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सोमवार, 30 अप्रैल, 2007

विष्णु नागर की बुश पर चुटकियाँ

विष्णु नागर पेश से पत्रकार हैं - लेकिन व्यंग्यकार के रुप में भी उनकी अच्छी ख़ासी पहचान हैं। उनके पाँच व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं। पेश हैं बुश पर उनकी कुछ चुटकियाँ :



एक-

आश्चर्य कि एक दिन बुश को अपने नाम से नफरत हो गई। उसने घोषणा की कि मैं अमेरिका का राष्ट्रपति जरुर हूं मगर मेरा नाम आज से जॉर्ज बुश नहीं है। लोगों ने सोचा कि अभी तक हम जॉर्ज बुश पर चुटकुले सुनाते थे,मगर अब उन्हें सुनसुनकर यह खुद भी इतना इँटेलीजेंट हो गया है कि अपने पर चुटकुले सुनाने लगा है। बाद में बुश को भी यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि दरअसल यह चुटकुला था। कृपया कोई इसका सीधा अर्थ न निकाले। इसके बावजूद,लोगों ने जब इसका कोई और अर्थ नहीं निकाला तो मामला यहीं खत्म हो गया। बुश बेचारा इससे ज्यादा लोगों की मदद भी क्या कर सकता था!

दो-
बुश बेचारे को पता नहीं था कि औरों की तरह वह भी एकदिन मर जाएगा। वह तो किसी ने उसे यह बद्दुआ दी तो उसके मन में शंका पैदा हुई। उसने अपने सहायको से पूछा कि क्या यह सच है कि मैं एक दिन मर जाउँगा? सहायकों ने कहा कि सर, जब तक आप राष्ट्रपति हैं,बेफिक्र रहिए, आप नहीं मरेंगे। तो उसने पूछा कि क्या एक दिन ऐसा भी आएगा कि मैं राष्ट्रपति नहीं रहूंगा? बुश के सहायकों को यह सुनकर बहुत हंसी आई, पर उसे रोकते हुए उऩ्होंने कुछ नहीं कहा। तब बुश ने कहा कि इसका अर्थ तो यही निकला कि मैं एक दिन मर जाऊंगा। उसके एक चतुर सहायक ने कहा, "सर,सच तो यह है कि इराक के कारण आप अमर हो जाएँगे।" यह सुनकर बुश खुश हो गया और उसने आदेश दिया कि मनमोहन सिंह ने दिल्ली से जो मिठाई भिजवाई है,वो तुरंत पेश की जाए। आज मुझे पता चल गया है कि मैं मरुंगा नहीं, अमर हो जाउँगा।

तीन-
बुश एक दिन राष्ट्रपति नहीं रहा। उसने अपने एक सहायक से पूछा - "भैये ये तो बता, अब ये दुनिया कैसे चलेगी? " सहायक अभी भी उसका वफादार था।उसने जवाब दिया, "भगवान भरोसे चलेगी और क्या?" बुश ने जवाब दिया - "यही तो मुश्किल है।भगवान बेचारा खुद मेरे भरोसे चल रहा है।"

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शुक्रवार, 27 अप्रैल, 2007

राकेश कायस्थ का व्यंग्य : राष्ट्रीय चुंबन नीति

Rakesh Kayasthaवरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के नज़रिए और बोलने के अंदाज़ में ही व्यंग्य है - लिहाज़ा उनका व्यंग्य लिखने का अपना अलग अंदाज़ है। अमर उजाला से लेकर दैनिक ट्रिब्यून तक कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उनके १५० से ज़्यादा व्यंग्य प्रकाशित हो चुके हैं। व्यंग्य की किताब जल्द बाज़ार में आने को है।

किस ग्रह योग का प्रभाव है यह कहना मुश्किल है, लेकिन अधर अचानक अधीर हो उठे। राजनीतिक कार्यक्रमों और सांस्कृतिक जलसो से लेकर पांच सितारा पार्टियों तक हर जगह से ख़बर आने लगी.. अरे फिर चूम लिया। .. दिन दहाड़े। आंखे फाड़-फाड़कर टीवी देखता हिंदी पट्टी का आठ साल बच्चा भी स्मूच और लिप लॉक की परिभाषा समझने और याद करने लगा।

लबो की गुस्ताखी, अधरो की आकुलता और होठो की हठधर्मिता ने उन लोगो को परेशान कर दिया जो सार्वजनिक जीवन में तो पारदर्शिता के हिमायती है, लेकिन उन्हे ये लगता है कि कुछ ख़ास किस्म के `लेन-देन' बिना गवाहों के भी हो सकते हैं। मुंबई से लेकर मुजफ्फरनगर और पटना से पालनपुर तक, जगह-जगह उन लोगों के पुतले फूंके जाने लगे जिन्होने भारतीय संस्कृति का अपमान किया है। `बोल की लब आज़ाद है', लेकिन याद रख लबो की आज़ादी सिर्फ बोलने के लिए है। चिलचिलाती गर्मी में चुंबन विरोधी नारा लगाते-लगाते होठो पर पपड़ियां पड़ गईं लेकिन हौसले कम नहीं हुए। जो हाय शिल्पा करते थे वो हाय-हाय शिल्पा करने लगे। चुंबन पर बुक्का फाड़ विलाप की धांसू तस्वीरें हर जगह छपी और नारे लगाते हुए कई लोगों के फोटू भी टीवी पर पहली बार आये। कुछ लोगों ने तो यहां तक कह डाला कि नशाबंदी के बाद इतना सार्थक सामाजिक आंदोलन इस देश में पहली बार हुआ है।

आंदोलनकारी सड़कों पर गला फाड़ते रहे, तो वातानुकूलित कमरों में भी राष्ट्रीय चुंबन चिंतन अपने तरीके से जारी रहा। एड्स एवेयरनेस कार्यक्रम में रिचर्ड गेर ने शिल्पा के साथ जो कुछ किया वह क्या था-- चुंबन, बल का अतिकार, शरारत या फिर ये बताने कोशिश- कि क्या-क्या करने पर एड्स नहीं होता है। इन सवालों पर बहस जारी है। अगर कोई टीवी चैनल इन सवालों पर एसएमस पोल कराये तो एक लाख से ज्यादा जवाब आने की गारंटी है। चुंबन के बढ़ते वाकयों ने इससे जुड़े चिंतन का दायरा भी फैला दिया है। अलग-अलग कोण से दिखाई जानेवाली तस्वीरों ने विश्लेषण के नये आधार तैयार किये। गेर ने शिल्पा को जकड़ा या शिल्पा ने खुद को ढीला छोड़ दिया? गेर का शिल्पा को ताबड़तोड़ चूमना एक स्वभाविक घटना थी या उसमें पश्चिमी साम्राज्यवादी मानसिकता के सांकेतिक अर्थ ढूंढे जा सकते हैं। शिल्पा का समर्पण भारतीय मेहमाननवाजी का नमूना था या फिर हॉलीवुड का टिकट पाने का ज़रिया? ऐसे लोगो की तादाद कम नहीं जिन्होने चुंबन के तस्वीरों को सैकड़ों बार देखा और हर बार ये पाया कि ऐसे दृश्य कतई देखे जाने योग्य नहीं हैं। यह बेहद दृश्य उत्तेजक और अश्लील हैं, अगर ज्यादा लंबे समय तक इसे देखा गया, तो शीघ्र ही उनका ही नहीं पूरे समाज का पतन हो जाएगा। मामला अदालत तक पहुंच गया।

सार्वजनिक चुंबन पर राष्ट्रीय चिंतन का सिलसिला पहले से ही चला आ रहा है। करीना और शाहिद के लिप-लॉक के एमएमएस प्रसाद की तरह घर-घर बंटे तो कुछ उम्रदराज सुधी संपादकों तक ने इसका संज्ञान लिया। तस्वीरें देखीं, विचार किया और संपादकीय लिखा। मीका-राखी एपिसोड में जो कुछ हुआ, टीवी चैनलों ने उसका फैसला दर्शकों के विवेक पर छोड़ दिया। इस बात का भरपूर ख्याल रखा गया कि दर्शक तथ्यों के ठीक से समझकर विचार कर सकें, लिहाज़ा तीस सेकेंड का क्लिप घंटों चलाया गया और अब भी चलाया जाता है। एक महिला मुख्यमंत्री और एक मशहूर महिला उद्योगपति ने एक-दूसरे का चुंबन लिया तो एक राज्य की सरकार हिल गई। विपक्ष ने शोर मचाया और आलाकमान तक को मामले पर गौर करना पड़ा। मामला जैसे-तैसे ठंडा पड़ा, लेकिन शिल्पा-गेर प्रकरण ने इसे फिर जिंदा कर दिया। पार्टी के नेताओं ने सफाई दी- गेर तो ग़ैर है, यहां मामला विदेशी है। शिल्पा ने जो कुछ किया उसके तार सीधे-सीधे अमेरिका, वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ से जुड़ते हैं। लेकिन हमारा चुंबन पूरी तरह स्वदेशी है।

राष्ट्रीय चुंबन चिंतन आगे बढ़ा तो कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि इस मुद्दे पर भी आम-सहमित बनाई जाना चाहिए। यानी विदेश नीति और अर्थ नीति की तरह एक राष्ट्रीय चुंबन नीति भी होनी चाहिए। एक स्पष्ट आचार संहिता हो और एक मॉनीटरिंग कमेटी भी। मामले लगातार बढ़ रहे हैं, इसलिए निगरानी के लिए अलग से एक मंत्रालय भी बनाया जा सकता है। विपक्ष के कुछ सदस्यों के तेवर तीखे हैं, उन्होने साफ कह दिया है- अगर आगे एक भी सार्वजनिक चुम्मा हुआ, तो सरकार से श्वेत पत्र जारी करने को कहेंगे।

राकेश कायस्थ

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मंगलवार, 24 अप्रैल, 2007

हास्य कविता : प्रॉमिस है खतरनाक गोली

Bollywood Starlet Jia Khan / Jiya Khan pic from Nishabdएक दिन बच्चे के प्यार में,
जो उसके सामने
हमने "प्रॉमिस" नाम की खट्टी गोली गटकी
थोड़ी देर में लगा पता कि वो तो गले में अटकी
दरअसल, प्रॉमिस है एक बड़ी ही खतरनाक गोली का नाम
पिल्स ज्यादा हो जाएं तो है मौत का सामान
सुना नहीं है आपने?
रामायण काल में राजा दशरथ खा बैठे थे ये गोली..... कैकेयी के आगे
न निगलते बनी, न उगलते, सो सीधे स्वर्ग साधे
बहरहाल, खा के गोली हमने बच्चे से उसके जन्मदिन पर वादा कर दिया
वो था कि प्रॉमिस की आड़ में सिर पर चढ़ गया
दूसरे शब्दों में बात कुछ यूं थी जैसे
घर आए मेहमानों से दिखाया हो आपने कुछ ज्यादा प्यार
और वो उसी मोहब्बत में मांग बैठे मोटी रकम उधार
हमने कहा बोलो क्या चाहिए?
फुटबॉल, बैटबॉल ,साइकिल या उसके पहिए
वो बोला,ये सब जेब में धरिए
मुझे तो आप बस फिल्म ले चलिए
हमनें कहा - हां क्यों नहीं, बोलो कौन सी फिल्म देखोगे भइए
वो बेखटक बोला-तो गौर से सुनिए
निशब्द....
अब अपना दिमाग चकराया. सिर भन्नाया
बेटा, वो बकवास फिल्म है, न उसमें अमिताभ बूढ़ा है, न कोई बढ़िया कहानी है
शहर के किस थिएटर में लगी है, ये बात भी अंजानी है
अब बेटे ने अपने फिल्मी ज्ञान का धुआँधार प्रदर्शन किया
पापा,बिग बी हैं फिल्म के हीरो
और हीरोइन है जिया खान
रही बात कहानी की तो,उसमें है एक ताजगी
अभी तक देखा होगा आपने हीरो हीरोइऩ के बीच प्यार का चक्कर
लेकिन इस फिल्म में तो अपनी बेटी के सहेली से ही हैं हीरो घनचक्कर
और पता थिएटर का...
आप कहें तो बताए देता हूं सिलसिलेवार
अब हमें औऱ गुस्सा आया
फिर भी बालक को समझाया
बेटा, इस फिल्म के सब्जेक्ट में सचाई नहीं है...
और फिल्म में कुछ सीन भी अच्छे नहीं हैं
अब, अचानक बालक समीक्षक की मुद्रा में आ गया
फिर ताव खा गया
बोला, सब्जेक्ट तो बहुत जोरदार है
फिल्म में प्यार ही प्यार है
रही बात सीन्स की तो
किस सीन की बात कर रहें हैं आप
उस नहाने वाले सीन की-जिसमें जिया पाइस से खुद पर पानी डालती है
या
उस सीन की, जिसमें बिग बी टंगड़ी मारकर जिया को गिरा देते हैं
चुप बे जिया के बच्चे
बकवास मत कर
ये सब बातें तुझे किसने बतायीं?
घटिया फिल्म की जानकारी कहां से हथियाई?
बोला, पापा परसो फी-की न्यूज वाले
एक विंडो में ये सीन्स और दूसरे में इंटरव्यू दिखा रहे थे
और बीच-बीच में
सेक्स, अश्लीलता और नैतिकता जैसे शब्द बडबड़ा रहे थे
मैं सब समझता हूं पापा
आप क्यों घबरा रहे हैं
एडल्ट फिल्म है न
इसलिए सर्दी में पसीना बहा रहे हैं
लेकिन, आप प्रॉमिस की बात भूल रहे हैं
और बतौर मेरी टीचर,अब आप थूक के चाट रहे हैं
इस ज्ञान प्रदर्शन के बाद
पहले हमें अपनी अज्ञानता पर शर्म आयी
फिर अपनी उड़ी हवा हवाई
अचानक हम बुदबुदाए,वाह रे मीडिया दुहाई हो दुहाई
पहले बच्चे एडल्ट फिल्में सिनेमाघरों में देखते थे,
इसलिए डरते भी थे
देख लेता था कोई परिचित तो जमकर पिटते भी थे
लेकिन अब तो बैडरुम तक हो रहा है नग्नता का फूहड़ व्यापार
यही बिकता भी है शायद, इऩसे ही मिलते हैं विज्ञापन औऱ बढती मांग जोरदार
ये पहले सोचा, फिर होके शर्मसार
हमने मन ही मन सोचा
अगर बच्चे को फिल्म दिखा भी दी जाए
तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा
जिन्दगी के दोराहे पर शायद,वो बना ले हमें हमराज
इससे हमारे बीच विश्वास ही बढ़ेगा
विश्वास ही बढ़ेगा।


- पीयूष

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रविवार, 22 अप्रैल, 2007

भूत मैनेजमेंट, नाग अरेंजमेंट

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं।




इधर मामला टेंशनात्मक हो गया है।
हर बच्चा टीवी पत्रकार बनना चाहता है। पर यह उन्हे यह समझाना मुश्किल है कि अब टीवी पर पत्रकार का स्कोप उतना नहीं है, जितना नाग-नागिन, भूत-प्रेतों का है। अगर आप राखी सावंत या राजू श्रीवास्तव नही हैं, तो टीवी न्यूज में कैरियर मुश्किल है, यह बात कई समझाने की कोशिश करता हूं। बच्चे नहीं समझते। पब्लिक की डिमांड पर इस खाकसार ने एक नया मीडिया कोर्स डिजाइन किया है। इच्छुक प्रवेश के लिए 1 लाख रुपये का ड्राफ्ट भिजवायें।
कोर्स में पांच पेपर होंगे।
पेपर नंबर एक भूत-चुडैल मैनेजमेंट
यह पेपर इधर बहुत ही जरुरी हो गया है। इधर तमाम चैनल नौकरी देने से कहते हैं कि शमशान से कोई भूत पकड़ ला सकते हैं, तो आपकी नौकरी पक्की।
इस पेपर को पढ़ने के बाद कैंडीडेट इतनी काबलियत हासिल कर लेंगे कि वह कह सकें –अजी शमशान से क्या लाना, मैं तो खुद भी भूत हूं।
इस पेपर को पढ़ाने के लिए शमशान के अघोरी बतौर गेस्ट लेक्चरर आयेंगे।
जिन कैंडीडेटों की फैमिली हिस्ट्री दिल की बीमारी की रही है, वे कृपया इस कोर्स में एडमीशन न लें।
यह पेपर प्रयोगात्मक रुप से पढ़ाया जायेगा, इसकी क्लास पुराने किलों, हवेलियों, श्मशान, कब्रिस्तान में ही होंगी। पेरेंट्स कृपया ध्यान दें, जो अपने बालक और बालिकाओं को रात के दो बजे शमशान में न भेज पायें, वे कृपया अपने बच्चों को इस कोर्स में न भेजें.
पेपर विवरण
भूतों के प्रकार, भूतों की परिभाषा, नये और पुराने भूतों के बीच अंतर
गांव के भूतों, शहरों और महानगरों के भूतों के टेस्ट में अंतर
कब्रिस्तान और शमशान के भूतों के धार्मिक और सांप्रदायिक अंतरों का विश्लेषण
भारतीय भूत और ग्लोबल भूत
भूतों के अफेयर, चुड़ैलों की स्टाइलें।
पेज थ्री चुड़ैलें
नोट-इस पेपर को पढ़ने वाले हर छात्र को सत्र के अंत मे एक भूत पकड़कर दिखाना होगा, औऱ उस भूत से तरह-तरह के काम कराने की महाऱथ हासिल करनी होगी।
-सजेस्टेड रीडिंग्स-
-भूत स्टाइल्स एंड प्रोफाइल्स-लेखक अघोरी टनटनानंद
-क्यूट चुड़ैलें-लाइव्स एंड हिस्ट्री-लेखक भूताशिकानंद
निम्नलिखित हिट टीवी कार्यक्रमों की विशेष केस स्टडी भी कोर्स का हिस्सा होंगी-
कातिल कब्रिस्तान, चौकन्नी चुड़ैल, मौत का धुआं, मुरदे की वारदात, मुरदा शहर, जिंदा कब्रिस्तान, श्मशान में पेज थ्री पार्टी, एनआरआई भूतों के लव अफेयर, ब्यूटीफुल चुड़ैलों के शातिर खेल।

पेपर नंबर दो-नाग मैनेजमेंट
चैनलों पर भूतों के बाद सबसे ज्यादा टीआरपी अब नागों की आ रही है। इस पेपर के जरिये बच्चों के बताया जायेगा कि इच्छाधारी नाग और गैर-इच्छाधारी नाग क्या होते हैं। इस पेपर को पढ़ने के बाद कैंडीडेट खुद भी इच्छाधारी नाग हो सकता है।
इस पेपर के प्रोफेसर विख्यात सपेरे ही होंगे।
छात्र और छात्राओं को सपेरों की ड्रेस पहनकर गांव-जंगलों में नागों की तलाश में जाना पड़ेगा।
जो पेरेंट्स अपने बालक और बालिकाओं को सपेरों की ड्रेस में नागों की तलाश में असम के जंगलों में भेजने में समर्थ नहीं हैं, वे कृपया अपने बच्चों को इस कोर्स में नहीं भेजे। पत्रकारिता बहुत मुश्किल काम है, यह बात ऐसे ही नहीं कही जाती।

पेपर विवरण-
नाग और नागिनों के प्रकार
अब तक नागिनों पर सारी फिल्में-विशेषत नगीना, नागिन( सारी), मैं तेरी दुश्मन तू दुश्मन तेरा, कोबरा, ब्लैक कोबरा, नागिन का डंक
नागों की टीवी में भूमिका
नागों के रंग-ढंग
नाग और टीआरपी
देशी और विदेशी नागिनें
नागों का मेकअप,
नागों को कैमराफ्रेंडली कैसे बनायें
नागों से इंटरव्यू में सावधानियां
इच्छाधारी नागों की समस्याएं
नागों से बातचीत(अगर आप खुद भी नाग हैं)
नागों से बातचीत(अगर आप नाग नहीं हैं)
सजेस्टेड रीडिंग्स-
नाग हिस्ट्री एंड फ्यूचर-स्वामी नागानंद
टीवी फ्रेंडली नाग-न्यू ट्रेंड्स एंड एनालिसिल-सपेरा नृत्यानंद
सत्र के अंत में हर छात्र और छात्रा को एक धांसू नाग या नागिन पकड़कर दिखाना होगा। उन छात्रों और छात्राओं को विशेष नंबर दिये जायेंगे, खुद ही इच्छाधारी बन पाने में समर्थ होंगे।

पेपर नंबर तीन- लतीफा प्रेजेंटेशन
नाग, भूत के बाद सबसे ज्यादा टीआरपी लतीफों की होती है।
हम कोशिश करेंगे कि प्रोफेसर राजू श्रीवास्तव, प्रोफेसर एहसान कुरैशी खुद इस पेपर को पढ़ाने के लिए हाजिर हों।
इस पेपर को पढ़ने के लिए छात्र-छात्राओं को ऐसी ड्रेस पहनकर आनी पड़ेगी, जिसे देखकर पब्लिक हंसे। जो पेरेंट्स ड्रेस सेंसिटिव हैं, वे अपने बच्चों को इस कोर्स के लिए ना भेजें।
पेपर विवरण
लतीफों का इतिहास,
अश्लील चुटुकलों का टीआरपी में योगदान
घटिया चुटकुलों की वैबसाइट
चुटकुलों को सुनाने की स्टाइलें
चुटकुला चिंतन कैसे करें
एसएमएस चुटकुला लेखन
सजेस्टेड रीडिंग्स-
घटिया चुटकुलों का धांसू प्रजेंटेशन-प्रोफेसर राजू श्रीवास्तव
उलटे-पुलटे चुटकुले-प्रोफेसर जसपाल भट्टी
स्टाइल में हंसाओं-प्रोफेसर राखी सावंत
सत्र के अंत में हर छात्र-छात्रा को पांच नये चुटकुलों को पेश करना होगा। सबसे ज्यादा घटिया चुटकुले बनाने वालों को विशेष अंक दिये जायेंगे।

पेपर नंबर चार-लव-क्राइम-डाका-ठगी स्टडीज
इस पेपर में वो आइटम पढ़ायें जायेंगे, जिनकी विकट डिमांड हैं।
पेपर का उद्देश्य यह है कि इस पेपर को पढ़ने के बाद बच्चे और बच्चियां वैसे हिट टीवी कार्यक्रम बनाने सीख जायें, जैसे अभी टीवी पर आ रहे हैं-यथा रात की वारदात, कोहरे के चेहरे, एक चाकू पांच सौ डाकू, कातिल बाथरुम, सन्नाटे की सनसनी आदि –आदि।
इस पेपर को पढ़ाने के लिए हमने सरकार से अनुरोध किया है कि वह जेल से कुछ ऐसे अपराधियों को रिहा करे, जो लव त्रिकोण, मर्डर, वगैहर के मामले में बंद हैं। प्रेम त्रिकोण की डिमांड सबसे ज्यादा है।
पेपर विवरण
प्रेम त्रिकोण-इतिहास और वर्तमान
ऐतिहासिक प्रेम त्रिकोण के मामले
प्रेम त्रिकोण के सारे कोण
यश चोपड़ा की सारी पुरानी फिल्मों की स्टडी जैसे कभी-कभी, दाग वगैरह
झूठ का प्रेम में योगदान
प्रेम औऱ ठगी का संबंध
ठग बनने की प्रक्रिया में प्रेम संबंधों का योगदान
चार्ल्स शोभराज के जीवन पर विशेष अध्ययन
हर्षद मेहता के जीवन की केस स्टडी
नटवरलाल की केस स्टडी

सजेस्टेज रीडिंग्स-सदी का महानायक चार्ल्स शोभराज-प्रोफेसर प्रेम ठगानंद
प्रेम के गेम्स- प्रोफेसर जोशो
सत्र के अंत में छात्रों और छात्राओं से उम्मीद की जायेगी कि वे कम से कम पांच चक्कर चला चुके होंगे। एक ही प्रेम में यकीन करने वाले परंपरागत संकीर्णमना पेरेंट्स अपने बच्चों को इस कोर्स में न भेजें। पत्रकारिता अत्यंत ही दुष्कर कार्य है, यह बात ऐसे ही नहीं कही जाती है।

पेपर नंबर पांच-सेलिब्रिटी स्टाइल्स
इसमें भी वह सब पढ़ाया जायेगा, जिसकी विकट डिमांड है।
यह पेपर पढ़ाने के लिए सेलिब्रिटीज और सेलिब्रिटाज आयेंगे।
पेपर विवरण-
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रिटीज का नाश्ता
सेलिब्रिटाज और सेलब्रिटीज का खाना
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रिटीज का डिनर
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रिटीज का मुस्कुराना
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रिटीज के लव अफेयर
सेलिब्रिटाज और सेलिब्रटीज और क्राइम

नोट-इस कोर्स को करने के लिए छात्र और छात्राओं को सिर्फ और सिर्फ इन विषयों पर फोकस करना चाहिए। जो छात्र या छात्रा राजनीति, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र ऐसी किसी अगड़म-बगड़म चीजों को पढ़ता हुआ पाया जायेगा, उसे कान पकड़कर बाहर निकाल दिया जायेगा।
संपर्क करें-आलोक पुराणिक
स्कूल आफ न्यू मीडिया, ठग गली, चालूपुरम्, दिल्ली -11001420

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बुधवार, 18 अप्रैल, 2007

व्यंग्य : नमन हो प्रदर्शनकारियों...

पीयूष मोहन पांडे अख़बारी पत्रकारिता और ऑनलाइन पत्रकारिता करने के बाद पिछले चार साल से टीवी पत्रकारिता में हाथ आज़मा रहे हैं। उनके 50 से ज़्यादा व्यंग्य दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक नवज्योति, स्वतंत्र वार्ता और दैनिक जागरण समेत कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं।

देश के हज़ारों लाखों प्रदर्शनकारियों, तुम्हें लख-लख नमन ! आंखों में (अ)क्रांति का सपना लिए तुम इस मॉर्डन युग में भी प्रदर्शन करने निकल जाते हो। पारा 44-45 डिग्री सेल्सियस हो या 4-5 डिग्री, मौसम तुम्हारे इरादों को जला नहीं पाता। इस देश की कोमल सी इज्जत और फूल सी संस्कृति को हर दो-चार दिन में कोई रौंद डालता है, और आप धीर-वीर इसकी रक्षा के लिए सड़क पर मोर्चा संभाल लेते हो।तुम्हें शत शत नमन....

आप न हों, तो 100 करोड़ की आबादी वाले इस देश की इज्जत रोज़ बेआबरु हो। वर्ल्ड कप में टीम इंडिया हार जाए तो देश की इज्जत जाती है। सचिन,सहवाग या दूसरे खिलाड़ी न खेलें तो देश की इज्जत को पलीता लगता है। जेड गुड़ी शिल्पा पर छींटाकशी कर दे तो पूरे देश का अपमान होता है। रिचर्ड गेयर शिल्पा की पप्पी ले लेता है तो देश की संस्कृति को झप्पी लगती है। अमर सिंह शाहरुख के बारे में कुछ कहते हैं तो आप लोग किंग खान के फैन बनकर अवतरित होते हो और चैपल सचिन के बारे में कुछ बोलता है तो आप सचिन के पंखे बन आग लगा डालते हो। कहीं दिल का मामला हो तो आप, कहीं "विल" का मामला हो तो आप....आप सर्वत्र मौजूद रहते हैं। जम्मू से कन्याकुमारी तक। स्वार्थरहित।

हे प्रदर्शनकारियों, इस युग में जब करोड़ों स्वार्थी लोगों के पास अपने पड़ोसी का दुख-दर्द सुनने के लिए वक्त नहीं है, आप मुहल्ले, शहर और इससे भी आगे बढ़कर राष्ट्र हित में प्रदर्शन करने के लिए वक्त निकाल लेते हो। अपने अमूल्य वक्त में प्रदर्शन के लिए वक्त निकालना कोई छोटी मोटी राष्ट्रसेवा नहीं है। आजकल तो नेता भी यह सेवा नहीं करते-जो उनका धर्म है।

राष्ट्रहित में प्रदर्शनकारियों के अहम योगदान को देखते हुए मेरी सरकार से मांग है कि वो (फालतू) धरना-प्रदर्शन को भी एक अहम रोजगार घोषित करे। इसके अलावा, इसमें संलग्न लाखों युवाओं को मोटा भत्ता मुहैया कराया जाए। वैसे, इससे दो लाभ और होंगे। पहला ये कि बेरोजगारों की संख्या में अचानक काफी कमी आ जाएगी। दूसरा यह कि प्रदर्शन के दौरान लुटने वाली दुकानदारों की शिकायतें भी कम हो जाएंगी।

बहरहाल,मुझे मालूम है कि निकम्मी सरकार इन प्रदर्शनकारियों को उनका हक़ आसानी से नहीं देने वाली। इसलिए, सभी प्रदर्शनकारियों से मेरी अपील है कि वो एक मंच पर जमा हो और दबाव समूह के रुप में अपने हक़ के लिए लड़े। वैसे,लड़ना उनका पसंदीदा काम है और सरकार की ऐसी-तैसी करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। प्रदर्शनकारी हर बात में पुतले फूंक, हवन-यज्ञ कर, नारेबाजी कर मीडिया का इस्तेमाल करना सीख ही गए है, सो उनके इस आंदोलन में मीडिया भी भरपूर सहयोग करेगा।

लीजिए,रात में प्रदर्शनकारी शांत नहीं है। अभी-अभी खबर आयी है कि प्रदर्शनकारियों ने मुंबई में स्टार न्यूज़ के दफ़्तर में भी हमला बोल दिया है......

-पीयूष मोहन पांडे

मंगलवार, 17 अप्रैल, 2007

विकास मिश्रा का व्यंग्य: खतरे में चड्ढी

विकास मिश्रा पेशे से पत्रकार हैं। समाचारों के बीच खाते-पीते, उठते-बैठते हैं लेकिन इन समाचारों के बीच ही जन्मी विसंगतियों को अपनी नज़र से देखते हैं। इनसे व्यंग्य पैदा होता है-लिहाजा वो व्यंग्यकार है। मीडिया के क्षेत्र में कई घाटों का पानी पीने के बाद विकास मिश्रा इन दिनों आजतक में बतौर प्रोड्यूसर कार्यरत हैं।

ये चेतावनी उनके लिए नहीं है, जिन्हें तन ढंकने के लिए चड्ढी तक के लाले हैं। लेकिन अगर आपके पास चड्ढी है और उसके ऊपर भी पहनने के लिए कुछ है तो खबरदार। आपकी चड्ढी खतरे में है। बार-बार लगातार टीवी पर आपको चेतावनी दी जा रही है। जिन्होंने नहीं देखा है, उन्हें हम बता रहे हैं।

सबसे पहले हम उन्हें होशियार करना चाहते हैं जिन्हें स्वीमिंग पूल में नहाने का शौक है। नहाइए जमकर नहाइए। कोई रोक टोक नहीं है, लेकिन ध्यान रहे। चड्ढी के ऊपर तौलिया मत पहनिएगा। स्वीमिंग पूल के पास भटकता कुत्ता कुछ अनहोनी कर सकता है। किसी तन्वंगी का कुत्ता आपका तौलिया लेकर भाग सकता है। टीवी पर जनहित में जारी एक विज्ञापन में चड्ढी बनाने वाली कंपनी ने इशारों ही इशारों में आपको होशियार करने की कोशिश की है। विज्ञापन में तो सिर्फ ये दिखाया गया है कि कुत्ता सिर्फ और सिर्फ तौलिया लेकर भाग जाता है, लेकिन ध्यान रहे कुत्तों को ऐसी तौलियों से कोई खास प्यार नहीं होता। चड्ढी कंपनी आपको ये बताना चाहती है कि कुत्ता और भी डैमेज कर सकता था। क्योंकि कुत्ते चाहते हैं कि आदमी सिर्फ चड्ढी में ही रहे। कुत्तों को ये बात बरदाश्त नहीं होती कि वो तो नंगे घूमें और आप का मन सिर्फ चड्ढी से न भरे और ऊपर से तौलिया भी लपेटें। बड़ी नाइंसाफी है। विज्ञापन में सिर्फ चड्ढी में बचे गबरू जवान को एक लड़की जहां तहां बहुत ध्यान से मुस्कुराकर देखती है। मैसेज ये है कि आज की लड़कियों को खुलापन पसंद है। वो खुद खुली रहने को बेताब हैं और आपको आमंत्रित करती हैं। किसी फिल्मी कवि ने कहा भी है-हमसे सनम क्या परदा।

वैसे चड्ढी के ऊपर का तौलिया छूटकर गिरने के लिए ही होता है। ये बात समझाई है चड्ढी बनाने वाली दूसरी कंपनी ने। दरवाजे पर दस्तक हो और आप चड्ढी के ऊपर तौलिया लपेटे हों तो ध्यान रहे, दरवाजा खुलते ही आपका तौलिया भी खुलेगा। और खुदा न खास्ता कहीं दरवाजे पर धोबन हुई तो झट मांग बैठेगी आपके कपड़े। अब वो कपड़ा वो होगा, जो आपके तन पर बचा है या वो जो छूटकर गिरा है या फिर वो जो अंदर रखा है और गंदा है, ये तो आप खुद समझें। ना समझ में आए तो लाल बुझक्कड़ से पूछ सकते हैं।

और अब खतरे की चड्ढी की कहानी नम्बर तीन। टीवी पर आपने देख रखा है। पूरा मतलब आप यहां समझिए। एक चड्ढी है जो गंदी है। हालांकि पूरी तरह से गंदी लगती नहीं लेकिन आप समझने के लिए मान लीजिए कि चड्ढी गंदी है। इतनी गंदी कि घर का पानी कम पड़ जायेगा धोने के लिए। अब ऐसी मुई चड्ढी तो किसी ताल या पोखरे में ही धुल पाएगी। तो पतिदेव के तौलिए के नीचे से सरक कर ये चड्ढी पहुंच चुकी है बीवी के हाथों में। बीवी जा पहुंची है पोखरे पर। वो पोखरा जहां सिर्फ महिलाएं हैं। बीवी चड्ढी को फैलाती है तो सखियों के दिल में कुछ कुछ होता है। लेकिन अभी कुछ कसर है। बीवी बगल से मुगदर उठाती है और उसे दे मारती है चड्ढी पर।...शुक्र है कि चड्ढी सिर्फ चड्ढी है, उसके भीतर कोई नहीं है। लेकिन मुदगर की चोट पहुंचती है सखियों के दिल पर। करमजलियां सोचती हैं हाय क्या किस्मत पाई है इस मुई ने। चोट खाई चड्ढी पानी में डूबकर आंसू बहाती बाहर निकलती है और चड्ढी धोने वाली के चेहरे का दर्प बताता है कि ये खुशी के आंसू हैं। कहने का मतलब ये कि चड्ढी में सुख है। अगर ये विज्ञापन बिग बी करते तो क्या नहीं कहते कि-चड्ढी में बहुत दम है, क्योंकि कपड़ा इसमें कम है।

-विकास मिश्र
(लेखक ने "मस्ती की बस्ती" के लिए यह व्यंग्य अतिथि लेखक के रुप में लिखा है)

रविवार, 15 अप्रैल, 2007

व्यंग्य-लिज़ खेलें फुटबॉल

जनाब बौखलाए हुए हैं। तमतमाए हुए हैं। चचा ग़ालिब से सीख लेकर आंखों में
खून उतार लिया है। अमेरिका-ब्रिटेन है, इसलिए मुठ्ठियां भींच के खड़े
हैं, भारत होता तो दो-चार कनपटी पर भी जड़ देते। तेरी ऐसी की तैसी
साले........????

भाई साहब के साथ अपनी पूरी सहानुभूति है। बेटा सुंदरी की मुहब्बत में बाप
को दुत्कार दे तो लहू उबलना लाज़िमी है। लेकिन, दुल्हन लिज़ हर्ले जैसी
खूबसूरत हो तो लड़के की भी क्या गलती ? शादी में फोटो खींचने का ठेका एक
विदेशी कंपनी को दिया गया। कंपनी ने सुंदर सुंदर फोटो खींचकर बेचने के
लिए मोटी रकम अदा की। अब, वो गोरी चमड़ी वालों के बीच आलतू-फालतू इंडियन
क्यों देखना चाहेगी ? जनाब अरुण नायर ये बात समझते थे। उन्होंने अपने
मां-बाप और देशी रिश्तेदारों को अलग बैठा दिया। कहा-जाओ,खाओ,पीयो, पर
यहां बीच में मत आओ। लेकिन, भाई विनोद नायर ये बात नहीं समझे। उखड़ गए।
बेटे को गुस्से में संपत्ति से ही बेदखल कर डाला। अब, बताइए, ये कोई बात
है भला ?

उधऱ,मोहतरमा अलग रोना रो रही हैं। उऩका कहना है कि खूंसठ सनकी बुढ्ढे के
चक्कर में पूरा इंडियन रीति को फॉलो किया। लेकिन, विनोद ने मेरा दिल
तोड़ा है । मैंने अरुण से पहले ही कहा था कि घरवालों से दूर रहकर निपटा
लो पूरा प्रोग्राम।

मुझे तीन दृश्य अचानक दिखायी दे रहे हैं-
पहला सीन फ्लैश बैक वाला है-
लिज़ हर्ले और अरुण नायर की टीमें जोधपुर के उम्मेद पैलेस में क्रिकेट
खेल रही हैं। लिज़ हर्ले की टीम में गोरी चमड़ी वाले खिलाड़ी है। अरुण की
टीम में भी गोरी चमड़ी वाले विदेशी दोस्त ही हैं। देशी रिश्तेदार और
दोस्त ग्राउंड के बाहर तालियां बजाने के लिए बैठाए गए हैं।

दूसरा सीन फ्यूचर का है-
इस बार खेल फुटबॉल का है। पूरा मीडिया तालियां बजा रहा है। लिज हर्ले गोल
पर गोल दागे जा रही हैं। गोल कीपर गेंद लपक नहीं रहा। पर फुटबॉल कौन ?
अरुण नायर। जी हां,अरुण नायर फुटबॉल बने हुए हैं। जमीन-जायदाद पिता ने
छीन ली। कुछ बचा नहीं तो लिज हर्ले ने भी फुटबॉल बना डाला। "अबे,शादी
करने का शौक है-इसलिए तुझसे शादी की थी। दो बार पहले की थी-लगा कुछ
इंडियन-विंडियन हो जाए-इसलिए तुझसे की। चल, अब निकल ले। चौथा प्रस्ताव
वेट कर रहा है।"

तीसरा सीन भारतीय अखबारों-चैनलों का है-
लिज और अरुण की ख़बरें फिर सुर्खियों में हैं। पहले बेगानी शादी में
अब्दुल्ला दीवाना था, अब बेगाने तलाक में दीवाना हो लिया है।

-पीयूष मोहन पांडे

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हंसी-ठिठोली : बड़ा कौन ?

इन दिनों चुनाव की सरगर्मी ज़ोरों पर है। एक नेता जी का चुनावी भाषण आपको पहले सुनाया जा चुका है। आज एक इंस्पेक्टर राम भरोसे का खेल सुनिए।

दरअसल, एक इलाके में चुनाव की सरगर्मियां ज़ोरों पर थी। आला पुलिस अधिकारी दौरों पर दौरे कर रहे थे। इसी वक्त, इंस्पेक्टर रामभरोसे का अपने एसपी के साथ अपने गांव पहुंचना हुआ। दोनों सादी वर्दी में थे-लेकिन पुलिस की जीप से उतरे तो मजमा लग गया। रामभरोसे काफी साल बाद अपने गांव पहुंचा था-सो पुलिस की जीप से उतरते देख लोगों को पहले शक हुआ कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं। लेकिन,रामभरोसे को हंसी-ठिठोली करते देख लोग समझ गए कि हो न हो ये पुलिस में भरती हो चुका है।

लोगों ने दोनों की खूब पेट पूजा करायी। इसी दौरान, गांव के एक शख्स ने पूछा कि रामभरोसे पुलिस मे कितने बड़े अधिकारी हो और ये जो तुम्हारे साथ आए हैं-ये कौन हैं?

रामभरोसे ने सीना तान कर जवाब दिया कि ये जो हमारे साथ आए हैं-हमारे महकमे में एसपी है और मैं डीआईजी।

यह सुनकर पास बैठे एसपी साहब का माथा ठनक गया। लेकिन,उन्होंने उस वक्त तो कुछ नहीं कहा। दोनों ने खा-पीकर गांव से विदा ली, पर जैसे ही जीप गांव के बाहर निकली-एसपी साहब ने जीप रुकवा दी। इसके बाद-दे दना दे दना रामभरोसे की पिटाई कर दी। बोले-कौन बड़ा? मैं या तू?

रामभरोसे ने मासूमियत से जवाब दिया- आप एसपी हैं तो आपको एसपी बताया। आपके बारे में कोई झूठ बोला ? और मैं अपने बारे में किसी से कुछ भी कहूं- डीआईजी या आईजी, आपको क्या?

रामभरोसे का जवाब सुनकर एसपी साहब भी समझ गए कि हो न हो-ये होनहार बिरवान एक दिन डीआईजी बनेगा ही।

शुक्रवार, 13 अप्रैल, 2007

"मस्ती की बस्ती" अमर उजाला में

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गुरुवार, 12 अप्रैल, 2007

विष्णु नागर का व्यंग्य : महत्वपूर्ण होना

विष्णु नागर पेश से पत्रकार हैं - लेकिन व्यंग्यकार के रुप में भी उनकी अच्छी ख़ासी पहचान हैं। उनके पाँच व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं। पेश है "महत्वपूर्ण होने" की मानसिकता पर यह व्यंग्य :

समाज में महत्वपूर्ण होना थोड़ा मुश्किल तो है मगर इतना मुश्किल भी नहीं है कि दूसरे होते चले जायें और आप टापते रह जायें। बस अपने को पहचानने की ज़रूरत है। एक बार अपने को पहचानिये कि इनमें आप कौन हैं और हो जाइये महत्वपूर्ण - मसलन बाक़ी अंधे हों और संयोग से आप काने हों तो समझिये आप हो गये महत्वपूर्ण। आपको भाषण देना आता है और दूसरों को नहीं आता, तो बस आप हो गये महत्वपूर्ण। आपके दादा या नाना या उनका कुल, गोत्र या जाति तथाकथित रूप से महत्वपूर्ण है तो बस आप हो गये - महत्वपूर्ण। आप उस परिवार के सदस्य हैं जिसमें किसी भी कारण से कोई आज़ादी की लड़ाई के दौरान जेल भेज दिया गया था तो आप हो गये महत्वपूर्ण, क्योंकि आप स्वतंत्रता सेनानी के परिवार के सदस्य हैं। आप खूब खाते हैं और अपना ही खाते हैं और अपने लिए ही खाते हैं मगर इतना खा लिया है कि आपका वज़न हो गया है 400 पौंड, तो समझ लीजिये कि आप हो गये महत्वपूर्ण।

मान लीजिये किसी आनुवांशिक या अन्य कारण से - जिसमें आपका कोई दोष नहीं है, आप साढ़े छह फ़ुट के हो गये तो आप हो गये महत्वपूर्ण। कुछ लोग इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उन्होंने लाटरी ख़रीदी और वह खुल गयी जो कि किसी-न-किसी के नाम खुलनी ही थी तो वह हो गये..... कुछ इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे खुलेआम घूसख़ोरी करते हैं मगर पकड़े नहीं जाते, तो जब तक पकड़े नहीं जाते महत्वपूर्ण रहते हैं और उसके बाद और महत्वपूर्ण हो जाते है, क्योंकि दुनिया को पता चल जाता है कि इनके पास कहाँ-कहाँ और क्या-क्या है। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि किसी तरह उन्होंने कुछ देदिवाकर कार का वीआईपी नंबर हासिल कर लिया है या किसी विधि उन्होंने अपनी कार या स्कूटर पर प्रेस का स्टिकर लगवा लिया है। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उन्होंने जीवनभर सरकारी दफ़्तर में हरामख़ोरी की और कुछ लोग इसलिए कि खुद महत्वपूर्ण नहीं होते मगर महत्वपूर्ण लोगों के दरवाज़े पर बिलानागा खड़े रहते हैं। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि किसी महत्वपूर्ण आदमी के चपरासी या क्लर्क या नाई या लठैत हैं।

कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे खाने में नमक नहीं लेते और पीने में शराब के अलावा कुछ नहीं लेते। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि दारू पी लेते हैं मगर चाय किसी हालत में नहीं पीते या वे अल्लमगल्लम सब कुछ खा लेते हैं मगर पालक नहीं खाते। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उनके रिश्तेदार आजकल मुंबई या दिल्ली या इससे भी बेहतर ब्रिटेन या अमेरिका में रह रहे हैं (हालाँकि उन्हें क़तई नहीं पूछते) और कुछ इसलिए कि उन्हें कभी सिरदर्द या ज़ुक़ाम नहीं होता। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि जंगल में नित्यकर्म के लिए गये थे और संयोग कि उन्हें शेर दिख गया और शेर के कारण उनका नित्यकर्म भले ही बाधित हो गया हो मगर शेर ने उन्हें खाया नहीं। कृपा शेर ने की और महत्वपूर्ण हो गये वे। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उनका दावा है कि उनके पास इस बात के पक्के प्रमाण हैं कि पश्चिम से भी पहले भारत ने वायुयान का आविष्कार कर लिया था। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि उन्होंने चार शादियाँ की क्योंकि संयोग से या संयोग के बग़ैर उनकी एक के बाद एक बीवी मरती गयी और यहाँ तक कि चौथी भी मर गयी और कुछ इसलिए कि वे दावा करते हैं कि शादी किये बग़ैर ही उनका काम चल जाता है।

कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे हमेशा कलफ़दार कुर्ता-पायजामा पहनकर ही घर से बाहर निकलते हैं और कुछ इसलिए कि उनके पिता ने उनका नाम जवाहर लाल या अटल बिहारी या दिलीप कुमार रख दिया था। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि ग़लती से उनकी शक़्ल कुछ-कुछ राष्ट्रपिता से मिलती है (जिसका अर्थ यह है कि बहुत कुछ नहीं मिलती) और कुछ इसलिए कि उन्होंने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ करने की सार्वजनिक चुनौती दी थी और शंकाराचार्य ने उसका कोई जवाब नहीं दिया था, जिसका अर्थ उन्होंने यह लग लिया कि शंकारचार्य उनसे डर गये। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे चार किलो गुलाबजामुन खा लेते हैं या तीन किलो रबड़ी पी जाते हैं। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि चोर हैं और पुलिस की सिक्युरिटी में चलते हैं और कुछ इसलिए कि उन्होंने कभी किसी अंग्रेज़ से हाथ मिलाया था और उसने उनसे पूछा था कि 'हाऊ डू यू डू' और इन्होंने इसके जवाब में अपना नाम बता दिया था। कुछ लोग इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि वे फ़रार घोषित होकर आराम से घर में रहते हैं और कुछ इसलिए कि रोज़ सुबह चार बजे उठकर नहाते हैं और हनुमान चालीसा का पाठ
करते हैं। कुछ इसलिए कि वे रामलीला में हमेशा हनुमान बनते हैं और कुछ इसलिए कि उनकी भैंस 20 किलो दूध देती है, कुछ इसलिए कि स्वपाकी हैं और किसी दूसरे के गिलास में पानी तक नहीं पीते और कुछ इसलिए कि उनके जितनी लंबी चोटी इस इलाक़े में किसी की नहीं है। कुछ इसलिए कि जहाँ भी जब भी जाते हैं हाथ में डंडा अवश्य रखते हैं और कुछ इसलिए कि जेब में माचिस या चाकू ज़रूर रखते हैं। कुछ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि बीस बार ज़मानत जब्त होने के बावजूद वे चुनाव लड़ते हैं और कुछ इसलिए कि हर बार अलग-अलग पार्टी से चुनाव लड़कर भी जीत जाते हैं।

तो बताइए आप इनमें से किस प्रजाति के हैं और किसी के नहीं हैं तो भी फ़ौरन अपनी प्रजाति को संगठित कीजिये, ईश्वर आपकी मदद अवश्य करेगा क्योंकि उसका काम ही आप जैसों की मदद करना है।

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सोमवार, 9 अप्रैल, 2007

व्यंग्य : च्यवनप्राश इनक्वायरी कमीशन

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। आलोक जी ने यह व्यंग्य ख़ास तौर पर "मस्ती की बस्ती" के लिए लिखा है।



पवार बैठे हैं, चैपल आये हैं-
चैपल रिपोर्ट पेश कर रहे हैं-देखिये सर पूरी टीम कोच सर की नहीं,सिर्फ स्पांसर की सुनती है। कई प्लेयर तो ऐसे हैं कि उन्हे चाय पेश करो, तो पूछते हैं स्पांसर कौन। बनियान पहनने से पहले पूछते हैं स्पांसर कौन। अभी उस दिन एक सीनियर बैट्समैन बंगलादेश वाले मैच में, जब बैटिंग करके, सौरी जब बैटिंग नहीं करके आया, तो मैंने उससे बताया कि घर से फोन आय़ा था। आपकी पत्नी ने बहुत धांसू काम किया है, एक प्यारी सी बिटिया को जन्म दिया है। दो मिनट तो वो रहा साइलेंट और मौन, फिर पूछने लगा कि छोड़ो ये बताओ स्पांसर कौन। सर, अब मैं नहीं चला पाऊंगा।
शऱद पवार-देखिये ये अंदर की बात है, बाहर नही जानी चाहिए।
चैपल-सर आप भी क्या किसी एड के हिसाब से बोल रहे हैं।
शरद पवार मुस्कुराते हुए।

पवार और द्रविड़
पवार –प्राबलम क्या है। अब तुम लोगों के सामने नेक्स्ट टारगेट क्या है। कुछ सोचा, अगला कंपटीशन किससे होने वाला है।
द्रविड़- (शरमाते हुए)- जी अभी अपना कंपटीशन ऐश्वर्या राय से है।
पवार-व्हाट।
द्रविड़जी-जी बात यह है कि च्यवनप्राश, बिस्कुट, बनियान बहुत कर लिये। कोल्ड ड्रिंक के एड तो ऐश और हम साथ साथ करते हैं। पर क्या है कि ऐश को लिपस्टिक, आई लोशन, नेलपालिश के एड मिल जाते हैं। अभी क्या है, अभिषेक भईया से शादी के बाद ऐश कुछ कम एड करेगी, तो ये सब लिपस्टिक विपस्टिक के एड हम करेंगे ना। अभी तो हम फ्री भी हैं ना।

पवार, द्रविड़ और वेंगसरकर
पवार वेंगसरकर से-मुझे लगता है कि सहवाग का आर्डर चेंज करना चाहिए। उसको चेंज मांगता।
द्रविड़-जी बिलकुल चेंज मांगता है। अभी उसको दूध-कोल्ड ड्रिंक के एड छोड़कर टू मिनट्स नूडल्स के एड करने चाहिए।
पवार –क्यों।
द्रविड़-देखिये नया एड बहुत ईजी से बन जायेगा-नूडल्स वाले अपने एड में ये बतायें-बच्चे नूडल्स का पैकेट खोलें, उन्हे पानी में मिलायें। और देखें कि कब सहवाग बैटिंग के लिए जायें। जैसे ही सहवाग बैटिंग के लिए जायें, बच्चे नूडल्स गैस पर चढ़ाकर गैस जलायें। घड़ी देखने का जरुरत नहीं, जैसे ही सहवाग आऊट होकर वापस आयेंगे-समझिये आपके दो मिनट पूरे हो जायेंगे।
वेंगसरकर-नहीं प्राबलम है, इसमें तो हो सकता है गच्चा। सहवाग दो मिनट के बजाय एक ही मिनट में आऊट हो गये, तो नूडल्स तो रह जायेगा कच्चा। इसलिए नूडल्स को सहवाग के लेवल पर लाइए। और उन्हे दो नहीं सिर्फ एक मिनट पर रेडी करवाइए।

पवार, वेंगसरकर और द्रविड़
पवार-देखो, अपना परफारमेंस बहुत अच्छा है। क्रिकेट बोर्ड ने करोड़ों कमाया है।
द्रविड़-सर हम ये कह सकते हैं कि जो भी टीम वर्ल्ड कप जीते, उसे ही इंडियन टीम मान लिया जाये। सबको थमा देंगे, बीस-बीस करोड़।
पवार-पर मान लो कि आस्ट्रेलिया जीत जाये। उनके प्लेयर्स को हम कैसे इंडिया का कह दें, वो तो इंडिया के लिए खेलते नहीं।
वेंगसरकर-तो क्या आपको यह लगता है कि इंडियन प्लेयर इंडिया के लिए खेलते हैं। नहीं, वो किसी कोल्ड ड्रिंक के लिए खेलते हैं। किसी बनियान के लिए खेलते हैं।
पवार जोर से चीख कर-राइट, वर्ल्ड कप इंडिया लाने की तैयारी है, जो भी टीम जीते, वो ही हमारी है।

पवार, वेंगसरकर और द्रविड़
पवार-इस सिचुएशन के लिए कौन जिम्मेदार हो, बताओ।
द्रविड़-देखिये जिम्मेदारी का सवाल नेताओं से कोई नहीं पूछता, तो हमसे क्यों पूछ रहे हैं। हम आपसे पूछते हैं क्या कि आटे के भाव इतने बढ़ गये, कौन जिम्मेदार है।
पवार-राइट।
द्रविड़ –मेरे ख्याल से जिम्मेदारी च्यवनप्राश की है।
वेंगसरकर-व्हाट, च्यवप्राश कहां से आ गया। द्रविड़ तुमने तो सहवाग की सिफारिश की थी, च्यवनप्राश की नहीं।
द्रविड़-समझिये सर, सौरभ दादा समेत तमाम प्लेयर जिस च्यवनप्राश का एड करते हैं, वह घटिया है। असली च्यवनप्राश तो अमिताभ बच्चन ले गये। सर बताइए वह च्यवनप्राश खाकर साठ साल की उम्र में भी निशब्द अठारह बरस की कन्या को पटा रहे हैं और हम इत्ते च्यवनप्राश के बाद भी पब्लिक की गालियां खा रहे हैं।
पवार- ओ के राइट, मैं पार्लियामेंट में च्यवनप्राश इन्क्वायरी के लिए आल पार्टी कमेटी बनवा दूंगा।

- आलोक पुराणिक

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शनिवार, 7 अप्रैल, 2007

व्यंग्य- दिखा दी न, फिर से 'उंगली'

बिहारी बाबू के रुप में प्रियरंजन व्यंग्यकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके व्यंग्य का अभी तक अलग अंदाज़ रहा है-लेकिन इस बार आप प्रियरंजन का दूसरा अंदाज देखेंगे। " मस्ती की बस्ती" के विशेष आग्रह पर लिखे गए इस व्यंग्य में प्रियरंजन ने गुरु ग्रेग पर टिप्पणी की है।

लीजिए, ग्रेग चैपल ने फिर से दिखा दी उंगली। आप कोच की क़ुर्सी छीनकर उसको उंगली दिखाते, उससे पहले ही उसने आपको फिर से एक बार उंगली दिखा दी। अब क्या कीजिएगा, उंगली भी हर कोई थोड़े दिखा सकता है, ये तो हम हैं कि हर कोई हमें उंगली दिखाकर चला जाता है और हम हैं कि अपनेको धन्य समझते रहते हैं। आख़िर उन्होंने इस लायक भी तो हमें ही समझा, वे कहाँ इंग्लैण्ड या ऑस्ट्रेलिया गए!

वैसे, मुझे लगता है कि चैपल की यह उंगली हमें नहीं, हमारी मानसिकता को दिखाई गई है। यह उंगली हमारी उस मानसिकता को दिखाई गई है, जो अभी भी विदेशों को स्वर्ग और गोरों को सर्वज्ञ मानती है। हमें अपने देश में कोई क़ाबिल दिखता ही नहीं -- हर कोई घोंचू है और ज़िन्दगी भर काम के बदले घास खोदता है। हमें अपने बच्चों पर भरोसा नहीं लेकिन मास्टर पर पूरा भरोसा होता है, जैसे वह भगवान हो। पता नहीं हम इस बात में क्यों विश्वास करते हैं कि मारकर, पीटकर, गाली देकर, कान मरोड़कर, नंगा कर, मुर्गा बनाकर, संटी-सेवाकर... मास्टर हमारे गदहे बच्चे को आदमी बना ही देगा, जबकि हमें पता है कि ऐसा होता नहीं है।

वैसे, अब तो विश्व-कप के कूचे से बेगाने निकलने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि यह भी चैपल की 'उंगली दिखाने' वाली कार्रवाई ही है। अब आप ही बताइए न, पहले तो 'किलरइंस्टिंक्ट' वाले गांगुली की उसने सारी इंस्टिंक्ट ग़ायब कर दी और फिर बल्लेबाज़ी क्रम में इतनी उधम मचाई कि बल्लेबाज़ यह भूल गए कि बैटिंग ऑर्डर जैसी किसी चीज़ की क्रिकेट के मैदान में कोई अहमियत भी होतीहै। उंगली दिखा-दिखा कर उसने बॉलरों को बैट्समैन बनाने की कोशिश की और बैट्समैन को बॉलर! इसी घनचक्करी में टीम कहीं की नहीं रही। कहाँ तो बीसीसीआई अपने गदहे खिलाड़ियों को इस गुरु ग्रेग से आदमी बनाना चाह रही थी और कहाँ इस गुरु ने 'उंगली दिखा-दिखा कर' टीम को बांग्लादेश से भी गदहा बना दिया।

मुझे तो कभी-कभार लगता है कि चैपल द्वारा भारतीय क्रिकेट की यह दुर्गति कहीं पश्चिमी देशों की चाल न हो। मुझे इसकी पुख़्ता वजह भी नज़र आती है। अब देखिए न, पश्चिम में बनने वाली तमाम दवाओं के परीक्षण के लिए जैसे एशिया-अफ़्रीका के लोगों को गिनीपिग के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, क्या पता चैपल भी वैसे ही क्रिकेट की अपनी किसी थ्योरी की जाँच के लिए भारतीय क्रिकेट टीम का 'इस्तेमाल' कर रहे हों और उसकी 'उंगली' उसी का हिस्सा हो।

तो मेरी मानिए और मेरी तरह अपने 'भगवान' सदृश खिलाड़ियों को विलेन बनाना छोड़ दीजिए। बेहतर तो होगा कि हम सरकार से यह मांग करें कि वह विश्वकप में भारतीय टीम की इस दुर्गति की सीबीआई से जाँच करवाए और अगर सीबीआई फ़ेल हो जाए, तो एफ़बीआई की मदद ली जाए। यक़ीन मानिए, जाँच में इस दुर्गति के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ चैपल की उंगली ही ज़िम्मेदार नज़र आएगी!
(प्रियरंजन जी ने यह व्यंग्य अतिथि लेखक के रुप में लिखा है)

शुक्रवार, 6 अप्रैल, 2007

हंसी-ठिठोली- "कुत्ते की पूंछ सीधी करके रहूंगा"

दिल्ली में मौसम चुनाव का है तो क्यों न चुनावी भाषण का लुत्फ ले लिया
जाए। इसलिए, "मस्ती की बस्ती" में आज नेता जी का अनूठा भाषण-
एक बार एक नेता जी एक गांव में भाषण देने पहुंचे। टोपी धारक जंतुओं की
श्रेणी में हाल-हाल में दाखिल हुए इस जंतु ने अपने भाषण की शुरुआत कुछ
यूं की।

मुझे भाषण देना नहीं आता
भाषण देना तो नेताओं का काम है
जैसे गांधी जी भाषण दिया करते थे
जैसे नेहरु जी भाषण दिया करते थे
नेहरु जी को "वार" से बड़ा प्यार था
पर वार कई प्रकार के होते हैं
जैसे सोमवार,मंगलवार,बुधवाऱ
लेकिन सबसे खतरनाक वार शेर का होता है
शेर जंगल का राजा है
शरीर का राजा मन है
मन बड़ा चंचल होता है
चंचल मधुबाला की छोटी बहन थी
उसे दिल की बीमारी थी
दिल एक मंदिर है
मंदिर में हिन्दू जाते हैं
मुसलमान मस्जिद में जाते हैं
मस्जिदों में सबसे अनूठी बाबरी मस्जिद है
लेकिन,बाबरी मस्जिद का बवाल ऐसा
कि निपटाए नहीं निपटता
लेकिन,कुछ धर्म स्थल ऐसे हैं
जिन्हें लेकर कोई पंगा नहीं
मसलन गुरुद्वारे
गुरुद्वारे में सिख जाते हैं
सिख बड़े स्वामिभक्त होते हैं
लेकिन जानवरों में सबसे स्वामिभक्त
कुत्ता होता है
कुत्ते की पूंछ हमेशा टेड़ी रहती है
टेड़ी ऐसी कि कोई कुछ कर ले-सीधी नहीं होती
मैं आपसे वादा करता हूं,कि
अगर आपने मुझे जिता दिया
तो मैं इस कुत्ते की पूंछ सीधी करके रहूंगा
मैं इस कुत्ते की पूंछ सीधी करके रहूंगा।
धन्यवाद

नेताजी का ये भाषण तो गप्प की श्रेणी का है-लेकिन हमारे भारतीय नेता भी
कुछ कम नहीं। उनके वादों की भाषा भले कुछ हो-लेकिन उनका लब्बो लुआब
"कुत्ते की पूंछ सीधी सीधी करके रहूंगा" जैसा ही होता है। मजे की बात ये
कि ढीठ इतने कि पांच साल बाद भी कुत्ते की पूंछ सीधी नहीं होती तो फिर
कुत्ते की पूंछ सीधी करने का वादा करके वोट हथियाते हैं। वैसे,जनता की
नादानी यह कि इस रस विहिन लॉलीपॉप को हर दो-चार साल में नेता उनके मुंह
में धर जाता है और वो इस उम्मीद में कि कभी तो इसमें से रस निकलेगा-वोट
देते हैं। नाकारा नेताओं को जीताते हैं।

-गौरी पालीवाल

बुधवार, 4 अप्रैल, 2007

व्यंग्य : चैपल का सनसनीख़ेज़ खुलासा

पीयूष मोहन पांडे अख़बारी पत्रकारिता और ऑनलाइन पत्रकारिता करने के बाद पिछले चार साल से टीवी पत्रकारिता में हाथ आज़मा रहे हैं। उनके 50 से ज़्यादा व्यंग्य दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक नवज्योति, स्वतंत्र वार्ता और दैनिक जागरण समेत कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं।

निम्नलिखित सनसनीख़ेज़ खुलासा गुरु ग्रेग की निजी डायरी से उड़ाया गया है। चप्पल साहब सॉरी चैपल साहब हार पर अपनी रिपोर्ट बीसीसीआई को देने वाले हैं। हार के बाद उन्होंने खिलाड़ियों के बीच रहकर बहुत कुछ देखा-सुना है। इसी देखे-सुने में एक सनसनीखेज़ सच ये भी है।

(मेरी निजी डायरी- 25/3/07)

मैंने आज जो सुना - उसे सुनकर मेरी आँखें खुली-की-खुली रह गईं। अपना धुरंधर धोनी किसी को उड़ाने की साज़िश रच रहा है। वर्ल्ड कप में उसकी परफ़ॉरमेंस बहुत ख़राब रही है लेकिन इसके लिए वो किसी और को दोषी मानता है। मैंने धोनी को यह कहते हुए सुना - "इंडिया पहुँचते ही साले को उड़ा दूंगा। उसकी बद्दुआ के चलते ही मैं यहाँ घास उखाड़ता रह गया। लंका के खिलाफ मैच में ज़ीरो पर आउट हो गया।"

धोनी सिर्फ़ किसी को उड़ाने की ही बात नहीं कर रहा था बल्कि कप्तान द्रविड से भी कह रहा था कि - "बॉस, तुम भी मेरा साथ दो। उसकी वजह से ही तुम्हारी आज इतनी फ़जीहत हो रही है। तुम न घर के न घाट के रहे। उसने ही साला कह डाला था कि टीम इंडिया कोई मैच न जीते।"

मैंने इस बारे में श्रीशंत और इरफ़ान से भी बात करने की कोशिश की - लेकिन दोनों ने मँह नहीं खोला। ये दोनों वर्ल्ड कप में एक भी मैच नहीं खेले लिहाज़ा इनके ख़िलाफ़ लोगों में ग़ुस्सा नहीं है, पर इन्होंने भी अपने साथी खिलाड़ियों की साज़िश के बारे में नहीं बताया। इन्होंने नहीं बताया कि धोनी किसे उड़ाने की बात कह रहा है? इऩ्होंने नहीं बताया कि किसने धोनी के ज़ीरो पर आउट होने की मन्नत मांगी थी? इऩ्होंने नहीं बताया कि कौन टीम इंडिया को एक भी मैच देखते हुए नहीं देखना चाहता? मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि धोनी, द्रविड़ और टीम इंडिया के कुछ दूसरे खिलाड़ियों के बीच कुछ खिचड़ी पक रही है और निश्चित तौर पर ये लोग इंडिया में किसी की हत्या करने का इरादा रखते हैं। वैसे, मैं ये बात विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इन्हें साज़िश का मंत्र किसी हिन्दी फ़िल्म से मिला है।

कौन है वो ?

अब चैपल साहब ने इतना बड़ा सनसनीखेज़ खुलासा डायरी में किया तो हमारे एक पत्रकार मित्र (खोजी पत्रकार) ने इसका पोस्टमार्टम भी कर डाला। उन्होंने एक गुप्त एएएमएस के ज़रिए इस पूरे राज़ से पर्दाफ़ाश किया है।

वाक़या कुछ ऐसा है कि टीम इंडिया बांग्लादेश और श्रीलंका से बुरी तरह पिटने के बाद जमैका में एक हिन्दी फ़िल्म देखने पहुँची। जमैका में वर्ल्ड कप के दौरान ख़ासतौर पर हिन्दी फ़िल्म का इंतज़ाम किया गया था। इस फ़िल्म का नाम है - हैट्रिक। भाइयों ने सोचा कि फ़िल्म क्रिकेट पर होगी, पर इसमें तो हीरो कुणाल ने टीम इंडिया की ही ऐसी की तैसी कर दी। अपनी पत्नी के दिल में बसे धोनी से परेशान कुणाल ने बद्दुआ दी - "वो साला धोनी, मैं चाहता हूँ कि एक भी रन न बनाए। हमेशा ज़ीरो पर आउट हो।" इसी तरह टीम इंडिया के बारे में कुणाल का कहना है - "ये टीम इंडिया हमेशा हारे। कभी कोई मैच न जीते।"

अब जनाब, बात चाहे फ़िल्म में कही गई हो या कहीं और - निकली तो कुणाल की ज़ुबाँ से ही है। लंबी ज़ुल्फ़ों वाला धोनी लुटा-पिटा घूम रहा है। कल तो छोरियाँ 'उड़े जब-जब ज़ुल्फ़ें' गा रही थीं, आज ज़ुल्फ़ों को उखाड़ने पर आमादा हैं। द्रविड को कप्तानी की दुकान समिटती दिख रही है। लाखों लोगों ने तो हार का ठीकरा इन खिलाड़ियों के पुतलों पर फोड़ ही दिया है - सो लौट के आए ये बुद्धु अब कुणाल को ढूंढ रहे हैं।

कुणाल सावधान! तुम धोनी के निशाने पर हो....

- पीयूष मोहन पांडे

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सोमवार, 2 अप्रैल, 2007

श्री विष्णु नागर का व्यंग्य : राजनीतिक संन्यासी

Vishnu Nagarविष्णु नागर पेश से पत्रकार हैं - लेकिन व्यंग्यकार के रुप में भी उनकी अच्छी ख़ासी पहचान हैं। उनके पाँच व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं। पेश है उनका 'राजनीतिक संन्यासियों' की क़लई खोलता व्यंग्य :


संन्यासी आपने भी बहुत देखे होंगे और हमने भी। संन्यासी हैं भी बहुत हमारे देश में और होंगे तो दिखेंगे भी। जायेंगे कहाँ? कोई बीवी के ताने-तिश्नों का मारा है और संन्यासी बन चुका है, किसी को बच्चों ने घर से भगा दिया है और वह संन्यासी बन गया है। कोई बेरोजगारी का मारा है और उसने संन्यास में जीवन जीने का रास्ता पा लिया है। किसी ने हत्या या बलात्कार किया है और वह संन्यासी के वेश में पुलिस से बचता फिर रहा है। किसी को फटाफट करोड़पति बनना है तो कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में कामयाबी न मिलने के बाद संन्यासी बन गया है, किसी की किसी साधु या बाबा की संपत्ति पर निगाह है तो वह संन्यासी बन गया है। किसी को लगता है कि संन्यास मुत और तर माल खाने की स्थायी और अविचल व्यवस्था है, इसलिए वह संन्यासी बन गया है। किसी को राजनीति करने के लिए संन्यासी बनने से ज्यादा फायदेमंद कुछ नहीं लगता। कोई-कोई ऐसा भी शायद होता ही होगा, जिसकी वाकई भगवान से लौ लग गई गई होती होगी। ऐसी गल्ती भी इनसान ही कर सकता है। आशय यह है कि जितने संन्यासी हैं उतने ही संन्यासी बनने के कारण भी हैं।

लेकिन तमाम नेताओं की इस धमकी के बावजूद कि फलां भ्रष्टाचार या फलां बलात्कार या फलां डकैती या फलां रंगदारी का आरोप सिध्द होने पर मैं राजनीति से हमेशा के लिए संन्यास ले लूंगा, किसी राजनीतिक संन्यासी को आपने आज तक कभी देखा है? मेरा विश्वास है कि नहीं देखा होगा क्योंकि मैंने भी आज तक नहीं देखा है।

सच्चाई यह है कि जो राजनीति में एक बार चला आता है, वह राजनीति से संन्यास लेने की गलती कभी नहीं करता, कभी कर ही नहीं सकता, भले ही राजनीति उससे संन्यास ले ले। वह राजनीति का गृहस्थाश्रम धर्म निभाते-निभाते ही अंतिम सांस लेना पसंद करता है। वह राजनीति के सेंट्रल हाल में बैठकर अपनी बारी की हमेशा प्रतीक्षा करता रहता है। वह इस आशा में सेंट्रल हाल नहीं छोड़ता कि कभी तो कोई ऐसा कमीशन बनाया जायेगा, जिसका अध्यक्ष उसे बनाया जायेगा। कभी तो किसी संस्थान का अध्यक्ष पद खाली होगा, जहाँ उसे कैबिनेट मिनिस्टर का नहीं तो कम से कम राज्य मंत्रि का दर्जा देकर जरूर बैठाया जायेगा। उसे कहीं का राजदूत, कहीं का राज्यपाल या नहीं तो उपराज्यपाल तो अवश्य ही बनाया जायेगा। यहाँ तक कि जो भूतपूर्व प्रधानमंत्रि हैं और अपनी भूतपूर्वता में भी अभूतपूर्व हो चुके हैं, जो अपनी बारी अच्छी या बुरी तरह खेल चुके हैं, उन्हें भी उम्मीद रहती है कि उनके अधूरे कामों को पूरा करने का अवसर यह देश, यह समाज और नहीं तो सोनिया गाँधी अवश्य देंगी। वे नहीं देंगी तो ईश्वर देगा और ईश्वर भी नहीं देगा तो जन्म कुंडली देगी क्योंकि उसमें ऐसा लिखा हुआ है। देश का शायद ही कोई नेता ऐसा होगा जो अपनी अंतिम सांस तक देश की सेवा करने को तत्पर न हो, वह भी क्या करे, राजनीति में ऐसी परंपरा हमेशा से रही है। क्या गाँधी, नेहरू और इंदिरा गाँधी या राजीव गाँधी ने ऐसा नहीं किया था? तो किस आधार पर वह देशसेवा से मुँह मोड़ लें? वैसे शायद हमारे धर्मग्रंथों में कहीं कहा गया होगा कि एक सच्चे राजनीतिक को कभी संन्यास नहीं लेना चाहिए।

बहरहाल सच तो यह भी है कि राजनीतिक संन्यास लेना भी चाहे तो कैसे ले बेचारा गरीब? राजनीति में पचास साल की उम्र से पहले तो आदमी को बच्चा ही समझा जाता है और कहा भी जाता है, भले ही राहुल गाँधी से उनके मुँह पर यह कहने का साहस किसी काँग्रेसी का न होता हो। पचास की उम्र में उसे युवा मानना शुरू होता है और पैंसठ की उम्र तक वह युवा ही बना रहता है। फिर वरिष्ठ होना आरंभ होता है और वरिष्ठ होते-होते उसे पाँच साल और लग जाते हैं। जब तक वास्तव में वरिष्ठता के नाते उसे कुछ मिलता है या मिलने की संभावना बनती दीखती है कि तभी उधर से बुलावा आना शुरू हो जाता है कि भाईसाहब या बहनजी- आप जो भी हों-चलिये,बहुत जी लिये। आपकी उम्र के 90 प्रतिशत लोग उधर जा चुके हैं, फिर आप इधर क्या कर रहे हैं? इसलिए राजनीतिक नेता तो मजबूर है संन्यास न लेने को। अब ठीक है कि कभी-कभी मुँह से निकल जाता है कि भ्रष्टाचार या बलात्कार या ऐसा ही कोई एक भी आरोप सिध्द हो गया तो मैं इस्तीफा ही नहीं दूँगा वरन राजनीति से संन्यास भी ले लूँगा लेकिन यह किसी भी समझदार आदमी को समझना चाहिए कि यह वक्त की नजाकत देखकर कहा गया महज एक वाक्य है, एक अखबारी वक्तव्य है, नेकनीयती का प्रमाणपत्र है और राजनीति में ऐसा कौन है जिसे अपने लघु या सुदीर्घ राजनीतिक जीवन में ऐसा वाक्य कभी नहीं कहा या ऐसा वक्तव्य नहीं दिया?

- विष्णु नागर

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रविवार, 1 अप्रैल, 2007

पागल हैं, मूर्ख नहीं

आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैंआलोक जी ने यह लेख ख़ासतौर मूर्ख दिवस के मौक़े पर "मस्ती की बस्ती" के लिए लिखा है



क़िस्सा
यूँ है कि देश के पहले प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु एक बार आगरा से होकर गुज़र रहे थे। आगरा के विख्यात मानसिक चिकित्सालय (जिसे तब पागलखाना कहा जाता था) के सामने नेहरुजी की कार ख़राब हो गयी। ख़राब यूँ हुई कि कार का एक पहिया ही निकल गया। पहिये के चारों पेंच निकल गये थे। रात एक बजे का वक़्त। नेहरुजी को दिल्ली पहुँचना ज़रुरी थी। उस वक़्त कोई मिस्त्री उपलब्ध नहीं। तब ही मानसिक चिकित्सालय के कुछ रोगियों ने नेहरुजी की समस्या देखी और दिमाग लड़ाया और सोल्यूशन बताया कि आप बचे हुए तीनों पहियों से एक-एक पेंच खोल लीजिये और चौथे पहिये को तीन पेंचों पर फ़िट कर दीजिये। चारों पहिये तीन-तीन पेंचों पर चलेंगे, दिल्ली जाकर मामला पूरा चौकस करवा लीजिये। आइडिया धांसू था। कार चल निकली। कार में बैठते हुए नेहरुजी ने कहा - कमाल है आप लोग तो बहुत अक़्लमंद हैं, लोग तो आपको पागल कहते हैं। उनमें से एक ने कहा - देखिये जी संभल कर बात कीजिये, हम पागल हैं, मूर्ख नहीं हैं।

इंडिया में अपनी चाइस से मूर्ख बनें, तो बनें पर नेचुरल मूर्ख, या प्रकृति निर्मित मूर्ख तलाशना मुश्किल है। पहले इस ख़ाकसार का मानना था कि दो ही तरह के लोग होते हैं, एक जो मूर्ख होते हैं, पर दिखते नहीं हैं। दूसरे, जो मूर्ख दिखते हैं, पर होते नहीं है। भारत में दूसरी कैटेगिरी के ज़्यादा पाये जाते हैं। इस से जुड़ा दूसरा क़िस्सा यूँ है कि एक चौराहे पर एक मदारी तमाशा दिखाता था कि देखो मूर्खता का लाइव शो, वो एक समझदार से बंदे के आगे एक तरफ़ पाँच का नोट रखता था और दूसरी तरफ़ पाँच सौ का नोट। वह हमेशा पाँच का नोट ही उठाता था। पब्लिक हँसती थी। एक दिन एक समझदार ने उससे पूछा कि तू कभी पाँच सौ नोट का क्यों नहीं उठाता। पाँच का नोट उठाऊ बोला - भईया सिर्फ़ एक ही बार पाँच सौ नोट उठाने का मौक़ा मिलेगा। फिर पाँच के नोट से हमेशा के लिए जाऊँगा।

भारत में नेचुरल मूर्ख मुश्किल से मिलते है, ये नियामत ऊपर वाले ने अमेरिका और इंगलैंड को ही बख़्शी है। हम सिर्फ़ बुश और ब्लेयर की बात नहीं कर रहे हैं।

मूर्ख दिखना पर मूर्ख न होना तो दरअसल एक क्वालिटी है। लालूजी ने बरसों इसी क्वालिटी से मौज काटी है। मीडिया उन्हें बरसों यही समझता रहा। बाद में पता लगा कि दरअसल जो वह लालूजी को समझ रहे थे, वह तो खुद मीडिया है।

मूर्खों का ख़ासा महत्व है सामाजिक जीवन में। ये जो कई उपदेशक टाइप, लेक्चरातुर बंदे घूमते हैं, इन्हे बौद्धिक कब्ज़ हो जाये, अगर लेक्चरों के ज़रिये इनका बोझ हलका न हो। अपने आसपास देखिये सीनियर समझावकों के चेहरे पर कैसी विकट आभा आ जाती है, जब वे किसी को कुछ समझा रहे होते हैं। अपने बुरे दिनों में मैंने भी ऐसे समझावकों की आभा में योगदान किया है। खाने-पीने का जब संकट चल रहा था, तब मैं ऐसे एक सीनियर समझावक के पास सुबह-सुबह चला जाता था। चेहरे पर विकट मूर्खता के भाव। विकट मूर्खता के भाव कई क़िस्म के अवयवों से बनते हैं। आँखों में परम जिज्ञासा का भाव, किंचित मूर्खोचित मुस्कान, वाह-वाह वाह-वाह क्या कहा है, जैसे जुमलों का धारावाहिक सिलसिला। चेहरे पर ऐसा भाव लाना पड़ता है कि समझावक समझे कि हाँ ये ओरिजनल मूर्ख है। मूर्ख तमाम समझावकों को सार्थकता प्रदान करता है। कई समझावकों को जीवन निरर्थक लगता है, अगर कोई ज्ञान लेने वाला न मिले, तो। तो साहब मेरे समझावक मुझे नैतिकता सत्य पर बहुत प्रवचन देते थे, साथ में दो कप चाय और बहुत दिव्य किस्म के बिस्कुट। प्रवचन मैं वहीं छोड़ आता था। बाद में मेरे दिन अच्छे आ गये, तो वह उदास हो गये, मूर्खों की घटती जनसंख्या से समझावक और अक़्लमंद बहुत परेशान होते हैं।

वैसे मूर्खता के बहूत मज़े हैं। काँलेज के दिनों में राजनीतिक दिशा जब मैं तलाश रहा था, तब राजनीतिक विचाराधारा पर फ़ोकस करने के बजाय मैं देखा करता था कि सुंदर कन्याओं की धारा किस तरफ़ बह रही है। जिस पार्टी में सुंदर बालाएँ होती थीं, मैं फ़ौरन निपट मूर्खोचित भाव से उनसे ज्ञान लेने के चक्कर में रहता था। उन दिनों एक हफ़्ते के हेर-फेर में मैं वामपंथी से दक्षिणपंथी तक हो जाया करता था। एक बार तो मैं निकारागुआ की एक पार्टी का भारतीय सदस्य तक बन गया, क्योंकि उसकी लोकल शाखा जो सुंदरी चला रही थी, वह मूर्खों को समझाने के लिए अतिरिक्त कक्षाएँ लिया करती थी। कालांतर में सारी सुंदरियों का विवाह हो गया। किसी भी किस्म की राजनीति से मेरा मोहभंग हो गया। अक़्लमंदी से सुंदरियों का साहचर्य पाना बहुत मुश्किल रहा है। पर मूर्खता के लाभांश के बतौर कई सुंदरियों ने मुझे समझाने में कई घंटे लगाये हैं। यह लाभांश सिर्फ़ मूर्खों को मिलता है।

बताइए कालिदास मूर्ख नहीं होते, तो क्या विद्योत्तमा से पार पा सकते थे। नहीं ना।

सुंदरियों को सैट करने का रास्ता, मूर्खता की पगडंडी से ही जाता है। अक़्लमंदी के राजमार्ग पर चलकर सुंदरियाँ नहीं मिलतीं। कालिदास की कहानी हमें बार-बार यही बताती है।

इसलिए मूर्ख दिखने में महारथ हासिल कर लेनी चाहिए। एक अप्रैल का यही संदेश है। एक संदेश और समझ लेना चाहिए कि पागल होकर भी कभी मूर्ख नहीं होना चाहिए।

- आलोक पुराणिक

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