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लघुकथा : तीन दिन बाद

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मुम्बई की लोकल ट्रेन. बड़ी भीड़-भाड़ थी, घुस्सम-घुस्सी, रेलमपेल. सुबह कार्यालय जाना था. सो सान्ताक्रुज के प्लेटपफॉर्म संख्या दो दो से चर्चगेट के लिए लोकल ट्रेन पकड़ी. संयोग से उस डिब्बे और उस केबिन में घुसा, घुसा क्या जन-वेग से पहुँचाया गया जहाँ आमने-सामने दोनों बेंचों पर कुछ तिलकधरी व कुछ अन्य लोग बैठे थे तथा जिन्हें सीट नहीं मिली थी दोनों के बीच दृश्य मुद्रा में खड़े थे और भजन-कीर्तन कर रहे थे. भजन-पोथी का वाचन- सामूहिक स्वर, ताली पर ताली- हाथ की ढब-ढब ताली, पीतल की ताली- खनखनित-झणझणित ताली- सबका समावेश था समवेत स्वर में. कीर्तन में लोगों को मजा आ रहा था. कुछ अन्य लोग भी उस समवेत स्वर में मधुर स्वर मिलाकर स्वाभाविक शिरकत कर रहे थे. कर्णप्रियता तो एक कारण होता ही है. ऐसे समय में स्वाभाविक व अनायास भगवत-फल-प्राप्ति की इच्छा भी एक कारण बन जाता है और इसी बहाने समय का सदुपयोग भी हो जाता है.

भजन अपने उत्कर्ष पर था. लोगों को झुमा रहा था. चर्चगेट आते-आते लोग गायन से थम से चुके थे. अब तक जिन्हें सीट नहीं मिली थी, किसी के उतरने पर उन्हें भी सीट मिल गयी थी. गाड़ी अपनी गति से चल रही थी कि अचानक उन भजनकारियों में से एक के मोबाइल की घंटी बज उठी थी- हलो, हलो, कौन... अच्छा-अच्छा. नहीं-नहीं, अभी नहीं, अभी मत आना. मैं अभी बम्बई से बाहर हूँ. बम्बई में नहीं हूँ. तीन दिन बाद आना. देखते हैं, ठीक है. ओके, ठीक है.

कार्यालय सही समय पर जाने के कारण मैं रोश उसी ट्रेन से उसी समय पर सफर कर रहा था और तीनों दिन उसे उसी डिब्बे में देखा था... भजन की मर्यादा ‘इस तीन दिन’ में स्खलित हो गयी थी...

ई-43, मेकर कुन्दन गार्डेन्स, एस.एन.डी.टी. कॉलेज के निकट, जुहू रोड, सान्ताक्रुज (प.), मुम्बई-400049



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