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खुली खिड़की : अफगानी उपन्यास

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हम देख रहे हैं कि दुनिया बदल रही है, जगह-जगह परिवर्तन हो रहे हैं, पर अफगानिस्तान में नहीं. हम यह भी जानते हैं कि  अमेरिका के नये राष्ट्रपति ओबामा अफगानिस्तान के मामले में कुछ सार्थक पहल करना चाहते हैं. अफगानिस्तान में ब्रिटिश सैनिकों की मृत्यु के समाचार बराबर मिल रहे हैं फिर भी वहाँ से ब्रिटिश सैनिकों की वापसी के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं. इस सबके बावजूद न तो यूरोपीय प्रकाशकों को और न ही पाठकों को इस बात के लिए दोष नहीं दिया जा सकता है कि अफगानिस्तान के सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा जा रहा है. लेकिन यह निश्चय ही प्रसन्नता की बात है कि अफगानी लेखक खालिद होसेनी के पहले उपन्यास ‘द काइट रनर’ की अभूतपूर्व अन्तरराष्ट्रीय सफलता के बाद उनका दूसरा उपन्यास ‘ए थाउजेंड स्पलेडिंड सन्स’ ब्रिटेन में प्रकाशित होते ही ‘संडे टाइम्स’ की बेस्टसेलर सूची में पाँचवे स्थान पर आ गया और कई सप्ताह तक उसकी यही स्थिति रही. यह उपन्यास अफगानिस्तान के संकट की जड़ों के सम्बन्ध में है. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि 2001 के बाद अफगानिस्तान का जो एक प्रकार से पुनर्जागरण हुआ है, पर अभी भी ब्रिटिश जनता के मन में वहाँ के संघर्ष की जो प्रतिच्छाया बनी हुई है, उसके साथ क्या यह मात्र संयोग ही कहा जाना चाहिए कि अफगानिस्तान से सम्बन्ध्ति उपन्यास ;पिफलिप हेन्सर का ऐतिहासिक उपन्यास ‘द मलबेरी एम्पायर’द्ध और रिपोर्ताज ;रोरी स्टेवार्ट का ‘द प्लेस इन बिटवीन’ के क्षेत्र में ब्रिटेन में इधर कुछ अच्छी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. इतना ही नहीं बी.बी.सी. पर डेविड लोन ने ‘बूचर एन्ड बेल्ट’ में इतिहास के माध्यम से अफगानिस्तान सम्बन्धी ब्रिटिश और अमेरिकी नीति की मूर्खतापूर्ण त्रुटियों और बर्बरता का अच्छा खुलासा किया है. नदी अस्लम के नये उपन्यास ‘द वेस्टेड वीजिल’ में अफगानिस्तान के अतीत और स्थानीय तथा बाहर के लोगों पर उसके प्रभाव का अच्छा चित्रण हुआ है. इससे भी अधिक, वस्तुतः सबसे अध्कि महत्त्वपूर्ण बात तो यह कही जानी चाहिए कि पिछले वर्ष 2008 अफगानी लेखक अतीक रहीमी को यूरोप का सर्वाध्कि प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार उनके दूसरे उपन्यास ‘सिन्ज सेबोर’ के लिए दिया गया.


1962 में जन्मे अतीक रहीमी अफगानिस्तान पर सोवियत आक्रमण के बाद लगभग पूरी तरह तबाह हो चुके अपने देश के बाहर एक प्रकार के शरणार्थी का जीवन ही बिता रहे हैं. आजकल वे प्रफान्स में रह रहे हैं. ब्रिटेन में उनके पहले दो उपन्यासों के बहुत ही सुन्दर अनुवाद ‘अर्थ एंड एशेज’ और ‘थाउजेंड रूम्स ऑफ ड्रीम्स’ नाम से चेटो एंड विंडस से प्रकाशित हुए हैं. ये दोनों ही उपन्यास अफगानिस्तान के अतीत और भविष्य के सपनों के विषय में हैं. इसके बाद उन्होंने फ्रेंच में अपना पहला उपन्यास लिखा और नम्बर 2008 में उन्हें अपने इस उपन्यास पर फान्स का प्रतिष्ठित प्रिक्स गोन्कोर्त साहित्यिक पुरस्कार मिला. यह आश्चर्य की बात ही कही जानी चाहिए कि गोन्कोर्त के जो जूरी अभी तक अपने दड़वे से निकलकर बाहर नहीं आ सके थे और अन्य देशों या भाषाओं में  लिखे उपन्यासों की एक प्रकार से भतर्सना ही करते आ रहे थे वे इस बार एकाएक संकीर्णता त्यागकर बाहर आये. इसका श्रेय जूरी के एक सदस्य मोरोक्को के फ्रेंचभाषी उपन्यासकार तहार वेन जेलून को दिया जाना चाहिए. उसी समय फ्रांस का एक दूसरा प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार प्रिक्स रेनोडोत गिनी के उपन्यासकार तीरनी मोनेनेम्बो को मिला.

खालिद होसेनी और नदीम असलम के समान अतीक रहीमी के उपन्यास ‘सिन्ज सेबोर’ में अफगानी महिलाओं की स्थिति का बहुत ही भयावह चित्रण किया गया है. इस उपन्यास में युद्ध में घायल एक अफगानी गुरिल्ला की पत्नी द्वारा एकालाप में अफगानी महिलाओं के विषय में लिखा गया है. रहीमी को यह उपन्यास लिखने की प्रेरणा एक अफगानी कवियत्री नादिया अन्जुमन के जीवन से मिली जिसे उसके पति ने तीन वर्ष पूर्व तरह-तरह से शारीरिक यातना देकर मार डाला था. तालिबान के पतन के बाद अफगानिस्तान की अनेक सक्रिय महिला कर्मियों को इसी प्रकार निर्दयता से मार डाला गया है. यदि ओबामा द्वारा घोषित नयी अफगानी अमेरिकी नीति अफगानिस्तान के बागियों का खात्मा कर सकी तो आशा की जानी चाहिए कि अफगानिस्तान में विश्व मानवाधिकार के समर्थक और उपनिवेशवादी विचारों में जबरदस्त टक्कर होगी. ऐसी स्थिति में अच्छे से अच्छा उपन्यास भी अफगानिस्तान की समस्याओं का उत्तर भले ही न दे सके, पर पाठकों को गम्भीरता से इस पर विचार करने के लिए प्रेरित तो कर ही सकेगा.

संपर्क : 8ए, बन्द रोड, एलेनगंज, इलाहबाद-211002



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