देश उस वक्त पर्यावरण के मुद्दे से दो चार होगा और उससे निपटना ही उनकी पहली चुनौती होगी।



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