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बुधवार, 18 जुलाई, 2007

आलोक पुराणिक का प्रपंचतंत्र : सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक की प्रपञ्चतन्त्र शृंखला का एक और व्यंग्य - “सत्यसेल्स और सेल्ससत्य की कहानी”।


स्मार्ट डिपार्टमेंटल स्टोर में दो सेल्समैन काम किया करते थे। एक का नाम था सत्यसेल्स और दूसरे का नाम था सेल्ससत्य। सत्यसेल्स नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स का आधार सत्य होना चाहिए और कस्टमर से हमेशा सत्य ही बोलना चाहिए। उसका मानना था कि सत्य के आधार पर की गयी सेल से कस्टमर परमानेंट बनते हैं। इसलिए हमेशा कस्टमर के हितों की ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए। इसलिए वह हमेशा कहा करता था कि सत्य ही सेल्स का आधार है।

उधर सेल्ससत्य नामक सेल्समैन का मानना था कि सेल्स ही परम सत्य है, क्योंकि सेल से ही सारे खेल होते हैं। मुनाफ़ा सेल से ही आता है। इसलिए जैसे भी हो, सेल करनी चाहिए। सेल्ससत्य का मानना था कि कोई क़ारोबारी दुकान अपने मुनाफ़े के लिए खोलता है, ना कि कस्टमर के मुनाफ़े के लिए।

सेल्ससत्य का मानना था कि आख़िर दुकान का उद्देश्य कमाई करना होता है। और रही बात कस्टमर सेटिस्फ़ेक्शन की, तो उसका मानना था भारतवर्ष की जनसंख्या बहुत ज़्यादा है। सबको बारी-बारी से बेवकूफ़ बनाया जाये, तो भी आसानी से पूरी ज़िंदगी मुनाफ़े कमाये जा सकते हैं।


पेपर सोप से वीसीडी प्लेयर

एक बार दो कस्टमर स्मार्ट स्टोर में आये। एक सत्यसेल्स के काउंटर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा, सत्यसेल्स ने पेपर सोप दे दिया और वह कस्टमर वापस चला गया।

दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के काउण्टर पर गया और उसने पेपर सोप मांगा। सेल्ससत्य ने कहा – “हेलो, आप कैसे हैं? ओह पेपर सोप चाहिए, लगता है कि आप कहीं यात्रा पर जा रहे हैं।”
कस्टमर ने कहा – “मैं नहीं मैं नहीं, मेरी बीबी मुंबई जा रही है मायके गरमी की छुट्टियों में।”
सेल्ससत्य बोला – “ओह, फिर तो आपको अकेला रहना पड़ेगा। एक महीने का टाइम कैसे काटेंगे। इधर टीवी चैनलों के प्रोग्राम तो बहुत बेकार के आते हैं। आप कहें, तो एक ऑप्शन बताऊँ?”
कस्टमर बोला - “क्या?”
सेल्ससत्य बोला - “देखिये, स्मार्ट कंपनी ने नया वीसीडी प्लेयर लॉञ्च किया है। इसे ले लीजिये। इसके साथ आपको बीस सीडी मुफ़्त में दी जायेंगी। आपका टाइम आराम से कट जायेगा।
कस्टमर बोला - “पर मैं तो इसके लिए पैसे नहीं लाया।”
सेल्ससत्य ने कहा - “कोई बात नहीं। यहाँ पर फाँसू बैंक का बंदा बैठा है, यह अभी आपको लोन दे देगा। बाक़ी की फ़ॉर्मेलिटी ये आपके घर में जाकर करवा लेगा। डोंट वरी।”

सो साहब, जो कस्टमर सिर्फ़ पेपर सोप ख़रीदने निकला था, वह एक वीसीडी प्लेयर और बीस सीडी लेकर निकला। उधर फाँसू बैंक के सेल्समैन ने भी क़रीब पाँच सौ रुपये का कमीशन सेल्ससत्य को दिया।

स्मार्ट स्टोर का मालिक इस पूरे कारनामे को देख रहा था, वह सेल्ससत्य के पास आकर बोला - “ग्रेट! ऐसा सेल्समैन नहीं देखा जो पेपर सोप ख़रीदने वाले को वीसीडी प्लेयर भी चेंप दे।”
इस पर सत्यसेल्स ने कहा - “वैसे यह तो अनुचित है। हमें कस्टमर को वही माल बेचना चाहिए, जो उसे चाहिए होता है। इस तरह से लोन दिलवाकर माल बेचना तो ठीक नहीं है। ऐसा सुनकर स्मार्ट स्टोर के मालिक ने सत्यसेल्स को डाँटा - “अबे तू मेरा इंप्लाई है या उस कस्टमर का इंपलाई! जा फूट, मैंने तुझे नौकरी से निकाल दिया और सेल्ससत्य का प्रमोशन करके मैं इसे चीफ़ सेल्समैन बनाता हूँ।

शाम को रोते हुए सत्यसेल्स से चीफ़ सेल्स ऑफ़ीसर सेल्ससत्य बोला - “हे मूरख! बेच, सिर्फ़ बेच। ऐसे भी बेच, वैसे भी बेच, कैसे भी बेच। ईमान, सत्य की बातें तब करना ठीक है, जब इनकी क़ीमत ठीक मिलती हो। बेटा आजकल सत्य–ईमान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले बाबा लोग भी मौक़ा-मुकाम देखकर अपने चेलों को कैसेट, चूरन-चटनी, शैंपू, दवाईयाँ बेच रहे हैं। बंदा मोक्ष पाने के लिए बाबा के पास आता है, और कैसेट और हर्बल शैंपू लेकर वापस जाता है। इसलिए बेच, कस्टमर की चिंता मत कर।

सत्यसेल्स उसके वचन सुनकर बोला - “अगली नौकरी मैं तेरे ही वचनों का पालन करुंगा।”


एक रुपये का मोबाइल, सौ रुपये की मोटरसाइकिल

सत्यसेल्स को नौकरी से निकाले जाने के बाद उसके बेटे - फ़ेयरप्राइज़ को कृपा-अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गयी। पर फ़ेयरप्राइज़ भी बाप की तरह से सच बोलने के दुर्गुणों से पीड़ित था। एक बार दो कस्टमर स्टोर में घुसे। एक कस्टमर फ़ेयरप्राइज़ की तरफ़ जाकर बोला - “उस वाले मोबाइल की क्या क़ीमत है?”
“दस हजार रुपये, टैक्स अलग – फ़ेयरप्राइज़ ने बताया।”
“उस वाली मोटरसाइकिल की क्या क़ीमत है” - कस्टमर ने पूछा।
“पचपन हज़ार टैक्स एक्स्ट्रा” - फ़ेयरप्राइज़ ने बताया। फ़ेयरप्राइज़ का कस्टमर वापस भाग गया।

दूसरा कस्टमर सेल्ससत्य के पास गया। उसे मोबाइल की क़ीमत बतायी गयी - एक रुपया और मोटरसाइकिल की क़ीमत बतायी गयी सौ रुपये। कस्टमर ने रुचि दिखायी। जब वह सहमत-सा हुआ, तो सेल्ससत्य ने कहा - “पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिये, हम लोन दिलवा देंगे। कस्टमर ने कहा – ओके।”

कस्टमर ने लोन के पेपर पर मज़े-मज़े में बिना देखे साइन कर दिये। यह सोचकर कि एक रुपया का और सौ रुपये का लोन तो चाहे जब चुका दूंगा। पर जब उसे फाँसू बैंक के सेल्समैन ने बताया - “जी आपकी महीने की किश्त चार हज़ार रुपये बनी है, जो आपको पच्चीस महीने तक देनी होगी। आप सारे दस्तावेज़ों पर साइन कर चुके हैं। इसमें यह शर्त आपने मंज़ूर की है कि अगर आप लोन लेने से इन्कार करते हैं, तो भी आपको एक लाख रुपये प्रोसेसिंग फ़ीस और डिफ़ॉल्ट चार्ज के बतौर हमें देने होंगे।”

कस्टमर फंस चुका था, वो बोला - “पर आपने तो बताया था कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल।”
सेल्ससत्य इस पर बोला - “महाराज, मोबाइल की क़ीमत तो एक ही रुपया है। पर 9,999 रुपये उसकी एक्सेसरीज़ के हैं। हम मोबाइल की डोरी को छोड़कर हर आइटम को एक्सेसरीज़ मानते हैं। पहले आपको सिर्फ डोरी के पैसे बताये गये थे। ऐसी ही मोटरसाइकिल तो सिर्फ़ दस रुपये की है। पर बाक़ी की रकम हम आफ़्टर सेल्स सर्विस के लिए लेते हैं।”

एक लाख रुपये डिफ़ॉल्ट फ़ीस चुकाने के बजाय कस्टमर ने बेहतर समझा कि एक रुपये का मोबाइल और दस रुपये की मोटरसाइकिल ले ली जाये। यह पूरा कांड देखकर फ़ेयरप्राइज़ समझ गया और सेल्ससत्य से बोला - “सर अब से मैं भी कार सौ रुपये की बेचा करुंगा।”

इन कहानियों से हमें निम्न शिक्षाएँ मिलती हैं -

1. बेचो, बेचो। हर सेल्समैन को तमाम बाबाओं को फ़ॉलो करना चाहिए। जो हर तरह का आइटम बेचने पर उतारु हैं। जिनके पास बंदे मोक्ष लेने जाते हैं और हर्बल शैंपू लेकर लौटते हैं।
2. समझदार सेल्समैन हेलीकॉप्टर भी सौ रुपये में बेचता है।

सावधान - आलोक पुराणिक! प्रपंचतंत्र को प्रकाशित करने का अधिकार सिर्फ़ “मस्ती की बस्ती” को है। किसी और ब्लॉग, यहाँ तक कि अपने ब्लॉग पर भी प्रकाशित किया तो कार्रवाई हो सकती है।

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गुरुवार, 28 जून, 2007

प्रपंचतंत्र : ऐबों के सुपरिणाम की कहानी

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक की प्रपञ्चतन्त्र शृंखला का व्यंग्य - "ऐबों के सुपरिणाम की कहानी"।



जंगलपुरम् नाम शहर में तमाम कंपनियों के हेडक्वार्टर थे। हेडक्वार्टर में होता यह था जो कि भी अपने बास को क्वार्टर पहुंचाया करता था, वह हेड हो जाया करता था। इस तरह से कई बंदे प्रोग्रेस की राह पर आगे बढ़ रहे थे।

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में शेर सिंह नाम का बास था, उसके दो जूनियर थे। एक का नाम था सियार सिंह और दूसरे का नाम था टाइगरप्रसाद। टाइगरप्रसाद दूर के रिश्ते के हिसाब से शेर सिंह का रिश्तेदार लगता था। टाइगरप्रसाद अपने नाम के अनुरुप गुणों से युक्त था। वह हमेशा सच बोलता था। वह सिगरेट, शऱाब से परहेज करता था। कैबरे-डिस्को से दूर रहता था। और तो और, वह झूठ तक नहीं बोलता था।

सियार सिंह मौके की नजाकत समझता था और तदनुरुप आचरण करता था। दो अक्तूबर यानी गांधी जयंती वाले दिन वह सत्य और नैतिकता पर आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार पाया करता था। पर इस पुरस्कार से प्राप्त राशि से वह निर्णायकों को क्वार्टर या अद्धा पिलाया करता था। इस तरह से जब सत्य में फायदा होता था, तो वह सत्य–सत्य करने लगता था। जब उसे लगता था कि फायदा अन्य गतिविधियों में है, तो वह अन्य गतिविधियों पर उतर जाता था।

उसका मानना था कि गतिशीलता में ही जीवन है। सवाल सत्संग का नहीं है, सवाल कुसंग का नहीं है। सवाल फायदे के संग का है। सियार सिंह ने तमाम संतों के प्रवचन स्थलों पर कैसेटों-किताबों के स्टाल लगाकर भी कमाया था और दारु की ब्लेक करके भी कमाया था। सियार सिंह कैबरे के ठिकानों को भी जानता था और यह भी जानता था कि शहर के श्रेष्ठ मंदिर कहां पर है। इस तरह से चौतरफा कार्रवाई करके वह प्रसन्न रहा करता था।

टाइगरप्रसाद का मामला एकतरफा था। वह सिर्फ और सिर्फ सत्य नैतिकता की बात करता था और अपने बास शेर सिंह को भी इसी तरह की बातें बताया करता था। शेर सिंह टाइगरप्रसाद से थोड़ा खुटका वैसे भी खाया करते थे क्योंकि वह जानते थे कि रिश्तेदारों से भले की उम्मीद कुछ इस तरह की है, जैसे गंजों के मुहल्ले में कोई कंघे की दुकान से मुनाफा कमाने की उम्मीद करे।

खैर, साहब कंपनी बहुराष्ट्रीय थी। रुस और ब्रिटेन नामक देशों से दो प्रतिनिधिमंडल आये। दोनों के हाथों में करोड़ों के आर्डर थे। शेर सिंह ने एक डेलीगेशन को मैनेज करने का जिम्मा टाइगर प्रसाद को सौंपा और दूसरे को मैनेज करने का जिम्मा सियार सिंह को सौंपा।

रुस वाले प्रतिनिधिमंडल को भारतीयता से परिचित कराने के उद्देश्य से टाइगरप्रसाद ने दिन में उन्हे तमाम मंदिरों का दौरा कराया और शाम को उन्हे वो कीर्तन में ले गया।
अगले दिन रुस वालों को टाइगरप्रसाद एक लोकल बाबा के प्रवचन सुनवाने ले गया। रुस वाले बोर हो गये और तीन दिन में टाइगर प्रसाद की कंपनी से फूट लिये और फिर कभी नहीं पलटे।

उधर सियार सिंह ने किया यह कि दिन में तो उसने ब्रिटेन वालों को मंदिर दिखाये। पर शाम होते होते सियार सिंह ने विदेशी अफसरों से कहा - भारतीय संस्कृति समग्रता की संस्कृति है। इसमें अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की बात हमारी संस्कृति करती है। इसलिए धर्म के बाद काम और अर्थ की बात करनी भी जरुरी है। अंगरेज समझ नहीं पाये। सियार सिंह फिर अंगरेज अफसरों को एक डिस्को में ले गया, जहां बहुत ही शानदार कैबरे नृत्य हो रहे थे। अंगरेज बम बम हो गये। फिर अति ही सुंदर सुरा अंगरेज अफसरों को पेश की गयी। अंगरेज अफसर घबराये, बोले, इट इज रांग।

सियार सिंह बोले - देखिये गलत बात तब होती, जब यह शऱाब होती। ना, यह तो अमृततुल्य प्रसाद है। भारत में कई देवताओं को इसे बतौर प्रसाद चढ़ाया जाता है और हमारे यहां कहा जाता है, अतिथि देवो भव। अर्थात अतिथि देवता होता है। आप हमारे देवता है, आपको अगर हमने यह प्रसाद नहीं चढ़ाया, तो हम पर पाप लगेगा। इस पाप का भागी होने से बेहतर है कि होटल की पांचवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर लूं। मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं क्योंकि मुझे आप मेरे धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं -ऐसा कहता हुआ सियारसिंह छत की सीढ़ियों की ओर लपका।

अंगरेज अफसरों ने घबराकर उसे रोका और फिर अंगरेज दारु गटक गये। तत्पश्चात सियार सिंह ने कहा अर्थ को हमारे यहां बहुत बड़ा पुरुषार्थ माना गया है, इसलिए आपको पचास हजार रुपये का अर्थ पेशगी मंजूर करना पड़ेगा, बाकी का दस परसेंट हम आपको आर्डर मिलने के बाद दे देंगे। प्लीज अर्थ को स्वीकार कर लीजिये। वरना इसका मतलब होगा कि आप मुझे मेरे धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं - सियार सिंह ने फिर कहा। इस बार एक अंगरेज अफसर अपराध भावना से भरकर बोला - बट यह तो रिश्वत है।

“नहीं यह रिश्वत नहीं है, यह तो पुरुषार्थ है जो आप कर रहे हैं। अर्थ का पुरुषार्थ। पैसा हाथ का मैल है। समझिये कि हम अपना मैल आपको दे रहे हैं। आप तो हमें कृतार्थ कर रहे है कि हम से मैल स्वीकार कर रहे हैं। अगर आप ऐसा नहीं करेंगे, तो मैं समझूंगा कि आप हमे अपने धर्म का पालन नहीं करने दे रहे हैं” - सियारसिंह ने कहा। अंगरेज धर्म का पालन करने पर विवश हो गये।

अंगरेज अफसरों ने वापस जाते ही पचास करोड़ के आर्डर दिलवाये। रुसी अफसरों ने वापस जाते ही शेर सिंह को डांटा कि आपने जो आदमी हमें मैनेज करने के लिए रखा था, वह बहुत ही बोरिंग था। सिर्फ सत्य, नैतिकता की बातें करता था।

शेर सिंह ने टाइगरप्रसाद को नौकरी से डिसमिस कर दिया और सियार सिंह का प्रमोशन हो गया। तत्पश्चात इंस्टीट्यूट आफ बिजनेस ग्रोथ में रिश्वत देने के तरीके-विषय भाषण देते हुए सियार सिंह ने कहा -

1- सवाल सत्संग या कुसंग के बीच चुनने का नहीं है। सच यह है कि सत्संग से नोट मिलें, तो सत्संग करना चाहिए और कुसंग से नोट मिलें, तो कुंसंग कर लेना चाहिए। असली सवाल नोटों के संग का है।
2- रिश्वत को रिश्वत की तरह से नहीं देना चाहिए। उसे इस तरह से देना चाहिए मानो आप अपने धर्म का पालन कर रहे हैं और लेने वाला स्वीकार करके अपने धर्म का पालन कर रहा है।
3- तमाम किस्म के ऐबों को फिलोसोफिकल जाम पहना दिया जाये, तो मामला बहुत आसान हो जाता है।
4- बदमाश किस्म के अफसर सिर्फ इंडिया में ही नहीं होते, रुस और ब्रिटेन में भी पाये जाते हैं।

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गुरुवार, 31 मई, 2007

आलोक पुराणिक का व्यंग्य : ई-शि और ताज सिंड्रोम

Satirist Alok Puranikआलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक का व्यंग्य दफ़्तरों के लिए इजाद किए गए ख़ास जुमलों पर।



दफ़्तर में काम करने वाले याद नहीं रहते, क़िस्से सुनाने वाले याद रहते हैं। दफ़्तर में जमकर मेहनत करने वाले याद नहीं रहते, जुमलेबाज़ी करने वाले याद रहते हैं। सो वक़्त का तकाज़ा है कि सही से, नये से जुमले पेश किये जायें। सो दफ़्तरार्थियों के लिए कतिपय नये टाइप के जुमले इस प्रकार हैं।

जुमला नंबर वन - ई-शि

ई-शि कर दिया ना।
अरे ई-शि नहीं किया तो बताओ कि कैसे एक्शन किया जा सकता है।

ई-शि समझे ना? नहीं समझे तो समझिये कि इस दौर में माडर्न होने के लिए हर बात के आगे ई लगाना लाज़मी है। जैसे ई-गर्वर्नैंस, ई-मेल,ई-चेकिंग, ई-चैट, ई-चमचागिरी, ई-गपशप।

समझे कि नहीं ई का जलवा। समझिये, यूँ समझिये जैसे आपने किसी सरकारी दफ़्तर में किसी काम के लिए अप्लाई किया, उस पर बाबू ने लिखा - नौट यानी एनओटी एक्सेप्टेड यानी नामंज़ूर। इसके बाद आप एनओटी में एक ई और लगा दीजिये यानी नोट करेंसी वाला नोट। आपकी एप्लीकेशन फ़ौरन मंज़ूर हो जायेगी।

यानी ई को पहले लगाइए या बाद में, झक्कास रिजल्ट देता है। सो साहब ई-शि किया या नहीं? यानी ई-शिकायत की या नहीं। किसी को कोई भी प्राबलम हो, वह कोई शिकायत दर्ज कराना चाहता हो, उसे कहिए कि ई-शि कीजिये यानी ई-मेल के ज़रिये शिकायत कीजिये। यह व्याख्यान दीजिये कि क्योंकि हर शिकायत वाया ई-मेल करना बहुत ज़रुरी है। ई-शि नहीं की, बिल गेट्स बुरा मान जायेंगे। बिल गेट्स बुरा मान गये, तो बहुत दिक़्क़त हो जायेगी। ख़ैर साहब-ई-शि के फायदे इस प्रकार हैं-

1- ई-शि से आधी शिकायतें खुद-ब-खुद ख़त्म हो जाती हैं।
एक ज़माने में मैं जब एक दफ़्तर में काम किया करता था, तो जूनियर आते थे, पैन दे दीजिये, पेंसिल दे दीजिये, काग़ज़ दिलवाईये। स्टेशनरी दिलवाइए। मैंने नियम बनाया कि ई-शि कीजिये, ई-मेल के ज़रिये अपनी प्राबलम बताइए। आधे से ज़्यादा लोग ई-मेल की ज़हमत उठाने के बजाय अपनी जेब से ही पेन-पेंसिल लाने लगे।

बाकी बचे आधे ई-शि कर भी देते थे, तो मैं तीन दिन तक टहलाया करता था कि मुझे आपका ई-मेल मिला नहीं, शायद कंप्यूटर का सर्वर डाऊन है। सर्वर डाऊन है, यह बहाना एक हफ़्ते तक खींचा जा सकता है। बचे आधे में से आधे इस एक हफ़्ते में अपनी जेब से पैन-पेंसिल ख़रीद कर ले आते थे। इसके बाद भी जो बंदे पीछा नहीं छोड़ते थे, वो तो दफ़्तर के पैन-पेंसिल के हक़दार थे ही। ई-शि से दफ़्तर का बहुत ख़र्च बचने लगा।

2- ई-शि से दफ़्तर में पालिटिक्स बहुत कम हो जाती है। एक ज़माने में मैं जब एक दफ़्तर में काम किया करता था, तो शर्माजी वर्माजी के ख़िलाफ़ कुछ कहते थे और वर्माजी शर्माजी के ख़िलाफ़ कुछ कहते थे। मैंने नियम बना दिया कि ऑफ़ दि रिकॉर्ड पॉलिटिक्स नहीं होगी। जो भी होगा, ई-शि के ज़रिये होगा। वर्माजी ई-मेल के जरिये शर्माजी के बारे में बतायेंगे। ई-शि के ज़रिये लोगों ने पालिटिक्स करना छोड़ दिया। दफ्तर में बहुत शांति हो गयी।

3- ई-शि से एक बड़ा फ़ायदा यह होता है कि बास के लिए पालिटिक्स करना बहुत आसान हो जाता है। अब बास जिस कर्मचारी की छवि चमकाना चाहता है, उसके बारे में मीटिंग में सबके सामने कह सकता है कि देखिये इस कर्मचारी ने नयी तकनीक को कैसे आत्मसात किया है। हर बात यह नयी तकनीक के ज़रिये ही कहता है। ऐसी ही कर्मचारियों के बूते कंपनी का नव-निर्माण हो सकता है।

और ई-शि का इस्तेमाल उन कर्मचारियों के खिलाफ भी हो सकता है, जिनसे बास खुंदकायमान हो। जैसे सबके सामने मीटिंग में यह कहा जा सकता है कि देखिये, कैसे वेस्ट हो रही है नयी तकनीक। जिस तकनीक के ज़रिये गंभीर चिंतन होना चाहिए था। गंभीर बातें होनी चाहिए थीं, उसके ज़रिये हमारे कर्मचारी पैन, पेंसिल मांगते हैं। धिक्कार है हम सब पर। हाय बिल गेट्स हम पर हँसता होगा रे।

जुमला नंबर टू - ताज सिंड्रोम

जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि कसे हुए जुमले सबको याद रहते हैं। ताज सिंड्रोम एक नया जुमला है, जो इस ख़ाकसार ने कल ही ईजाद किया है। इसे दफ़्तर में आप अपने प्रतिद्वंदियों को उखाड़ने और अपने बंदों को जमाने के लिए कर सकते हैं। आजकल हर दफ़्तर में पालिटिक्स इतनी नीरस टाइप हो गयी है कि बास लोग उससे परेशान हो गये हैं। आप अपने प्रतिद्वंदी को उखाड़ने के लिए शुरुआत कुछ इस तरह से करें, तो बास निश्चय ही आपको सुनेंगे। मान लीजिये कि आपके प्रतिद्वंदी मिस्टर शर्मा हैं। आप बास से बात की शुरुआत कुछ इस तरह से करें-

बास मिस्टर शर्मा आजकल ताज सिंड्रोम से ग्रस्त हैं।
बास पक्के तौर पर पूछेंगे-ये ताज सिंड्रोम क्या होता है।

ताज सिंड्रोम का मतलब यही होता है कि जिन चीज़ों की ज़रुरत नहीं है, उन पर तो बहुत पैसा ख़र्च किया जाये। और जिनकी ज़रुरत है, उन पर ध्यान नहीं दिया जाये। अब देखिये शाहजहाँ ने जब ताजमहल बनवाया था, तब आगरा में अकाल पड़ा हुआ था। इसके बावजूद शाहजहाँ ने ताजमहल में मोटी रकम लगा दी। इसीलिए तो औरंगजेब नाराज़ हुआ था शाहजहाँ से। मिस्टर शर्मा ने दफ़्तर में हर महीने क्लर्कों को एक के बजाय दो पैन देना शुरु कर दिया है। बताइए ये ताज सिंड्रोम है कि नहीं।
बास आपके ताज सिंड्रोम में डूब कर रह जायेगा।

और अगर किसी को जमाना है, तो ताज सिंड्रोम का इस्तेमाल इस तरह से कीजिये। मान लीजिये आपको मिस्टर वर्मा को जमाना है। बास के पास जाकर कहिये देखिये मिस्टर वर्मा आजकल ताज सिंड्रोम के लपेटे में आ गये हैं। अच्छा है।
बास पूछेगा- ये क्या होता है।
अरे ताज सिंड्रोम नहीं जानते, कैलीफ़ोर्निया जर्नल आफ मैनेजमेंट में इस पर पूरा लेख है। इसमें बंदा बहुत मेहनत से, बहुत लगन से किसी चीज को संवारता है। निखारता है। समय की चिंता नहीं करता है। वर्माजी भी आजकर नये प्रोजेक्ट में ऐसी ही लगे हुए हैं, जैसे ताजमहल बना रहे हों।

समझे कि नहीं, ताज सिंड्रोम? तो लीजिये ई-शि और ताज सिंड्रोम से हमें निम्नलिखित शिक्षाएँ मिलती हैं -
1- काम करने वाले नहीं, धाँसू जुमले देने वाले याद किये जाते हैं।
2- ई-शि से शिकायतें कम हो जाती हैं, दफ़्तर का ख़र्च कम हो जाता है।
3- ताज सिंड्रोम से आप किसी को भी जमा सकते हैं, किसी को भी उखाड़ सकते हैं।

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रविवार, 6 मई, 2007

आलोक पुराणिक का व्यंग्य : मैं मूल्यवान लेखक हूँ

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। इस बार पढ़िए आलोक पुराणिक का ज़बरदस्त आत्मसाक्षात्कार, जिसमें वे बता रहे हैं अपने मूल्यवान लेखक होने की वजह।



ब्रह्मांड के सबसे धांसू रचनाकार आलोक पुराणिक (आलोकजी ब्रह्मांड के सबसे धांसू रचनाकार कैसे हैं, यह जानने के लिए प्रतीक्षा करें आलोकजी की आगामी पुस्तक की - स्मार्ट झूठ कैसे बोलें। इसमें आलोकजी ने विस्तार से समझाया है कि उन्हे ब्रह्मांड का सबसे धांसू रचनाकार कैसे माना गया है)

आलोक पुराणिक ने काफी कुछ लेखन बर्नार्ड शा, आस्कर वाइल्ड के नाम से भी किया है। दरअसल पूर्वजन्म में आलोक पुराणिक यही थे। जिन्हे इस बयान पर आपत्ति हो, वे सबूत पेश करें कि आलोकजी ये नहीं थे।

आलोक पुराणिक पिछले क़रीब बीस सालों से पत्रकारिता की और दस सालों से व्यंग्य लिख कर हिंदी व्यंग्य की सेवा कर रहे थे। इससे पहले अपनी उम्र के क़रीब तीस साल आलोकजी ने व्यंग्य न लिखकर भी हिंदी व्यंग्य सेवा की है, ऐसा कई जानकार लोग बताते हैं। बल्कि कई तो यह भी मानते हैं कि न लिखकर जो सेवा उन्होनें की थी, वह ज़्यादा सार्थक थी।

आलोक पुराणिक का यह आत्मसाक्षात्कार है।

सवाल- आप व्यंग्यकार कैसे बने?
जवाब- देखिये, सबसे पहले मैंने कविता के इलाक़े में ज़ोर आज़माया। हिंदी के एक वरिष्ठ कवि एक जगह कविता पढ़ रहे थे -

चिड़िया से उठता है धुआँ
धुएँ की एक लकीर से निकलती हो तुम
तुम हम, हम तुम,
तुम ही तुम तुम ही तुम

बाद में एक आलोचक ने बताया कि यह तो विकट कालजयी कविता है। इसमें समकालीन मसलों से लेकर प्रेम के आयाम मौजूद हैं। धुएँ की एक लकीर से निकलती हो तुम, यानी कवि अपनी प्रेमिका को संबोधित कर रहा है - हे प्रिये तुम धुएँ की लकीर से निकलती हो। यानी भारी प्रदूषण हैं, कवि इस तरह से समकालीन संदर्भों से जुड़ रहा है। स्त्री विमर्श भी है इसमें, धुआँ विमर्श भी है। कविता की आख़िरी पंक्ति है - तुम ही तुम यानी कवि उसके इश्क़ में डूबने की बात कर रहा है, जो शरीरी प्रेम से परे है। यह प्रेम की आख़िरी पराकाष्ठा है।

आलोचक की इस व्याख्या से मुझे लगा कि मेरे अंदर भी भारी कवि बनने के लक्षण हैं। और मैं कवि बन गया, बहूत हिट कविताएँ लिखीं (हिट उन आलोचक की नज़र में, यह तब की बात है जब मैं आलोचकजी को अपने वाहन पर उनके इच्छित स्थानों पर ले जाया करता था, उनके विरोधियों के ख़िलाफ़ प्रचार किया करता था आदि आदि)। बाद में मेरी व्यस्तता अन्यत्र बढ़ने लगी, और मैं कविता को ज़्यादा और आलोचक महोदय को कम समय देने लगा, तो मैंने पाया कि आलोचक महोदय ने यह कहना शुरु कर दिया कि अब तुम्हारी कविता में वह बात नहीं रही।

सो साहब कविता छूट गयी। फिर मैं शायरी की तरफ मुड़ा। शायरी में उस्ताद बनाने पड़ते हैं। मेरे उस्ताद ने कहा - बेटे पहले कुछ पढ़-लिख कर आओ। इससे आशय मैंने यह लगाया कि औरों की पढ़ो और फिर लिखो। साहब दो ही दिनों बाद मैं पहुँच गया कुछ नये शेर लेकर -

जिनके देखे से आ जाती है मुँह पर रौनक, वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
देखिये पाते हैं उश्शाक बुतों से क्या फ़ैज़, एक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है

उस्ताद कुछ चौंक कर बोले - ये शेर तो लगता है कि चोरी का है।
मैंने कहा - हो सकता है कि ग़ालिब ने मेरा चुरा लिया हो। मैं भी ठीक यही बात कहना चाहता था, उन्होने पहले ही मेरी बात चुराकर कह दी।

उस्ताद बिगड़े और बोले - क्या मतलब? ग़ालिब तुमसे बहुत पहले पैदा हुए हैं, वो चोरी कैसे कर सकते हैं?
मैंने समझाया कि ये क्या बात हुई कि जो मुझसे पहले पैदा हुए हैं, वो चोरी नहीं कर सकते। एक से एक नायाब चोर मुझसे पहले पैदा हुए हैं। नटवरलाल मुझसे पहले पैदा हुए हैं।

उस्ताद बोले - तुम बात बिलकुल लौजिकल कर रहे हो। पर उर्दू वाले इतने समझदार नहीं है कि तुम्हारा लाजिक समझ पायें।
सो साहब इस तरह से शेर कहना छूटा।

फिर एक दिन मैं एक अख़बार के दफ़्तर में बैठा था। एक मित्र झींकते हुए बोले - व्यंग्य के नाम पर इधर कूड़ा भेज रहे हैं लोग। छापना पडता है। मैंने इजाज़त मांगी कि अगर वह चाहें, तो कुछ फ़्रेश क़िस्म का, अपनी तरह का कूड़ा मैं भी देना शुरु करुँ। वह सहमत हो गये। सो साहब चल निकला मामला, मैं कूड़ा समझ कर भेजता रहा, वह व्यंग्य समझकर छापते रहे। जब तक बाक़ी के व्यंग्यकार गुटबाज़ी करके मुझे उखाड़ने की जुगाड़ कर पाते, तब तक मैं जम चुका था।

सवाल- लोग कहते हैं कि आप सिर्फ़ रुपयों के लिखते हैं।
जवाब- ग़लत कहते हैं कि मैं सिर्फ़ रुपयों के लिए लिखता हूँ। मौक़ा दें, मैं डालरों और पौंडों के लिए भी लिखना चाहता हूँ।

सवाल- आप अख़बारों के लिए लिखते हैं, पत्रिकाओं औऱ किताबों की शक्ल में आपका योगदान कम है, क्यों?
जवाब- मैं जनता का लेखक हूँ। जनता के काम आने वाला लेखक हूँ। ये जो आप केले ख़रीद कर लाये हैं, इनके लिफ़ाफ़ों का अख़बार देखिये। इसमें मेरा लेख है। जनता के काम आना और किसे कहते हैं जी। अभी भोपाल जा रहा था, एक अख़बार ख़रीदा। एक अख़बार में मेरा व्यंग्य था। कुछ देर बाद सामने की बर्थ की महिला के छोटे बच्चे ने लघुशंका कर दी। महिला ने मुझसे कहा कि अख़बार तो आप पढ़ ही चुके हैं, लाइए मैं इसे इस्तेमाल कर लूँ। व्यंग्यकार समाज की गंदगी साफ़ करता है, इस मुहावरे को सिर्फ़ अख़बार में लिखकर ही सार्थक किया जा सकता है। ऐसा गौरव पत्रिकाओ, और किताबों के लेखकों को नही मिलता। फिर मैं मूल्यवान लेखक हूँ, अख़बार की रद्दी छ: रुपये किलो बिकती है। पत्रिकाओं की रद्दी चार रुपये किलो बिकती है। किताबों की मुश्किल से दो रुपये किलो बिकती है। मैंने पहले ही साफ़ किया है कि मैं मूल्यवान लेखक हूँ।

सवाल- आपको लिखने की प्रेरणा कहां से मिलती है?
जवाब- प्रणव जैन, बलीराम सेकसरिया और रानू श्रीवास्तव से।

सवाल- पर इन लोगों के नाम बतौर लेखक तो मैंने नहीं सुने।
जवाब- मैंने भी नहीं सुने, क्योंकि ये लेखक हैं ही नहीं। ये उन अख़बारों के एकाउटेंट हैं, जो मेरे लेखों के पारिश्रमिक के चेक बनाते हैं। सारी प्रेरणा यहीं से मिलती है।

सवाल- अपने समकालीन व्यंग्यकारों के बारे में क्या कहना चाहते हैं।
जवाब- सारे बहुत ही बढ़िया हैं। वाह-वाह क्या कहने।

सवाल- सब कुछ बढ़िया ही है, कुछ भी ख़राब नहीं है क्या?
जवाब- देखिये, व्यंग्यकार बहुत तरह के हैं। एक तो जिनके लेख चलते हैं। दूसरे, जिनके स्थापित पुरस्कार, सम्मान वगैरह बाज़ार में चलते हैं। कईयों का कुछ नहीं चलता, पर वे तमाम किस्म की कमेटियों में चलते हैं, वे पुरस्कार, सम्मान, फ़ैलोशिप वगैरह के फ़ैसले करते हैं। मुझे अभी तक कोई पुरस्कार वगैरह नहीं मिला है। अभी बहुत पुरस्कार झटकने हैं। किसी को बुरा क्यों बताना। इस धरती पर सभी कुछ अपनी जगह ठीक है। मैं कौन हूँ किसी को बुरा बताने वाला। ना काहू से बैर के फ़्ण्डे पर चल कर ही सर्वत्र सैटिंग कर पाता है। वही मुझे करनी है।

सवाल- आपको अभी तक कोई पुरस्कार कोई नहीं मिला?
जवाब- देखिये इस संबंध में थोड़ा प्रोफ़ेशनल हूँ। पुरस्कार खेंचों प्रक्रिया में कास्ट-बेनिफ़िट एनालिसिस करता हूँ। अभी दिल्ली में एक अकादमी में ग्यारह हज़ार रुपये के पुरस्कार के लिए चक्कर चलाने के लिए किसी ने प्रोत्साहित किया। मैंने कैलकुलेशन किया कि दो निर्णायकों को सैट करने में छह शाम, ट्रांसपोर्ट ख़र्च, और महंगी वाली शराब की क़रीब बाईस बोतलें ख़र्च होंगी। ख़र्चा ज़्यादा हुआ जा रहा था, पुरस्कार कम का था। सो मैंने खट से बयान दिया कि मैं ऐसा लेखक हूँ कि जो अपनी प्रतिबद्धता को पुरस्कार के लिए नहीं बेचता। हाँ यह पुरस्कार अगर ज़्यादा रक़म का होता, तो मैं बयान देता कि पुरस्कार से ही तो प्रतिभा का मूल्यांकन होता है। एकाध लाख का पुरस्कार हो, तब मारधाड़ की जाये। कॉस्ट रिकवर हो जाये, कुछ मुनाफ़ा हो जाये, तब पुरस्कार में ध्यान लगाना चाहिए।

सवाल- तो क्या मतलब आपके हिसाब से ये सारे पुरस्कार रैकेटबाज़ी के तहत दिये जाते हैं?
जवाब- जो पुरस्कार मुझे दिये जायेंगे, वे इस बयान के अपवाद होंगे।

सवाल- आप इतनी गुंताड़ेबाज़ी करने की सोचते हैं। यह तो लेखकीय संवेदना नहीं है।
जवाब- देखिये, लेखन तीन प्रकार का होता है। कालजयी, शालजयी और मालजयी। कालजयी लेखन यह होता है - जैसे कोई लिखे कि नींबू का कब्ज़ निवारण में योगदान, ननद से संबंध कैसे सुधारें, कपड़ों पर लगे दाग़ों को कैसे छुड़ायें। ये लेखन कालजीय लेखन है। अक़बर के टाइम में भी इस तरह के लेखन की ज़रुरत थी और अब से पाँच हज़ार सालों बाद भी इस तरह के लेखन की डिमाण्ड होगी। दूसरे तरह का लेखन होता है शालजयी। इस किस्म के लेखन वाले लेखक साल छह महीनों में कोई बुलाकर शाल दे देता है। तीसरे किस्म का लेखन होता है मालजयी लेखन। सब तरफ से माल आने दो। फैलोशिप आने दो। पुरस्कार आने दो। अपनी दिलचस्पी मालजयी लेखन में है।

सवाल- अपने को किस स्तर का लेखक मानते हैं?
जवाब- कबीरदास, सूरदास और तुलसीदास के स्तर का। इनमें और मुझमें बहुत समानता है। इनमें से किसी को साहित्य का नोबल पुरस्कार नहीं मिला है। मुझे भी अभी तक नहीं मिला है। अगर मिल गया, तो फिर मेरा स्तर गिर जायेगा।

सवाब- आप पढ़ते क्या हैं?
जवाब- पढऩे की क्या ज़रुरत है। पढ़ने में लगा रह जाऊँगा, तो लिखूंगा कब।

सवाल- प्रशंसकों के लिए क्या संदेश है?
जवाब- देखिये मैं ऐसे ही किसी फ़ोकटी में प्रशंसक नहीं मानता। प्रशंसकों के लिए संदेश यह है कि अगर कोई आलोक पुराणिक राहत समिति या आलोक पुराणिक ग़रीबी निवारण समिति या आलोक पुराणिक कैंसर सहायतार्थ कोष में आपसे रुपये मांगे तो अवश्य दें। ऐसी कई समितियाँ मेरे निर्देशन में काम करती हैं। और तो और आलोक पुराणिक मृत्योपरांत परिवार सहायता समिति वाले आपसे चंदा मांगने आयें, तो उन्हे भी भरपूर योगदान दें।

पर प्रशंसक होने के लिए इतना भर काफी नहीं है। इस सारी चंदेबाज़ी के बाद अगर मैं आपको कहीं जीवित, स्वस्थ और सानंद दिख जाऊं, फिर भी आप नाराज न हों, और दोबारा आलोक पुराणिक सहायतार्थ कोष में योगदान देने को तत्पर दिखें, तब ही मानूंगा कि आप मेरे प्रशंसक हैं।

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रविवार, 22 अप्रैल, 2007

भूत मैनेजमेंट, नाग अरेंजमेंट

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं।




इधर मामला टेंशनात्मक हो गया है।
हर बच्चा टीवी पत्रकार बनना चाहता है। पर यह उन्हे यह समझाना मुश्किल है कि अब टीवी पर पत्रकार का स्कोप उतना नहीं है, जितना नाग-नागिन, भूत-प्रेतों का है। अगर आप राखी सावंत या राजू श्रीवास्तव नही हैं, तो टीवी न्यूज में कैरियर मुश्किल है, यह बात कई समझाने की कोशिश करता हूं। बच्चे नहीं समझते। पब्लिक की डिमांड पर इस खाकसार ने एक नया मीडिया कोर्स डिजाइन किया है। इच्छुक प्रवेश के लिए 1 लाख रुपये का ड्राफ्ट भिजवायें।
कोर्स में पांच पेपर होंगे।
पेपर नंबर एक भूत-चुडैल मैनेजमेंट
यह पेपर इधर बहुत ही जरुरी हो गया है। इधर तमाम चैनल नौकरी देने से कहते हैं कि शमशान से कोई भूत पकड़ ला सकते हैं, तो आपकी नौकरी पक्की।
इस पेपर को पढ़ने के बाद कैंडीडेट इतनी काबलियत हासिल कर लेंगे कि वह कह सकें –अजी शमशान से क्या लाना, मैं तो खुद भी भूत हूं।
इस पेपर को पढ़ाने के लिए शमशान के अघोरी बतौर गेस्ट लेक्चरर आयेंगे।
जिन कैंडीडेटों की फैमिली हिस्ट्री दिल की बीमारी की रही है, वे कृपया इस कोर्स में एडमीशन न लें।
यह पेपर प्रयोगात्मक रुप से पढ़ाया जायेगा, इसकी क्लास पुराने किलों, हवेलियों, श्मशान, कब्रिस्तान में ही होंगी। पेरेंट्स कृपया ध्यान दें, जो अपने बालक और बालिकाओं को रात के दो बजे शमशान में न भेज पायें, वे कृपया अपने बच्चों को इस कोर्स में न भेजें.
पेपर विवरण
भूतों के प्रकार, भूतों की परिभाषा, नये और पुराने भूतों के बीच अंतर
गांव के भूतों, शहरों और महानगरों के भूतों के टेस्ट में अंतर
कब्रिस्तान और शमशान के भूतों के धार्मिक और सांप्रदायिक अंतरों का विश्लेषण
भारतीय भूत और ग्लोबल भूत
भूतों के अफेयर, चुड़ैलों की स्टाइलें।
पेज थ्री चुड़ैलें
नोट-इस पेपर को पढ़ने वाले हर छात्र को सत्र के अंत मे एक भूत पकड़कर दिखाना होगा, औऱ उस भूत से तरह-तरह के काम कराने की महाऱथ हासिल करनी होगी।
-सजेस्टेड रीडिंग्स-
-भूत स्टाइल्स एंड प्रोफाइल्स-लेखक अघोरी टनटनानंद
-क्यूट चुड़ैलें-लाइव्स एंड हिस्ट्री-लेखक भूताशिकानंद
निम्नलिखित हिट टीवी कार्यक्रमों की विशेष केस स्टडी भी कोर्स का हिस्सा होंगी-
कातिल कब्रिस्तान, चौकन्नी चुड़ैल, मौत का धुआं, मुरदे की वारदात, मुरदा शहर, जिंदा कब्रिस्तान, श्मशान में पेज थ्री पार्टी, एनआरआई भूतों के लव अफेयर, ब्यूटीफुल चुड़ैलों के शातिर खेल।

पेपर नंबर दो-नाग मैनेजमेंट
चैनलों पर भूतों के बाद सबसे ज्यादा टीआरपी अब नागों की आ रही है। इस पेपर के जरिये बच्चों के बताया जायेगा कि इच्छाधारी नाग और गैर-इच्छाधारी नाग क्या होते हैं। इस पेपर को पढ़ने के बाद कैंडीडेट खुद भी इच्छाधारी नाग हो सकता है।
इस पेपर के प्रोफेसर विख्यात सपेरे ही होंगे।
छात्र और छात्राओं को सपेरों की ड्रेस पहनकर गांव-जंगलों में नागों की तलाश में जाना पड़ेगा।
जो पेरेंट्स अपने बालक और बालिकाओं को सपेरों की ड्रेस में नागों की तलाश में असम के जंगलों में भेजने में समर्थ नहीं हैं, वे कृपया अपने बच्चों को इस कोर्स में नहीं भेजे। पत्रकारिता बहुत मुश्किल काम है, यह बात ऐसे ही नहीं कही जाती।

पेपर विवरण-
नाग और नागिनों के प्रकार
अब तक नागिनों पर सारी फिल्में-विशेषत नगीना, नागिन( सारी), मैं तेरी दुश्मन तू दुश्मन तेरा, कोबरा, ब्लैक कोबरा, नागिन का डंक
नागों की टीवी में भूमिका
नागों के रंग-ढंग
नाग और टीआरपी
देशी और विदेशी नागिनें
नागों का मेकअप,
नागों को कैमराफ्रेंडली कैसे बनायें
नागों से इंटरव्यू में सावधानियां
इच्छाधारी नागों की समस्याएं
नागों से बातचीत(अगर आप खुद भी नाग हैं)
नागों से बातचीत(अगर आप नाग नहीं हैं)
सजेस्टेड रीडिंग्स-
नाग हिस्ट्री एंड फ्यूचर-स्वामी नागानंद
टीवी फ्रेंडली नाग-न्यू ट्रेंड्स एंड एनालिसिल-सपेरा नृत्यानंद
सत्र के अंत में हर छात्र और छात्रा को एक धांसू नाग या नागिन पकड़कर दिखाना होगा। उन छात्रों और छात्राओं को विशेष नंबर दिये जायेंगे, खुद ही इच्छाधारी बन पाने में समर्थ होंगे।

पेपर नंबर तीन- लतीफा प्रेजेंटेशन
नाग, भूत के बाद सबसे ज्यादा टीआरपी लतीफों की होती है।
हम कोशिश करेंगे कि प्रोफेसर राजू श्रीवास्तव, प्रोफेसर एहसान कुरैशी खुद इस पेपर को पढ़ाने के लिए हाजिर हों।
इस पेपर को पढ़ने के लिए छात्र-छात्राओं को ऐसी ड्रेस पहनकर आनी पड़ेगी, जिसे देखकर पब्लिक हंसे। जो पेरेंट्स ड्रेस सेंसिटिव हैं, वे अपने बच्चों को इस कोर्स के लिए ना भेजें।
पेपर विवरण
लतीफों का इतिहास,
अश्लील चुटुकलों का टीआरपी में योगदान
घटिया चुटकुलों की वैबसाइट
चुटकुलों को सुनाने की स्टाइलें
चुटकुला चिंतन कैसे करें
एसएमएस चुटकुला लेखन
सजेस्टेड रीडिंग्स-
घटिया चुटकुलों का धांसू प्रजेंटेशन-प्रोफेसर राजू श्रीवास्तव
उलटे-पुलटे चुटकुले-प्रोफेसर जसपाल भट्टी
स्टाइल में हंसाओं-प्रोफेसर राखी सावंत
सत्र के अंत में हर छात्र-छात्रा को पांच नये चुटकुलों को पेश करना होगा। सबसे ज्यादा घटिया चुटकुले बनाने वालों को विशेष अंक दिये जायेंगे।

पेपर नंबर चार-लव-क्राइम-डाका-ठगी स्टडीज
इस पेपर में वो आइटम पढ़ायें जायेंगे, जिनकी विकट डिमांड हैं।
पेपर का उद्देश्य यह है कि इस पेपर को पढ़ने के बाद बच्चे और बच्चियां वैसे हिट टीवी कार्यक्रम बनाने सीख जायें, जैसे अभी टीवी पर आ रहे हैं-यथा रात की वारदात, कोहरे के चेहरे, एक चाकू पांच सौ डाकू, कातिल बाथरुम, सन्नाटे की सनसनी आदि –आदि।
इस पेपर को पढ़ाने के लिए हमने सरकार से अनुरोध किया है कि वह जेल से कुछ ऐसे अपराधियों को रिहा करे, जो लव त्रिकोण, मर्डर, वगैहर के मामले में बंद हैं। प्रेम त्रिकोण की डिमांड सबसे ज्यादा है।
पेपर विवरण
प्रेम त्रिकोण-इतिहास और वर्तमान
ऐतिहासिक प्रेम त्रिकोण के मामले
प्रेम त्रिकोण के सारे कोण
यश चोपड़ा की सारी पुरानी फिल्मों की स्टडी जैसे कभी-कभी, दाग वगैरह
झूठ का प्रेम में योगदान
प्रेम औऱ ठगी का संबंध
ठग बनने की प्रक्रिया में प्रेम संबंधों का योगदान
चार्ल्स शोभराज के जीवन पर विशेष अध्ययन
हर्षद मेहता के जीवन की केस स्टडी
नटवरलाल की केस स्टडी

सजेस्टेज रीडिंग्स-सदी का महानायक चार्ल्स शोभराज-प्रोफेसर प्रेम ठगानंद
प्रेम के गेम्स- प्रोफेसर जोशो
सत्र के अंत में छात्रों और छात्राओं से उम्मीद की जायेगी कि वे कम से कम पांच चक्कर चला चुके होंगे। एक ही प्रेम में यकीन करने वाले परंपरागत संकीर्णमना पेरेंट्स अपने बच्चों को इस कोर्स में न भेजें। पत्रकारिता अत्यंत ही दुष्कर कार्य है, यह बात ऐसे ही नहीं कही जाती है।

पेपर नंबर पांच-सेलिब्रिटी स्टाइल्स
इसमें भी वह सब पढ़ाया जायेगा, जिसकी विकट डिमांड है।
यह पेपर पढ़ाने के लिए सेलिब्रिटीज और सेलिब्रिटाज आयेंगे।
पेपर विवरण-
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रिटीज का नाश्ता
सेलिब्रिटाज और सेलब्रिटीज का खाना
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रिटीज का डिनर
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रिटीज का मुस्कुराना
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रिटीज के लव अफेयर
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रटीज और क्राइम

नोट-इस कोर्स को करने के लिए छात्र और छात्राओं को सिर्फ और सिर्फ इन विषयों पर फोकस करना चाहिए। जो छात्र या छात्रा राजनीति, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र ऐसी किसी अगड़म-बगड़म चीजों को पढ़ता हुआ पाया जायेगा, उसे कान पकड़कर बाहर निकाल दिया जायेगा।
संपर्क करें-आलोक पुराणिक
स्कूल आफ न्यू मीडिया, ठग गली, चालूपुरम्, दिल्ली -11001420

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सोमवार, 9 अप्रैल, 2007

व्यंग्य : च्यवनप्राश इनक्वायरी कमीशन

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। आलोक जी ने यह व्यंग्य ख़ास तौर पर "मस्ती की बस्ती" के लिए लिखा है।



पवार बैठे हैं, चैपल आये हैं-
चैपल रिपोर्ट पेश कर रहे हैं-देखिये सर पूरी टीम कोच सर की नहीं,सिर्फ स्पांसर की सुनती है। कई प्लेयर तो ऐसे हैं कि उन्हे चाय पेश करो, तो पूछते हैं स्पांसर कौन। बनियान पहनने से पहले पूछते हैं स्पांसर कौन। अभी उस दिन एक सीनियर बैट्समैन बंगलादेश वाले मैच में, जब बैटिंग करके, सौरी जब बैटिंग नहीं करके आया, तो मैंने उससे बताया कि घर से फोन आय़ा था। आपकी पत्नी ने बहुत धांसू काम किया है, एक प्यारी सी बिटिया को जन्म दिया है। दो मिनट तो वो रहा साइलेंट और मौन, फिर पूछने लगा कि छोड़ो ये बताओ स्पांसर कौन। सर, अब मैं नहीं चला पाऊंगा।
शऱद पवार-देखिये ये अंदर की बात है, बाहर नही जानी चाहिए।
चैपल-सर आप भी क्या किसी एड के हिसाब से बोल रहे हैं।
शरद पवार मुस्कुराते हुए।

पवार और द्रविड़
पवार –प्राबलम क्या है। अब तुम लोगों के सामने नेक्स्ट टारगेट क्या है। कुछ सोचा, अगला कंपटीशन किससे होने वाला है।
द्रविड़- (शरमाते हुए)- जी अभी अपना कंपटीशन ऐश्वर्या राय से है।
पवार-व्हाट।
द्रविड़जी-जी बात यह है कि च्यवनप्राश, बिस्कुट, बनियान बहुत कर लिये। कोल्ड ड्रिंक के एड तो ऐश और हम साथ साथ करते हैं। पर क्या है कि ऐश को लिपस्टिक, आई लोशन, नेलपालिश के एड मिल जाते हैं। अभी क्या है, अभिषेक भईया से शादी के बाद ऐश कुछ कम एड करेगी, तो ये सब लिपस्टिक विपस्टिक के एड हम करेंगे ना। अभी तो हम फ्री भी हैं ना।

पवार, द्रविड़ और वेंगसरकर
पवार वेंगसरकर से-मुझे लगता है कि सहवाग का आर्डर चेंज करना चाहिए। उसको चेंज मांगता।
द्रविड़-जी बिलकुल चेंज मांगता है। अभी उसको दूध-कोल्ड ड्रिंक के एड छोड़कर टू मिनट्स नूडल्स के एड करने चाहिए।
पवार –क्यों।
द्रविड़-देखिये नया एड बहुत ईजी से बन जायेगा-नूडल्स वाले अपने एड में ये बतायें-बच्चे नूडल्स का पैकेट खोलें, उन्हे पानी में मिलायें। और देखें कि कब सहवाग बैटिंग के लिए जायें। जैसे ही सहवाग बैटिंग के लिए जायें, बच्चे नूडल्स गैस पर चढ़ाकर गैस जलायें। घड़ी देखने का जरुरत नहीं, जैसे ही सहवाग आऊट होकर वापस आयेंगे-समझिये आपके दो मिनट पूरे हो जायेंगे।
वेंगसरकर-नहीं प्राबलम है, इसमें तो हो सकता है गच्चा। सहवाग दो मिनट के बजाय एक ही मिनट में आऊट हो गये, तो नूडल्स तो रह जायेगा कच्चा। इसलिए नूडल्स को सहवाग के लेवल पर लाइए। और उन्हे दो नहीं सिर्फ एक मिनट पर रेडी करवाइए।

पवार, वेंगसरकर और द्रविड़
पवार-देखो, अपना परफारमेंस बहुत अच्छा है। क्रिकेट बोर्ड ने करोड़ों कमाया है।
द्रविड़-सर हम ये कह सकते हैं कि जो भी टीम वर्ल्ड कप जीते, उसे ही इंडियन टीम मान लिया जाये। सबको थमा देंगे, बीस-बीस करोड़।
पवार-पर मान लो कि आस्ट्रेलिया जीत जाये। उनके प्लेयर्स को हम कैसे इंडिया का कह दें, वो तो इंडिया के लिए खेलते नहीं।
वेंगसरकर-तो क्या आपको यह लगता है कि इंडियन प्लेयर इंडिया के लिए खेलते हैं। नहीं, वो किसी कोल्ड ड्रिंक के लिए खेलते हैं। किसी बनियान के लिए खेलते हैं।
पवार जोर से चीख कर-राइट, वर्ल्ड कप इंडिया लाने की तैयारी है, जो भी टीम जीते, वो ही हमारी है।

पवार, वेंगसरकर और द्रविड़
पवार-इस सिचुएशन के लिए कौन जिम्मेदार हो, बताओ।
द्रविड़-देखिये जिम्मेदारी का सवाल नेताओं से कोई नहीं पूछता, तो हमसे क्यों पूछ रहे हैं। हम आपसे पूछते हैं क्या कि आटे के भाव इतने बढ़ गये, कौन जिम्मेदार है।
पवार-राइट।
द्रविड़ –मेरे ख्याल से जिम्मेदारी च्यवनप्राश की है।
वेंगसरकर-व्हाट, च्यवप्राश कहां से आ गया। द्रविड़ तुमने तो सहवाग की सिफारिश की थी, च्यवनप्राश की नहीं।
द्रविड़-समझिये सर, सौरभ दादा समेत तमाम प्लेयर जिस च्यवनप्राश का एड करते हैं, वह घटिया है। असली च्यवनप्राश तो अमिताभ बच्चन ले गये। सर बताइए वह च्यवनप्राश खाकर साठ साल की उम्र में भी निशब्द अठारह बरस की कन्या को पटा रहे हैं और हम इत्ते च्यवनप्राश के बाद भी पब्लिक की गालियां खा रहे हैं।
पवार- ओ के राइट, मैं पार्लियामेंट में च्यवनप्राश इन्क्वायरी के लिए आल पार्टी कमेटी बनवा दूंगा।

- आलोक पुराणिक

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रविवार, 1 अप्रैल, 2007

पागल हैं, मूर्ख नहीं

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैंआलोक जी ने यह लेख ख़ासतौर मूर्ख दिवस के मौक़े पर "मस्ती की बस्ती" के लिए लिखा है



क़िस्सा
यूँ है कि देश के पहले प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु एक बार आगरा से होकर गुज़र रहे थे। आगरा के विख्यात मानसिक चिकित्सालय (जिसे तब पागलखाना कहा जाता था) के सामने नेहरुजी की कार ख़राब हो गयी। ख़राब यूँ हुई कि कार का एक पहिया ही निकल गया। पहिये के चारों पेंच निकल गये थे। रात एक बजे का वक़्त। नेहरुजी को दिल्ली पहुँचना ज़रुरी थी। उस वक़्त कोई मिस्त्री उपलब्ध नहीं। तब ही मानसिक चिकित्सालय के कुछ रोगियों ने नेहरुजी की समस्या देखी और दिमाग लड़ाया और सोल्यूशन बताया कि आप बचे हुए तीनों पहियों से एक-एक पेंच खोल लीजिये और चौथे पहिये को तीन पेंचों पर फ़िट कर दीजिये। चारों पहिये तीन-तीन पेंचों पर चलेंगे, दिल्ली जाकर मामला पूरा चौकस करवा लीजिये। आइडिया धांसू था। कार चल निकली। कार में बैठते हुए नेहरुजी ने कहा - कमाल है आप लोग तो बहुत अक़्लमंद हैं, लोग तो आपको पागल कहते हैं। उनमें से एक ने कहा - देखिये जी संभल कर बात कीजिये, हम पागल हैं, मूर्ख नहीं हैं।

इंडिया में अपनी चाइस से मूर्ख बनें, तो बनें पर नेचुरल मूर्ख, या प्रकृति निर्मित मूर्ख तलाशना मुश्किल है। पहले इस ख़ाकसार का मानना था कि दो ही तरह के लोग होते हैं, एक जो मूर्ख होते हैं, पर दिखते नहीं हैं। दूसरे, जो मूर्ख दिखते हैं, पर होते नहीं है। भारत में दूसरी कैटेगिरी के ज़्यादा पाये जाते हैं। इस से जुड़ा दूसरा क़िस्सा यूँ है कि एक चौराहे पर एक मदारी तमाशा दिखाता था कि देखो मूर्खता का लाइव शो, वो एक समझदार से बंदे के आगे एक तरफ़ पाँच का नोट रखता था और दूसरी तरफ़ पाँच सौ का नोट। वह हमेशा पाँच का नोट ही उठाता था। पब्लिक हँसती थी। एक दिन एक समझदार ने उससे पूछा कि तू कभी पाँच सौ नोट का क्यों नहीं उठाता। पाँच का नोट उठाऊ बोला - भईया सिर्फ़ एक ही बार पाँच सौ नोट उठाने का मौक़ा मिलेगा। फिर पाँच के नोट से हमेशा के लिए जाऊँगा।

भारत में नेचुरल मूर्ख मुश्किल से मिलते है, ये नियामत ऊपर वाले ने अमेरिका और इंगलैंड को ही बख़्शी है। हम सिर्फ़ बुश और ब्लेयर की बात नहीं कर रहे हैं।

मूर्ख दिखना पर मूर्ख न होना तो दरअसल एक क्वालिटी है। लालूजी ने बरसों इसी क्वालिटी से मौज काटी है। मीडिया उन्हें बरसों यही समझता रहा। बाद में पता लगा कि दरअसल जो वह लालूजी को समझ रहे थे, वह तो खुद मीडिया है।

मूर्खों का ख़ासा महत्व है सामाजिक जीवन में। ये जो कई उपदेशक टाइप, लेक्चरातुर बंदे घूमते हैं, इन्हे बौद्धिक कब्ज़ हो जाये, अगर लेक्चरों के ज़रिये इनका बोझ हलका न हो। अपने आसपास देखिये सीनियर समझावकों के चेहरे पर कैसी विकट आभा आ जाती है, जब वे किसी को कुछ समझा रहे होते हैं। अपने बुरे दिनों में मैंने भी ऐसे समझावकों की आभा में योगदान किया है। खाने-पीने का जब संकट चल रहा था, तब मैं ऐसे एक सीनियर समझावक के पास सुबह-सुबह चला जाता था। चेहरे पर विकट मूर्खता के भाव। विकट मूर्खता के भाव कई क़िस्म के अवयवों से बनते हैं। आँखों में परम जिज्ञासा का भाव, किंचित मूर्खोचित मुस्कान, वाह-वाह वाह-वाह क्या कहा है, जैसे जुमलों का धारावाहिक सिलसिला। चेहरे पर ऐसा भाव लाना पड़ता है कि समझावक समझे कि हाँ ये ओरिजनल मूर्ख है। मूर्ख तमाम समझावकों को सार्थकता प्रदान करता है। कई समझावकों को जीवन निरर्थक लगता है, अगर कोई ज्ञान लेने वाला न मिले, तो। तो साहब मेरे समझावक मुझे नैतिकता सत्य पर बहुत प्रवचन देते थे, साथ में दो कप चाय और बहुत दिव्य किस्म के बिस्कुट। प्रवचन मैं वहीं छोड़ आता था। बाद में मेरे दिन अच्छे आ गये, तो वह उदास हो गये, मूर्खों की घटती जनसंख्या से समझावक और अक़्लमंद बहुत परेशान होते हैं।

वैसे मूर्खता के बहूत मज़े हैं। काँलेज के दिनों में राजनीतिक दिशा जब मैं तलाश रहा था, तब राजनीतिक विचाराधारा पर फ़ोकस करने के बजाय मैं देखा करता था कि सुंदर कन्याओं की धारा किस तरफ़ बह रही है। जिस पार्टी में सुंदर बालाएँ होती थीं, मैं फ़ौरन निपट मूर्खोचित भाव से उनसे ज्ञान लेने के चक्कर में रहता था। उन दिनों एक हफ़्ते के हेर-फेर में मैं वामपंथी से दक्षिणपंथी तक हो जाया करता था। एक बार तो मैं निकारागुआ की एक पार्टी का भारतीय सदस्य तक बन गया, क्योंकि उसकी लोकल शाखा जो सुंदरी चला रही थी, वह मूर्खों को समझाने के लिए अतिरिक्त कक्षाएँ लिया करती थी। कालांतर में सारी सुंदरियों का विवाह हो गया। किसी भी किस्म की राजनीति से मेरा मोहभंग हो गया। अक़्लमंदी से सुंदरियों का साहचर्य पाना बहुत मुश्किल रहा है। पर मूर्खता के लाभांश के बतौर कई सुंदरियों ने मुझे समझाने में कई घंटे लगाये हैं। यह लाभांश सिर्फ़ मूर्खों को मिलता है।

बताइए कालिदास मूर्ख नहीं होते, तो क्या विद्योत्तमा से पार पा सकते थे। नहीं ना।

सुंदरियों को सैट करने का रास्ता, मूर्खता की पगडंडी से ही जाता है। अक़्लमंदी के राजमार्ग पर चलकर सुंदरियाँ नहीं मिलतीं। कालिदास की कहानी हमें बार-बार यही बताती है।

इसलिए मूर्ख दिखने में महारथ हासिल कर लेनी चाहिए। एक अप्रैल का यही संदेश है। एक संदेश और समझ लेना चाहिए कि पागल होकर भी कभी मूर्ख नहीं होना चाहिए।

- आलोक पुराणिक

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