कई बार, कई बड़े-बड़े लोगों के मुँह से गोष्ठियों या निजी बातचीत में यह सुनने को मिलता है-‘हिन्दी के विचार की अच्छी पत्रिका या पत्रिकाएँ कहां हैं?’
क्या सचमुच ऐसा है?
मेरे सामने ‘गांधी-मार्ग’ का नवंबर-दिसंबर अंक है. ‘गांधी मार्ग’ गांधी शांति प्रतिष्ठान की पत्रिका है और उसके संपादक अनुप्रम मिश्र हैं. जो हिन्दी में अच्छी वैचारिक पत्रिका नहीं है, ऐसी शिकायत करते रहते हैं और जो शिकायत नहीं भी करते हैं, उनको यह पत्रिका अवश्य पढ़नी चाहिए. वैसे यह ‘वैचारिक’ पत्रिका नहीं है, पर विचार की तरफ ले जाती है.
फिलहाल इस अंक के दो लेखों की यहाँ चर्चा करूंगा. पहला है ‘कचरे से बने समुद्री डाकू.’ यह पश्चिमी स्वतंत्र पत्रकार क्रिस मिल्टर का लेख है. आजकल हम अक्सर सोमालिया के समुद्री डाकुओं के बारे में पढ़ते-सुनते हैं. लेकिन अखबारों-पत्रिकाओं में जो छपता है और टी.वी चैनलों पर जो दिखता है वह बेहद एकांगी है. ऐसा लगता है कि सोमालिया के समुद्री लुटेरे उत्पात मचा रहे हैं और न तो वहाँ की सरकार इसे लेकर कुछ खास कर पा रही है न अंतरराष्ट्रीय समुदाय. लेकिन इस छोटे से लेख को पढ़ने के बाद यह लगता है मामला बेहद पेचीदा है और दुनिया के विकसित कहे जाने वाले देश सोमालिया के साथ आपराधिक आचरण कर रहे हैं.
इस बात से हम अनजान से हैं दुनिया के कई विकसित कहे जानेवाले देश सोमालिया में जहरीला कचरा फेंकते हैं. इसी वजह से वहां जल-दस्युओं का कारोबार फैला. 1980 के बाद स्विटजरलैंड और इटली की कुछ कम्पनियों ने सोमालिया में कचरा फेंकने का ठेका लिया था. 1992 में जब सोमालिया गृहयुद्ध में उलझ गया तो इन कम्पनियों को वहां के लड़ाकों के साथ समझौता करना पड़ा. इन लडा़कों ने कचरा फेंकने के काम में रुकावट नहीं डालने के बदले में हथियार और गोलाबारूद की माँग की. इसके बाद वहाँ कई जहाज कचरा और हथियार लेकर आने लगे और वापसी में मछली पकड़ने वाले जहाज में बदल गए. यानी जहरीले कचरे के बदले
हथियार का व्यापार शुरू हो गया. सोमालिया आज दुनिया का सबसे बड़ा कचराघर बन गया है.
इस रासायनिक और परमाणुविक कचरे की वजह से सोमालिया में गम्भीर बीमारियाँ पैदा हो रही हैं. कैंसर का प्रकोप तो फैल ही रहा है, हाथ-पैर ठीक से विकसित नहीं होने जैसी शारीरिक विकृतियाँ भी बढ़ रही हैं.
‘गांधी मार्ग’ के इसी अंक में दूसरा लेख है- ‘कहां से आते हैं जूते,’ जिसकी चर्चा भी जरूरी है.
आजकल हमारे देश के बड़े-छोटे शहरों ‘एडिडास’ या ‘नाइके’ जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जूते बिकते हैं. इनका चलन भी बढ़ रहा है. पर हम इस बात से अनजान रहते हैं कि इस तरह के जूते कहाँ और कैसे बनते हैं. दरअसल सभी बड़े ब्रांड वाली कम्पनियों के जूते गुमनाम कम्पनियाँ ही बनाती हैं. ‘नार्थवेस्ट वाच’ नाम की एक संस्था की विज्ञप्ति के आधार पर अनुपम मिश्र ने जो आलेख तैयार किया उसके मुताबिक जूते के सफर की कहानी बड़ी रोचक व विचारोत्तेजक है.
आम अमेरिका की ब्रांड जूता कंपनियाँ जूता बनाने का ठेका कोरिया की एक कम्पनी को देती हैं. पर यह कोरियाई कम्पनी भी जूता नहीं बनाती. वह इसे बनाने का ठेका इंडोनेशिया की एक गुमनाम कम्पनी से बनवाती है. पर सारा काम यहाँ भी नहीं होता. इंडोनेशिया की यह कम्पनी जूते के डिजायन का काम ताइवान की एक कम्पनी के पास भेजती है.
जूते में जिस चमड़े का इस्तेमाल होता है उसे भी लंबा सफर तय करना होता है. यह चमड़ा एक खास किस्म की गायों का होता है जिन्हें अमेरिका के शहर टेक्सास में पाला जाता है. यहीं पर इन गायों को कत्लखानों में मारा जाता है. यह चमड़ा मालगाड़ियों में लदकर लॉस एंजलीस पहुंचता है और वहाँ से जलमार्ग से दक्षिण कोरिया के पुसान नाम की जगह पर. यहीं पर चमड़े की सफाई और रंगाई का काम शुरू होता है. चमड़े की सफाई-रंगाई रासायनिक प्रक्रिया से होकर गुजरती है और इस प्रक्रिया में उत्पन्न गंदगी कोरिया की नाकटेंग नदी में छोड़ दी जाती है.
जूते के तले को बनाने के लिए जो फोम लगता है एथीलीन और इसके साथ कई और पदार्थ लगते हैं. एथीलीन सउदी अरब से निकलने वाले पेट्रोल से बनता है. जूते का बाहरी तला स्टाइटीन ब्यूटाडाइन रबर से बनता है. जिसका कुछ भाग सउदी अरब से निकले पेट्रोल से बनता है और कुछ ताइवान की कोयला खदानों से निकले बंजीन से. जूते की तैयार जोड़ी को जिसे टिशू पेपर में लपेटा जाता है सुमात्र के वर्षा वनों में उगने वाले कुछ खास पेड़ों को काटकर बनाया जाता है.
यानी जिस जूते को दुनिया का भद्रलोक पहनता है, वह पशुओं को क्रूरता से मारकर, पर्यावरण का विनाश कर और इसके निर्माण में लगे लोगों के स्वास्थ्य खराब कर बनता है. दुनिया के कई देशों की नदियाँ प्रदूषित हो जाती हैं.
ऐसे लेख या ऐसी जानकारियाँ क्या हमें विचार की तरफ नहीं ले जातीं? फिर क्यों ‘वैचारिक’ पत्रिका के अभाव का रोना रोया जाता है.
‘गांधी-मार्ग’ के लेखोंं की एक और खूबी इसकी सहज और सरल भाषा है. आज भाषायें भी प्रदूषित हो रही हैं. हिन्दी भी उनमें एक है. पर ‘गांधी मार्ग’ की हिन्दी स्वच्छ और निर्मल जल की तरह है. इस पत्रिका के कुछ और अंक भी मैंने देखे हैं. बेहतर होगा कि उन्हें दूसरे भी देखें और विचारवान बनें.
साहित्य किसान और गाँव
प्रतिलिपि. इस नाम की वेब पत्रिका ने, जो गिरिराज किराडू और राहुल सोनी के सह-संपादन में निकलती है, समकालीन साहित्य की दुनिया में द्विभाषिकता की वजह से खास जगह बनायी है. देसी-विदेशी रचनाओं को हिन्दी-अंग्रेजी में प्रस्तुत कर इस वेब-पत्रिका ने भारतीय तथा विश्वसाहित्य के बीच संवाद कायम किया है. इस पर विस्तार से बात करने की जरूरत है.
लेकिन फिलहाल यहाँ इस वेब पत्रिका के नए अंक में छपे एक लेख ‘तय था हत्या होगी’ पर चंद बातें कही जा रही हैं. पल्लव का यह लेख किसानों की दुर्दशा और उनकी तबाही की साहित्यिक अभिव्यक्ति पर है. लेखक ने जयनंदन, कैलाश वनवासी, पुन्नी सिंह, प्रियदर्शन मालवीय, चंद्र किशोर जायसवाल, लोक बाबू, चरणजीत सिंह पथिक, सत्यनारायण, सत्यनारायण पटेल सहित कुछ अन्य कहानीकारों/कथाकारों की रचनाओं का उल्लेख करते हुए यह दिखाया है कि मौजूदा आर्थिक विकास की दिशा न सिर्फ किसानों की आत्महत्या करने के लिए विवश कर रही है बल्कि खेती को भी बर्बाद कर रही है. लेख एक अच्छे.समाजशास्त्रीय-साहित्यिक आलोचना का उदाहरण है. फिर भी यह कहे जाने की जरूरत है हमारे कथाकार और आलोचक- कृषि व्यवस्था के संकट को सही प्रसंग में नहीं देख पाये.
और सिर्फ साहित्यकार ही क्यों, हमारे राजनैतिक दल भी, वामपंथी राजनैतिक दल भी, इस समस्या को लेकर एकांगी ही रहे हैं. किसान और किसानी के संकट को या तो मौजूदा आर्थिक नीतियों से जोड़ दिया जाता है या भूमि सुधार से. अगर सिर्फ मौजूदा आर्थिक नीतियों को ही किसान की बदहाली का कारण माना जाए तो 1991 के पहले क्या स्थिति थी. और अगर मूल समस्या सिर्फ भूमि-सुधार का न होना ही है तो पश्चिम बंगाल क्यों सुलग रहा है? पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने तो अपेक्षाकृत सफल भूमि-सुधार किया? फिर भी पश्चिम बंगाल में खेती की हालत क्यों नहीं सुधरी?
दरअसल भारतीय गाँव के बारे में अमूनन साहित्यकारों, समाजशास्त्रियों, रानजीति विज्ञानियों और राजनैतिक दलों की समझदारी मोटे तौर पर उपनिवेशवाद के दौरान की ही है. यानी उपनिवेशवादी अंग्रजों ने भारतीय गाँव की जो समझ बनायी वही ‘नासमझी’ आज तक मौजूद है. इसी नासमझी से निकला एक सरलीकरण यह भी है कि भारत किसानों का देश रहा है.
उपनिवेशवाद के भारत में जो बड़े पैमाने पर तबाही मचायी उसका खामियाजा जिस एक क्षेत्र को भुगतना पड़ा उसमें दस्तकारी भी थी. उपनिवेश बनने के पहले भारत किसानों का ही नहीं दस्तकारों का भी देश था. लेकिन अंग्रेजों ने दस्तकारी को तहसनहस कर दिया. इस वजह से खेती पर दबाव बढ़ गया. पर एक बड़ी त्रसद बात यह हुई कि हम यह भूल गए कि भारत कारीगरों/दस्तकारों का देश भी था. आज भूमि-सुधार को रामबाण की तरह पेश किया जाता है, यानी इसके होने के साथ ही खेती में रामराज्य आ जाएगा. हमारी कल्पना से यह बात ही गायब हो गई है भारतीय गाँव किसान और दस्तकार के समुच्चय से बनता था.
गांधीजी ने इस बात को समझा था. लेकिन हम यह बात ही भूल गये कि गांधीजी ने चरखा को क्यों इतना महत्व दिया. लेकिन बाकी लोगों का क्या दोष दें. अपने को गांधीजी का अनुयायी कहनेवाले राम मनोहर लोहिया भी ‘चरखा’ का महत्व नहीं समझ सके. डॉ. लोहिया ने ‘फावड़ा’ को प्रतीक बनाया, बिना यह समझे कि फावड़ा चरखे की जगह नहीं ले सकता. मेरे ख्याल से ‘चरखा’ गांधीजी का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक-संकेत है. गांधीजी की आध्यात्मिक प्रतिज्ञाएँ सत्य और अहिंसा हैं तो सांसारिक प्रतिज्ञा चरखा. स्थूल रूप में कहंे तो ‘चरखा’ ही हिन्द स्वराज है.
बहरहाल, ‘चरखा’ पर विस्तार से फिर कभी. फिलहाल यह रेखांकित करना जरूरी है भारतीय गौरव के वास्तविक स्वरूप को, उसके संकट को सिर्फ खेती के माध्यम से ही नहीं समझा सकता है. ऐसा नहीं है कि भारतीय साहित्य, विशेषकर हिन्दी-कथा-साहित्य दस्तकारी-कारीगरी को लेकर बिल्कुल ही चेतना शून्य रहा है. मिसाल के लिए अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ में इस तथ्य को रेखांकित किया गया है.
पर हमारी साहित्य चेतना इस दिशा में उदासीनता भरी है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पूरे समाजशास्त्रीय-राजनैतिक विश्लेषण में भी इस बात को भुला दिया गया. फिर हमारे योजनाकारों ने यह बात भुला दी. पूरा जोर बड़े उद्योगों के विकास पर लग गया. योजनाकारों को भी लगा कि दस्तकारी या कारीगरी से आर्थिक विकास कैसे तेज होगा. राजनैतिक स्वाद की वजह से किसानों की बात तो सुनी गयी पर दस्तकारों की खूब उपेक्षा हुई. गाँव की संकल्पना को ही संकुचित कर दिया गया.
साहित्य की समाजशास्त्रीय आलोचना तो ठीक है. पर सबसे पहले समाज को जानना जरूरी है. दिक्कत यह है कि साहित्य के आलोचक समाज को अलग से जानने का किसी तरह का प्रयास नहीं करते. सिर्फ साहित्य के माध्यम से समाज को जानने में लगते हैं या वैचारिक लेखों-पुस्तकों को पढ़कर. पर तीसरे या चौथे रास्ते की संभावना को नजरअंदाज कर दिया जाता है. इसलिए हिन्दी की साहित्यिक आलोचना समाज के ज्ञान या दृष्टि में विस्तार करने में असफल हो जाती है. वह घोर साहित्यिक होकर उबाऊ हो जाती है. वह अच्छे अर्थ में अकादमिक भी नहीं बन पाती. वह गुण-दोष विवेचन करते करते इतनी थकाऊ और पकाऊ हो जाती है कि उसका रस गायब हो जाता है और सिर्फ भूसा बचा रह जाता है बेहतर होगा कि आलोचना समाज को अलग से जानने में लगे. तब तक शायद कवियों-कथाकारों के काम की चीज भी हो जाएगी.
- ई 102 जनसत्ता अपार्टमेंट्स, सेक्टर-9
वसुन्धरा, गाजियाबाद-12