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यायावर की डायरी – साँसों के बाजे

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एक गोल घेरे में कुछ लोग थिरक रहे थे. रंग बिरंगी पोशाकों में. लड़के-लड़कियाँ, बुजुर्ग-अधेड़.चैतरफ रंगीनियाँ और आतिशबाजी. लकदक गहनों से चकाचौंध पैदा करती महिलाएँ. इस सबको टुकुर टुकुर ताकती कुछ कतारबद्ध लड़कियाँ जिनके सिरों पर रोशनियाँ थीं. वे इन सबको राह दिखा रही थीं ताकि इन सबकी चमक दमक दिखती रहे. पर इनके अपने पाँवों तले भी दिन भर की गरम, अब कुछ ठंडी होती पथरीली अंधेरे में डूबी डगर, जिसे वे ऐड़ियों के बल ढूँढ रही थीं. करीब-करीब घिसटते हुए. इनके सिरों पर रोशनी के हंडे थे.

इन्हीं के साथ चमक-दमक वाले कलफ लगे वस्त्रों से लैस कुछ लोग भी थे, पर इन वस्त्रों के बीच उनका शरीर किसी बरसों पुरानी काली पड़ी जर्जर शहतीर की तरह था जिसे किसी तरह यह कलफ लगी वरदी थामे हुए थी. सफेद झक्क चमकीली. कमर और कंधे के बीच लाल चमकीली पट्टी जिस पर चिलचिलाती बारीक पन्नियाँ और हाथों में थे बैंड. भिन्न-भिन्न आकार के.डायपिट, ल्यारनेट, ट्रामोन तो कारनेट, सेक्सोफोन के साथ ड्रम, साइड ड्रम, तम्बूर और झांझ भी. आगे-आगे बैंड मास्टर जिसके हाथ में एक गोल पतली सी छड़ी. उसी के इशारे पर इनके बैंड फेफड़ों से निकलती साँसों से राग छोड़ते और नाचने. वाले वाह-वाह कर जोश में आ जाते.

शादी ब्याह के दिनों में यह दृश्य आपको शहर के किसी भी गली मौहल्ले में देखने को मिल जायेगा. विशेषकर गर्मियों के दिनों में. जब अबूझ सावों की भरमार होती है.

वह शादी ही क्या जिसमें बैंड न बजे. बैंडबाजों में भी समय के अनुसार नये-नये इजाफे हो गये. ट्राली पर रंग बिरंगे हंस, कमल आदि के आकार और उस पर माइक या एकार्डियन के साथ ताजा फिल्मी गीतों से लेकर पारम्परिक लोग गीत गाता कोई युवक और उसी धुन पर बैंड बजाते दूसरे कलाकार. बैंड वालों व घोड़ी पर चढ़े दूल्हे के बीच मटक-मटककर नाचते बराती. एक ऐसा समां कि रास्ते चलते लोग ठिठककर खड़े हो जाते हैं तो खुल जाती हैं, घरों की खिड़कियाँ और दरवाजे. बच्चे अपनी माँओं से जिद करते हैं कि कब होगी उनकी शादी और जिन युवकों की नहीं हुई होती है वे उदास हो उठते हैं.

ग्यारह मई का दिन था. एक दिन में कई शादियाँ तय थीं और बैंड वाले थे एक को निपटाकर दूसरी ओर भाग रहे थे. रात के दस बज रहे थे और बाराती अभी तक अपने फरमाइशी गानों पर अड़े थे. जुम्मे खां थे कि अपी साँसों की धौकनी चलाए जा रहे थे. मास्टर की धुकधुकी बढ़ रही थी कि अगली बरात में टेम पर नहीं पहुँचे तो क्या होगा? यह भी संयोग था कि मुझे भी एक और बरात में जाना था और यह वही बरात थी जहाँ इन बैंडवालों को जाना था. रात के ग्यारह बजे जब मैं अपने मित्र के साथ उस विवाह में गया तो वहाँ जुम्मे खां एंड पार्टी तैयार थी. उसी तरह साँसों की धौकनी के साथ. जुम्मे खां ने ही कहा कि यह हमारी सासों की धौंकनी है, बैंड नहीं. बेंड तो मास्टर का है.

यह आज की आखिरी शादी थी और जुम्मे फुरसत में था. पता नहीं पिछले कितने बरसों से वह अपनी साँसों का बाजा बजाता आ रहा था. एक समय था मास्टर दाद देता था पर आज बीच-बीच में साँस उखड़ जाती है. इसलिए अब वह सिर्फ शामिल बाजा है. एक दिन मास्टर ने कहा कि आज झांझ बजाओ तो बिफर पड़ा- जब साँसें थीं तब बाजा और आज झांझ? उस दिन फिर उसने जिस तन्मयता से बजाया तो मास्टर भी दंग रह गया. पर कई दिनों तक लगता रहा कि साँस अब उखडी़ कि तब. कई दिनों बाद काम पर लौटा था. मास्टर को उसने कहा कि चाहे दिखाने के लिए ही हो पर हाथ में रहेगा बैंड. बीच बीच में फूंक मारता रहूँगा पर झांझ हाथ में नहीं लूँगा. पुराना आदमी होने के कारण मालिक ने भी कुछ नहीं कहा, जबकि आज हकीकत में वह शामिल बाजा ही है. बीच-बीच में जोश आता है पर साँसें अटक जाती हैं.

“आपके इस समाज में भी तो शामिल बाजा ही हूँ.” जुम्मे ने कहा तो मैंने देखा और सोचा कि आज मेनस्ट्रीम में वह कहाँ है? बैंड बाजे वालों में आखिरी व्यक्ति की तरह समाज के कोने में खड़ा आखिरी आदमी.

जुम्मे ही नहीं, छोटू, यासीन, लाला सभी का यही हाल है. कोई लगी बंधी नौकरी नहीं. काम है उन दिनों खूब है. बाकी बैठे रहो. एक दिन ऐसा भी आता है कि हारकर बैठ जाओ खाँसी की खुल-खुल के साथ. कुछ वेतनभोगी भी होते हैं पर उनका वेतन इतना नाम मात्र का होता है कि परिवार मुश्किल से चल पाता है. बल्कि एक तरह से बंधुआ मजदूर ही होते हैं वे. दुकान की साफ-सफाई से लेकर घरेलू काम तक. एक सीजन में मालिक कितना कमा लेता है इन्हें कुछ पता नहीं होता. वह तो सिर्फ दिहाड़ी देता है या बरात के हिसाब से. लाला बताता है कि मुख्य कलाकार तो चार-पाँच ही होते हैं, जिन्हें जरूर ज्यादा मिलता है. बाकी तो शामिल बाजे में लोग अपनी शान समझते हैं. इसलिए बैंडवाले आदमियों की संख्या बढ़ा देते हैं. वर्दी पहनकर हाथ में कुछ भी पकड़ा देते हैं.

पुराने दिनों को याद कर लाला उदास हो जाता है- पहले कलाकार की पूछ बैंड मालिक ही नहीं बरात वाले भी करते थे. खाना भी खिलाते थे और बरात की तरह विदा भी. अब खाना तो दूर पानी की भी पूछ नहीं. पहले अच्छे गाने पर नोटों की बरसात हो जाती थी. अब सब स्याणे हो गये.

यही दर्द यासीन का था और छोटू का भी जो अकेला दूर चुप खड़ा था. जब उसे कुरेदा तो सारे खिलखिलाकर हँस पड़े. “साब, इसने सैकड़ों शादियों में बजाया होगा पर इसका अपना बाजा नहीं बजा आज तक.” एक ने कहा तो छोटू शरमाकर वहीं सिमट अगया जैसे मैंने उसकी आँखों में झाँककर देखा तो उनमें अटके लाल डोरे कई रंगों में बदल गये थे. उसने मेरे करीब आकर धीरे से कहा-मेरे नहीं बजा तो क्या औरों की शादियों में बजाकर खुश हो लेता हूँ. कहते हुए उसके चेहरे पर बच्चे का सा भाव था जो अनजान व्यक्ति में अपने व्यक्त को ढूँढकर खुश हो लेता है और न मिलने पर जोर से रोने लगता है.

मैंने उससे कहा था तेरे एक बार बजा जबकि मैं जीवन भर बाजे में ही रहूँगा. कहकर छोटू चुप हो गया. चौंककर मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा- किससे? “छोड़ो साब आई गयी बातों को क्यों याद करूं. क्या पता था यह सब रोज झेलना पडे़गा. आज भी बाजा बजाते हुए कई बार उदास हो उठता हूँ. साँस फूल जाती है. रोंगटे खडे़ हो जाते हैं” कहकर वह वहाँ से चला जाता है मेरी यह बात बिना सुने कि मेरा दुख भी तुम्हारे दुख में शामिल है छोटू और मैं भी वहाँ से लौट आता हूँ


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