विष्णु शर्मा का व्यंग्य : हर सड़क कुछ कहती है
विष्णु शर्मा – पंचतंत्र नहीं, बॉलीवुड तंत्र की उठापटक में लगे रहे हैं। बैग टेलीफ़िल्म्स के कार्यक्रम ‘ख़बरें बॉलीवुड की’ के प्रोड्यूसर हैं। हाल तक, स्टार न्यूज़ के पोल-खोल कार्यक्रम में भी अदृश्य तौर पर योगदान देते रहते थे। लेख कई लिखे, पर व्यंग्य इक्का-दुक्का ही लिखे हैं। “मस्ती की बस्ती” के लिए फिर व्यंग्य के मैदान में।बुझे-बुझे से रहते हो कहो ध्यान किसका है,
पुरानी सड़क पर ये नया मकान किसका है?
आपको भी यह शेर अनचाहे ही हज़ारों बार झेलना पड़ा होगा। लेकिन मेरा सॉलिड दावा है कि मेरी तरह किसी ने इतना निठल्ला-चिंतन नहीं किया होगा। बहुतों से सुना था कि दिल में भी सड़क होती है। लेकिन इस शेर में किस सड़क और किस मकान की बात हो रही है, खुद शायर को भी नहीं पता होगा। बिलकुल वैसे जैसे आपको नहीं पता कि सड़क के कितने टाइप होते हैं। अब आप किसी ग्राम प्रधान की तरह इसे खडंजा और पडजा में डिवाइड मत कीजिएगा और न ही किसी ठेकेदार की तरह चार लैन और छह लैन में। हम तो सड़क को इमोशनली डिवाइड कर रहे हैं। मसलन कुछ सड़कें पूंजीवादी होती हैं। पूंजीवादी बोले तो उस शहर की सड़कें, जहाँ या तो बहुत-सी आईटी कंपनियाँ होती हैं या फिर जो सड़कें किसी बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी के किसी प्रोजेक्ट को बाक़ी शहर से जोड़ती हैं। ढेर सारी पूंजी जो लगी होती है। पूंजी तरलता यानी चिकनाई लाती है, सो ये सड़कें भी काफ़ी चिकनी बनी होती हैं। यानी टोटली खुरदुराहट फ़्री। ऐसे ही कुछ सड़कें घोर वामपंथी भी होती हैं, हम नहीं सुधरेंगे टाइप। पूंजी पसंद ही नहीं। वैसे कोई देता भी नहीं। किसी ने पैसा लगाकर थोड़ी-बहुत डेंटिंग-पेंटिंग करवा भी दी तो ऐसा लगता है मानो सड़क को ही पसंद नहीं आता, रात को करवटें बदल-बदल कर माक्र्सवादी सिद्धांतों की तरफ़ वापस लौट आती है। शायद चाहती है उस पर चलने वाले जितने ज़्यादा कष्ट भोगेंगे, उतने ही मज़बूत बनेंगे। यहीं पहली बार लगता है कि सर्वहारा के सिद्धांत से डार्विन का भी कुछ लेना देना था शायद।
जबकि कुछ सडकें संघी टाइप की होती हैं। दूर से बहुत लुभावनी होती हैं, एकदम चिकनी चौड़ी, आदर्शवादी – लेकिन स्पीड ब्रेकर इतने ज़बरदस्त होते हैं कि तौबा-तौबा। यूँ तो कॉलेज के लड़कों को स्पीड ब्रेकर ख़ासे पसंद होते हैं, लड़की पीछे बैठी हो तो हर स्पीड ब्रेकर पर झटके लेने का कुछ और ही मज़ा है। लेकिन संघी सड़कों पर स्पीड ब्रेकर इतने ऊँचे होते हैं कि लड़कियों को गाड़ी से उतरकर चलना ही मुफ़ीद लगता है। सो इन जोड़ों को संघी सड़कों से ख़ासी ऐलर्जी होती है। वैसे कुछ सड़कें सेकुलर टाइप की भी होती हैं, बोले तो किसी के लिए कोई मनाही नहीं। रिक्शे वाले भी सड़क के बीचों-बीच चलेंगे। दिन में भी ट्रक और बसें एलाउड हैं, गाड़ी के साइज़, स्पीड और लैन का तो कोई दूर-दूर तक भेद-भाव नहीं। अब ये आपकी किस्मत है कि गुड़ लेकर जा रही कोई बैलगाड़ी या भूसा लेकर जा रहा कोई ट्रैक्टर इतनी जगह घेर कर चले कि आपको साइड ही नहीं मिले। सारे लोग इस सड़क पर एक-दूसरे को गाली तो देते हैं, लेकिन सड़क को कभी नहीं। बाइक वाला टैम्पो वाले को, टैम्पोवाला रिक्शे वाले को, रिक्शा वाला कार वाले को और कार वाला ट्रक वाले को – लेकिन सड़क के सेकुलर करेक्टर पर कोई उंगली नहीं उठाता। वैसे कुछ सड़कें बुद्धिजीवी किस्म की भी होती हैं। आप कई बार कुछ सड़कों को देखकर सोचते होंगे कि ये ऐसे क्यों बनी हैं, इसकी बजाय वैसे बनी होतीं तो बेहतर होता। इसमें मोड़ यहाँ की बजाय थोड़ा पहले दे दिया गया होता तो ज़्यादा अच्छा होता। इसमें बीच में यू-टर्न आधा किलोमीटर दूर नहीं बनाया गया होता तो और भी अच्छा होता। यानी जो सड़कें आपको सोचने पर मजबूर कर देती हैं, बुद्धि पर ज़ोर डालने पर मजबूर कर देती हैं, वो बुद्धिजीवी किस्म की सड़कें होती हैं।
सड़कें अपनी हैसियत, उम्र और जन्म-स्थान आदि के हिसाब से भी डिफ़ाइन की जाती सकती हैं। बशर्ते मल्लिका शेरावत की तरह अपने नाम, उम्र इत्यादि में हेरा-फ़ेरी न करें। लेकिन सड़कों का नामकरण तो प्रजाति के आधार पर भी होता है। जैसे ‘दगड़ा’ या ‘दगरा’। आप इसे ‘डगर’ का अपभ्रंश रूप मान सकते हैं। दगरा वैसे दर्रे के काफ़ी निकट लगता है और दल्ले के भी। जैसे नेताओं के पीए या सेकेटरी या फिर दल्ले बाईपास रास्ते से आपको सीधे नेताजी तक पहुँचा देते हैं। वैसे ही दगरे गाँव या पोखर तक पहुँचने का बाईपास होते हैं। लेकिन ‘गैल’ शब्द थोड़ा व्यापक अर्थ लिए होता है। जैसे घूंसे को डुक्का बनाने के लिए उंगलियों के बीच में से अंगूठा निकालकर थोडा सोफ़िस्टीकेटेड लेकिन ज़्यादा मारक और असरदार बना दिया जाता है, वैसे ही जब हम ‘गैल’ की बात करते हैं तो दगरा, पीए या दल्ले की बजाय व्यापक अर्थ में पीआर कंपनी जैसा हो जाता है यानी एक बड़ी सोसायटी के लिए मैक्ज़िमम स्वीकार्य रूप। ये अलग बात है कि जहाँ ‘दगरे’ में पुरूष प्रधान खुरदुरा भाव नज़र आता है, वहीं ‘गैल’ में कर्णप्रिय स्त्रीत्व कोमलता होती है। बिलकुल ‘पगडंडी’ की तरह। साहित्यकारों ने ‘पगडंडी’ और फ़िल्मकारों ने ‘सड़क’ व ‘गलियों’ जैसे शब्दों को शायद उनके स्त्रीलिंग के चलते ही अपनाया होगा। लेकिन जब भी उनको रेस्पेक्ट देने का भाव मन में आता है, नेता लोग सड़क को ‘मार्ग’ कहने लगते हैं – बाबा साहब मार्ग, महात्मा गांधी मार्ग, बहादुर शाह जफ़र मार्ग। लेकिन अंगरेज़ लोग उसे सैक्सी नज़रों से देखते आए हैं, सो उसे ‘रोड’ का नाम दिया। कर्जन रोड, अक़बर रोड आदि। अगर कभी ‘वे’ भी कहते हैं तो उसमें निहित उपेक्षा या दूरी का भाव साफ़ दिखता है, चार ख़ूबसूरत इंटर्न लड़कियों के बीच एक बेचारे लड़के इंटर्न की तरह।
फ़िगर और शील के नज़रिए से भी सड़कों को देखा जा सकता है। आप गाँव की पतली पगडंडी को देखिए, जिस पर केवल साइकिल या स्कूटर ही चल सकता हो, बिलकुल बेदाग़ नज़र आएगी। बीच में ऐसा टर्न लेगी मानो किसी हसीना की कमर में बल पड़ गए हों। उसके किनारे खड़े सरकंडे ऐसे नज़र आते हैं मानो “इस ख़ूबसूरत लड़की को कोई और न देख-छेड़ ले” की मानसिकता वाले मोहल्ले के स्वंयभू कमसिन लौंडे लपाड़े हों। लेकिन दगरे का फ़िगर हमेशा बुलट पर सवार किसी सरपंच के छोकरे की तरह नज़र आता है, स्पीड कम लेकिन रूकावट फ़्री। ‘बुलट चले तो दुनिया रास्ता दे’ के मूलमंत्र के साथ। जबकि छोटे शहरों की सड़कें तो वहाँ की लड़कियों की तरह ही होती हैं, जब तक शादी नहीं हो जाती है, बस-स्टैंड के पान वाले से लेकर मिश्रा जी और उनके नाती के गैंग तक, सबकी नज़रों में छाई रहती हैं। लेकिन बहुत ही अल्पावधि सरकार की तरह जल्द ही शहीद हो जाती हैं और मार्केट से लापता। छोड़ जाती हैं अपनी यादों के निशान। तो बड़े शहर की ज़्यादातर सड़कें मल्लिका शेरावत और राखी सावंत की तरह नज़र आती हैं – चिकनी, चौड़ी, मादक और हरदम मानो इन्वीटेशन कार्ड देती हुईं। ज़रा-सी टूट-फूट हुई नहीं कि हफ़्ते भर के अंदर डेंट-पेंट। आजकल तो वैसे भी बड़े शहरों में नाक सीधी करने से लेकर झुर्रियाँ मिटाने के बर्टोक्स इंजेक्शन तक मौजूद हैं। बस जेब में नावाँ होना चाहिए। शहर की सड़कों पर तो वैसे भी नावें की कमी नहीं। इधर मेकओवर में लोगों के कमीशन भी फ़िक्स हैं – सो टेंशन ही नहीं। एक ख़ास बात और है। सभी पार्टियों के नेता लोग बड़े शहरों में ही रहते हैं। सो महानगरीय सड़कों के मेकओवर पर क्या वामपंथी और क्या संघी, सबकी आम सहमति है। हर फ़िल्म में आइटम गर्ल या आइटम डांस वैसे भी ज़रूरी बन गए हैं। इससे किसी को भी असहमति नहीं। अब तक आप भी सहमत हो गए होंगे कि हर सड़क कुछ कहती है।
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