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कविता : आरक्षण गलि अति सांकरी

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इन दिनों मैं अपने प्रेम को बहुत मुश्किल में पा रहा हूँ
उसे बचाना लगातार कठिन होता जा रहा है मेरे लिए
कागजों में मैं पिछड़ा कहलाता हूँ
मगर मैं जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो खुद को
दलितों से भी अधfk गया बीता पाता हूँ, सोचता हूँ
दलित से भी गया बीता हो सकता है कुछ तो लगता है
दलित से गया बीता तो दलित ही हो सकता है
मेरे लिए यह कोई बात ही नहीं मगर मेरे आस-पास के लिए
ये इर्ष्या की बात है कि मैं पिछड़ा हूँ
और सवर्ण लड़की से प्रेम करता हूँ कठिनतम
और वह सवर्ण लड़की भी मुझसे उतना ही प्रेम करती है
उसने खुद को सौंपते वक्त भी कभी इस वजह से
रोकने की कोशिश नहीं खुद को कि मैं पिछड़ा हूँ
और मुझे उसे सबकुछ नहीं सौंप देना चाहिए अपना
कुछ तो बचाकर रखना चाहिए अपने पास
ताकि रहे कुछ तो अन्तर बाकी उस वक्त मुझमें और उसमें
इन दिनों हमारे बीच जो विकट समस्या
आ खड़ी हुई है वह न तो उसके परिवार और समाज की
इस सनातन सवर्ण आपत्ति के कारण है
कि मैं पिछड़ा एक सवर्ण लड़की से प्रेम
करने की हिमाकत कैसे कर सकता हूँ
मेरी हिम्मत तो उसकी तरफ आँख उठाकर
देखने की भी नहीं होनी चाहिए और मैं हूँ कि
उसे लिये दुनिया भर में डोलता हूँ
मात्र इस वजह से ही अब तक उन्हें मुझे पेड़ से
बाँधकर गोली मार देनी चाहिए थी
या सबके बीच मेरा मुँह काला करके
जूते मारते हुए सरे राह घुमाना चाहिए था
मेरे घर में आग लगा देना चाहिए थी
मेरी माँ और बहनों से बलात्कार कर दिया जाना चाहिए था
और मेरे पिता और भाइयों की भी वही दुर्गति
करनी चाहिए थी जो इस प्रेम की वजह से
मेरी हो जानी चाहिए थी, संयोग है कि
अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है मेरे साथ
हम दोनों बेधड़क प्रेम कर रहे हैं एक दूसरे से
जो समस्या हमारे बीच आ खड़ी हुई
है वह मेरी छोटी जात को लेकर नहीं
मेरी जात को दिये जाने वाले आरक्षण को लेकर है
जिसकी वह सख्त विरोधी है और मैं उसका उदार समर्थक
हम दोनों के बीच प्रेम के बाद दोनों की जरूरत ही है जो मुझे
आरक्षण का समर्थक और उसे विरोधी बनाती है
क्या चीज है ये जरूरत भी जिसके
बारे में किसी से ये अपेक्षा की जाये कि वह
अपनी जरूरतें कुछ कम कर ले,
थोड़ी मिल बाँट ले तो मुश्किल
मैं इन दिनों मुश्किल में हूँ और उसके
आक्रमणों से खुद को बचाने और उतने में ही जितना वह
आरक्षण को समझती है उसे समझाने में ही लगातार
भिड़ा रहता हूँ, सबकी तरफ जब वह भी कहती है
इस मामले में मेरे और तुम्हारे विचार
कभी नहीं मिल सकते, उन्हें रुपया पैसा दो न
ताकि वे प्रतियोगिता लायक बन सकें
आरक्षण की जरूरत क्या है ?
सालों में अकल है नहीं तो क्या करेंगे, देने से अकल
तो आ नहीं जायेगी, रहेंगे तो वही के वही
साले जूठन खोर, बगल से निकल जाये तो
देर तक चमड़े की गन्ध नहीं जाती
जब इतने आक्रामक होकर आरक्षण विरोध
और उनके बारे में बोल रही होती है तो मुझे लगता है
पता नहीं आज से मुझे ये चूमेगी भी या नहीं
ऐसे ही डॉक्टर बनेंगे तो मरीजों का क्या होगा
बताओ अब तुम बताओ
तुम्हारे पास इस बात का कोई जवाब है
तब मैं डरते डरते उससे कहता हूँ
मगर किसी दलित डॉक्टर ने तो किसी मरीज के पेट में
आज तक कैंची या तौलिया नहीं छोड़ी
तब वह और गुस्साते हुए कहती है
साले सर्जन बन पायें तब न
यही तो मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि मैंने
किसी दलित डॉक्टर सर्जन के बारे में नहीं सुना
फिर कौशल तो अभ्यास से पैदा होता है भाई
अच्छा बड़ा पक्ष ले रहे हो उनका, मगर आगे वह
कुछ नहीं कहती, मगर मैं डरता हूँ जो आज तक
उसने नहीं कहा किसी दिन वो ये न कह दे
पक्ष क्यों नहीं लोगे
आखिर तुम भी तो उन्हीं में से एक हो न
पता है ये अफसर भले ही बन जाते हो
मगर नीति निर्धारण में कोई इन्हें पूछता भी नहीं
साले एक तरफ चुपचाप बैठे रहते हैं
कुछ कहते भी हैं तो डपट दिया जाता है
अरे साहस और समझ आरक्षण देने से नहीं आ जाती
परम्परा से आती है और परम्परा तो होती है बस
बाजार में नहीं मिलती समझें साले नीच हरामखोर
हराम हम मरे जा रहे हैं पढ़-पढ़ के मरे
और इन्हें बिना कुछ करे धरे ही सब हासिल
तब तो ये और भी बुरा व्यवहार होता है उनकी आवाज
हर जगह दबा दी जाती है तो क्या मतलब उन्हें
आरक्षण की जगह रुपया पैसा दिये जाने का
वे हमारे ही लोग हैं भाई
वह तमतमा कर कहती है बने रहे हमारे लोग
आरक्षण नहीं होना चाहिए तो नहीं होना चाहिए बस
समझे इस मामले में सब बराबर इन्हें सुविधा दो
रुपया पैसा दो और कहो सबके बीच आयें और
खुद को साबित करें समझे, जब मैं कहता हूँ नहीं यह
ठीक नहीं तो वह तमतमाकर कहती है क्यों ठीक नहीं
अरे भाई अगर थाली में भरे लड्डुओं को
ये पचास तुम्हारे और पचास तुम्हारे
बराबर से बाँट दिया जाये तो क्या बुराई तुम तो
चाहती हो उन्हें खुले में रख दिया जाये
और कहा जाये जिसमें हिम्मत हो वो उठा ले

अब तुम्हीं बताओ लड्डू भी रखने वाले तुम
लाठियाँ भी तुम्हारी और दूसरे तरफ वे नंगे निहत्थे निर्धन
इतना सुनते ही वह भड़क उठती है
अच्छा वे नंगे निहत्थे हैं तो क्या हमारी वजह से हैं
अपने कर्मों की वजह से हैं साले नीच
क्या हम सवर्णों में गरीब नहीं होते
क्या अकेले वे ही निर्धन हैं
तब मैं उससे कहता हूँ कौन कहता है
सवर्णों में कोई गरीब नहीं होता है
मगर एक बात बताऊँ सवर्णों में गरीब तो होते हैं
मगर वे गरीब दलित नहीं होते
वे गरीब नीच अछूत और हरिजन नहीं होते
वे गरीब होने के बाद भी सवर्ण ही होते हैं
मैं चुपचाप देर तक उसकी बात सुनता रहता हूँ
फिर देर तक मेरे और उसके बीच खामोशी
पसरी रहती है मगर मैं भीतर ही भीतर सकपकाता रहता हूँ
कहीं वह आज के बाद मेरा तुमसे कोई रिश्ता नहीं
यह कहते हुए अपना बैग उठाकर चल न दे
उसके तमाम विरोधी तर्कों कुतर्कों को लगातार
झेलने के बीच जब मैं कहता हूँ
अच्छा सुनो जहाँ तक आरक्षण विरोध का
प्रश्न है वह मेरे आगे तो ठीक
तुम यह विरोध राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा
जिसकी तैयारी में तुम पागल जैसी हो में
दर्ज मत कर आना समझे
वहाँ शासन की मंशा के अनुसार ही दिखना
हाँ वो तो मैं समझती हूँ मुझे बार-बार बताने की जरूरत नहीं
मगर आरक्षण नहीं होना चाहिए तो नहीं होना चाहिए बस
इस मामले में मेरी और तुम्हारी
समझ कभी नहीं मिल सकती
साला मुझे एक बार मौका मिल जाये बस
इन्हें मार मारकर ठीक
और आरक्षण खत्म न कर दिया तो मेरा नाम नहीं
आरक्षण को लेकर उसके भीतर से बहकर
बाहर निकलती नफरत में मैं कई दफे
उड़ते-उड़ते बचता हूँ
जब भी बचता हूँ बचते हुए जरा
कबीर के कहे को इस तरह कहना नहीं भूलता
आरक्षण गली अति सांकरी जामे प्रेम फँस जाये.

Pawan Karanकवि परिचय: पवन करण

जन्म: 18 जून 1964.

शिक्षा: हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, जनसंचार एवं मानव संसाधन विकास में जनसंचार में स्नातकोत्तर पत्रोपाद्यि.

प्रकाशन, सम्मान एवं अन्य उपलब्धियाँ: वर्ष 2000 में म0प्र0 साहित्य परिषद के सहयोग से पहला कविता संग्रह ‘इस तरह मैं’ प्रकाशित, वर्ष 2004 में दूसरा कविता संग्रह ‘स्त्री मेरे भीतर’ प्रकाषित, कविता संग्रह ‘इस तरह मैं’ पर वर्ष 2000 में म0प्र0 साहित्य अकादमी का ‘रामविलास शर्मा’ पुरस्कार, वर्ष 2002 में म0प्र0 कला परिषद का प्रतिष्ठित ‘रजा पुरस्कार’, कविता संग्रह ‘स्त्री मेरे भीतर’ पर वर्ष 2004 में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वागीष्वरी सम्मान, वर्ष 2006 में मास्को (रूस) का पुष्किन सम्मान, वर्ष 2007 का राग विराग कला केन्द्र नई दिल्ली का शीला सम्मान, म0प्र0 के प्रमुख समाचार पत्र ‘नवभारत’ में प्रति गुरुवार प्रकाशित होने वाले साहित्यिक पृष्ष्ठ ‘सज्जन’ का पाँच बरसों तक सम्पादन, साहित्य केन्द्रित साप्ताहिक स्तंभ शब्द-प्रसंग का नियमित लेखन.

सम्पर्क: सावित्री आई-10, साइट नं0 1, सिटी सेन्टर, ग्वालियर-474002 (म0प्र0)



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