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सोमवार, 30 अप्रैल, 2007

विष्णु नागर की बुश पर चुटकियाँ

विष्णु नागर पेश से पत्रकार हैं - लेकिन व्यंग्यकार के रुप में भी उनकी अच्छी ख़ासी पहचान हैं। उनके पाँच व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं। पेश हैं बुश पर उनकी कुछ चुटकियाँ :



एक-

आश्चर्य कि एक दिन बुश को अपने नाम से नफरत हो गई। उसने घोषणा की कि मैं अमेरिका का राष्ट्रपति जरुर हूं मगर मेरा नाम आज से जॉर्ज बुश नहीं है। लोगों ने सोचा कि अभी तक हम जॉर्ज बुश पर चुटकुले सुनाते थे,मगर अब उन्हें सुनसुनकर यह खुद भी इतना इँटेलीजेंट हो गया है कि अपने पर चुटकुले सुनाने लगा है। बाद में बुश को भी यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि दरअसल यह चुटकुला था। कृपया कोई इसका सीधा अर्थ न निकाले। इसके बावजूद,लोगों ने जब इसका कोई और अर्थ नहीं निकाला तो मामला यहीं खत्म हो गया। बुश बेचारा इससे ज्यादा लोगों की मदद भी क्या कर सकता था!

दो-
बुश बेचारे को पता नहीं था कि औरों की तरह वह भी एकदिन मर जाएगा। वह तो किसी ने उसे यह बद्दुआ दी तो उसके मन में शंका पैदा हुई। उसने अपने सहायको से पूछा कि क्या यह सच है कि मैं एक दिन मर जाउँगा? सहायकों ने कहा कि सर, जब तक आप राष्ट्रपति हैं,बेफिक्र रहिए, आप नहीं मरेंगे। तो उसने पूछा कि क्या एक दिन ऐसा भी आएगा कि मैं राष्ट्रपति नहीं रहूंगा? बुश के सहायकों को यह सुनकर बहुत हंसी आई, पर उसे रोकते हुए उऩ्होंने कुछ नहीं कहा। तब बुश ने कहा कि इसका अर्थ तो यही निकला कि मैं एक दिन मर जाऊंगा। उसके एक चतुर सहायक ने कहा, "सर,सच तो यह है कि इराक के कारण आप अमर हो जाएँगे।" यह सुनकर बुश खुश हो गया और उसने आदेश दिया कि मनमोहन सिंह ने दिल्ली से जो मिठाई भिजवाई है,वो तुरंत पेश की जाए। आज मुझे पता चल गया है कि मैं मरुंगा नहीं, अमर हो जाउँगा।

तीन-
बुश एक दिन राष्ट्रपति नहीं रहा। उसने अपने एक सहायक से पूछा - "भैये ये तो बता, अब ये दुनिया कैसे चलेगी? " सहायक अभी भी उसका वफादार था।उसने जवाब दिया, "भगवान भरोसे चलेगी और क्या?" बुश ने जवाब दिया - "यही तो मुश्किल है।भगवान बेचारा खुद मेरे भरोसे चल रहा है।"

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गुरुवार, 12 अप्रैल, 2007

विष्णु नागर का व्यंग्य : महत्वपूर्ण होना

विष्णु नागर पेश से पत्रकार हैं - लेकिन व्यंग्यकार के रुप में भी उनकी अच्छी ख़ासी पहचान हैं। उनके पाँच व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं। पेश है "महत्वपूर्ण होने" की मानसिकता पर यह व्यंग्य :

समाज में महत्वपूर्ण होना थोड़ा मुश्किल तो है मगर इतना मुश्किल भी नहीं है कि दूसरे होते चले जायें और आप टापते रह जायें। बस अपने को पहचानने की ज़रूरत है। एक बार अपने को पहचानिये कि इनमें आप कौन हैं और हो जाइये महत्वपूर्ण - मसलन बाक़ी अंधे हों और संयोग से आप काने हों तो समझिये आप हो गये महत्वपूर्ण। आपको भाषण देना आता है और दूसरों को नहीं आता, तो बस आप हो गये महत्वपूर्ण। आपके दादा या नाना या उनका कुल, गोत्र या जाति तथाकथित रूप से महत्वपूर्ण है तो बस आप हो गये - महत्वपूर्ण। आप उस परिवार के सदस्य हैं जिसमें किसी भी कारण से कोई आज़ादी की लड़ाई के दौरान जेल भेज दिया गया था तो आप हो गये महत्वपूर्ण, क्योंकि आप स्वतंत्रता सेनानी के परिवार के सदस्य हैं। आप खूब खाते हैं और अपना ही खाते हैं और अपने लिए ही खाते हैं मगर इतना खा लिया है कि आपका वज़न हो गया है 400 पौंड, तो समझ लीजिये कि आप हो गये महत्वपूर्ण।

मान लीजिये किसी आनुवांशिक या अन्य कारण से - जिसमें आपका कोई दोष नहीं है, आप साढ़े छह फ़ुट के हो गये तो आप हो गये महत्वपूर्ण। कुछ लोग इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उन्होंने लाटरी ख़रीदी और वह खुल गयी जो कि किसी-न-किसी के नाम खुलनी ही थी तो वह हो गये..... कुछ इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे खुलेआम घूसख़ोरी करते हैं मगर पकड़े नहीं जाते, तो जब तक पकड़े नहीं जाते महत्वपूर्ण रहते हैं और उसके बाद और महत्वपूर्ण हो जाते है, क्योंकि दुनिया को पता चल जाता है कि इनके पास कहाँ-कहाँ और क्या-क्या है। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि किसी तरह उन्होंने कुछ देदिवाकर कार का वीआईपी नंबर हासिल कर लिया है या किसी विधि उन्होंने अपनी कार या स्कूटर पर प्रेस का स्टिकर लगवा लिया है। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उन्होंने जीवनभर सरकारी दफ़्तर में हरामख़ोरी की और कुछ लोग इसलिए कि खुद महत्वपूर्ण नहीं होते मगर महत्वपूर्ण लोगों के दरवाज़े पर बिलानागा खड़े रहते हैं। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि किसी महत्वपूर्ण आदमी के चपरासी या क्लर्क या नाई या लठैत हैं।

कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे खाने में नमक नहीं लेते और पीने में शराब के अलावा कुछ नहीं लेते। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि दारू पी लेते हैं मगर चाय किसी हालत में नहीं पीते या वे अल्लमगल्लम सब कुछ खा लेते हैं मगर पालक नहीं खाते। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उनके रिश्तेदार आजकल मुंबई या दिल्ली या इससे भी बेहतर ब्रिटेन या अमेरिका में रह रहे हैं (हालाँकि उन्हें क़तई नहीं पूछते) और कुछ इसलिए कि उन्हें कभी सिरदर्द या ज़ुक़ाम नहीं होता। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि जंगल में नित्यकर्म के लिए गये थे और संयोग कि उन्हें शेर दिख गया और शेर के कारण उनका नित्यकर्म भले ही बाधित हो गया हो मगर शेर ने उन्हें खाया नहीं। कृपा शेर ने की और महत्वपूर्ण हो गये वे। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उनका दावा है कि उनके पास इस बात के पक्के प्रमाण हैं कि पश्चिम से भी पहले भारत ने वायुयान का आविष्कार कर लिया था। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उन्होंने चार शादियाँ की क्योंकि संयोग से या संयोग के बग़ैर उनकी एक के बाद एक बीवी मरती गयी और यहाँ तक कि चौथी भी मर गयी और कुछ इसलिए कि वे दावा करते हैं कि शादी किये बग़ैर ही उनका काम चल जाता है।

कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे हमेशा कलफ़दार कुर्ता-पायजामा पहनकर ही घर से बाहर निकलते हैं और कुछ इसलिए कि उनके पिता ने उनका नाम जवाहर लाल या अटल बिहारी या दिलीप कुमार रख दिया था। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि ग़लती से उनकी शक़्ल कुछ-कुछ राष्ट्रपिता से मिलती है (जिसका अर्थ यह है कि बहुत कुछ नहीं मिलती) और कुछ इसलिए कि उन्होंने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ करने की सार्वजनिक चुनौती दी थी और शंकाराचार्य ने उसका कोई जवाब नहीं दिया था, जिसका अर्थ उन्होंने यह लग लिया कि शंकारचार्य उनसे डर गये। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे चार किलो गुलाबजामुन खा लेते हैं या तीन किलो रबड़ी पी जाते हैं। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि चोर हैं और पुलिस की सिक्युरिटी में चलते हैं और कुछ इसलिए कि उन्होंने कभी किसी अंग्रेज़ से हाथ मिलाया था और उसने उनसे पूछा था कि 'हाऊ डू यू डू' और इन्होंने इसके जवाब में अपना नाम बता दिया था। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे फ़रार घोषित होकर आराम से घर में रहते हैं और कुछ इसलिए कि रोज़ सुबह चार बजे उठकर नहाते हैं और हनुमान चालीसा का पाठ
करते हैं। कुछ इसलिए कि वे रामलीला में हमेशा हनुमान बनते हैं और कुछ इसलिए कि उनकी भैंस 20 किलो दूध देती है, कुछ इसलिए कि स्वपाकी हैं और किसी दूसरे के गिलास में पानी तक नहीं पीते और कुछ इसलिए कि उनके जितनी लंबी चोटी इस इलाक़े में किसी की नहीं है। कुछ इसलिए कि जहाँ भी जब भी जाते हैं हाथ में डंडा अवश्य रखते हैं और कुछ इसलिए कि जेब में माचिस या चाकू ज़रूर रखते हैं। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि बीस बार ज़मानत जब्त होने के बावजूद वे चुनाव लड़ते हैं और कुछ इसलिए कि हर बार अलग-अलग पार्टी से चुनाव लड़कर भी जीत जाते हैं।

तो बताइए आप इनमें से किस प्रजाति के हैं और किसी के नहीं हैं तो भी फ़ौरन अपनी प्रजाति को संगठित कीजिये, ईश्वर आपकी मदद अवश्य करेगा क्योंकि उसका काम ही आप जैसों की मदद करना है।

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सोमवार, 2 अप्रैल, 2007

श्री विष्णु नागर का व्यंग्य : राजनीतिक संन्यासी

Vishnu Nagarविष्णु नागर पेश से पत्रकार हैं - लेकिन व्यंग्यकार के रुप में भी उनकी अच्छी ख़ासी पहचान हैं। उनके पाँच व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं। पेश है उनका 'राजनीतिक संन्यासियों' की क़लई खोलता व्यंग्य :


संन्यासी आपने भी बहुत देखे होंगे और हमने भी। संन्यासी हैं भी बहुत हमारे देश में और होंगे तो दिखेंगे भी। जायेंगे कहाँ? कोई बीवी के ताने-तिश्नों का मारा है और संन्यासी बन चुका है, किसी को बच्चों ने घर से भगा दिया है और वह संन्यासी बन गया है। कोई बेरोजगारी का मारा है और उसने संन्यास में जीवन जीने का रास्ता पा लिया है। किसी ने हत्या या बलात्कार किया है और वह संन्यासी के वेश में पुलिस से बचता फिर रहा है। किसी को फटाफट करोड़पति बनना है तो कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में कामयाबी न मिलने के बाद संन्यासी बन गया है, किसी की किसी साधु या बाबा की संपत्ति पर निगाह है तो वह संन्यासी बन गया है। किसी को लगता है कि संन्यास मुत और तर माल खाने की स्थायी और अविचल व्यवस्था है, इसलिए वह संन्यासी बन गया है। किसी को राजनीति करने के लिए संन्यासी बनने से ज्यादा फायदेमंद कुछ नहीं लगता। कोई-कोई ऐसा भी शायद होता ही होगा, जिसकी वाकई भगवान से लौ लग गई गई होती होगी। ऐसी गल्ती भी इनसान ही कर सकता है। आशय यह है कि जितने संन्यासी हैं उतने ही संन्यासी बनने के कारण भी हैं।

लेकिन तमाम नेताओं की इस धमकी के बावजूद कि फलां भ्रष्टाचार या फलां बलात्कार या फलां डकैती या फलां रंगदारी का आरोप सिध्द होने पर मैं राजनीति से हमेशा के लिए संन्यास ले लूंगा, किसी राजनीतिक संन्यासी को आपने आज तक कभी देखा है? मेरा विश्वास है कि नहीं देखा होगा क्योंकि मैंने भी आज तक नहीं देखा है।

सच्चाई यह है कि जो राजनीति में एक बार चला आता है, वह राजनीति से संन्यास लेने की गलती कभी नहीं करता, कभी कर ही नहीं सकता, भले ही राजनीति उससे संन्यास ले ले। वह राजनीति का गृहस्थाश्रम धर्म निभाते-निभाते ही अंतिम सांस लेना पसंद करता है। वह राजनीति के सेंट्रल हाल में बैठकर अपनी बारी की हमेशा प्रतीक्षा करता रहता है। वह इस आशा में सेंट्रल हाल नहीं छोड़ता कि कभी तो कोई ऐसा कमीशन बनाया जायेगा, जिसका अध्यक्ष उसे बनाया जायेगा। कभी तो किसी संस्थान का अध्यक्ष पद खाली होगा, जहाँ उसे कैबिनेट मिनिस्टर का नहीं तो कम से कम राज्य मंत्रि का दर्जा देकर जरूर बैठाया जायेगा। उसे कहीं का राजदूत, कहीं का राज्यपाल या नहीं तो उपराज्यपाल तो अवश्य ही बनाया जायेगा। यहाँ तक कि जो भूतपूर्व प्रधानमंत्रि हैं और अपनी भूतपूर्वता में भी अभूतपूर्व हो चुके हैं, जो अपनी बारी अच्छी या बुरी तरह खेल चुके हैं, उन्हें भी उम्मीद रहती है कि उनके अधूरे कामों को पूरा करने का अवसर यह देश, यह समाज और नहीं तो सोनिया गाँधी अवश्य देंगी। वे नहीं देंगी तो ईश्वर देगा और ईश्वर भी नहीं देगा तो जन्म कुंडली देगी क्योंकि उसमें ऐसा लिखा हुआ है। देश का शायद ही कोई नेता ऐसा होगा जो अपनी अंतिम सांस तक देश की सेवा करने को तत्पर न हो, वह भी क्या करे, राजनीति में ऐसी परंपरा हमेशा से रही है। क्या गाँधी, नेहरू और इंदिरा गाँधी या राजीव गाँधी ने ऐसा नहीं किया था? तो किस आधार पर वह देशसेवा से मुँह मोड़ लें? वैसे शायद हमारे धर्मग्रंथों में कहीं कहा गया होगा कि एक सच्चे राजनीतिक को कभी संन्यास नहीं लेना चाहिए।

बहरहाल सच तो यह भी है कि राजनीतिक संन्यास लेना भी चाहे तो कैसे ले बेचारा गरीब? राजनीति में पचास साल की उम्र से पहले तो आदमी को बच्चा ही समझा जाता है और कहा भी जाता है, भले ही राहुल गाँधी से उनके मुँह पर यह कहने का साहस किसी काँग्रेसी का न होता हो। पचास की उम्र में उसे युवा मानना शुरू होता है और पैंसठ की उम्र तक वह युवा ही बना रहता है। फिर वरिष्ठ होना आरंभ होता है और वरिष्ठ होते-होते उसे पाँच साल और लग जाते हैं। जब तक वास्तव में वरिष्ठता के नाते उसे कुछ मिलता है या मिलने की संभावना बनती दीखती है कि तभी उधर से बुलावा आना शुरू हो जाता है कि भाईसाहब या बहनजी- आप जो भी हों-चलिये,बहुत जी लिये। आपकी उम्र के 90 प्रतिशत लोग उधर जा चुके हैं, फिर आप इधर क्या कर रहे हैं? इसलिए राजनीतिक नेता तो मजबूर है संन्यास न लेने को। अब ठीक है कि कभी-कभी मुँह से निकल जाता है कि भ्रष्टाचार या बलात्कार या ऐसा ही कोई एक भी आरोप सिध्द हो गया तो मैं इस्तीफा ही नहीं दूँगा वरन राजनीति से संन्यास भी ले लूँगा लेकिन यह किसी भी समझदार आदमी को समझना चाहिए कि यह वक्त की नजाकत देखकर कहा गया महज एक वाक्य है, एक अखबारी वक्तव्य है, नेकनीयती का प्रमाणपत्र है और राजनीति में ऐसा कौन है जिसे अपने लघु या सुदीर्घ राजनीतिक जीवन में ऐसा वाक्य कभी नहीं कहा या ऐसा वक्तव्य नहीं दिया?

- विष्णु नागर

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