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मंगलवार, 3 जुलाई, 2007

अरुण अरोड़ा के व्यंग्यात्मक दोहे

फ़रीदाबाद के कवि अरुण अरोड़ा एक बार फिर हाज़िर हैं "मस्ती की बस्ती" में। इस बार वे सुना रहे हैं गुरू पर दोहे, लेकिन ज़रा नए अन्दाज़ में। आप भी इन दोहों का मज़ा लीजिए:

१.
गुरु गोविंद दोनो खड़े काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने कुर्सी दई दिवाय॥

भावार्थ:- असमंजस मे पडा चेले के सामने सतगुरु और भगवान दोनो खडे है, चेला दुविधा में है कि मै पहले किसके पाँव पड़ूँ।
हे गुरु! मै आप पर बलिहारी जाता हूँ, आपने मुझे कुर्सी दिलादी।
अर्थात् जो काम आये वही बडा है

२. बलिहारी गुरु आपने दिखा दियो जो बार।
दो पगन के लगत ही दिखन लगत है चार॥

भावार्थ:- कलियुगी सतगुरु आपने चेले को बार दिखा कर जीवन सफल कर दिया है, जहाँ दो पैग लगाते ही चार दिखाई देने लगते है।
अर्थात् सच्चा गुरु वही है जो मस्त रहना सिखाए।

३. संसद मंज़िल गुंडई नाव है बाक़ी सब बेकार।
जिस दिन तुम पा जाओगे, सारे दुखडे पार॥

भावार्थ:- प्रिय चेले, नाव रूपी तेरी गुंडागिरी ही तुझे संसद रूपी मंज़िल तक ले जायेगी। बाक़ी सब कुछ मिथ्या है। जिस दिन तुम अपनी मंज़िल पर पहुँच जाओगे, सारे दुःख और पाप समाप्त हो जायेंगे।
अर्थात् मंज़िल तक पहुँचना ही मुख्य उद्देश्य होना चाहिये, चाहे मार्ग कैसा भी हो।

४. गुरु सारे माल समेटिये, चेले को बस नाम।
मन राखि संतोषिये, घूम फिरत सब गाम॥

भावार्थ:- कलयुगी सतगुरु ने मुझे अपना नाम देकर सारा माल समेट लिया है। अब मैं मन में संतोष लिये गाँव-गाँव भटकता फिर रहा हूँ।
अर्थात् गुरु माल समेटे उस से पहले आप गुरु का माल समेट कर कल्टी हो लो, यही सत्य है।

५. सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
जब तक माल बटोरो, कियो प्रेम व्यवहार॥
माया सारी निखस गई, दियो सरक पे डार।
लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावण हार॥

भावार्थ:- अन्त नहीं है कलयुग के सतगुरु की महिमा का, अन्त नहीं है उनके द्वारा किये गये उपकारों का। जब तक खीसे मे माल था, गुरुदेव ने अत्यंत प्रेम पूर्वक व्यवहार किया, पर जब मैं माया से मुक्त हो गया, मुझे सड़क पर डाल दिया।
गुरु के इस कार्य ने मेरे लोचन अर्थात् नेत्र खोल दिये, जिससे मैं अब निरंतर अनंत देख पा रहा हूँ।
अर्थात् मुझ निपट अज्ञानी को गुरु ने ज्ञान देकर गुरु बनाने की बहुत कोशिश की पर मेरी अज्ञानता को अब गुरु ने दूर कर दिया है।

६. अच्छा सतगुरु मिल गया अच्छी मिल गई सीख।
गुरु तो खावै माल पुये, मैं घर-घर मांगू भीख॥

भावार्थ:- मुझे अच्छा सतगुरु मिल गया, अच्छी सीख भी मिल गई। अब मैं चिंताओ से मुक्त होकर घर-घर भीख मांगता हूँ और सतगुरु माल पुये खाते हैं।
अर्थात् चेले से गुरु बनना ज़्यादा सुखदाई है।

७. जा तन विष की बेलरी, नोट है सुख की खान।
सिर फोड़े जो नोट मिले तो भी ससता जान॥

भावार्थ:- यह तन नश्वर है, संसार असार है, बस नोट ही सुख देने वाले हैं – इस मिथ्या जगत में, अगर किसी का सिर फोड़कर भी नोटों की प्राप्ति होती है तो वह सस्ती है। क्योंकि नोट होने से तू हर पाप से मुक्ती का मार्ग निकाल सकता है।
अर्थात् इस मिथ्या संसार मे नोट से बढ़कर कुछ नहीं।

८. अब तो तू अधिकारी है लूट सके जो लूट।
रिटायर्मेंट के बाद में नसीब ना होगी फूट॥

भावार्थ:- अभी तू सरकारी अधिकारी है, जो माल बना सकता हो बना। रिटायर होने के बाद तुझे फूट (खरीफ़ की फ़सल में मक्का के साथ मे होने वाला एक छोटा-सा फल) भी खाने को नहीं मिलेगी।
अर्थात् आज और अभी माल बना, कल की योजना मत सोच।

९. कबिरा बास रिझाइ ले मुख अमृत गुण गाय।
मार्च माह है सर पर, कहीं प्रमोशन ना रह जाय॥

भावार्थ:- कबीर दास कहते हैं मुख मे अमृत जैसी मीठी वाणी लेकर बॉस के गुण गाने का समय है। मार्च का महीना चल रहा है, कहीं प्रमोशन ना रह जाय।
अर्थात् काम चाहे मत करो, पर बॉस को मक्खन लगाना मत भूलो

१०. कबिरा नोट ख़र्च करो, गिफ़्ट लो एक मंगाय।
वापे बोस को नाय लिखो, उसे घर पे दे के आय॥

भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कुछ पैसा ख़र्च कर एक अच्छा सा गिफ़्ट मंगा कर बास के घर जाकर खुद देकर आओ।
अर्थात् बॉस को ख़ुश करने का कोई मौक़ा मार्च माह में हाथ से नहीं जाने देना चाहिये।

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सोमवार, 21 मई, 2007

अरुण अरोड़ा के व्यंग्य दोहे

फ़रीदाबाद के कवि अरुण अरोड़ा एक बार फिर हाज़िर हैं "मस्ती की बस्ती" में। इस बार वे सुना रहे हैं आधुनिक परिप्रेक्ष्य में कबीर और रहीम के दोहे। आप भी इन दोहों का मज़ा लीजिए:

१. "निन्दक नियैरे राखिये,खाय़ पियै सो जाये
ना काहू सै बोल सकै ,ना कोई पंगा पाय"

२. "नेता ऐसो चाहिये, जैसो सूप सुभाय
चंदो सारो गहि धरै, देय रसीद उडाय"

३. "रहिमन निज करमन की गाथा, मन ही राखो गोय
ना सेकेटरी को शामिल करो, ना शिबु सौरेन सी दुर्गति होय"

४. "रहिमन या राजनीति मे, कभी न खुन्दक दिखायै
ना जाने कब कौन से, दल मे शामिल होनो पड जाये"

५. "कबिरा तेरी झोपडी, गर है थाने के पास
करै कोई तू भरैगा, रख ले ये विश्वास"

६. "जब तक कुर्सी संग है, ले शराब मे रंग
पाच बरस के बाद मे, नसीब न होगी भंग"

७. "रहिमन या लीडरन ते, तजो बैर औ प्रीत
काटे चाटे स्वान के, दुहु भाती विपरीत"

८. "या लीडरन के चरित की, गति समझै नही कोई
ज्यो ज्यो डूबे श्याम रंग, त्यो त्यो उज्जल होई"

९. "कबिरा खडा पार्लियामेंट् मे, देवे सब को धौल
जो बोला सो पिटैगा, दुंगा खोपडी खोल"

१०. "रहिमन या संसार मे, मिलियो सब से धाय
न जाने कौन कब, प्रधान मंत्री बन जाये "

११. "रहिमन चमचा राखिये, काम आये वक्त पर
चमचा बिना न उबरे, नेता अभिनेता अफ़सर"

घोटालो एसो करो, काहु हवा न लगने पाय
ना बाटन को मामला, न चैनल खबर बनाय

बाणी एसी बोलिये, वोट-बैंक को हिसाब लगाये
जनता चाहे जलि मरै, चाहे कोर्ट मे चक्कर खाये

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे अमिताभ उसूल
विज्ञापन ते नोट बनाय, बाकी जाये भूल

भला जो देखण मै चला, भला न मिलया कोए
मुझते और मेरे लाल ते जग मे भलो न कोए

"काल लूटॆ सो आज लूट, आज मारे सो अब
जब वोटिंग हो जायेगी, बहूरी करोगे कब."

चाकी चलती देखकर, दिया कबीरा रोये
पीस के सारा खा गई, दियो न रत्ती कोये
"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
जब कुरसी छिन जायेगी , कहा करोगे तब."

कछु न छ्डयो रे नेता कछु न छोटो होये
भुसे के घोटलो मै अरबॊ के नॊट होये

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रविवार, 13 मई, 2007

अरुण अरोड़ा की व्यंग्य कविता : मुलायम की चिट्ठी माया के नाम

फ़रीदाबाद के कवि अरुण अरोड़ा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति पर चुटकी ली है। आप भी इसका मज़ा लीजिए मुलायम की इस चिट्ठी का, जो लिखी गयी है माया के नाम।

पीर मेरी प्यार बन जा
है भगे मेरे गधे कुछ
है भगे तेरे गधे कुछ
आजा मिलकर जीते चुनाव
साइकल रखले हाथी पर, तू गले का हार बनजा
पीर मेरी प्यार बनजा
सवर्णो को भी माफ़ किया जब
मै भी हूँ इतना बुरा कब
मै बनूंगा मुख्यमंत्री, तू मेरी सरकार बनजा
पीर मेरी प्यार बन जा
अमर सिंह से बात कर ले
शर्ते सारी साफ़ कर ले
अम्बानी की गारन्टी दूंगा
तू गरल से छार बन जा, पीर मेरी प्यार बन जा
देश की चिन्ता तुझे कब
देश की चिन्ता मुझे कब
लूटन में उत्तर प्रदेश को, तू मेरी मददगार बन जा
पीर मेरी प्यार बन जा
मै अमर का हूँ मुलायम
तू भी है काशी की माया
आधा ले लेना मुझसे
पिछले सालों जो कमाया
मिल बाट कर खालेंगे अब, तू मेरी हमराह बन जा
पीर मेरी प्यार बनजा
अम्बानी को बांट लेंगे
अमिताभ को साथ लेंगे
गुण्डे तेरे साथ भी हैं
गुण्डे मेरे पास भी हैं
जुर्म घटाने मे युपी के, तू भी जुम्मेदार बन जा
पीर मेरी प्यार बन जा

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