जल्द आ raha है "मस्ती की बस्ती"
पहला विज्ञापन- वैद्यानथ का
वोट किसको दें
जिसका आचरण तपा-तपाया हो
जो कट्टर देशभक्त और निस्वार्थी हो
जो जनकल्याण की भावना से ओतप्रोत हो
जिसने आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा बनाने की प्रतिज्ञा ली हो
-श्री वैद्यानाथ आयुर्वेद भवन,आयुर्वेद औषधियों के श्रेष्ठ निर्माता
(विज्ञापन प्रकाशित- 6 नवंबर,1952, नवभारत टाइम्स, दिल्ली)
दूसरा विज्ञापन- एक फिल्म का
जल्द आ रहा है-
जैमिनी का हदयस्पर्शी चित्र
जिसे देखकर गृहणियों के अश्रू आ जाएं
(विज्ञापन प्रकाशित- 1952 हिन्दुस्तान, दिल्ली)
तीसरा विज्ञापन- "मस्ती की बस्ती"
जल्द आ रही है-"मस्ती की बस्ती"
एक गली-एक मोहल्ला-एक कस्बा-एक शहर-एक चौपाल
जहां नुक्ताचीनी है-कांटे की बात है और हैं टेढे-मेढ़े सवाल
जहां आप पढ़ेगे व्यंग्य और रखा जाएगा आपके हंसने का ख्याल
तो इंतज़ार कीजिए-"मस्ती की बस्ती" का
एक अनूठे ब्लॉग का.......
(31 मार्च, 2007, ब्लॉग पर)
विज्ञापनों का रंग-ढंग बदल गया। पुराने विज्ञापन इतिहास में दर्ज हो गए और नए भविष्य को बनाने के मकसद से आते गए।
फिलहाल जनाब,हम भी इतिहास में दर्ज हो गए। हिन्दी ब्लॉग के इतिहास में। जब कभी हिन्दी ब्लॉग के विज्ञापन की बात आएगी-तो खबरदार पाठकों! अगर आप इस ब्लॉग "मस्ती की बस्ती " का ज़िक्र करना भूले तो।
इस ब्लॉग पर पहला चिठ्ठा यानि व्यंग्य एक अप्रैल यानि मूर्ख दिवस पर नज़र आएगा और वरिष्ठ व्यंग्यकार आलोक पुराणिक लेकर आएंगे-मूरखों के बारे मे अपनी दिलचस्प टिप्पणी।
लगे मौके इस ब्लॉग को शुरु करने का मकसद भी बता दिया जाए। दरअसल, इऩ दिनों हिन्दी ब्लॉग की दुनिया में बहार आयी हुई है। नए चिठ्ठाकारों की बहार। उऩके कहे अलग और दिलचस्प चिठ्ठों की बहार। इस बहार में हमने भी सोचा कि कुछ नए फूल उगा दिए जाए-सो ये प्रयोग है। इस चिठ्ठे में दिखेंगे आपको करारे व्यंग्य और दिलचस्प टिप्पणियां। सभी व्यंग्यकारों का चिठ्ठे पर स्वागत है।
वैसे,एक दूसरा मकसद भी है। मैं भी "क्योंकि हर ब्लॉग कुछ कहता है.." विषय पर शोध कर रही हूं। इस शोध के दौरान एक प्रोजेक्ट के तौर पर इस ब्लॉग को स्थापित करने की कोशिश करुंगी। देखना है- कितनी सफलता मिलती है?
बहरहाल, क्या होगा खुदा जाने-पर इतिहास में नाम तो दर्ज हो ही गया। तो-हे चिठ्ठाकारों इंतजार कीजिए...और मत भूलिए कि ब्लॉग के इतिहास में पहला विज्ञापन (संभवत:) जारी हो चुका है।
धन्यवाद
-गौरी पालीवाल
वोट किसको दें
जिसका आचरण तपा-तपाया हो
जो कट्टर देशभक्त और निस्वार्थी हो
जो जनकल्याण की भावना से ओतप्रोत हो
जिसने आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा बनाने की प्रतिज्ञा ली हो
-श्री वैद्यानाथ आयुर्वेद भवन,आयुर्वेद औषधियों के श्रेष्ठ निर्माता
(विज्ञापन प्रकाशित- 6 नवंबर,1952, नवभारत टाइम्स, दिल्ली)
दूसरा विज्ञापन- एक फिल्म का
जल्द आ रहा है-
जैमिनी का हदयस्पर्शी चित्र
जिसे देखकर गृहणियों के अश्रू आ जाएं
(विज्ञापन प्रकाशित- 1952 हिन्दुस्तान, दिल्ली)
तीसरा विज्ञापन- "मस्ती की बस्ती"
जल्द आ रही है-"मस्ती की बस्ती"
एक गली-एक मोहल्ला-एक कस्बा-एक शहर-एक चौपाल
जहां नुक्ताचीनी है-कांटे की बात है और हैं टेढे-मेढ़े सवाल
जहां आप पढ़ेगे व्यंग्य और रखा जाएगा आपके हंसने का ख्याल
तो इंतज़ार कीजिए-"मस्ती की बस्ती" का
एक अनूठे ब्लॉग का.......
(31 मार्च, 2007, ब्लॉग पर)
विज्ञापनों का रंग-ढंग बदल गया। पुराने विज्ञापन इतिहास में दर्ज हो गए और नए भविष्य को बनाने के मकसद से आते गए।
फिलहाल जनाब,हम भी इतिहास में दर्ज हो गए। हिन्दी ब्लॉग के इतिहास में। जब कभी हिन्दी ब्लॉग के विज्ञापन की बात आएगी-तो खबरदार पाठकों! अगर आप इस ब्लॉग "मस्ती की बस्ती " का ज़िक्र करना भूले तो।
इस ब्लॉग पर पहला चिठ्ठा यानि व्यंग्य एक अप्रैल यानि मूर्ख दिवस पर नज़र आएगा और वरिष्ठ व्यंग्यकार आलोक पुराणिक लेकर आएंगे-मूरखों के बारे मे अपनी दिलचस्प टिप्पणी।
लगे मौके इस ब्लॉग को शुरु करने का मकसद भी बता दिया जाए। दरअसल, इऩ दिनों हिन्दी ब्लॉग की दुनिया में बहार आयी हुई है। नए चिठ्ठाकारों की बहार। उऩके कहे अलग और दिलचस्प चिठ्ठों की बहार। इस बहार में हमने भी सोचा कि कुछ नए फूल उगा दिए जाए-सो ये प्रयोग है। इस चिठ्ठे में दिखेंगे आपको करारे व्यंग्य और दिलचस्प टिप्पणियां। सभी व्यंग्यकारों का चिठ्ठे पर स्वागत है।
वैसे,एक दूसरा मकसद भी है। मैं भी "क्योंकि हर ब्लॉग कुछ कहता है.." विषय पर शोध कर रही हूं। इस शोध के दौरान एक प्रोजेक्ट के तौर पर इस ब्लॉग को स्थापित करने की कोशिश करुंगी। देखना है- कितनी सफलता मिलती है?
बहरहाल, क्या होगा खुदा जाने-पर इतिहास में नाम तो दर्ज हो ही गया। तो-हे चिठ्ठाकारों इंतजार कीजिए...और मत भूलिए कि ब्लॉग के इतिहास में पहला विज्ञापन (संभवत:) जारी हो चुका है।
धन्यवाद
-गौरी पालीवाल

