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रविवार, 1 जुलाई, 2007

प्रियरंजन झा का व्यंग्य : भगवान के बूते से बाहर

बिहारी बाबू के रुप में प्रियरंजन व्यंग्यकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके व्यंग्य का अभी तक अलग अंदाज़ रहा है - लेकिन इस बार आप प्रियरंजन का दूसरा अंदाज देखेंगे। " मस्ती की बस्ती" के लिखे गए इस व्यंग्य में प्रियरंजन बता रहे हैं क्या है भगवान के बूते से भी बाहर।

मैंने ख़बर पढ़ी कि हूजी के आतंकी साधु के भेष में देश में गड़बड़ी फैलाने आए हैं। ऐसे में आजकल हमारी हालत ख़राब रहती है। साधु के भेष में अब मुझे सब असाधु ही नज़र आते हैं। एक साधु जैसे दिखने वाले आदमी से मैंने पूछा, 'आप साधु के भेष में हूजीके आतंकी तो नहीं?' उसने कहा, 'लगता है बच्चा, तुम मृग मरीचिका के शिकार हो, इसलिए साधुको असाधु समझ रहे हो। वैसे, ग़लती तुम्हारी भी नहीं है। इस देश की हवा में ही भांग घुली हुई है, इसलिए सब कुछ उल्टा हो रहा है। लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि तुम परेशान क्यों हो रहे हो? जा करके जनता से पूछो, सब आनंद से हैं। बस एक तुम्हारे ही पेट में दर्द हो रहा है! हूजी...हूँ...।'

हमने सोचा, चलो जनता के आनंद का पता लगाया जाए। हम यूपी गए। वहाँ एक आदमी से पूछा, 'बहनजी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता रहा है, आप लोगों ने बावजूद इसके उनको मुख्यमंत्री बना दिया?' वह बिगड़ गया। उल्टे मुझसे से पूछने लगा, 'आप ऊँची जाति के हैं क्या? ... तभी यह आरोप लगा रहे हैं। पचास साल तक ऊँची जाति ने देश को खाया, तब तो आप लोगों के पेट में कभी दर्द नहीं हुआ, अब बहनजी की संपत्ति देखकर क्यों हो रहा है?'

उसे उलझते देख मेरे एक दोस्त ने मुझे समझाया, 'कहाँ परेशान हो रहे हो? नेताजी को कोसने की बजाय उनसे सीख लो। शेयर में पैसा इन्वेस्ट करने की बजाय नेतागिरी में इन्वेस्ट करो। जन्म सफल हो जाएगा!'

ख़ैर, अरबपति नेता से प्रभावित हुए बिना हम बहुचर्चित डिफॉल्टर नेता के बारे में जानने के लिए एक दूसरे नेता के पास पहुंचे। मैंने पूछा, 'आप लोगों ने एक डिफॉल्टर को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बना दिया है?' वह कुछ ज़्यादा ही गर्म हो गया, 'डिफॉल्टर तो हर कोई है। जो नेता बन गया, समझो डिफॉल्टर हो गया या फिर यह भी कह सकते हो कि डिफॉल्टर ही इस देश में नेता बन सकता है। अगर इतना क़ानूनची बनोगे, तो विदेश से नेता आयात करना पड़ेगा!'

लेकिन मुझे तो देसी नेता ही चाहिए, इसलिए मैं पहुँचा शिवसेना के ऑफ़िस। मैंने वहाँ बैठे एक कार्यकर्ता से पूछा, 'आप लोग हिंदुत्व की पॉलिटिक्स करते हैं, लेकिन अब मराठी के नाम पर पाटिल का समर्थन...? राजस्थानी हिंदू में क्या खोट है? आख़िर आप लोग कितने छोटे-छोटे टुकड़ों में लोगों को बांटकर राजनीति कर सकते हैं?' जवाब मिला, 'हमारे पार्टी प्रमुख इतने मंझे हुए नेता हैं कि एक आदमी पर भी राजनीति कर सकते हैं, यहाँ तो मामला अरब की जनसंख्या को करोड़ में ही बांटने का है! वैसे, आपको दिक़्क़त क्या है? कोई मराठा राष्ट्रपति बने, ये तो हमारा गौरव होगा।'

हिंदुत्व की बात चलते ही हमको फिर से हूजी याद आ गया। हमने फिर से एक दाढ़ी वाले व्यक्ति से पूछा, 'कहा जा रहा है कि आपके ही स्कूल में आतंकी सब आकर रुकते हैं।' वह कहने लगा, 'तो इसमें गड़बड़ क्या है? आप हिंदू हैं क्या? ...इसीलिए ऐसे कह रहे हैं। इस देश में जितना गड़बड़ होता है, सब के लिए हम ही तो दोषी होते हैं। नक्सली इतना कुछ करते हैं, उस पर तो आप लोग किसीको कुछ नहीं कहते, उनके समर्थक तो आपके देश में सत्ता में साझीदार हैं... उनका वर्ग संघर्ष है, तो हमारी भी धर्म की लड़ाई है। आप ख़ामख़ा परेशान हो रहे हैं। जाइए, आराम से घर में सोइए। चिंता से चतुराई घटती है और चतुराई घट गई, तो चतुर सुजानों के इस देश में आप चिंता करने लायक़ भी नहीं बचेंगे। अरबपति नेता, डिफॉल्टर नेता, साम्प्रदायिक नेता या हूजीको यहाँ आने से रोकना तो ख़ैर भगवान के बूते से भी बाहर की बात है!'

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गुरुवार, 24 मई, 2007

प्रिय रंजन झा का व्यंग्य : क्रिया की कैसी-कैसी प्रतिक्रिया

बिहारी बाबू के रुप में प्रियरंजन व्यंग्यकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके व्यंग्य का अभी तक अलग अंदाज़ रहा है - लेकिन इस बार आप प्रियरंजन का दूसरा अंदाज देखेंगे। " मस्ती की बस्ती" के विशेष आग्रह पर लिखे गए इस व्यंग्य में प्रियरंजन कर रहे हैं भौतिकी के नियम की नई व्याख्या।

हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है, यह गति का तीसरा नियम है। कहने को तो यह फीजिक्सकी थ्योरी है, लेकिन जिंदगी के हर क्षेत्र में लोग इस थ्योरी को घुसा डालते हैं। या फिर यहकहिए कि इस थ्योरी पर चलना पसंद करते हैं। इसके एकनहीं, तमाम उदाहरण आपको आए दिन देखने को मिल जाएंगे।

गुजरातमें जब खूब दंगे हुए, तो हिंदू हृदय सम्राटों ने कहा कि वे कुछ नहीं करसकते, क्योंकि यहतो क्रिया के विपरीतहुई प्रतिक्रिया है - जो कुछ हुआ, वह गोधरा कांड का रिएक्शन था। ऐसे ही'तुष्टीकरण' के पुरोधा अक्सर यह कहते हैं कि हिंदू मुसलमानों को बहुत डरा रहे हैं, इसलिए मुसलमान कट्टर हो रहे हैं। खैर, ऐसे और भी कई उदाहरण हैं, जिसमें गति के इस नियम को लागू होते देखने में लोग गर्व का अनुभव करते हैं। अजीब तो यह है कि 'क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया' का तर्क अक्सर लोग अपने गलत कामों को सही साबित करने के लिए देते हैं। मेरे एक गुरुजी थे, वे गति के इस नियम को कुछ ज्यादा ही मानते थे। उनका मानना था कि जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ेगी, लोग वैसे-वैसे पीछे हटेंगे। लोग एक तरफ तो इस बात पर गर्व करेंगे कि हम ग्लोबल विलेज में रहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे घनघोर क्षेत्रीयतावादी मानसिकता के स्वामी भी होंगे। उनकी बात आज सौ फीसदी सच लगती है। आज फ्रांस से लेकर मुंबई तक यही हाल है। राष्ट्रपति सर्कोजी फ्रांस में विदेशियोंको देखना नहीं चाहते, तो बाल ठाकरे से लेकर राज ठाकरे तक गैरमराठियोंको महाराष्ट्र में नहीं देखना चाहते। अब ठाकरे लोगों को यह कौन बताए कि उनकी ऐसी सोच (क्रिया) की प्रतिक्रियामें अगर दूसरी जगहों पर रह रहे मराठियों को खदेड़ दिया जाए, तो उनका क्याहोगा?

हमारे गुरुजी इस थ्योरी कोसमझाने के लिए वे एक जुमले का इस्तेमाल करते थे - 'जौं जौं मुर्गी मोटानी, तौं तौं दुम सिकुड़ानी।' कहने का मतलब यह कि जब मुर्गियां छोटी होती हैं, तो उनकी दुम (अगर होती है, तो) मोटी होती है, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़ी व मोटी होती जाती हैं, उनकी दुम सिकुड़ती चली जाती है। आजकल के बच्चों को ही लीजिए, समय के साथ मुर्गियों जैसे ही उनकी दुम भी सिकुड़ रही है। नए जमाने के बच्चे अभिमन्यु की तरह गर्भ से हीबहुत कुछ सीखकर आते हैं। आज के तीन-चार साल के बच्चों में जितनी अक्ल होती है, आज से बीस-तीस पहले अगर इस उम्र में इतनी अक्ल होती, तो पता नहीं अपना देश कहां चला गया होता!

खैर, तो हम बात कर रहे थे, दुम सिकुड़ने की। हाल में मेरे एक दोस्त के साथ दिलचस्प वाकिया हुआ। रिक्शा से बाजार जाते हुए कॉन्वेन्टमें पढ़ रहे उसके पांचवर्षीय बेटे ने खुश होते हुए कहा - पापा, वो देखो बकरियां जा रही हैं। इससे पहले कि मेरा दोस्त बकरियों की ओर देखता, रिक्शा वाला हैरान होकर रिक्शा रोककर खड़ा हो चुका था। दरअसल, वह इस बात को लेकर हैरान था कि कंप्यूटर से लेकर हवाई जहाज तक की बात कर रहा यह बच्चा गदहे को भी नहीं पहचानता और उसे बकरी बता रहा है! रिक्शा वाला भले ही हैरान हो, लेकिन मेरी समझ से यह मॉडर्न होने जैसी क्रिया की प्रतिक्रिया है। इसे आप कतई बच्चों की नासमझी न कहें, क्योंकि अगर वह नासमझ होता, तो विंडोज विस्टाऔर कॉन्कर्ड विमानों की बातें कैसे करता?

वैसे, सच यह भी हैकि अगर आपको मॉडर्न दिखना है, तो गदहे को पहचानने से इनकार करना ही होगा, क्योंकि वह बीते जमाने का जानवर है। और बीते जमाने की चीजों का आज क्या काम! यह मॉडर्न होने की प्रतिक्रिया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि गदहे को नहीं पहचानने पर भी न तो आपका जीके कमजोर माना जाएगा और न ही इससे आपके पेट पर लात पड़ेगी। बच्चों के लिए यह जमाना राम-कृष्ण और गांधी-सुभाषसे ज्यादा अमिताभ-सलमानऔर बैटमैन-स्पाइडरमैन को जानने का है, क्योंकि इसी तरह के ज्ञान की अब जरूरत पड़ती है - स्कूल-कॉलेज कैंटीन से लेकर टीवी के रियलिटीशो तक में। तो यह है नई पीढ़ी का ज्ञान - इसे आप क्रिया की प्रतिक्रिया कह सकते हैं या फिर बढ़ती मुर्गी की सिकुड़ती दुम भी, लेकिन क्या आप यह बता सकते हैं कि इतनी रामकहानी किस क्रिया की प्रतिक्रिया में लिखी गई है?

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