लेखा-जोखा
पसीना मिश्रित जल से
उगायीं फसलें
लगाये पेड़
पल भर ठिठककर
जानना चाहा धूप का रंग
न फसल ही अपनी हो सकी
न पेड़ ही
तपती दुपहर में
रजबाहे की नालियों में
बहते गंगाजल से
बुझायी प्यास अनेक बार
बिना हिसाब किये-
कितनी रेत समायी पेट में
कितना पानी बदला लहू में
फिर भी,
न गंगा ही अपनी हो सकी
न रजबाहे की रेत ही
शिवालय के दरवाजे से दूर
खड़े होकर माँगी मन्नतें
सही दुत्कार बामन की
यह सोचकर-
कभी तो खुलेगा दरवाजा
अपने लिए भी
भीतर सोया देवता
जागेगा किसी रोज
पी जायेगा समूचा विष
बाहर आकर
न दरवाजा ही खुला कभी
न देवता ही अपना हो सका
बालिग होते ही
नाम लिखाया मत-सूचि में
कागज का मोहर लगा टुकड़ा
हर बार डाला मत पेटी में
इस उम्मीद में-
कोई और नहीं
लोकतंत्र तो अपना होगा
गोपनीयता की शपथ में
रची गयी साजिशें
खाकी वर्दी की मंत्रणा में
मरी-दबी इच्छाओं के सायरन-सी
गूँजती-आवाजें
लूट-खसोट
मारा-मारी
पालों की अदला-बदली
संसद के गलियारों का
अधमरा लोकतंत्र भी
न अपना हो सका
न जगा सका
विश्वास ही!
जूता
हिकारत भरे शब्द चुभते हैं
त्वचा में
सुई की नोक की तरह
जब वे कहते हैं
साथ चलना है तो कदम बढ़ाओ
जल्दी-जल्दी
जबकि
मेरे लिए कदम बढ़ाना
पहाड़ पर चढ़ने जैसा है
मेरे पाँव जख्मी हैं
और जूता काट रहा है
वे फिर कहते हैं
साथ चलना है तो कदम बढ़ाओ
मेरे पीछे-पीछे आओ
मैं कहता हूँ
पाँव में तकलीफ है
चलना दुश्वार है
मेरे लिए
जूता काट रहा है
वे चीखते हैं
भाड़ में जाओ
तुम और तुम्हारा जूता
मैं कहना चाहता हूँ
मैं भाड़ में नहीं
नरक में जीता हूँ
पल-पल मरता हूँ
जूता मुझे काटता है
उसका दर्द भी मैं ही जानता हूँ
तुम्हारी महानता मेरे लिए स्याह अँधेरा है
वे चमचमाती नक्काशीदार छड़ी से
धकियाकर मुझे
आगे बढ़ जाते हैं
उनका रौद्र रूप-
सौम्यता के आवरण में लिपटकर
दार्शनिक मुद्रा में बदल जाता है
और मेरा आर्तनाद
सिसकियों में
मैं जानता हूँ
मेरा दर्द तुम्हारे लिए चींटी जैसा
और तुम्हारा अपना दर्द पहाड़ जैसा
इसीलिए
मेरे और तुम्हारे बीच
एक लम्बा फासला है
जिसे लम्बाई से नहीं
समय से नापा जायेगा.
जो मेरा कभी नहीं हुआ
जन्म के समय
सबकुछ वैसा ही नहीं था
जैसा मैंने चाहा था
बड़ा होने पर
घर था
छत नहीं थी
खटिया थी
बिस्तर नहीं था
लिपा-पुता चूल्हा था
जो बदलता रहता था
अपनी जगह
मौसम के साथ
स्कूल था
जहाँ भरी जाती थी नस-नस में
जातीय हीनता
शब्दों की घुट्टी में घोलकर
नौकरी है
जहाँ पीछा करती नजरें
करने लगी हैं खड़ा कठघरे में
यकीनन
बहुत मुश्किल है समय
जब चलना है
आगे-पीछे
दायें-बायें
ऊपर-नीचे
अपने आपको बचाकर
जुटानी है रोटी
सीधे चलते हुए
बिना किसी शिकवे-शिकायत
और कातर गुहार के
सबकुछ था
मेरे जन्म से पहले भी
और जन्म के बाद भी
लेकिन मैं
उसे अपने पक्ष में
कर लेने में रहा असमर्थ ही
मेरी इस असमर्थता में
बहुत बड़ा हाथ था
मेरे धर्म का
जो मुझे बाँध कर तो चाहता है
रखना
लेकिन वह मेरा
कभी नहीं हुआ!
दीवार के उस पार
खुली सड़कों पर टहलते
आरामतलब लोग करने लगे हैं बहस
उँ$ची आवाज में
चिल्लाने लगे हैं
यह निषिद्ध क्षेत्र है
जहाँ हमने लगायी है नेमप्लेट
अपने पुरखों की
दर्ज किया है इतिहास में जातीय गौरव
मत आने दो इस ओर
असभ्य, संस्कृतिविहीन, विपथियों को
अतीत से बाहर आती क्रूर हँसी
किरकिराने लगी है आँखों में
चेहरों का ठंडापन
और पसीने से भीगी हथेलियाँ
भूल जाना चाहते हैं
पीठ पर रंेगती पीड़ा का एहसास
कागज पर उभरते अक्षर
करवट बदलने लगे हैं
भविष्य का अँधेरा
ठहाके मारकर हँसने की कोशिश में
विदू्रप हो उठा है
दीवार के उस पार उग आयी है
काँटेदार बाड़
जिसे पार करने कई पीढ़ियाँ
जो जीना चाहती हैं
अपनी शर्तों पर
बिना डरे
साँप की केंचुल-सा हीनताबोध
उतार फेंका है
दीवार के उस पार
जहाँ सड़ रहा है
सदियों से जमा कूड़ा.
विपथित संघर्ष-यात्रा: एक
जब घर से चले थे
चेहरे पर नीली आभा थी
आकाश में चमकते नये सूर्य की
आँखों में पहाड़ी नदी का तीव्र प्रवाह
मार रहा था हिलोरें
साँसों में शोर था तूफानी हवाओं का
कानों में गूँज रही थी
पुरखों की दर्दनाक चीखें
नगाड़ों की तरह
हृदय में उठता था
हाहाकार
समय की परिधियों से बाहर
निकलकर
उमड़-घुमड़ करती थी
विश्वास में छले जाने की
सदियों पुरानी यातना
सुविधाओं की परछाईं में
छूटने लगा है सभी कुछ
फिसलने लगा है समय
मुट्ठी में बन्द रेत-सा
लहू में बसा हुआ
बर्बर संस्कृति का भय
बुना हुआ है मकड़ी के जाले-सा
इर्द-गिर्द
महीन अदृश्य धागों से
हौसला टूट रहा है
नया सोफा आने से पहले
आ गया है मखमली कालीन
ड्राइंग रूम में
जिस पर बैठना चाहता हूँ
धुले-पुँछे जिस्म
साफ-सुथरे पाँव
स्मृतियाँ धुँधलाने लगी हैं
फीका पड़ रहा है नीला रंग
जिसने सिखाया था
अपने हक में लड़ने का तरीका
आदमी को देखना
आदमी की तरह
आने वाला समय
गहरा काला लबादा ओढ़कर
पसर गया है
उन बस्तियों में
जहाँ ताजा हवा प्रतिबन्धित है
इसके बावजूद मैं
सजाने लगा हूँ ड्राइंग रूम
उनके लिए
जो शामिल हैं
इस साजिश में!
विपथित संघर्ष-यात्रा: दो
मैं आज चाहता हूँ दीक्षा भूमि
अदृश्य भय पीछा करता है
दिखाना चाहता हूँ परिवारजनो
सगे-सम्बन्धियों को
चैत्य भूमि
असमंजस में पड़ जाता हूँ
छिपा लेता हूँ खुद को
दिग्भ्रमित होकर
झूठ की आड़ में
घुन की तरह समा गया है भय
मेरी हड्डियों में
पत्नी रोपना चाहती है
गमले में तुलसी
मैं तिल-तिल मरने लगता हूँ
ढीली पड़ जाती हैं
मांसपेशियाँ
मेरी यह कोशिश
धोखा देगी मुझे
अँधेरे में खो जायेंगी
आने वाली पीढ़ियाँ
यह सब जानते हुए भी
मैंने स्थगित कर दी है
अपनी संघर्ष-यात्रा
भय ने घेर लिया है मुझे
चारों ओर से!
ओमप्रकाश वाल्मीकि
जन्म: 30 जून 1950 बरला, जिला मुजफ्फरनगर (उ.प्र.)
शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी साहित्य)
प्रकाशित कृतियाँ: सदियों का संताप, बस्स! बहुत हो चुका (कविता-संग्रह), जूठन (आत्मकथा); पंजाबी, मलयालम, तमिल, कन्नड़, अंग्रेजी, जर्मनी, स्वीडिश भाषाओं में अनूदित, सलाम, घुसपैठिए (कहानी-संग्रह), दलित साहित्य (आलोचना), सफाई देवता (समाजशास्त्रीय अध्ययन.)
सम्पादन: दलित हस्तक्षेप (रमणिका गुप्ता), प्रज्ञा साहित्य (अतिथि संपादन), तीसरा पक्ष (सलाहकार सम्पादन)
पुरस्कार: डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार (1993), परिवेश सम्मान (1995), कथाक्रम सम्मान (2001), न्यू इंडिया बुक पुरस्कार (2004), 8वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन (2007), न्यूयाॅर्क, अमेरिका सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान (2008.)
सम्पर्क: सी-5/2, आर्डनैंस फैक्टरी ईस्टेट, देहरादून-248008