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रविवार, 30 सितंबर, 2007

राजेंद्र त्यागी का व्यंग्य : अर्थ मार्ग धर्म मार्ग

राजेन्द्र त्यागी पेशे से क़लम के सिपाही हैं। नुक्ताचीनी में माहिर हैं, सो व्यंग्य लिखने की मौलिक प्रतिभा उनमें होनी ही थी। नए प्रतीकों और रुपकों के ज़रिए अपनी बात कहने का उनका अलग अंदाज़ है। त्यागी जी के तीन व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं। "मस्ती की बस्ती" पर इस बार पढ़िए उनका व्यंग्य - "अर्थ-मार्ग धर्म-मार्ग"।

उसने कहाँ-कहाँ धक्के नहीं खाए। कौन-कौन से ब्राण्ड के पापड़ नहीं बेले, मगर अर्थ प्राप्ति का सुगम व सुरक्षित मार्ग प्राप्त करने में वह असफल ही रहा। दरअसल वह कोई सस्ता, सुंदर और टिकाऊ रास्ता चाहता था। ऐसा रास्ता जिसमें अर्थ तो बरसे मगर छप्पर सुरक्षित रहे। काजल की कोठरी से काजल तो समेटे, मगर कुर्ता चमकता रहे। इसके लिए उसने सत्यनारायण की कथा भी नियमित रूप से कराई। लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उद्देश्य से उल्लुओं को भी खूब चबेना चबाया। अर्थ प्राप्ति हुई भी हुई, मगर दाग़ ने पीछा नहीं छोड़ा।

अर्थ प्राप्ति के सुगम व सुरक्षित रास्ते के रूप में उसने पत्रकारिता के पेशे में भाग्य आज़माया। नेताओं की परिक्रमा की, उनके लिए दलाली की। अर्थ भी खूब बटोरा, मगर संतोष की प्राप्ति नहीं हुई। एक अज्ञात भय से भयभीत रहा। दलाली करते-करते पत्रकारिता का त्याग कर समाज सेवकी का पेशा अख़्तियार किया। वहाँ भी सेवा की मेवा खूब बटोरी, मगर अज्ञात भय ने वहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा। समाज सेवकी से उसने राजनीति के बाज़ार में प्रवेश किया और नेता बन बैठा। अर्थ की धारा उसकी तरफ़ और भी तीव्र गति से प्रवाहित होने लगी। मगर कभी पक्ष तो कभी विपक्ष और कभी स्टिंग ऑपरेशन तो, कभी सीबीआई उसे पीछा करते दिखलाई देते रहे।

दाग़ से कैसे पीछा छुड़ाए, यह प्रश्न बराबर उसे विचलित करता रहा। एक के बाद एक असफलता से हताश कभी-कभी वह सोचता, 'पता नहीं अंधे के हाथ बटेर कैसे लग जाती है? लगती भी है या बिना लगे ही मार्केटिंग कर दी जाती है। मार्केटिंग का फ़ण्डा है ही कुछ ऐसा अपने-अपने अंधों के हाथ बटेर थमा कर उपलब्धि रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी जाती हैं।'

हैरान-परेशान, परेशान मुन्नालाल ने एक दिन एक ही झटके में कुर्ता-पयजामा उतार खूंटी पर टांग दिया और राजनीति के बाज़ार से अपना कारोबार समेट सुरक्षित किसी नए व्यवसाय की तलाश में लेफ़्ट-राइट शुरू कर दी। दोस्तों के सामने अपनी पीड़ा रखी, जन-परिवारजनों के साथ सलाह-मश्विरा किया और अंतत: स्वामी अभेदानंद की शरण में जाने का निश्चय किया। अध्यात्म में उसकी रुचि बालकाल से ही थी, इसलिए उसने सोचा अर्थ प्राप्ति का न सही धर्म मार्ग ही सही। उसका ऐसा फ़ैसला करना स्वाभाविक भी था, क्योंकि एक सीमा तक चूहों का भक्षण करने के बाद परलोक सुधारने के मंशा से बिल्लियां अक्सर तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़ती हैं।

स्वामी अभेदानंद के समक्ष वह चरणागत हुआ और उद्देश्य निवेदन किया। राजनीति को धर्ममय बनाए रखने के लिए धर्मगुरु व राजनीतिज्ञों के बीच सांठगांठ आवश्यक है। इसी धर्म का निर्वाह करते हुए स्वामीजी ने मुन्नालाल को शिष्य के रूप में ग्रहण कर अपने पवित्र आशीर्वाद से धन्य किया। मुन्नालाल भी पूर्ण समर्पण भाव से उनकी सेवा में लग गया। उसकी सेवा से प्रसन्न हो कर एक दिन स्वामीजी बोले, 'पुत्र मुन्नालाल! तुम्हारे प्रश्न, तुम्हारी शंकाएँ ऐसे छद्म ज्ञानियों के समान हैं, जो ज्ञान विहीन होते हुए भी ज्ञानी कहलाए जाते हैं। परंतु तुम्हारे अंतर्मन में धर्म व अर्थ दोनों के बीज सुषुप्त अवस्था में विद्यमान हैं और मैं तुम्हारे बुद्धि-चातुर्य और सेवा दोनों से प्रसन्न हूँ अत: तुम्हें अर्थ प्राप्ति का सुगम व सुरक्षित मार्ग बतलाता हूँ। पुत्र! अर्थ प्राप्ति का केवल मात्र एक ही सुगम व सुरक्षित मार्ग है और वह है, धर्म-मार्ग। धर्म-मार्ग ही बिना किसी अवरोध के सीधा कुबेर के आश्रम की ओर जाता है।'

स्वामीजी के ऐसे वचन सुन मुन्नालाल हैरान था, उसे लगा कि वह आसमान से गिरकर खजूर पर लटक गया है और स्वामीजी उसे खजूर के पत्ते पर ही दंड-बैठक करने की सलाह दे रहें हैं। वह आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोला, 'स्वामीजी, धर्म-मार्ग और अर्थ! धर्म मार्ग तो मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाता है। अर्थ तो धर्म-मार्ग में अवरोध उत्पन्न करता है। पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धांत भी कुछ ऐसा ही कहता है।'

मुन्नालाल के वचन सुन स्वामीजी मुस्करा दिए और बोले, 'वत्स! अभी तक तुम किसी योग्य गुरु के पल्ले नहीं पड़े हो, तभी ऐसे तुच्छ विचार रखते हो। मोक्ष की ओर नहीं पुत्र! धर्म-मार्ग अर्थ की ही ओर जाता है। पुरुषार्थ चतुष्टय का सिद्धांत भी यही प्रतिपादित करता है। अपने मस्तिष्क के सॉफ़्टवेयर को तनिक एक्टिवेट करो और सोचो पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धांत (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में धर्म के बाद क्या अर्थ नहीं आता? अरे, मूर्ख मोक्ष तो उपरांत में आता है। पुरुषार्थ चतुष्टय सिद्धांत भी यही कहता है, धर्म मार्ग अपना कर अर्थ प्राप्त करो और अर्थ तुम्हें काम व मोक्ष प्रदान करेगा।'

मुन्नालाल बोला, 'मगर गुरुजी! धर्म मार्ग अर्थ प्राप्ति का सुगम व सुरक्षित मार्ग कैसे है?'
स्वामीजी बोले, 'आभामंडल! पुत्र आभामंडल, इसी आभामंडल के कारण कुबेर हमारे यहाँ पानी भरता है और उसी के प्रभाव से समूचा जनतंत्र हमारे समक्ष नतमस्तक है। बड़े-बड़े पूर्व, भूतपूर्व व अभूतपूर्व मंत्रियों से लेकर संतरी तक हमारे समक्ष चरणागत हैं। फिर असुरक्षा का प्रश्न कहाँ? आभामंडल लक्ष्मण रेखा है, कोई भी दाग़ उसे लांघ नहीं पाएगा। न आयकर, न सेवाकर, न व्यवसाय कर। बस धर्ममार्ग पर चल और दोनों कर से अर्थ एकत्रित कर। जाओ पुत्र धर्म मार्ग का अनुसरण करो, उसे ही अपना व्यवसाय बनाओ और इस व्यवसाय में 'कॉर्परेट कल्चर' का समावेश करते हुए कुबेर के खज़ाने का निर्भय पूर्वक उपभोग करो।'

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मंगलवार, 8 मई, 2007

राजेंद्र त्यागी का व्यंग्य : बुद्धिजीवी बनाम बुद्धूजीवी

राजेन्द्र त्यागी पेशे से क़लम के सिपाही हैं। नुक्ताचीनी में माहिर हैं, सो व्यंग्य लिखने की मौलिक प्रतिभा उनमें होनी ही थी। नए प्रतीकों और रुपकों के ज़रिए अपनी बात कहने का उनका अलग अंदाज़ है। त्यागी जी के तीन व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं।

हमारे एक मित्र हैं, निर्मल चंद उदास। उदास उनका तख़ल्लुस है, स्वभाव से निर्मल हैं। निर्मल और उदास दोनों ही धाराएँ उनके व्यक्तित्व में ऐसे समाहित हैं जैसे इलाहाबाद में गंगा-यमुना का संगम। लेखन में रुचि रखते हैं। कई ग्रंथ लिख चुके हैं मगर अभी तक वे अपनी गिनती न तो साहित्यकारों में करा पाए हैं और न ही बुद्धिजीवियों में। उनका सारा लिखा-पढ़ा काग़ज़ काले करना ही साबित हुआ। हाँ, जिस प्रकाशक के यहाँ वे प्रूफ रीडरी कर जीविकोपार्जन कर रहे हैं, उसकी गिनती अवश्य बुद्धिजीवियों में होती है। प्रकाशक महोदय साहित्य के क्षेत्र में भी दो-एक पुरस्कार हथियाने में सफल हो गए हैं। शायद उदास साहब की उदासी का यही प्रमुख कारण है।

एक अन्य मित्र हैं, हँसमुख लाल जी। इस मिथ्या जगत में उनका पदार्पण रोते हुए नहीं मुस्कुराते हुए ही हुआ था। यही वजह है कि उनका मूल नाम ही हँसमुख रख दिया गया। आज वह प्रौढ़ावस्था को प्राप्त हैं, लेकिन हँसमुख स्वभाव आज भी बरक़रार है। जानने वालों का कहना है कि वह अपने ऊपर कम दूसरों के ऊपर ज़्यादा हँसते हैं। कभी-कभी यह स्थिति परचित्तानुरंजन तक पहुँच जाती है। इसे हम भाग्य का खेल मानते हैं, कुछ लोग दूसरों पर हँसने के ही लिए पैदा होते हैं और कुछ हँसी का पात्र बनने के लिए।

हँसमुख लाल जी साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर हाथ साफ़ कर चुके हैं। विभिन्न विधाओं में अपने नाम से दो-एक ग्रंथों की भी रचना करा चुके हैं। फलस्वरूप साहित्य के लगभग सभी अलंकरण उनके ड्राइंग रूम को शोभायमान कर रहे हैं। उन्हें बुद्धिजीवियों की भी प्रथम पंक्ति में स्थान प्राप्त है। अत: राष्ट्र नेता के नाम का सदुपयोग करते हुए उन्हीं के नाम से काग़ज़ों पर एक विश्वविद्यालय भी बाक़ायदा चला रहे हैं। फ़िलहाल उनके क़दम संसद की तरफ़ रुख़ किए हैं। देर-सबेर सांसद भी बन ही जाएंगे।

एक लंबे अर्से से हम इसी उधेड़-बुन में थे कि आख़िर बुद्धिजीवी होने का फ़ण्डा क्या है? बैठे-ठाले एक दिन इस गुत्थी को सुलझाया हमारे पौत्र ने। खेल-खेल में उसने हमारी तरफ़ निशाना साधा और एक सवाल दाग दिया, 'डैडी, अकबर बुद्धिजीवी था या बीरबल?'

सवाल सुन हमने सोचा आज फिर उसे कोई बौद्धिक ख़ुराफ़ात सूझी है। शारीरिक ख़ुराफ़ात के साथ-साथ वह ऐसी ख़ुराफ़ात अक्सर कर बैठता है। मगर जब उसे ख़ुराफ़ाती दौरा उठता है तो हमारी तरह ज़मीन पर लक़ीरें नहीं, मशीन के आविष्कर्ता लियॉनार्ददा विंचीकी तरह काग़ज़ पर यांत्रिक आकृति बनाता है। वह हमारी तरह रेत के घर बना कर भी नहीं तर्क-वितर्क के ताने-बाने में घर के अन्य सदस्यों को फँसा कर अपना मन बहलाता है। यह उसके बुद्धिजीवी होने का प्रमाण है।

ख़ैर, उसका सवाल हमने सहज भाव से लिया और सहज भाव से ही उसका जवाब दिया, 'बेटे, दोनों ही बुद्धिजीवी थे, बीरबल भी और अकबर भी।'
पौत्र के चेहरे पर बुद्धिजीवियों के समान गंभीर मुस्कराहट के भाव उतर आए और अक्षरों को शब्दों की लंबाई तक खींचते हुए वह बोला, 'डैऽऽऽडी, दोनों कैसे हो सकते हैं? एक साथ दो बुद्धिजीवी, वह भी प्रेम भाव के साथ, असंभव!'

पौत्र के तेवर देख हम समझ गए कि आज सहज भाव के आधार पर सहज ही पीछा छूटने वाला नहीं है, जवाब देना ही होगा। अत: हमने हनुमान चालीसा की तरह अकबर-बीरबल के क़िस्सों का मनन किया और बुद्धि पर जैक लगाते हुए जवाब दिया, 'बीरबल!'

हमारा जवाब सुन वह खिल-खिलाकर हँस दिया और इस बार शब्दों को अक्षरों के आकार तक सीमित करते हुए बोला, 'बुद्धू! अच्छा डैड, बताओ शेर ताक़तवर होता है या रिंग मास्टर?'

रिंग मास्टर-शेर, अकबर-बीरबल! उसकी पहेली अब हमारी बुद्धि के चोर दरवाज़े से बाहर झांकने लगी थी। फिर भी बुद्धि के सभी खिड़की-दरवाज़े बंद किए और दोनों जीवों की ताक़त का अनुमान लगाते हुए नतीजे पर पहुँचे की ताक़तवर तो शेर ही होता है, आदमी की क्या बिसात? इसी अनुमान के आधार पर हमने शेर के सीने पर ताक़तवर होने का तमगा जड़ अपना जवाब उसकी तरफ धकेल-सा दिया।

हमारे इस बौद्धिक जवाब से ख़ुश हो कर उसने 'नासमझ' होने का गोल्ड मेडल हमारे सीने पर चस्पा कर दिया और अभिनेता नाना पाटेकर के लहज़े में टेढ़ी उंगली से अपनी बुद्धि खटखटाते हुए बोला, 'डैड, ताक़त यहाँ होती है, बाँहों में नहीं। शेर यदि ताक़तवर होता तो उसके इशारे पर रिंग मास्टर डांस करता, रिंग मास्टर के इशारे पर शेर नहीं। कुछ समझे, डैड!'
अब हम सहज भाव के साथ पूरी तरह फँस चुके थे। अत: आत्मसमर्पण भाव से बोले, 'समझ गए, पुत्र!'

'समझे! तो बताओ, अकबर व बीरबल में कौन बुद्धिजीवी था।' उसने सवाल फिर दोहराया।
इस स्तर तक आते-आते हम समझ गए थे कि पौत्र की निगाह में बुद्धिजीवी कौन है। मगर डैडी होने के अहम् भाव के कारण हम अकबर को बुद्धिजीवी कहने में अपनी हिमाकत समझ रहे थे। हम यह भी जानते थे कि पौत्र का जवाब हमारे अहम् को घायल कर देगा, मगर महसूस यह भी कर रहे थे कि पौत्र के अनुकूल सही जवाब अपने मुख से देने पर तो हमारा अहम् मृत्यु को ही प्राप्त हो जाएगा। अत: सुगढ़ व्यापारी की तरह नफ़े-नुक़सान का आकलन करते हुए हमने विनीत भाव से कहा, 'तुम्हीं बताओ पुत्र।'

विजय भाव से उसने जवाब दिया, 'डैडी, बुद्धिजीवी तो अकबर ही था, बीरबल नहीं।'
पराजित घायल राजा के समान कराहते हुए हम बोले, 'वह कैसे?'
शांत व शालीन भाव से वह बोला, 'बीरबल यदि बुद्धिजीवी होता तो वही महान कहलाता, अकबर नहीं। हिंदुस्तान का बादशाह बीरबल होता, अकबर नहीं। यह ठीक है कि बुद्धि बीरबल के पास भी थी, मगर नवरत्नों की बुद्धि का दोहन करने वाली बुद्धि किसके पास थी? अकबर के ना!
तो बुद्धि का कौन खा रहा था, अकबर ना! फिर बुद्धिजीवी कौन हुआ डैडी, अकबर या बीरबल, अकबर ना!'

बौद्धिक रूप से अब हम पूरी तरह मात खा चुके थे। डेढ़ बालीस्तके पैदनेसे छोरे ने हमारी बुद्धि का दिवाला निकाल हमारी हथेली पर जो रख दिया था। मात खाने के बाद हमने उससे पूछा 'फिर बीरबल किस श्रेणी का जीव था।'
वह शरम-लिहाज़ त्याग बोला, 'बुद्धूजीवी'।

अब हम पूरी तरह शिष्यत्व अवस्था को प्राप्त हो चुके थे और उसी अवस्था की व्यवस्था का पालन करते हुए हमने पूछा, 'बेटे! मंत्री बुद्धिजीवी होता है या आईएएस अफ़सर?'

उसका जवाब था, 'डैडी, बुद्धिजीवी होने के लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं है।' उसने हमारे सवाल की गहराई नाप ली थी। हमारा अगला सवाल था, 'देश में बुद्धिजीवी शिरोमणि किसे मानते हो?'

वह बोला, 'पहले नंबर पर ठग सम्राट दादा नटवर लाल। ज़िन्दगी भर बुद्धि का चमत्कार दिखाता रहा और अपनी जीविका चलाता रहा। वह यदि इस देश का विदेश मंत्री भी होता तो मियाँ मुशर्रफ़ के हस्ताक्षर से पाकिस्तान की बिल्टी भारत के नाम कटा देता और अखंड भारत का सपना साकार हो जाता। डैडी! दूसरे नंबर का बुद्धिजीवी था, चचा हर्षद मेहता। वह भी पूरी उम्र बुद्धि का ही खाता रहा। वह यदि वित्तमंत्री होता तो विश्व बैंक भारत में गिरवी रखा होता।'

अब हमारे पास न कहने के लिए कुछ बचा था और न पूछने के लिए। इलेक्ट्रानिक पीढ़ी के सामने चर्खा पीढ़ी पूरी तरह नतमस्तक थी।

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मंगलवार, 1 मई, 2007

राजेंद्र त्यागी का व्यंग्य : नेता का विराट स्वरूप

Rajendra Tyagiराजेन्द्र त्यागी पेशे से क़लम के सिपाही हैं। नुक्ताचीनी में माहिर हैं, सो व्यंग्य लिखने की मौलिक प्रतिभा उनमें होनी ही थी। नए प्रतीकों और रुपकों के ज़रिए अपनी बात कहने का उनका अलग अंदाज़ है। त्यागी जी के तीन व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं।

मौसम में ठण्डक थी। मगर उम्मीदवारों के मुँह से निकलती आश्वासन व वायदों की गरम हवाएँ, मौसम की सर्द हवाओं से रह-रह कर टकरा रहीं थी। इसलिए सर्द मौसम के बावजूद माहौल में गर्मी थी। चुनावी नारे आकाश में ट्रैफ़िक जाम की सी स्थिति पैदा किए हुए थे। जल-वायु, पृथ्वी-आकाश सभी चुनावाग्निसे तापायमान थे। जब संपूर्ण वायुमंडल ही चुनाव की बू से ओतप्रोत हो तो भला महामंडलेश्वर स्वामी अद्भूतानन्दजी महाराज व उनके भक्तगण ही उससे अछूते कैसे रह पाते। अत: भक्तजनों के आग्रह पर स्वामीजी ईश्वर के स्वरूप का वर्णन करते-करते नेता के स्वरूप का बखान करने लगे। भक्तजनों के आग्रह स्वरों श्रोत्रेद्रियों में प्रवेश करते ही स्वामीजीके मुखारबिंदु से निकला, नेता! 'नेति-नेति' अर्थात यह भी नहीं यह भी नहीं। फिर स्वामीजी बोले जिसका उद्भव ही 'नृ' धातु से हुआ हो उसका वर्णन शब्दों में करना दुष्कर कार्य है। शब्द ज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं और नेता असीम है। फिर भी हे भक्तजनों! सीमित शब्दावली में ही मैं नेता के असीम स्वरूप का वर्णन करने का प्रयास करता हूँ।

"जुगाड़" की तरह अपने प्रवचन को आगे खींचते हुए स्वामीजी बोले - हे भक्तजनों! नेता सर्वव्यापी है, सर्वाकार है, निर्विवाद है, सद्चिदानंद है, जुगाड़ी है अर्थात सभी जुगाड़ों का स्रोत है।

नेता के विराट स्वरूप का संक्षिप्त वर्णन करने के बाद स्वामीजी ने उसके एक-एक गुण का विस्तृत वर्णन कुछ इस प्रकार किया :

हे भक्तजनों! नेता सर्वव्यापी है, वह राष्ट्र के कण-कण में व्याप्त है। राजधानी से लेकर गाँव-देहात तक की गली-मौहल्ले की हर ईंट के नीचे वह विद्यमान है। हृदय निर्मल होना चाहिए घट-घट में नेता के दर्शन संभव हैं।

भक्तजनों, अब मैं नेता के सर्व-विवादित गुण का बखान करता हूँ। सर्व-विवादित यह गुण है उसका स्वरूप। आदिकाल अर्थात जब से सृष्टि में नेता नाम के जीव का उद्भव हुआ है, तभी से उसके स्वरूप को लेकर विवाद है। कहा जा सकता है कि नेता और उसका स्वरूप विवाद, दोनों का उद्भव व विकास साथ-साथ ही हुआ है।

हे भक्तजनों! विवादों के पार यदि देखा जाए तो नेता सर्वाकार है, बहुरूपी है। कभी-कभी उसे बहुरूपिया कह कर भी संबोधित किया जाता है। क्योंकि नेता लीलामय है, इसलिए भक्त ने उसके जिस रूप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की नेता ने उसे उसी रूप में दर्शन दिये। उसके विभिन्न स्वरूप भक्त की भावना पर भी निर्भर करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है -
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देख तिन तैसी"
बहुरूपिया होने के बावजूद शास्त्रों में मूलतया उसके दो स्वरूपों का वर्णन प्रमुखता से मिलता है। आज के प्रवचनों में हम मुख्य रूप से इन्हीं दो रूपों की चर्चा करेंगे।

हे भक्तजनों! शास्त्रों को घोट कर यदि निचोड़ा जाए तो नेता का मूल स्वरूप निराकार ही साबित होता है। निराकार है, तभी तो जल-वायु और आकाश की तरह वह पात्र के अनुरूप आकार धारण कर लेता है, रंग बदल लेता है। निराकार है तभी तो वह घट-घट का वासी है और आड़ी-तिरछी उसकी टांग का आभस तभी तो प्रत्येक क्षेत्र में हो जाता है। स्नेह के वशीभूत भक्तजन कभी-कभी उसे घाट-घाट का जल ग्रहण कर्ता भी कहते हैं। दर्शन देकर नेता अक़्सर अंतर्ध्यान हो जाता है, हवा हो जाता है, इसलिए ही उसका एक नाम हवाबाज़ भी है। ये सभी लक्षण उसके निराकार स्वरूप का वर्णन करते हैं।

नेता के निराकार स्वरूप का वर्णन कर अद्भूतानन्दजी महाराज ने अपने प्रवचन पर अर्ध विराम लगाया। भक्तों ने अगला प्रश्न उठाया, "नेता जब निराकार है, तो दर्शन किसके?"
चिलम में दम लगाने की माफ़िक महाराज ने लंबी सांस खींची और फिर बोले, "प्रश्न महत्वपूर्ण है।"

हे भक्तजनों! नेता निराकार ही है। मगर जब-जब चुनाव सन्निकट होते हैं, भक्तों के आग्रह पर वह उम्मीदवार बनकर साकार रूप में अवतरित होता है। भक्तजनों यही कारण है कि चुनाव संपन्न हो जाने के बाद नेता अंतर्ध्यान हो जाता है। वास्तव में तब वह अपने निराकार रूप में चला जाता है। इसलिए तुच्छ जन को उसके दर्शन नहीं होते। मगर जो प्राणी भक्ति-भाव (पांव-पान-पूजा) के साथ उसके विराट स्वरूप के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं, ऐसे भक्तों को वह निराकार स्वरूप में भी दर्शन देता है।

भक्तजनों, सभी जुगाड़ों का आदि स्रोत होने के कारण नेता को जुगाड़ी भी कहा गया है। जुगाड़ उसकी प्रकृति है, उसकी माया है। सृष्टि के तमाम जुगाड़ उसी के जुगाड़ से संचालित हैं। जिसके सहारे वह संपूर्ण राजनैतिक सृष्टि का निर्माण करता है।

स्वामीजी! और यह भ्रष्टाचार?
अच्छाऽऽऽ, भ्रष्टाचार!
भक्तजनों, भ्रष्टाचार भी उसी शक्ति पुंज जुगाड़ का एक अंश है। हे भक्तजनों! जिस प्रकार जल से भरा कुंभ यदि जल ही में फूट जाए तो दोनों जल एक दूसरे में समा जाते हैं, एकाकार हो जाते हैं। उसी प्रकार की गति जुगाड़ व भ्रष्टाचार की है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि भ्रष्टाचार जुगाड़ है और जुगाड़ भ्रष्टाचार। नेता प्रथम भ्रष्टाचार के लिए जुगाड़ करता है, फिर भ्रष्टाचार के सहारे चुनाव के लिए धन का जुगाड़ करता है और फिर उसके सहारे चुनाव में विजयश्री प्राप्त करने का जुगाड़। विजयश्री प्राप्त हो जाने के बाद सरकार बनाने के जुगाड़ में व्यस्त हो जाता है। ये सभी उसकी लीलाएँ हैं। ऐसी ही लीलाओं के माध्यम से संपूर्ण राजनैतिक सृष्टि की संरचना का जुगाड़ फिट हो जाता है। यह जुगाड़ ही की माया है कि नेता कभी नहीं हारता, हमेशा जनता ही हारती है।

नेता निर्विवाद है। दुनिया के संपूर्ण प्रपंच उसकी माया है, लीला है। मर्यादा स्थापना हेतु प्रपंच करना उसका परम कर्तव्य है। प्रपंच के माध्यम से वह लोकतंत्र वासियों को उनके कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध कराता है। क्योंकि वह कीचड़ में कमल की भांति, प्रपंच करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता। वह प्रपंच कर्म भी सहज भाव से करता है, इसलिए निर्विकारी है, निर्विवाद है, सभी विवादों से परे हैं।

नेता का असत्य भी सत्य हैं, क्योंकि सत्य के मानदंड, सत्य की परिभाषा परिवर्तनशील हैं, इसलिये समय के अनुरूप नेता ही सत्य के मानदंड व परिभाषा तय करता है। इसलिये ही शास्त्रों में नेता को सत् और जनता को असत् कहा गया है।

नेता चित् स्वरूप भी है। राजनीति की समस्त चेतना नेता ही से प्रवाहित है। नेता को शक्ति पुंज कहा गया है। लोकतंत्र के लोक और तंत्र दोनों ही का चेतना स्रोत नेता ही है। लोकतंत्र रूपी सृष्टि के संपूर्ण चक्र-कुचक्र नेता की ही माया से संचालित हैं। लोकतंत्र का जुगाड़ उसी की चेतना से गतिशील है। क्योंकि वह सत् है, चित् है, इसलिए वह आनंद स्वरूप है। वह आनंद स्वरूप है, इसलिए ही जनता दुखानंद रूप है। जनता का दुख ही नेता का आनंद है और उसका आनंद जनता का दुख है। यही लोकतंत्र का नियम है।

भक्तजनों क्योंकि नेता सत् है, चित्त है, आनंद है, इसलिये उसे सद्चिदानंद भी कहा गया है। इसके साथ ही हे भक्तजनों, आज के प्रवचनों पर अब विराम लगाते हैं। भक्तजनों, आओ अब नेता के उस विराट स्वरूप की आरती उतारे। धन्य-धन्य के सुर के साथ भक्तजन अपने-अपने स्थान पर खड़े हो कर आरती गुनगुनाने लगते हैं।

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