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विमर्श नहीं, दलित जीवन-कथा

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पुस्तक - मेरा बचपच मेरे कंधों पर

लेखक - श्यौराज सिंह बेचैन

प्रकाशन - वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली-2

श्यौराज सिंह बेचैन की आत्मकथा ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ (2009, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली) से यह बात एक बार फिर शिद्दत से रेखांकित हुई कि दलित आत्मकथनों का प्रकाशन कितना जरूरी है. हिन्दी दलित साहित्य आत्मकथन विधा में धीरे-धीरे समृद्वि की ओर बढ़ रहा है. इस विधा की अब तक जितनी कृतियाँ प्रकाश में आयी हैं उन्हें देखकर ऐसा कहीं नहीं लगता कि उनमें दोहराव है. गौरतलब यह भी है कि अधिकांश आत्मकथन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं. ‘अपने-अपने पिंजरे’ (मेरठ), ‘जूठन’ (मुजफ्फरनगर), ‘तिरस्कृत’, ‘संतप्त’ (अलीगढ़) और ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ (बदायूँ) जैसे आत्मकथन एक जोन के होने के बावजूद ‘एकसापन’ से मुक्त हैं, अनूठे और विलक्षण हैं. माँग करनी चाहिए कि दलित आत्मकथन एक अभियान के तहत बड़ी संख्या में लगातार लिखे जाएं, प्रकाशित हों और यह सिलसिला तब तक चले जब तक जीवन-स्थितियों और घटना-प्रसंगांे की आवृत्ति न होने लगे. अभी कितने ही इलाके और कितनी ही दलित जातियाँ हैं जहांँ से एक भी आत्मकथन अस्तित्व में नहीं आया है.

‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’ के आखिरी पन्ने से यह सूचना मिलती है कि प्रस्तुत पुस्तक आत्मकथा लेखन की उनकी वृहद परियोजना का पहला हिस्सा है. इस हिस्से में जन्म से लेकर हाईस्कूल पास करने की यात्रा शामिल है. चार सौ पृष्ठों की यह किताब वस्तुतः उनकी संघर्ष-गाथा है. आशंका, अवसाद और तनाव से भरी हुई एक दलित बच्चे की जिन्दगी से रूबरू कराती यह रचना एक ऐसा सामाजिक साक्ष्य बन जाती है जिससे एक बार गुजरे बिना परिवर्तन और नवनिर्माण का कोई ‘ब्लूपिं्रट’ तैयार करना नामुमकिन लगने लगता है. भूख और शिक्षा-इस किताब के ये दो नियामक-निर्धारक बिंदु हैं. भूख हर क्षण विकराल होती असामधेय प्रश्न-शृंखला है. होश संभालने से लेकर किशोरावस्था में पाँव रखने तक भूख का एक चिलकता अहसास हर पल बना रहता है. भूख से निजात पाने के अनगिनत कड़वे प्रसंग, अनथक और कारुणिक प्रयत्न पुस्तक में दर्ज हैं- ‘नाना जी ने किसी गलती पर मुझे दूर से ही डाँटा तो मेरा पेशाब निकल गया. पेशाब की पतली धार सीधी दाल के बरतन में गयी. मूतता हुआ उठा और उठकर सामने नाली में बाकी पेशाब कर के आया. लेकिन मैंने डर के मारे किसी को यह नहीं बताया कि दाल खाने लायक नहीं रही बल्कि भूख की तीव्रता में मैं वही पेशाब मिश्रित दाल खाता रहा’. (पृ-179) बचपन में ही बेगारी, ईंट के लिए मिट्टी काटना, मरे पशुओं को उठाना, उनकी ‘फराई’ करके (खाल निकालकर) चमड़ा बेचना, बूट पालिश, खेती से जुडे़ सभी तरह के काम लेखक ने किये. भूख से छुटकारा पाने की नौबत तब भी नहीं आयी.

लेकिन भूख से लड़ना बालक श्यौराज की पहली प्राथमिकता कभी नहीं रही. यह स्थान शिक्षा के लिए तय रहा. उसके सारे प्रयत्नों की दिशा शिक्षा प्राप्ति की ओर उन्मुख रही. स्कूल जाना उसके लिए दुर्दमनीय आकांक्षा थी. जीवन की सार्थकता का अनुभव यहीं से जन्मता रहा. जिजीविषा का यही स्रोत रहा. जोड़-तोड़कर अक्षर ज्ञान कर लेने के बाद बालपोथी, गीतों, किस्सों की किताब पढ़ना उसने किसी भी हाल में बनाये रखा. इसी व्यसन ने उसे अन्य व्यसनों से बचाया और उम्मीद की लौ कायम रखी. लेखक ने पूरी तफसील से, दोहराव का खतरा उठाते हुए शिक्षा के प्रति अपनी आसक्ति और उससे उपजी कोशिशों का हवाला दिया है. जब वह किसी दलित परिवार का परिचय देता है तो यह बताना नहीं भूलता कि उसकी शैक्षिक स्थिति क्या है. शिक्षा के प्रति यह लगाव लेखक को अम्बेडकरी आन्दोलन का हिस्सा बनाता है.

आत्मकथा के बहाने लेखक ने दलित जिन्दगी का वास्तविक चित्र प्रस्तुत किया है. ऐसा उसका दावा भी है- “वर्तमान में मिलने वाले दिखावी मान-सम्मान की चमक में अतीत के सच को झुठलाने या छिपाने का उपक्रम हमारे दलित बंधु बड़ी संख्या में कर रहे हैं. मैं यह सत्योद्घाटन इसलिए नहीं कर रहा हूँ कि कोई मेरी पीठ ठोके कि वाह, क्या हिम्मत की? या कोई मेरी अभिव्यक्ति पर थूके और सवाल करे कि क्या कुत्ते-सूअरों जैसी जिन्दगी को बेपर्दा कर दिया. लोग जानेंगे तो तुम्हें किस नजर से देखेंगे? “(पृ-192).

चूँकि आत्मकथा दलित विमर्श की मांग से बचकर और हटकर लिखी गई है इसलिए सच और अनुभव को अनुकूलित करके, मनमाने ढंग से पेश नहीं किया गया है. हिन्दी में दलित लेखन के अब तीन दशक बीत रहे हैं. इस बीच ‘विमर्शकारों’ की टीम अधिक मजबूती और व्यापक नेटवर्क के साथ सक्रिय हुई है. रचनात्मक दृष्टि से रहित और विमर्शात्मक शब्दावली से लैस यह टीम प्रभूत मात्र में साहित्य-उत्पादन में तत्पर है. विमर्शवादी लेखन पढ़ते हुए पाठकों का एक नया वर्ग भी हमारे सामने उभर रहा है. जिस विमर्श की बात की जा रही है. उसमें ‘राजनीति’ की पूर्व निर्धारित फॉर्मूलेबाजी ही सब तय कर रही है. खलनायक पहले से निश्चित हैं. जिन्दगी सांचे मं ढली हुई है. सभी प्रश्नों के उत्तर पहले से मौजूद हैं. द्वंद्व और पुनर्विचार की कोई गुंजाइश नहीं बची है. ‘मेरा बचपन.....’ की नवता का सबसे बड़ा प्रमाण इस बात में है कि उसने खुद को विमर्श के हवाले करने से इनकार कर दिया है. लेखक कृति पर हावी नहीं हो सका है उल्टे कृति लेखक की छवि को तोड़ती हुई अपना स्वतंत्र आकार अख्तियार कर ले गयी है.

‘मेरा बचपन... ’ में दलित उत्पीड़क के रूप में यादव हैं. लेकिन श्यौराज की निजी जिन्दगी में उत्पीड़क अपने घर, अपनी बिरादरी के लोग हैं. लेखक के पिता राधेश्याम की अकाल मृत्यु तब हुई जब वह मात्र 5-6 वर्ष का था. इसके बाद उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूटना शुरू होता है. माँ ‘मुखी’ की दूसरी शादी रामलाल नामक व्यक्ति से कर दी गयी. वहाँ से उसे तीसरे पति भिकारी के पास भेजा गया. आत्मकथा में भिकारी सर्वाधिक क्रूर व्यक्ति के रूप में चित्रित है. राधे की मृत्यु के बाद उनका परिवार इतना लाचार है कि चाहकर भी उनके बच्चों को सुरक्षा नहीं दे पाता. बाबूराम ताऊ, गंगी बब्बा, भागीरथ बब्बा नेत्रहीन हैं और विद्याराम बब्बा लंगड़े. भिकारी पर किसी का दबाव नहीं. उसके घर में दोनों बच्चों का रहना मुश्किल हो जाता है. बेटी मायावती की शादी बचपन में करवा दी गई और श्यौराज को मजबूरन पैतृक गाँव भेज दिया गया. डोरी लाल इस किताब के दूसरे खलपात्र हैं. ये लेखक की बिरादरी के ही हैं. अपनी बिरादरी के लोगों की जायदाद हड़पना इनका शगल है.

आंतरिक जातिवाद का प्रश्न आत्मकथा में कई बार उठा है. श्यौराज का अकेला घर है जो ‘छिका’ हुआ है यानी ‘जाटवों में चमार’. बाहरी दुनिया की नजर में भले ही ये सब एक ही हों लेकिन भीतर भेदभाव की गहरी खाई खुदी हुई है. भूख मिटाने के लिए गंगी बब्बा ने श्यौराज के साथ भट्टी झौंकी, कोल्हू हांका. बदले में उन्हें आधी बाल्टी धोवन मिला. बब्बा के कपड़े भी जल गये.

इधर बस्ती के लोगों से सहानुभूति मिलने की बजाय ऐसी प्रतिक्रियाएँ मिलीं- ‘तुम तो भंगिनु तंे ऊ गिर गये.’ ‘...वे बब्बा को चैपाल के नीचे जमीन पर बिठाकर हिदायतें दे रहे थे. उनका व्यवहार लगभग वैसा ही था जैसा कथित उच्च जातियों के लोग दलितों के साथ किया करते थे.’ (पृ-198)

‘मेरा बचपन....’ दलित स्त्री उत्पीड़न का नायाब दस्तावेज है. श्यौराज सिंह बेचैन को इसके लिए जितनी बधाई दी जाये, कम है. दलित स्त्री के प्रश्न पर उनकी जो छवि बनी ह,ै यह आत्मकथा उसे तोड़ती है. दलित स्त्री के बारे में विमर्शकारों ने जो मिथ गढ़ा है उसे यहाँ हम भहराते हुए देख सकते हैं. पुरुष-उत्पीड़न की शिकार तमाम दलित स्त्रियां इस आपबीती में मौजूद हैं. सबसे बड़ी शिकार तो स्वयं लेखक की माँ ही है. माँ की जिन्दगी इस भ्रम का पर्दाफाश करती है कि दलित स्त्रियों को अपेक्षित स्वतंत्रता हासिल है. उन्हें विधवा का जीवन नहीं जीना पड़ता. विधवा होने के दुख नहीं झेलने पड़ते. मुखी के पति की मौत के बाद अपार दुखों का सिलसिला शुरू हो जाता है. रामलाल के यहाँ गनीमत थी लेकिन भिकारी ने तो जिन्दगी ही ‘नारकीय’ बना दी- ‘सबसे दुखद यह कि भिकारी अम्मा को लाठी-डंडे, कलाबूत या फरहे से मारा-पीटा करता था. (पृ-47) एक दूसरी दलित स्त्री रुक्मिनी है- ‘रुक्मिनी और उसका पति मुन्नी चमार रात-दिन लड़ते-झगड़ते थे. ...स्त्री पुरुष पर हाथ नहीं उठा सकती थी. पति से पिटना मर्यादा थी. रुक्मिनी पिटने के बाद बुदबुताती हुई गली से गुजर जाती थी तो मुझे वह अम्मा का ही प्रतिरूप लगती थी.’ (पृ-54) ‘भरण-पोषणकर्ता होने, घर का मालिक और पुरुष होने के नाते भिकारी माँ को तिहरे अघिकार से मारता था’ (पृ-56) एक गलती बालक श्यौराज ने की. चाचा डालचंद की जेब से एक रुपया निकालकर किताब खरीदनी चाही. सजा माँ को मिली- ‘छोटेलाल चाचा के साथ लौटा तो देखा, मेरी माँ कसाई द्वारा काटी जा रही गाय की तरह चीख रही थी.’ “...उसकी कमर पर भिकारी ने पहला वार फरहे (वह लकड़ी जिस पर रखकर चमड़ा काटा जाता था) से किया था. उसके बाद डालचंद ने भी माँ के शरीर पर लाठियाँ बरसाई थीं. उसने सिर बचाकर माँ का सारा शरीर तोड़ दिया था. माँ चीखते-चीखते बेहोश हो गयी थी. बीरबल बाबा की घरवाली ने मुँह में पानी डाला था” कोई चाहे तो यहाँ काल्पनिक रचना ‘कफन’ को याद कर सकता है. बुधिया दो पुरुषों का पेट भरती थी यहाँ भिकारी के दो भाइयों सहित तीन पुरुष थे. घर और बाहर दोनों जगह श्रम करने वाली उनके बीच अकेली और असहाय स्त्री सूरजमुखी थी. माँ की स्थिति का विश्लेषण करते हुए श्यौराज लिखते हैं- ‘वह उतनी ही निर्वाक थी. बराबर काटी जा रही गाय-सी वह केवल चीख सकती थी. उसके पास और कोई भाषा न थी, न कोई उसको समझने वाला था. वह कानून नहीं जानती थी. तलाक से परिचित न थी. वह पुरुष पर निर्भर थी. दुष्ट पुरुष ही उसका ईश्वर था, जो उसे मजबूरी में मिला था.’ (पृ-67).

‘अनगिनत बार उन्होंने अम्मा को मार-मारकर आंगन में बिछा दिया था. कितनी ही बार अम्मा के मुँह में पानी डाल-डालकर उसे होश में लाया गया था.(पृ-168.)

दलित-स्त्री-उत्पीड़न का इतना हृदय विदारक साक्ष्य प्रस्तुत करने वाले श्यौराज जब विमर्शकार के रूप में सक्रिय होते हैं तो दलित स्त्री की पीड़ा भूल जाते हैं और उस पीड़ा को समझने तथा उस पर सवाल उठाने वाली दलित लेखिकाओं को ही कोसने लगते हैं-”अधिकांश दलित लेखिकाओं के विवाह परंपरागत ढंग से हुए हैं. उन्होंने निजी जीवन में दहेज और दिखावा दोनों को अपनाया है. वे कर्मकांडों में डूबी रही हैं. उनमें कुछ तो जाति तोड़ने के मुगालते में गैर दलितों में से लायक की हमसफर बन दलितों में उनकी एकता तोड़ने को लौटती है.” (स्त्री विमर्श और पहली दलित शिक्षिका, डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन, साहित्य संस्थान, गाजियाबाद प्रथम संस्करण 2009, पृ.3) इतना ही नहीं, वे दलित स्त्री के घरेलू उत्पीड़न को ही नकारते दिखाई पड़ते हैं. इसी किताब में उन्होंने लिखा है-”दलित महिलाएँ दलित पुरुषों द्वारा भी यदि कहीं सताई गई हैं, तो वे सवर्ण-सामंती प्रभावों के कारण सताई गई हैं.’ (वही, पृ-8). ‘यदि कहीं’ लिखते हुए बेचैन जी को खयाल नहीं आया कि उनकी आत्मकथा की अधिकांश दलित स्त्रियाँ सताई हुई हैं. यहाँ वे ‘सवर्ण-सामंती प्रभाव’ का कोई संकेत भी नहीं देते. विमर्शकार के रूप में बेचैन जी दलित स्त्री को बेहतर स्थिति में दिखाते हैं. यह कहकर कि दलित स्त्री को पुनर्विवाह की पूरी आजादी है, वे विधवा हुई दलित स्त्री के दुखों पर मानो पर्दा ही डाल देते हैं-”पुनर्विवाहों की दलित समाज में कोई मनाही नहीं है.” (वही, पृ-9) पुनर्विवाह की इस घोषित छूट के नेपथ्य में दलित स्त्री का दुख बिसार दिया गया है. वही लेखक जब जिंदगी का असल रूप पेश करता है तो कुछ और ही कहता है. श्यौराज की बहन माया विधवा हुई. पति गंगावासी की मृत्यु ने माया को ऐसी हालत में ला छोड़ा कि उसे बाकी जिंदगी जुल्म सहते गुजारनी होगी. दलित विधवा की दुर्दशा पर माँ के बहाने लेखक ने ये शब्द अंकित किये हैं-”माँ ने अपने विधवा जीवन के दुख भरे सफर से समझा था कि एक अनपढ़ और गरीब स्त्री के लिए विधवा होने के क्या-क्या परिणाम होते हैं? उसके बच्चे कैसे पलते हैं? समाज की भूमिका कैसी होती है? उन सबको याद कर-करके माँ का संताप और गहरा हो रहा था” (‘मेरा बचपन....’ 128) पुनर्विवाह दलित विधवा को कितनी सहूलियतें देता रहा है, यह तथ्य इस अनुभव की रोशनी में समझा जा सकता है. लेकिन जब तिहरा श्रम करनेवाली और तिहरा शोषण की शिकार दलित स्त्री को ‘उच्छृंखल’, ‘निठल्ली’ बताने वाले डॉ. धर्मवीर को श्यौराज जी अपना समर्थन देने लगते हैं तो हैरत होती है. (देखें ‘दलित दखल’ सं. डॉ श्यौराज सिंह बेचैन, डॉ. रजतरानी मीनू; श्री साहित्यिक संस्थान, गाजियाबाद, प्र.सं. 2001, पृ.-71) एक तरफ तो बेचैन जी आत्मकथा में दलित पुरुषों को दलित स्त्री के उत्पीड़क के रूप में रखते है, (ठीक उसी समय) दूसरी तरफ वे दलित स्त्री को दलित पुरुष की ज्यादतियों पर उंगली उठाने से रोक रहे होते हैं-”दलित स्त्री के पास दुश्मन की पहचान नहीं है. लड़ने के लिए उसके पास पति और बेटे हैं.” (‘स्त्री विमर्श....’ पृ.-137) दलित स्त्रियों को नासमझ साबित करने के पीछे मंशा क्या है? बहन की विदाई के वक्त लेखक दलित स्त्रियों द्वारा गाया जा रहा एक गीत सुनाता है. परिवार के सत्तातंत्र में दलित स्त्री की स्थिति का इससे बेहतर रूपायन और क्या हो सकता है-

भैया को दीने महल अटरियाँ रे. हमको दिया परदेश, अरे बाबुल मेरे!

हम तो बाबुल तेरे आँगन को कूड़ो रे. भोर भये फिंक जाएं बाबुल मेरे!

(‘मेरा बचपन....’, पृ.-111)

विमर्शवादियों द्वारा गढ़े जा रहे ‘मुक्त दलित स्त्री’ के मिथ पर ये पंक्तियाँ जोरदार प्रहार करती हैं.

सभी दलित स्त्रियाँ एक-सी होती हैं-यह कहना सच नहीं. लेकिन दिक्कत तब आती है जब किसी एक उदाहरण का सामान्यीकरण कर दिया जाता है. डॉ. धर्मवीर के साथ संभवतः यही हुआ. ‘बहुरि नहिं आवना’ (त्रौमासिक) के जुलाई-दिसं.2009 संयुक्तांक में उनका ‘आत्मकथ्य’ छपा है. इसमें उन्होंने अपनी पत्नी के बारे में लिखा है-”यह निठल्ली और जार थी.” (पृ.-26) हालाँकि इस ‘निठल्लेपन’ से उनका क्या आशय है, स्पष्ट नहीं होता. वे स्वयं बताते हैं ‘सुरेन्द्र की कोशिश के बाद मेरे छह बच्चे मेरे पास आये...’ (पृ.-25) छह बच्चों को पालने-पोसने वाली स्त्री किस अर्थ में निठल्ली हुई? डॉ. धर्मवीर के अनुसार उनके साथ बच्चे नहीं रहे. वे यदा-कदा बच्चों से मिलने भले जाते रहे- ”मेरा दिल चाह रहा था कि मैं अपने बच्चों को देखूँ.” (पृ-25) पत्नी रमेश को खासी गुस्सैल साबित किया है डॉ. साहब ने. लेकिन, उनके लिए वे जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वह अशालीन ही लगती है, “लेकिन मैंने अपनी पत्नी को सब के सामने नंगी करना शुरू कर दिया था.” (पृ-26)

दोनों पक्षों को पढ़े-सुने बिना कुछ कहना मुश्किल है. लेकिन जोखिम उठाते हुए इतना अनुमान किया जा सकता है कि जो कटुता डॉ. धर्मवीर के भीतर बैठ गई है वह निराधार नहीं होगी. असल सवाल यह कि एक अनुभव को पूरे दलित स्त्री समुदाय पर क्यों चस्पाँ कर दिया गया है. ‘मेरा बचपन...’ में टोड़ी ताऊ का एक प्रसंग है. लेखक ने 10-12 साल की उम्र में रायपुर के टोड़ी ताऊ के यहाँ जाकर मजदूरी की थी. टोड़ी ताऊ जूतियाँ खरीदते और बेचते थे. उनके नाम 20-25 बीघे जमीन भी थीे. कालांतर में टोड़ी ताऊ के आँखों की रोशनी जाती रही-”अंधा आदमी बीबी का पेट कहाँ से भरेगा, इसलिए ताई के भाइयों ने चन्दौसी बुलाकर ताई का दूसरा विवाह करने की योजना बनाई.” (पृ-175) इस वाकये ने ताऊ को तोड़ दिया. उनकी स्थिति का मूल्यांकन करते हुए श्यौराज लिखते हैं-”हृदय पर लगे आघात को सहन करने का उनके पास और कोई विकल्प नहीं था, सिवाय इसके कि वे समूची स्त्री जाति को ही गद्दार मान कर संतोष करें.” (पृ-117) डॉ. धर्मवीर के संदर्भ में यह मूल्यांकन क्या सटीक बैठता दिखता है?

आत्मकथा में दो बड़े हृदयद्रावक प्रसंग हैं-पिता राधे और जीजा गंगावासी की मृत्यु का. दोनों अकाल मौतें. इन मौतों के असर बड़े गहरे. पिता की मृत्यु रुक सकती थी अगर झाड़फंूक और भूत पूजा के लिए सयानों-ओझाओं को बुलाने की बजाये डॉक्टर को दिखाया गया होता. सयानों द्वारा पिता को चाबुक मारने का दृश्य दहशत पैदा करता है. देवी-देवताओं में दलित समुदाय की अंधश्रद्धा पिता की मौत का एक मात्र कारण है. इसे लेखक ने बार-बार आग्रहपूर्वक कहा है. लेखक का यह बेशकीमती पर्यवेक्षण काबिले गौर है. “अपने देवी-देवता सभी के देवी-देवताओं से अधिक शक्तिशाली हैं, यह भ्रामक सोच हमारे जाति बंधुओं में अभी तक कायम है.” (पृ-16) श्यौराज ने स्वीकार किया है कि शुरू में वे स्वयं इन देवी-देवताओं में विश्वास करते थे-”उन दिनों मैं भूत-पिशाचों के अंधविश्वास से निकलकर आया था और आर्यसमाज के कार्यक्रमों में रहकर व उनका प्रसार साहित्य पढ़कर मेरी समझ कुछ तार्किक बन गई थी. परन्तु ईश्वर कहीं जरूर है जो सब देखता है. जिसे चाहे मारता है और जिसे चाहे बचाता है. बेसहारों का वही सहारा है, ऐसी धारणा बनी हुई थी.” (पृ-368) विडम्बना देखिये कि जिस समझ को “कुछ तार्किक” से आगे बढ़ना था वह उल्टी दिशा में मुड़ गयी. अभी जिस पत्रिका ‘बहुरि नहिं आवना’ के डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन प्रधान संपादक है वह ईश्वरवाद की स्थापना के लिए मुहिम चला रही है. सभी बुनियादी समस्याओं का समाधान ईश्वर की अवधारणा में देख रही है. पत्रिका के नवीनतम अंक का संपादकीय देखें-”पता नहीं हमारे दलित समाज के अधिकांश पढ़े-लिखे लोग ईश्वर से इतना खार क्यों खाये बैठे हैं? उसका नाम सुनते ही ये ऐसे भड़कते हैं जैसे किसी सांड़ को लाल कपड़ा दिखा दिया गया हो.... ईश्वर एक कान्सेप्ट है. अंधविश्वास से इसका क्या लेना-देना? ... ईश्वर द्वारा मनुष्य पैदा किये जाने के अच्छे कान्सेप्ट से ही वर्णाश्रम के अछूत और शूद्र बनाने के बुरे कान्सेप्ट से लड़ा जा सकता है. बिना इसके तो निहत्थे और शक्तिहीन होना है. बुराई से लड़ने के लिए पे्ररित करने वाला कोई पवित्र विचार तो होना ही चाहिए. बिना इसके लड़ाई में जीत कैसे? ...ईश्वर के नाम पर ही लोग कुर्बानियों की हद तक पहुँचते हैं.” (जुलाई-दिसम्बर 2009 अंक का संपादकीय-शीर्षक- “ ‘बहुरि नहिं आवना’ बड़े मिशन पर है” (पृ.-6-7) अद्भुत साम्य है हिन्दुत्व की ‘सनातन’ जैसी संस्था और इस्लाम के तालिबानों से. ये सब ‘बड़े मिशन’ पर हैं. ईश्वर के नाम पर कुर्बानियों का सिलसिला बढ़ता जा रहा है. उक्त संपादकीय में यह कहा जाना कि ईश्वर की अवधारणा का ‘अंध विश्वास से क्या लेना-देना?’ भ्रामक है. स्वयं श्यौराज जी ने आत्मकथा में निभ्र्रांत शब्दों में लिखा है- “शुरू में ईश्वर में विश्वास रखने के कारण भी भूत-पिशाच विश्वासी बन गया था, क्योंकि देवी-देवता मुझे ईश्वर के निकट-सम्बन्धी लगते थे.” (पृ-17) श्यौराज जी एक ही वक्त दोे नावों पर पाँव रखे हुए हैं. आत्मकथा में वे ईश्वर को अंधविश्वास का स्रोत बताते हैं, पत्रिका में कहते हैं कि उसका “अंधविश्वास से क्या लेना-देना?” दलितों का अपना ईश्वर कौन है (या होने की तैयारी में है) इसका संकेत ‘बहुरि नहिं आवना’ के इसी अंक में मौजूद है. आपबीती में डॉ. धर्मवीर ने लिखा है- “जब मैं कुछ नहीं बोला तो मेरी पत्नी बिखरकर रह गयी. वह मेरे बारे में बोल पड़ी-”बन गया भगवान! अब इसे कोई बुलवा नहीं सकता.” (पृ-25). लेकिन सिर्फ पत्नी ही नहीं, बच्चे भी मुझसे कह रहे थे-”बन गया भगवान” (पृ-26).

‘मेरा बचपन....’ की संरचना के बारे में दो शब्द. यह आत्मकथा तरतीबवार नहीं लिखी गई है. कालक्रम का ध्यान रखे बगैर जीवन प्रसंगांे की अहमियत को आधार बनाकर अध्याय रखे गये हैं. इससेे कई बार उलझाव की स्थिति भी पैदा होती है. व्यौरों में जहाँ नयापन है वहाँ नया विश्लेषण भी किया गया है. कई नये शब्द भी आए हैं - ‘होन’ (पृ-70), ‘कुटी’ (चारा के अर्थ में) (पृ-189), ‘संगेटा’ (पृ-380), ‘फिरक’ (पृ-88), ‘छिका’ (पृ-78) आदि. वाणी प्रकाशन (जहाँ से यह किताब छपी है) यों तो बहुत स्तरीय प्रकाशन गृह माना जाता लेकिन इस किताब में पू्रफ की बेशुमार भूलें देखकर मन खीझ उठता है. कई प्रसंग दो-दो बार छप गये हैं. मसनल ‘गर्लफ्रेंड का चलन नहीं था’ शीर्षक से एक ही सामग्री पृ.-179 तथा पृ.-392 पर छपी है. कुछ वाक्य बड़े अटपटे हैं- ‘तब बाबूरामताऊ अंधे थे, गंगी बब्बा और भागीरथ बब्बा दो बब्बा नेत्रहीन थे और विद्याराम बब्बा लँगड़े थे.’ (पृ-12) ताऊ अंधे हैं लेकिन ‘दो बब्बा’ नेत्रहीन. ऐसा ही एक और वाक्य है- ‘तब रोते-रोते विलाप करती जा रही थी’ (पृ-22) पिता की मृत्यु पर लिखा है- ‘मनुष्य मर जाता है, उसका अमूल्य शरीर अपनों के हाथों जला देना पड़ता है. यह मेरा पहला और आत्मीय अनुभव था’ (पृ-24) ‘आत्मीय’ शब्द यहाँ उचित नहीं. चमड़ा कमाने के लिए ‘चर्म-शोधन’ (पृ-11) सात भांवरों के लिए ‘सप्तपदी’ (पृ-104) जैसे शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए था.

अंततः किताब का ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि लेखक ने ‘विमर्श ’ करने की बजाये दलित जीवन को यथासंभव यथातथ्य प्रस्तुत किया है.

- 204, दूसरी मंजिल, टी-134/1, बेगमपुर, मालवीयनगर, नई दिल्ली



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