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व्यंग्‍यकथा : ककउआ डॉट कॉम

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आइए, आइए. आपका स्वागत है. घर ढूँढने में परेशानी तो नहीं हुई. इलाके के बारे में तो आपको मैंने ठीक से समझा दिया था. आइए बैठिए. अरे उस कुर्सी पर क्यों बैठ रहे हैं? इधर बैठिए, सोफे पर. बी कंफर्टेबल. जूता पहने रहिए और कालीन के गंदा होने की चिंता न कीजिए. आराम से बैठिए.

क्या लेंगे? क्या कहा? चाय? अरे चाय भी कोई पीने की चीज है. वो भी शाम को. मेरे कहने का मतलब है कि व्हिस्की, रम, बीयर या वोदका में से क्या लेंगे? या वाइन लेंगे. सब है अपने पास. आपको इतनी दूर से बुलाया है तो सिर्फ चाय-कॉफी के लिए थोड़े ही बुलाया है. क्या बोल रहे हैं आप कि ड्रिंक नहीं करते? फिर साहित्य कैसे करते हैं?

हा हा हा.....! नाराज मत होइएगा. यों ही कह दिया.

अरे रीना, इधर सुनो, देखो कौन आया है. ये हैं कपिल जी. हिन्दी के बहुत बड़े आलोचक हैं. और ये हैं मेरी पत्नी रीना. कविताएँ लिखती हैं. आपने पढ़ी होंगी. पिछले महीने ही तो इनकी कविताएँ ‘रचनाकार’ में आई थीं. एक संकलन भी आ चुका है इनका. ‘नदी हूँ मैं नाम से.’  तेरह समीक्षाएँ आ चुकी हैं उसकी. आपने तो देखी ही होंगी. आपसे क्या छिपा है. आप इतने बड़े आलोचक जो ठहरे. रीना जरा चाय वगैरह लाओ भाई. ये तो बड़े साधु आदमी हैं. जो हम लेते हैं वो ये नहीं लेते.

और कैसा चल रहा है कपिल जी? साहित्य की दुनिया के क्या हालचाल हैं? आप तो जानते ही हैं कि मैं ज्यादा बाहर आता जाता नहीं. और बाहर क्यों निकलूं? मुझे तो ये सब वक्त की बर्बादी लगती है. सहित्य की राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है. ऊपर से ज्यादातर साहित्यकार एक दूसरे के निंदा अभियान में लगे रहते हैं. कोई साहित्य की बात नहीं करता. और ड्रिंक करना है अपने घर पर अपने पैसे से करो. क्यों दूसरों पर पैसा बर्बाद करो. आप तो जानते ही हैं कि आजकल जिसकी पीते हैं बाहर निकलकर उसी को गरियाते हैं. समाज में नैतिकता की ऐसी की तैसी हो रही है. हर आदमी सिर्फ अपने फायदे में लगा है. साहित्य भी एक धंधा बन गया है. ये सब बाजारवाद का असर है. बाजार ने साहित्य के लिए जगह नहीं छोड़ी. मैं तो कब से कह रहा हूँ कि बाजारवाद हमें कहीं का नहीं छोड़नेवाला. लेकिन कोई सुनता नहीं.

बड़े दिनों से आपका आना टल रहा था. सच पूछिए तो हिंदी की दुनिया में संवाद नहीं है. हम सब अपने में सिमट गये हैं. लोग आपस में मिलते जुलते नहीं. एक दूसरे की रचनाओं पर खुलकर राय नहीं देते. हाँ सामने मिलने पर तारीफ करते हैं लेकिन पीठ फेरते ही निंदा अभियान में लग जाते हैं...वैसे आप तो लिखते पढ़ते रहते हैं. मैं औरों की बातें कर रहा हूँ. सबसे बुरी बात तो ये कि कोई पढ़ने को तैयार ही नहीं. पाठकों की संख्या बड़ी तेजी से घट रही है. हालात तो ऐसे हो रहे हैं कि जो लिख रहा है उसी को अपना लिखा पढ़ना पड़ रहा है. ये लीजिए चाय आ गयी. और ये मिठाई और नमकीन भी. चीनी कितनी लेंगे आप. नहीं लेंगे? अच्छा तो आपने चीनी लेना बंद कर दिया. अच्छा किया...मैं जरा अपना ड्रिंक बना लूँ. चीयर्स.

हाँ तो मैं क्या कह रहा था. हाँ याद आया. मैं कह रहा था. हिन्दी में पाठकों की सख्या बड़ी कम होती जा रही है. कहाँ जाएगी हमारी भाषा और किधर जाएगा हमारा साहित्य? किस तरह का समाज हम बना रहे हैं?

खैर छोड़िए. आप भी सोच रहे होंगे कि मैं भी कौन सा राग अलाप रहा हूँ. ये देखिये मेरा नया कहानी संग्रह आ गया है- ‘रसोगम’. क्या पूछा आपने कि नाम का क्या मतलब है कोई मतलब नहीं. ये नाम इसलिए रखा है कि लोग इसी बहाने इसकी तरफ आकृष्ट हो जायें. लेकिन अब तो मैं निराश हो गया हूँ. आप देखिए न, इस संग्रह को आये तीन महीने हो चुके हैं लेकिन अभी तक हिंदी में एक भी समीक्षा नहीं आयी. सच पूछिये तो लोग जलते हैं मुझसे. इसकी एक कहानी का नाट्य रूपांतर रतलाम में हो चुका है जिसके प्रदर्शन के दौरान बत्तीस बार तालियाँ बजी थीं. बत्तीस बार. और भी कई जगहों पर बाकी कहानियों के नाट्य रूपांतर होने वाले हैं इसके. मुंबई के एक निर्देशक ने तो फिल्म बनाने की बात की है. अगले हफ्ते वे मुझसे मिलने आने वाले हैं. लेकिन अपने यहाँ साहित्य में इतनी राजनीति है कि कोई नाम तक नहीं ले रहा है.

ये मैं जरा टी.वी. बंद कर दूँ बम फटने का फ्लैश आ रहा है. चालीस लोग मर गये, अस्सी घायल, अब सारे चैनलों पर यही चलेगा और बोर करेगा. कोई ढंग की खबर नहीं होती अपने चैनलों के पास. यहाँ बम फटा वहाँ बम फटा. इतने मरे इतने घायल. और अपनी पुलिस भी बहुत नकारा है. पता नहीं क्या करती हैं. लोग आते हैं ओर बम फोड़कर चले जाते हैं और पुलिस वाले बैठे रहते हैं. सच पूछिये तो अपना लोकतंत्र, असफल हो गया है. चाहे नेता हो या पुलिस, सब अपने बारे में सोचते हैं. देश के बारे में तो कोई सोचता ही नहीं.

आपने मेरे पुराना कहानी संग्रह तो देखा होगा. बड़ा चर्चित रहा. कई विदेशी भाषाओं में उसका अनुवाद हो चुका है. जर्मनी में तो उस पर एक लड़की शोध भी कर रही है. लेकिन अपने यहाँ के हिंदी विभागों की हालत के बारे में तो आप जानते ही हैं. कहीं कोई हलचल नहीं है. कहीं पढ़ाई लिखाई का माहौल नहीं बचा है. मैंने तो एक कहानी भी लिखी है- ‘तीन तिलंगे’ जो हिंदी के तीन प्रोफेसरों के बारे में है. काफी चर्चित रही. कई लोगों ने उसके बारे में मुझे चिट्ठी लिखी है. वो चिट्ठियाँ हैं मेरे पास. आप देखेंगे? अरे रीना, जरा वो चिट्ठियाँ लाना जो नीले रंग की फाइल में रखी हैं. हाँ-हाँ वहीं जो पाँच साल पहले बनाई थी....पढ़कर सुनाऊँ आपको. नहीं ज्यादा देर नहीं लगेगी. सिपर्फ चार चिट्ठियाँ हैं. ये सुनिये.

.....देखा आपने. पाठक मुझे इतना चाहता है. आपको बता ही चुका हूँ कि रतलाम में मेरी कहानी पर हुए नाट्य प्रदर्शन के दौरान बत्तीस बार तालियाँ बजीं. बत्तीस बार. लेकिन आप तो सब जानते ही हैं. अपनी भाषा में किसी का कोई मोल नहीं. अब देखिए न....इस बार साहित्य अकादेमी पुरस्कार बघेला को मिल गया. क्या लिखा है उसने? मुझसे ज्यादा तो नहीं लिखा है उसने. लेकिन तिकड़म करके अच्छी अच्छी समीक्षाएँ छपवा लेता है. सुनता हूँ अपने घर पर पार्टियाँ भी देता है. क्या बताऊँ आपको. आजकल कोई नैतिकता नहीं बची है. लोग अपने यहाँ आलोचकों को बुला लेते हैं. उनका स्वागत सत्कार करते हैं अपने ऊपर लिखवाते हैं और फिर पुरस्कार झटक लेते हैं. क्या होगा साहित्य का? जहाँ लोग तिकड़म से पुरस्कार झटक लेते हैं और समीक्षाएँ लिखवा लेते हैं. उस साहित्य का क्या होगा? मैं तो कहता हूँ इस पर हम सबको मिलकर विचार करना चाहिए. बहुत बुरे हाल हैं भाई साब, बहुत बुरे. जिसे देखो वहीं कुछ हथियाने में लगा है कोई पुरस्कार तो कोई विदेश यात्रा.

अरे हाँ इसी बहाने याद आया कि कुछ दिन पहले मैं अमेरिका गया था. अपने संस्कृति मंत्रलय ने भेजा था. वहाँ कई जगहों पर गया. उनका जल्दी ही संस्मरण लिखूँगा. संस्मरण की विधा में इधर कुछ नया नहीं हुआ है. लेकिन जब मेरी किताब आयेगी तो देखियेगा हंगामा होगा अपको दूँगा. अपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी.

एक बात कहूँ. बुरा मत मानिएगा. हालाँकि आजकल लोग खरी खरी बात कहने पर बुरा मान लेते हैं. पर मैं जानता हूँ. आप ऐसे लोगों में नहीं हैं. दरअसल आपसे मेरी एक शिकायत है. आपने कभी भी मेरी किताब पर कुछ नहीं लिखा. और रीना की भी किताब पर भी कुछ नहीं लिखा. आपको बता चुका हूँ. तेरह समीक्षाएँ आ चुकी हैं उसके संग्रह के ऊपर. वैसे तो हिन्दी में आलोचना की बहुत बुरी हालत है. लेकिन हम सब जानते हैं आपकी अपनी हैसियत है. आप जो लिखते हैं उसकी कद्र है हिंदी में.

क्या कहा आपने कि आप कविता पर नहीं लिखते. आश्चर्य की बात है कि आजतक आपने कविता पर नहीं लिखा. वैसे एक बात आपको कहूँ. जिसकी अपनी हैसियत होती है वे कविता पर लिखें या कहानी पर- सबका असर होता है और हर आदमी किसी चीज की शुरुआत कभी न कभी तो करता है. आज करे या कल. इसलिए अगर आप रीना के काव्य संग्रह से ही उसकी शुरुआत कर दें तो अच्छा रहेगा. आप प्लीज बुरा मत मानियेगा. आपसे उम्र में छोटा हूँ लेकिन मैंने भी दुनिया देखी है इसलिए कह रहा हूँ कि अच्छे आलोचक की सबसे बड़ी पहचान ये है कि वो उन रचनाओं पर लिखे जो गुणवत्ता की दृष्टि से बेहतर हों.

दरअसल आपको बुलाने का मकसद ही यही था कि संवाद हो, जो कि हिंदी में बहुत कम हो गया है. लोग अपनी ढफली अपना राग अलाप रहे हैं. और आलोचना का क्या धर्म होता है इसे आपसे बेहतर कौन जानता है. संवाद. लेखक से संवाद. रचना से संवाद. आज हिंदी साहित्य का यही संकट है आलोचना और रचना के बीच की दूरी बढ़ गयी. अच्छी रचना को अच्छे गुणग्राही पाठक नहीं मिलते. वैसे तो मैं कह चुका हूँ कि रीना के काव्य संग्रह पर तेरह समीक्षाएँ आ चुकी हैं. वे सब अच्छी पत्र पत्रिकाओं में छपी हैं लेकिन जो बातें इन समीक्षाओं में आनी चाहिए थी वो नहीं आयी ठीक है हिंदी में और भी कवयित्रियाँ हैं जो अच्छी कविताएँ लिख रही हैं. लेकिन रीना की जो भाषा है, उसकी संवेदनशीलता की जो व्यापकता है, उसे ठीक से विश्लेषित नहीं किया गया है. मैं ये सब इसलिए नहीं कर रहा हूँ, कि उसका पति हूँ बल्कि इस नाते कह रहा हूँ कि मैं साहित्य का एक गंभीर पाठक हूँ. मुझे ये बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि जो अच्छा लिखा जा रहा है कि उसकी खासियत दबी रहे इसलिए मैं तो कहता हूँ एक आपद धर्म की तरह अपको रीना की कविता पर लिखने का संकल्प लेना चाहिए.

अरे हाँ, एक बात बतलाना तो आपसे भूल ही गया आप जय प्रकाश जी को जानते हैं न. वही जो दूरदर्शन में डिप्टी डायरेक्टर हैं. बड़े पुराने दोस्त हैं मेरे. अक्सर शाम को घर आते हैं. वो अगले महीने की बीस तारीख को मेरे नए कहानी संग्रह पर एक कार्यक्रम करने जा रहे हैं. साहित्य प्रेमी जीव हैं. उनके भी कई कविता संग्रह आ चुके हैं. विदेश में भी कविता पढ़ चुके हैं. वो भी इस बात से काफी दुखी हैं कि हिंदी में संवाद की कमी है. पिछले हफ्ते वे यही बात कर रहे थे. तो मैंने कह दिया कि भाई इतने चिंतित हो तो दूरदर्शन पर संवाद नाम से एक कार्यक्रम शुरू कर दो जिसमें आलोचक और कवि या कहानीकार से संवाद करा दो. मैंने तो ये बात मजाक में कही थी लेकिन उन्होंने गंभीरता से ले लिया. अगले हफ्ते से उन्होंने दूरदर्शन पर संवाद नाम का कार्यक्रम शुरू करने का पफैसला कर लिया है. वो कहावत तो आपने सुनी होगी- जो बोले सो दरवाजा खोले. यही काम उन्होंने किया और पहला कार्यक्रम मुझसे शुरू कराना तय किया. ये तो बदमाशी हुई भाई. किंतु क्या करें. यारी दोस्ती में तो इतना तो चलता है. मगर उन्होंने एक और शरारत दी. उन्होंने मेरे ऊपर ही ये भार डाल दिया कि मेरे साथ हिंदी का कौन सा आलोचक संवाद करेगा. आप तो जानते ही हैं. मेरी जान पहचान बहुत कम लोगों से है. और आलोचकों से तो और कम है. इसलिए मेरे दिमाग में सिर्फ आपका नाम आया सो मैंने आपसे पूछे बिना उनसे कह दिया कि भाई साहब के अलावा किसी और से मैं संवाद नहीं करूँगा.

दूरदर्शन में चिट्ठी बन गयी है. कल तक शायद आपके पास पहुँच जाए. प्लीज इनकार मत कीजिएगा. दोस्ती में इतना तो चलता है कि हम एक दूसरे के प्रति औपचारिक न हों. और अगर आपने संग्रह न पढ़ा हो तो कोई बात नहीं मेरे पास एक प्रति है जो मैं आपको दे देता हूँ. और मैंने कुछ प्वाइंट्स भी बना दिये हैं जो सवाल पूछने में आपकी मदद करेंगे. रीना जरा वो फाइल लाना जो मैंने भाई साहब के लिए कल रात में तैयार की थी....हाँ ये लीजिए. ये फाईल आपकी काफी मदद करेगी. मोटी लग रही है आपको. इसका भी जवाब दे देता हूँ. इसके मोटी होने की वजह यह है कि आपका खयाल रखा है हमने. इसमें आपके सामने आनेवाली हर मुश्किल का हल है. इसमें मेरे पिछले सभी कहानी संग्रहों की समीक्षाओं के फोटो स्टेट हैं. यानी आपने मेरी पिछली कहानियाँ नहीं भी पढ़ी होंगी तो भी आप उनके बारे में आसानी से सवाल पूछ सकेंगे. देखिये, हिंदी में संवाद अधिक से अधिक हो उसके लिए जितनी जिम्मेदारी आलोचक की है उतनी ही कवि या कथाकार की भी. इसीलिए मैंने ये सब बंदोबस्त किया है.

एक बात और बताऊँ. मैंने अपना ब्लॉग भी बना लिया है. आपने देखा. नहीं देखा. क्या बोले ब्लॉग नहीं देखते. भाई साहब ऐसे कैसे चलेगा. हिंदी वालों की यही तो दिक्कत है कि वे टेक्नॉलोजी से नहीं जुड़ते हैं इसीलिए तो हम पश्चिमी देशों से पिछड़े हैं. मेरी मानिए तो आप सबसे पहले एक कंप्यूटर ले लीजिए. क्या? आपके पास कंप्यूटर है फिर भी ब्लॉग नहीं देखते. ये तो कोई बात नहीं हुई. बहरहाल आइए आपको अपना ब्लॉग दिखाता हूँ. रीना...जरा लैपटॉप लाना.

हाँ देखिये. ये है मेरा और रीना का ब्लॉग. ककउआ डॉट कॉम. यानी कविता कहानी उपन्यास आलोचना डॉटकाम. इस पर लगातार हिट आ रहे हैं. रीना की कविता पर तो कई लोगों को विचार भी आ गये हैं. और ये दखिए मेरे ब्लॉग पर तो आपको मेरे बारे में इतनी सारी जानकारियाँ भी मिलेंगी. मेरी छोटी सी आत्मकथा भी है यहाँ. ये देखिये. मेरे और रीना के कुछ फोटो भी हैं. यहाँ हमारी शादी के भी फोटो हैं और मेरे बच्चों के भी. ये सब मैंने इसलिए किया हे कि मेरे ऊपर किसी विश्वविद्यालय में शोध हो तो शोधार्थी को ज्यादा दिक्कत न हो. या मेरे ऊपर कोई डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाना चाहे तो उसे आसानी हो.

आप बार-बार घड़ी क्यों देख रहे हैं. घर जाने जल्दी है क्या? मुझे मालूम है आप यहाँ तक बस में आये हैं. भाई साहब आपको मेरी दूर दृष्टि की तारीफ करनी होगी. इस बारे में भी मैंने पहले ही सोच लिया था. आपके लिए टैक्सी की व्यवस्था कर दी है...क्या समझे? इसलिए आराम से बैठिये. अभी तो हम डिनर लेंगे. क्या लेंगे? इंडियन या चाइनीज? खाना मैंने घर में इसलिए नहीं बनवाया कि किसी को परेशानी न हो. न आपको न हमें. आप जो कहें वो हम उसका आर्डर दे देंगे. और इस दौरान रीना की कविताएँ सुनेंगे. रीना डार्लिंग....अपना संग्रह लेकर आना. कुछ नई और ताजी कविताएं भी लाना. पता नहीं भाई साहब को फिर आने का कब वक्त मिले. इसलिए समय का पूरा सदुपयोग करना है. ऐसे ही तो हम सबके बीच संवाद बनेगा.

ई 102, अपाटमेंट्स, सेक्टर-9, वसुंधरा, गाजियाबाद



1939
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