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सच्ची कथा – इतर के पानी भीतर गइल, चुम्मा लेत जाति गइल

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जाति व्यवस्था के अध्ययन ने समाजशास्त्री एम.एम. श्रीनिवास की अवधारणा संस्कृतीकरण की प्रायः चर्चा की जाती है. संस्कृतीकरण तथाकथित निम्न जाति समुदाय के ‘उच्च’ जाति में शामिल होने की प्रक्रिया है. इससे उलट भी एक प्रक्रिया मौजूद रही है. इसमें तथाकथित ऊँची जाति का व्यक्ति अपने से नीची जाति में चला जाता है. इस प्रक्रिया को अवजातीकरण कहा जा सकता है. अवजातीकरण में जाति-व्यवस्था को चुनौती देने का भाव केन्द्रीय रहता है. जाति की जटिल व जड़ संरचना में अवजातीकरण विक्षोभ पैदा करता है.

प्रसिद्ध कथाकार सृंजय की प्रस्तुत रचना अवजातीकरण का एक उदाहरण है. आप भी अपने इलाके की ऐसी ही किसी परिघटना की खबर हम तक पहुँचा सकते हैं.

बिहार प्रांत के भोजपुर जनपद (तत्कालीन शाहाबाद जनपद) के मुख्यालय आरा से 15-16 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दिशा में गंगा नदी के किनारे स्थित एक गाँव है-सलेमपुर. सलेमपुर ब्राह्मण बहुल गाँव है. वहीं के थे मड़ई दूबे.

भारत की स्वतंत्रता के कुछ वर्ष बाद की घटना है- छठे दशक की. मड़ई दूबे नौजवान थे. बीस-बाईस साल की उमर रही होगी. उस वक्त गाँवों में अत्याधुनिक खेलों की कोई व्यवस्था न थी. कबड्डी, चीका और पहलवानी का ही शौक था नौजवानों में. मड़ई दूबे भी दंड-बैठक, कसरत किया करते थे, अखाड़े में पहलवानी किया करते थे. जरा अक्खड़ स्वभाव के थे. साधारण काश्तकार परिवार के थे. गाय-बैलों के साथ-साथ एक घोड़ा भी रखते थे. खेती-किसानी से बचे समय में घोड़े पर चढ़कर शौकिया घूमा करते थे.

गर्मियों के दिन थे. सलेमपुर गाँव के बाहर सीवान के एक बाग म डोमों के डेरे लगे हुए थे. डोम जाति महादलित की श्रेणी में आती है. वर्ण-व्यवस्था की परिधि से भी बाहर... नितांत अछूत... भूमिहीन... खेती-किसानी में भी जन-मजूर के रूप में उनका इस्तेमाल प्रायः नहीं के बराबर होता था. उनका अधिकतर वास श्मशान घाट के आसपास ही होता था. शव के दाह-संस्कार के समय खर कुश की लुकाठी में वही आग जलाते हैं और उसी से मुखाग्नि दी जाती है

... मुखाग्नि के बाद उसी आग से चिता जलती है. अर्थी के कच्चे-हरे बाँस को डोम उठा ले जाते हैं. हरे बाँस को चीरकर पतले-पतले कइन निकालते हैं. कइन से सूप, कलसूप, चंगेरी, दौरा, दौरी, सिपुली-मउनी, डलिया, धैंटी, ओड़ा, खाँच, काँडी जैसे नाना प्रकार के बाँस निर्मित पात्र और उपकरण बनाये जाते हैं जिनका ग्रामीण जीवन में भरपूर उपयोग होता है. शादी ब्याह के अवसर पर डोमों द्वारा बनाये ‘सूपा-वेणी’ का उपयोग होता है. ‘सूपा-वेणी’ दूल्हे के साथ कन्या के घर ले जायी जाती है. अर्थी के बाँस से ही डोम हाथ के पंखे भी बनाते हैं जिन्हें ‘विजना’ भी कहा जाता है. बिजली रहित गाँव में गर्मी के दिनों में बाँस के उन हाथपंखे की खपत खूब होती थी. बाँस से बनी चीजों की बिक्री डोम जाति की लड़कियाँ और स्त्रियाँ गाँव-गाँव घूमकर करती थीं. इसके लिए वे गाँव के बाहर किसी घने बाग में, जहाँ कोई जोहड़ तालाब हो, डोम अपने डेरे (अस्थाई तंबू) गाड़ देते थे.

ऐसे ही गर्मियों के एक दिन डोम की लड़की सूप पंखे आदि लेकर सलेमपुर गाँव में बेचने निकली. असह्य गर्मी और कड़ी धूप के चलते डोमनी को तेज प्यास लगी, दो-तीन घरों से उसने पानी माँगा, लेकिन ब्राह्मणों के गाँव में उसे पानी-पिलाने को कोई तैयार न हुआ. उसके सिर में चक्कर आने लगे. सँभलते-सँभलते उसे गश आ गया. गर्मी की दोपहर में वैसे भी गाँव की खोरियाँ सुनसान हो जाती हैं. किसी के गिरने की आवाज सुनकर दोपहरी में अपने दालान में आराम फरमाते मड़ई बाहर निकले तो देखा कि एक जवान डोमनी खोरी में औंधी पड़ी हुई है... उसके सूप पंखे छितराये पड़े हैं. मड़ई हक्का-बक्का होकर कुछ पल के लिए उसे देखते रहे... डोमनी गजब की सुन्दर थी, जेठ की धूूप की तरह निखरी. रूप की उस गर्मी में पिघल गये मड़ई. उन्होंने उसे गोद में उठाया और अपने दालान के अन्दर लाकर बाँसखट पर लिटा दिया. दुबारा जाकर उसके सामान बटोर लाये. घड़े से पानी निकाल मुँह पर छींटे मारने लगे. पानी के ठंडे स्पर्श से उसे होश आये तो पीने के लिए पानी माँगने लगी. अपनी गोद में उसको लिटाकर मड़ई ने लोटा उसके मुँह से लगा दिया. वह गटागट पानी पीने लगी. प्यास मिटते ही उसने आँखें खोलीं. आँखें चार हुईं. दोनों को अब एक अलग तरह की प्यास ने आ लपेटा.

जवान मन, जवान देह, अलस दोपहरी और सूना गेह. मड़ई अपने आपे में न रहे. डोमनी तो शाम ढले अपने डेरे में चली गयी, लेकिन बहुत कुछ देकर और उससे भी ज्यादा लेकर. मड़ई के दिन अब डोमनी के इर्द-गिर्द बीतने लगे. डोमनी अपने डेरे से बाहर निकलती और मड़ई अपने घोड़े पर उसे बिठाकर जंगल-कछार चले जाते. मन भर अभिसार होता, फिर भी तृप्ति नहीं मिलती. प्रेम के अथाह सागर में गोते लगाने वालों की प्यास बुझे भी तो कैसे! ज्यों-ज्यों चाखे प्रेम रस, त्यों-त्यों भींजै पंख.

कहते हैं-इश्क और मुश्क छुपाये न छुपे. लोगों को पता चल ही गया. कुटम्ब-गोतिया समझाने लगे कि हद लाँघना ठीक नहीं है. मर्द को भौंरे की तरह होना चाहिए, फूलों का रस पी ले, लेकिन उनसे लगे न रहे, मूर्ख होते हैं वे, जो मक्खी की तरह शहद में लिथड़ जाते हैं और प्राण गँवा देेते हैं. मड़ई न माने. गाँव वाले आड़े आने लगे, जाति से निकाल देने की धमकी देने लगे. उधर मड़ई डोमों के डेरे के इर्द-गिर्द चक्कर काटते रहते, प्रेमिका की एक झलक पाने के लिए. खेती-गृहस्थी के काम चैपट होने लगे. ‘रैन नहीं चैन, न सैन इहि उद्दिम में.’

डोम बिरादरी की तरफ से भी बाधा आने लगी. वह समय आजकल की तरह उग्र विरोध का नहीं था, न दलितों में आज की तरह एकता और सचेतनता थी. सवर्ण जातियाँ उनकी बहू-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ करने में कोई परहेज न करती थी. सम्बन्ध केवल मौज-मजे के लिए बनते थे, उनकी विवाह में परिणति कतई सम्भव न थी. वे मड़ई को समझाने लगे कि आप ब्राह्मण हैं, हमारी छाया तक छूना आपके लिए पाप है. यह सम्बन्ध अधिक समय तक टिक न पाएगा. आप हमारी लड़की को अपने घर में बिठा नहीं सकते और हमारे में आप शामिल नहीं हो सकते.

मड़ई लेकिन दूसरी ही धातु के बने थे. प्रेम के आगे उन्हें जाति-पाँति का बन्धन स्वीकार्य नहीं था. प्रेम के लिए वह सबकुछ त्याग देने पर उतारू हो गये, धन-संपत्ति, कुल-मर्यादा, जाति-संस्कार सबकुछ. महान प्रेमी दृढ़हठी होते हैं. “इनको यही सुभाव है, पूरी लागी आड़ि” एक डोम कन्या को व्याहकर अपने घर में रख लेना नितांत असंभव था. उन्होंने झटके में फैसला ले लिया कि वे डोम बिरादरी में शामिल हो जायेंगे.

डोमों के चैधरी के सामने उन्होंने जनेऊ तोड़ दिया और अपने इरादे से उन्हें अवगत कराया. चैधरी ने फिर समझाया, लेकिन मड़ई अपने फैसले पर अडिग रहे. मड़ई का सबसे बड़ा बल थी उनकी प्रेमिका. वह भी मड़ई को छोड़ना नहीं चाहती थी. मड़ई के बिना उसके लिए एक पल जीना भी गवारा न था. जिस ब्राह्मण जाति के लोग उसे दूर से पानी तक पिलाना नहीं चाहते थे उसी जाति का एक गबरू जवान उस पर फिदा था, मर मिटने पर उतारू था, उसे छोड़ देना घोर विश्वासघात होता. शारीरिक सुख लेने के लिए सवर्ण पुरुष तो लालायित रहते थे, लेकिन प्रेम देने के लिए, मान-इज्जत देने के लिए तैयार न होते थे. मड़ई के दृढ़ संकल्प के आगे डोमों के चैधरी भी नतमस्तक हो गये. ब्राह्मणों को तो मड़ई ठेंगा दिखा ही चुके थे. अपना घर-बार, गाय-बैल, खेत-बघार सबकुछ छोड़कर मड़ई डोमों के डेरे में आ धमके.

अगले दिन श्मशान घाट में उनके ब्राह्मण से डोम में अंतरण की प्रक्रिया शुरू हुई. वह कोई बहुत जटिल प्रक्रिया न थी. हलके भर के डोमों को बुलावा भेजा गया. वे श्मशान में एकत्र हुए. अर्थी के बाँस से ही एक पुरसा भर ऊँचा मचान बनाया गया. उस पर डोम कन्या को तेल-उबटन लगाकर बिठाया गया. नीचे जमीन पर औंधे सूप पर मड़ई को बिठाया गया. मचान पर डोमों के चैधरी और सरदार चढ़ गये ओर घड़े में पानी भरकर लड़की के ऊपर गिराने लगे. उसी पानी से लड़की स्नान करने लगी और मचान के नीचे बैठे मड़ई के ऊपर वह पानी गिरने लगा. मड़ई उसे पानी से स्नान करने लगे. यही प्रक्रिया सात दिनों तक चली. सातों दिन सात जलाशयों के जल से डोमकन्या ने स्नान किया और उसके नहाये पानी से मड़ई ने. सातवें दिन भोजभात हुआ और उस लड़की से मड़ई का व्याह हो गया. सवर्णों में ठीक उलटा विवरण है.... वर के नहछू (नखक्षौर) के पानी से कन्या स्नान करती है.

उस अवभृथ स्नान के बाद मड़ई का वास्तविक संघर्ष शुरू हुआ. श्मशान घाट पर उनके हाथ की जलाई अग्नि से कोई मुखाग्नि नहीं देना चाहता था. उसके लिए जन्मना डोम चाहिए. मड़ई तो ब्राह्मण से डोम बने थे. लोग उन्हें मड़ई दूबे कहकर ही बुलाते. वह प्रतिवाद करते कि अब तो मुझे ‘मड़इया डोम’ कहा जाय. अपना तो सबकुछ वह छोड़ ही आये थे. श्मशान घाट पर अग्नि प्रज्वलित करने की आजीविका भी उन्हें न मिली. उन्होंने बाँस से सूप-दौरा-पंखे बनाना सीखा. उसी से घर का खर्चा चलाना पड़ता. पति-पत्नी मिलकर बाँस से चीजें बनाते और पत्नी इन्हें बेचने जाती. संतति-निग्रह के कारगर उपाय न होने की वजह से दम्पति के कई बच्चे-कच्चे भी हो गये. वैसे भी उस वर्ग में ज्यादा बच्चों का मतलब आय के साधन में वृद्धि होना होता है. घोर आर्थिक कष्ट और अपमान ताने के बावजूद मड़ई का प्रेम कम न हुआ. यद्यपि अंतिम अवस्था घोर दरिद्रमय रही, फिर भी यह दरिद्रता उनकी खुद की वरण की हुई थी, सो कोई गिला-शिकवा भी न था. कुछ वर्षों के बाद मड़ई ने अपने गाँव का इलाका छोड़ दिया था. डोम जाति वैसे भी स्थायी रूप से एक जगह कम ही टिक पाती है.

जिस वक्त की यह घटना है, उस वक्त जातिगत बंधन बहुत कठोर था. मड़ई ने उसे तोड़ने का साहसिक कदम उठाया था.अपने आप में यह कम क्रांतिकारी घटना नहीं है. बाद में उन पर भोजपुरी में एक फिल्म भी बनी थी-”पीरितिया के डोर’ नाम से. फिल्म नितांत रोमांटिक थी... वास्तविकता पर आधारित नहीं... उसमें मड़ई दूबे के प्रेम-प्रसंग की छाया मात्र थी. आज तो सवर्ण समाज मड़ई के ऊपर कोई बात भी नहीं करता. नयी पीढ़ी के लोगों को उनके बारे में जानकारी भी कम है. मड़ई के जीवन की तरह उनकी प्रेम कहानी पर भी वक्त की गर्द पड़ती गयी.

मड़ई दुबे सामान्य परिवार से आते थे. सवर्ण समाज के दृष्टिकोण से उन्होंने घोर अनैतिक काम किया था. डोम बेचारे तो वैसे भी उपेक्षित जाति हैं. उनमें शामिल होना कोई ध्यानखींचू घटना न बन सकी. इसलिए भी मड़ई की कहानी अधिक प्रसिद्ध न हो सकी.



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