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सोच हो खूबसूरत : शबाना आजमी

सोच हो खूबसूरत : शबाना आजमी

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खामोशी खुद अपनी सदा हो ऐसा भी हो सकता है... लेकिन हमेशा खामोशी सदा नहीं बन पाती। आवाज उठानी ही पड़ती है और शबाना आजमी ने भी इसी बात को समझा कि अब वक्त चुप्पी तोडऩे का है। चाहे किसी के अधिकारों के हनन का मामला हो चाहे सांस्कृतिक वैल्यूज की बात हो शबाना कभी खामोश नहीं रहतीं। दर्द किसी का भी हो, तकलीफ कैसी भी हो वे उससे पिघल जाती हैं। मजबूती और नाजुकी के बीच का सुंतलन उनकी शख्सियत में साफ झलकता है।

महिलाओं के बारे में इतनी बातें होने के बावजूद स्थितियां अभी तक बहुत अच्छी नहीं हुई है। इसका क्या कारण है?
हालात बदल रहे हैं अभी और बदलेंगे। लेकिन इसके लिए महिलाओं को खुद पहल करने की आदत डालनी होगी।

क्या आम परिवार की औरत से इस तरह की उम्मीद करना बेमानी नहीं है?
बिलकुल नहीं, बल्कि उन्हें इसी सोच से निकलना है। पहले से तय दायरे तोडऩे हैं। अपने लिए आवाज उठाना बहुत जरूरी है। छीनता हो हक तुम्हारा जब कोई उस वक्त तो आंख से आंसू नहीं शोला निकलना चाहिए।

आपने हक की बात की तो क्या सचमुच उनके लिए हक हासिल कर पाना इतना आसान है?
देखिए, आसान तो कुछ भी नहीं है। जीना तो सबसे मुश्किल है लेकिन अपनी कोशिशों से हम इसे हर दिन आसान बनाते हैं।

अभी हाल ही में एंटी डोमेस्टिक वॉयलेंस का कानून आया और इसके आते ही लोगों का विरोध शुरू हो गया?
मैं आपको बताऊं, विरोध वही लोग करते हैं जिन्हें इन कानूनों से खतरा होता है। यानी उन्हीं के लिए इन कानूनों का जन्म हुआ है। हमें पहला काम तो यह करना है कि डरना छोडऩा होगा। किसी भी व्यक्ति को, किसी भी परिस्थिति को अगर जीतना हो तो पहले आत्मविश्वास हासिल करिये। इससे बड़ी कोई ताकत नहीं है। आपका आत्मविश्वास आपका सबसे बड़ा औजार है।

चलिए मुद्दा बदलते हैं। यह बताइये कि फिल्मों का यह जो दौर चल रहा है इसे आप कैसा मानती हैं?
यह बहुत ही अच्छा दौर है। इस दौर की खास बात यह है कि इसमें बहुत अलग विषयों पर भी फिल्में बन रही हैं और कई बार लगता है कि विषयों का दोहराव भी हो रहा है। एक तरफ हॉलीवुड से विषय लेकर फिल्में बन रही हैं, रीमेक फिल्में बन रही हैं। दूसरी तरफ बिलकुल नये विषयों पर भी काम हो रहा है। मल्टीप्लेक्स वगैरह के बनने से दर्शकों के सामने चुनाव की आजादी बढ़ गई है। छोटे बजट की एक्सपेरिमेंटल फिल्में दर्शकों तक कम से कम पहुंच तो पाती हैं। पहले तो इस तरह की फिल्में अक्सर डिब्बों में ही बंद पड़ी रहती थीं।

फिल्मों पर उठने वाले विवाद के बारे में कुछ कहेंगी?
कुछ नहीं, बस इतना कि जब यह सब हो उसे खामोशी से इग्नोर किया जाए। पब्लिक से बढ़कर कोई नहीं। अगर पब्लिक अपनी भूमिका को ठीक से समझे तो काफी समस्याएं सुलझ सकती हैं।

बॉलीवुड में इतनी फिल्में बनती हैं फिर भी ऑस्कर में हम अक्सर पिछड़ जाते हैं ऐसा क्यों?
इस बारे में सोचने से बेहतर है हम आगे की योजनाओं पर अच्छे कॉन्सेप्ट्स पर ध्यान दें। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हमारे यहां की फिल्में ऑस्कर डिजर्व नहीं करती हैं। खैर, इस पर ज्यादा नहीं सोचना चाहिए बस अपने काम पर एकाग्र होना चाहिए।

पिछले दिनों आई फिल्म- हनीमून ट्रैवल में बोमन ईरानी के साथ आपके एक किस सीन को लेकर काफी विवाद हुआ? इस बारे में कुछ कहना चाहेंगी आप?
हंसते हुए... इस बारे में कुछ भी कहना विवाद करने वालों को इंटरटेन करने जैसा होगा। बोमन बहुत अच्छे इंसान हैं और हमने एक साथ काम करके काफी एंज्वॉय किया। मेरे ख्याल से पब्लिक को भी फिल्म पसंद आई।

आज भी थियेटर से पब्लिक को जोडऩे के लिए स्टारडम का इस्तेमाल आखिर क्यों करना पड़ता है?
यह सब तो चलता रहता है। अच्छे प्ले होते हैं तो पब्लिक जाती है। थोड़ा फर्क तो होता ही है लेकिन इससे कंस्ट्रक्टिव और क्रिएटिव काम पर असर नहीं पड़ता है। थियेटर से निकले लोग ज्यादा अच्छी तरह परफॉर्म कर पाते हैं, इस बात से तो कोई इनकार नहीं कर सकता।

आज के यूथ को देखकर आपको क्या लगता है कि सांस्कृतिक मूल्यों से दूर जा रहे हैं?
नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है। सांस्कृतिक मूल्य अब भी कायम हैं और हमारा यूथ इन्हें ठीक से समझ भी रहा है और अपना भी रहा है। थोड़े बहुत बदलवाव तो लािजमी हैं और वे होंगे ही। हमें उन्हें लेकर थोड़ा उदार होना चाहिए। लेकिन होता यह है कि हम वैसे तो आधुनिक होने का दावा करते हैं लेकिन वक्त आने पर एकदम से दकियानूस होने लगते हैं। सच पूछिये तो प्रॉब्लम यूथ में नहीं हममें ही है। हमारे एटीट्यूड में है। आज का यूथ बहुत समझदार है।



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