हत्यारे
एक
वे करोड़ों बरस से
आते रहे हैं इस धरती पर
साफ-सफेद कपड़ों में
वे करोड़ों बरस से
बैठते रहे हैं सबके साथ
सबके अपने बनकर
वे करते रहे हैं हत्याएँ
अनुभवों स्मृतियों पेड़ों वनस्पतियों
मनुष्यों की ऐसे ही
दो
हर रात खाना खिलाया गया उन्हें
हर सुबह नाश्ता जोखिम उठाते हुए
एक-एक रात एक-एक चाँद
एक-एक दिन एक-एक सूरज
एक-एक क्षण एक-एक दृश्य-अदृश्य
हमारी रक्षा हमारे मनुष्य होने का हिसाब
माँगते वेे शबोरोज फिर भी
ताकि वे ही रहें बस इस पूरी पृथ्वी
इस पूरे ब्रह्मांड में इस शरीर के साथ
तीन
हमारी मनुष्यता से सार्थक हुए समय पर केन्द्रित
उनके पुरस्कार हमें ही दिये जाते
उनके भव्य-विशाल समारोहों में उन्हीं के हाथों
हम इनकार कहाँ कर पाते थे
उनके द्वारा दिये गये ओहदे और खिताब का
उनके द्वारा दिये गये तमगे और प्रमाणपत्र का
चार
उनके सम्बोधन उनकी अदाएँ
कितनी कलात्मक कितनी विकल
होती थीं हमारे प्रति
हर बार मारे जाते समय हमें
और जब वे मारते
कोई चित्रकार
कोई फोटोग्राफर नहीं होता
कोई फटफटिया वाला नहीं गुजरता
उस कालखंड से
पाँच
एक दिन जब मैं घर जल्दी पहुँचना चाहता था
बसस्टैंड के पास से गुजरते हुए
किसी हत्यारे का बरसों पुराना रोजनामचा
पड़ा मिला मुझे अकस्मात् एक चमत्कार की तरह
जिसमें दर्ज था: जीवन पृथ्वी इतिहास बीज के बारे में
किसी कबाड़ी के बारे में
किसी रिक्शे वाले के बारे में
किसी दर्जी के बारे में
किसी नाविक
किसी छाते वाले के बारे में
इन सबके साथ में अन्त में मेरा भी नाम था लिखा
छह
खिड़की की सलाखों और शीशों से
झाँकती र्हुइं कुछ जोड़ी आँखें
घर में अकेली रह गयी लड़की को
डराती हैं लड़की के जीवन के अँधेरे में
सात
उस रोज
उस रोज बारिश खूब हुई थी
कुछ लोग अनजाने अनपहचाने विचित्र से
बस्ती में आये थे
रात भर उनके पैनेे नाखून
बन्द दरवाजों पर गुर्राते रहे थे
शोक की बारिश हुई थी मित्रो
उस रोज मृत्यु की बारिश हुई थी
बारिश के बाद नालियों-गड्ढों में
लाल-लाल पानी रह गया था बचा सिर्फ
अनजाने अनपहचाने विचित्र वे लोग
लौट चुके थे हत्याओं के बाद
अपनी-अपनी ठहरने की जगहों पर
आठ
हत्यारे गुस्सा कम करते थे
बने रहते थे शान्त-गम्भीर
चेहरे पर रखते थे किसी लोकपर्व के दिन सा उत्सव
वे बतियाते थे एकदम अपनों की तरह
शायद अपनों से भी बढ़कर अपना जताते वे
नौ
उनका मन होता तो दिखाने ले आते
पूरे निवेदन पूरे सद्भाव से कोई फिल्म
कलकत्ते का चिड़ियाखाना
मुजफ्फरपुर का चतुर्भुज स्थान
बनारस के गंगातट
मुंगेर का पीर पहाड़ अथवा सीताकुंड
अथवा समुद्र के किनारे स्नान के लिए
उनका मन होता तो खेलते पूरी कृतज्ञता से पूरे मनोयोग से
‘छुपम-छुपाई’ या ‘छू ती ती’ का खेल हमारे संग
उनका प्रेम अभाषित-अद्वैत होता अकसर
वे अकसर ईश्वर बन जाते तुम्हारे ईश्वर के जैसा
कभी हमारी ही दुनिया के लोग बन जाते
कभी पिता बन जाते हमारे अपने पिता के जैसे
उनका मन होता तो हमें खाने देते हमारी पसन्द के खाने
बचा लेते मारे जाने से अपने ही जैसे किसी हत्यारे से
दस
हत्यारे हालाँकि हत्यारे होते हैं
हत्यारे तो होते हैं अंततः बस हत्यारे
आदमियों में अपने को रखते हैं छिपाकर
लेकिन हमारे कवि मित्रो साहित्यकार साथियो
कविता बहुत जल्दी जाहिर कर देती है हत्यारे को.
अभी-अभी
अभी-अभी
एक शब्द जनमा
उस बच्चे के मुँह से
माँ से जनमी
एक पूरी भाषा समृद्ध
अभी-अभी
यह समय था तुम्हारा
अब हुआ किसी अन्य का
अभी-अभी
वह दरख्त हुआ
उस चिड़िया का
एकदम अपना
अभी-अभी
एक पूरा युद्ध लड़ा गया
खुरपी से
हंसिया से
कुदाल से
लाठी से
अभी-अभी
खुली एक ट्रेन
कि दूसरी आ लगी झट से
अभी-अभी
रसोईघर से निकल
फैली इस पृथ्वी पर
लहसुन की गन्ध अनोखी
अभी-अभी
यह देह हुई उसकी
यह बीज
यह कामना
यह शोर
यह एकान्त हुआ उसी का
अभी-अभी
आग हुई मेरी
फाग हुआ मेरा
राग हुआ मेरा
अभी-अभी
वहाँ था सूर्यास्त
अब दिखता था
सूर्योदय वहीं पर
अभी-अभी
जो भूल गया था
रास्ता अपने घर का
बता रहा था
किसी अन्य को
उसके घर का रास्ता
अभी-अभी
वह मटका था खाली
अब भरा था
मीठे जल से
अभी-अभी
एक लड़का कूदा पानी में
बहा धार में
एक दूसरे लड़के ने लाँघा
अपने ही अन्दर के पुरुष को
अभी-अभी
जलतरंग बजाया उसने अद्भुत
ओझल को प्रकट किया उसी ने
अभी-अभी
मैं धँसा तुम्हारी ही धमक में
तुम घँसी मुझ में
सन्नाटे को चीर
- शहंशाह आलम
बदरुन मंजिल, गुलजार पोखर, मुंगेर-811201 (बिहार)