प्रियरंजन झा का व्यंग्य : भगवान के बूते से बाहर
बिहारी बाबू के रुप में प्रियरंजन व्यंग्यकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके व्यंग्य का अभी तक अलग अंदाज़ रहा है - लेकिन इस बार आप प्रियरंजन का दूसरा अंदाज देखेंगे। " मस्ती की बस्ती" के लिखे गए इस व्यंग्य में प्रियरंजन बता रहे हैं क्या है भगवान के बूते से भी बाहर।मैंने ख़बर पढ़ी कि हूजी के आतंकी साधु के भेष में देश में गड़बड़ी फैलाने आए हैं। ऐसे में आजकल हमारी हालत ख़राब रहती है। साधु के भेष में अब मुझे सब असाधु ही नज़र आते हैं। एक साधु जैसे दिखने वाले आदमी से मैंने पूछा, 'आप साधु के भेष में हूजीके आतंकी तो नहीं?' उसने कहा, 'लगता है बच्चा, तुम मृग मरीचिका के शिकार हो, इसलिए साधुको असाधु समझ रहे हो। वैसे, ग़लती तुम्हारी भी नहीं है। इस देश की हवा में ही भांग घुली हुई है, इसलिए सब कुछ उल्टा हो रहा है। लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि तुम परेशान क्यों हो रहे हो? जा करके जनता से पूछो, सब आनंद से हैं। बस एक तुम्हारे ही पेट में दर्द हो रहा है! हूजी...हूँ...।'
हमने सोचा, चलो जनता के आनंद का पता लगाया जाए। हम यूपी गए। वहाँ एक आदमी से पूछा, 'बहनजी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता रहा है, आप लोगों ने बावजूद इसके उनको मुख्यमंत्री बना दिया?' वह बिगड़ गया। उल्टे मुझसे से पूछने लगा, 'आप ऊँची जाति के हैं क्या? ... तभी यह आरोप लगा रहे हैं। पचास साल तक ऊँची जाति ने देश को खाया, तब तो आप लोगों के पेट में कभी दर्द नहीं हुआ, अब बहनजी की संपत्ति देखकर क्यों हो रहा है?'
उसे उलझते देख मेरे एक दोस्त ने मुझे समझाया, 'कहाँ परेशान हो रहे हो? नेताजी को कोसने की बजाय उनसे सीख लो। शेयर में पैसा इन्वेस्ट करने की बजाय नेतागिरी में इन्वेस्ट करो। जन्म सफल हो जाएगा!'
ख़ैर, अरबपति नेता से प्रभावित हुए बिना हम बहुचर्चित डिफॉल्टर नेता के बारे में जानने के लिए एक दूसरे नेता के पास पहुंचे। मैंने पूछा, 'आप लोगों ने एक डिफॉल्टर को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बना दिया है?' वह कुछ ज़्यादा ही गर्म हो गया, 'डिफॉल्टर तो हर कोई है। जो नेता बन गया, समझो डिफॉल्टर हो गया या फिर यह भी कह सकते हो कि डिफॉल्टर ही इस देश में नेता बन सकता है। अगर इतना क़ानूनची बनोगे, तो विदेश से नेता आयात करना पड़ेगा!'
लेकिन मुझे तो देसी नेता ही चाहिए, इसलिए मैं पहुँचा शिवसेना के ऑफ़िस। मैंने वहाँ बैठे एक कार्यकर्ता से पूछा, 'आप लोग हिंदुत्व की पॉलिटिक्स करते हैं, लेकिन अब मराठी के नाम पर पाटिल का समर्थन...? राजस्थानी हिंदू में क्या खोट है? आख़िर आप लोग कितने छोटे-छोटे टुकड़ों में लोगों को बांटकर राजनीति कर सकते हैं?' जवाब मिला, 'हमारे पार्टी प्रमुख इतने मंझे हुए नेता हैं कि एक आदमी पर भी राजनीति कर सकते हैं, यहाँ तो मामला अरब की जनसंख्या को करोड़ में ही बांटने का है! वैसे, आपको दिक़्क़त क्या है? कोई मराठा राष्ट्रपति बने, ये तो हमारा गौरव होगा।'
हिंदुत्व की बात चलते ही हमको फिर से हूजी याद आ गया। हमने फिर से एक दाढ़ी वाले व्यक्ति से पूछा, 'कहा जा रहा है कि आपके ही स्कूल में आतंकी सब आकर रुकते हैं।' वह कहने लगा, 'तो इसमें गड़बड़ क्या है? आप हिंदू हैं क्या? ...इसीलिए ऐसे कह रहे हैं। इस देश में जितना गड़बड़ होता है, सब के लिए हम ही तो दोषी होते हैं। नक्सली इतना कुछ करते हैं, उस पर तो आप लोग किसीको कुछ नहीं कहते, उनके समर्थक तो आपके देश में सत्ता में साझीदार हैं... उनका वर्ग संघर्ष है, तो हमारी भी धर्म की लड़ाई है। आप ख़ामख़ा परेशान हो रहे हैं। जाइए, आराम से घर में सोइए। चिंता से चतुराई घटती है और चतुराई घट गई, तो चतुर सुजानों के इस देश में आप चिंता करने लायक़ भी नहीं बचेंगे। अरबपति नेता, डिफॉल्टर नेता, साम्प्रदायिक नेता या हूजीको यहाँ आने से रोकना तो ख़ैर भगवान के बूते से भी बाहर की बात है!'
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