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कहानी : गन्ध

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रोज की तरह आज भी उनकी नींद चार बजे के आसपास खुल गयी थी. उनकी यानी जानकी प्रसाद शर्मा की. ट्रेन ने अभी-अभी कानपुर स्टेशन पार किया था. इसका अन्दाजा उन्होंने लेटे-लेटे प्लेटपफार्म के लाउडस्पीकर पर चल रही उद्घोषणा से लगा लिया था. वे उठकर बैठ गये. ट्रेन में घूमना-टहलना, योगासन वगैरह तो किया नहीं जा सकता था. रोज जिस तरह सुबह पार्क में लोगों के साथ मिलकर पूरे इत्मीनान और विधि-विधान से वे योगासन-प्राणायाम किया करते हैं, वह इस ट्रेन के कूपे में कहाँ संभव है. मगर नींद खुल गयी तो फिर कहाँ आने वाली थी. शरीर को रोज का अभ्यास है. उन्होंने मन ही मन सोचा-जैविक घड़ी....

वे उठे, बेसिन तक गये. मुँह पर छींटे मारे. लौटकर सीट पर आये. पूरे डिब्बे में एक नजर दौड़ायी. सारे यात्री सो रहे थे. कोई कम्बल ताने, कोई हल्की चादर ओढे़. जिन-जिन तक नजर जा पा रही थी, उन्हें सोते हुए उन्होंने गौर से देखा. सोते हुए लोगों को देखना हर बार उन्हें अलग अनुभव देता है. कभी देर रात को घर लौटते हैं या देर रात की ड्यूटी पर कभी जाना पड़ता है तो सड़कों के किनारे लोगों को सोते हुए देखते हैं और उनका मन अजीब सी भावनाओं से भर जाता है. इसी तरह रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म या उसके बाहर लोगों को बेसुध सोते देखकर होता है. मगर इस तरह वातानुकूलित डिब्बे में सोये शरीफ लोगों को देखकर उनमें अलग भावना पैदा होती है. यही लोग जागते हुए, होशो हवास में, कपड़ों, चेहरे-मोहरे, उठने-बैठने की भंगिमा वगैरह को लेकर कितने सतर्क रहते हैं. उन्हें हँसी आ गयी.

बैग में साबुन, ब्रश और पेस्ट निकाला. संडास गये. फिर दाँत मांजा और सीट पर लौट आये. पालथी मारकर बैठे और प्राणायाम शुरू कर दिया. आँखें बन्द कर लंबी साँस खींचना और छोड़ना. तभी उन्हें एक गन्ध् ने घेर लिया. बल्कि कहें, उन पर हमला किया.

साँस खींचते-छोड़ते रहे और उस गन्ध को पहचानने की कोशिश करते रहे.... क्या यह किसी अचार की गन्ध है. लेकिन इतनी सुबह कौन खाने बैठ गया ...रात को खाया होगा, उसी की गन्ध बची रह गयी होगी ...गाँव में शादी विवाह या आयोजन-समारोह वाले घरों में जहाँ खाना पकता और रखा जाता है, वहाँ से कई दिनों तक पकवान के तेल-मसाले वगैरह की मिली-जुली गन्ध आती रहती है. वैसे ही यह गन्ध भी होगी. फिर ऐसी डिब्बे में हवा बाहर निकलने की गुंजाइश कम होती है, इसलिए भी इसी में घूम रही होगी. वे प्राणायाम करते रहे ...मगर यह गन्ध है किस चीज के अचार की. मैंने तो कभी खाया नहीं. खाया होता तो पहचानने में इतना वक्त नहीं लगता

...हो सकता है अपने घर में ऐसा अचार न बनता हो. किसी और के घर कभी खाया हो ...मगर अचार किसी भी चीज का हो, सबकी गन्ध में एक समानता होती है, जिसके आधर पर बिना खाये भी पहचाना जा सकता है कि यह अचार ही है ...नहीं, यह अचार की गन्ध् नहीं हो सकती ...फिर किस चीज की हो सकती है. जानी-पहचानी गन्ध् है, समझ क्यों नहीं आ रहा कि है किस चीज की.

उन्होंने उस गन्ध की तरफ से ध्यान हटाने की कोशिश की. अपने से क्या. सफर में तरह-तरह के लोग चलते हैं. हर आदमी का खान-पान अलग है. खाना पकाने, उसमें तेल-मसाले वगैरह के इस्तेमाल का तरीका अलग है. ऐसे क्या अन्दाजा लगाया जा सकता है कि यह किस व्यंजन की गन्ध हो सकती है ...उन्होंने प्राणायाम की दूसरी विधि शुरू की. पेट के भीतर की साँस को पूरी ताकत से तेजी के साथ निकालना शुरू किया. मगर गन्ध ने पीछा नही छोड़ा. बन्द आँखों में बहुत सारे व्यंजनों, दावतों और अब तक याद रह गये भोजन की स्मृतियाँ एक-एक कर उभरती रहीं.

स्मृति उन्हें बचपन में खींच ले गयी. याद आया कि जब वे गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे, वहाँ अध्यापक लोग दोपहर का खाना पकाते थे तो किस तरह मसालों की गन्ध् से उनके मुँह में पानी आता रहता था. कभी-कभी अपने दोस्तों से वे दबी जुबान में चर्चा भी करते कि सब्जी या दाल किस चीज की बन रही है. तब मास्टर लोगों के बर्तन धोने के लिए हर विद्यार्थी की अलग-अलग दिन पारी बनी थी. एक लड़का रसोई का कामकाज देखने के लिए मॉनीटर बनाया जाता था. वह हर किसी की पारी याद रखता था. दोपहर को खाना खाकर लौटने के बाद अपनी पारी के मुताबिक बच्चे बर्तन उठाते और पास के चाँपाकल पर माँजकर लाते. अगर कोई बदमाशी करने की कोशिश करता तो उसे अगले दिन बर्तन माँजने पड़ते थे. उन्हें याद आया कि जब वे बर्तन धोने ले जाते तो उसमें से खाने की खुशबू आती रहती थी. प्राणायाम करते समय उन्हें बचपन में धोई मास्टर जी की थाली और पतीली की तस्वीर उभर आयी. वह खुशबू भी जैसे स्मृति ने उनके नथुनों में भर दी.

अब यह गन्ध उन्हें परेशान कर रही थी. जैसे उनके लिए चुनौती बन गयी थी. प्राणायाम छोड़कर वे थोड़ी देर सीट पर बैठे रहे. खिड़की के परदे हटाकर बाहर देखने लगे. धीरे-धीरे उजास फैलने लगी थी. अन्दाजा लगाया गया कि कुछ ही देर में पूरा उजाला हो जायेगा. जून का महीना. गर्मी में सुबह की उजास जल्दी पैफल जाती है. नौ-दस बजे तक दोपहरी का आलम होता है. इसलिए गाँव के बहुत सारे लोग जल्दी उठकर सूरज निकलने से पहले ही अपना बहुत सारा काम निपटा लेते हैं.

ट्रेन दौड़ रही थी. दूर-दूर तक सफाचट खेत. पेड़ों की आकृतियाँ. कहीं-कहीं रेल लाइन के नजदीक के किसी खेत में सब्जी-भाजी के पौधें की हरियाली. हालाँकि हल्के उजास में हरियाली का रंग भी साँवला लग रहा था, पर मस्तिष्क उसे दुरुस्त कर ले रहा था. जब गाड़ी किसी गाँव के करीब से गुजरती तो पटरियों के किनारे की खुली जगह में निपटान के लिए बैठे स्त्री-पुरुषों की आकृतियाँ नजर आतीं. उन्होंने सोचा, यह गन्ध् कहीं पटरियों के किनारे की तो नहीं ...नहीं नहीं, कतई नहीं. इस बन्द, वातानुकूलित कमरे में बाहर की गन्ध्. यों भी इस गन्ध को बदबू नहीं कहा जा सकता. फिर दिमाग ने पलटी खायी, विकास के नारे, गाँवों में शौचालयों के लिए पैसे का प्रबन्ध्, योजनाएँ ...हुंह. कुछ भी तो बदलता नहीं जान पड़ता. इन लोगों को क्या पता कि ट्रेनों का कितना मल रोज पटरियों के किनारे गिरता है. उससे कितनी तरह की बीमारियाँ पैदा होती हैं. वे निपटाने के लिए यहीं आना पसन्द करते हैं बीमारियाँ उन्हें जकड़ती रहती हैं ...पता नहीं कब
ट्रेनों के मल के निपटाने का कोई व्यवहारिक इन्तजाम हो पायेगा....

चित्रा : निताई दासउन्होंने अपने दिमाग को झटका दिया. क्या-क्या सोचने लगते हैं वे भी. वे अपने पर मुस्कराये ...तथ्यों की जानकारी आदमी को इसी तरह सनकी और वहमी बना देती है. हर चीज में गलत-सही की तलाश, बेवजह. फिर उसे खींच-खांचकर व्यवस्था की लापरवाहियों, नाकामियों, भ्रष्टाचार वगैरह से जोड़ देना ...वे भी तो इसी व्यवस्था के अंग हैं.

मगर इस गन्ध् का वे क्या करें. वे सीट से उठ खड़े हुए. दरवाजे तक गये. वहीं खड़े होकर बन्द दरवाजे की खिड़की से बाहर की तरफ देखते रहे. अब खेतों और पेड़ों की आकृतियाँ कुछ साफ होने लगी थीं. पेड़ों पर लटके आम साफ देखे जा रहे थे. उन्हें बचपन के वे दिन स्मृति में उभर आये जब वे पूरी लू चलती दुपहरी बगीचे में बिता देते थे. किस तरह आँधी के वक्त आधी रात को भी वे आम लूटने बगीचे में भागते थे. बड़े लोग डाँटते रहते कि अगर कोई डाल टूटकर उफपर गिर गयी तो गजब हो जायेगा, मगर उसका खौफ उन्हें कहाँ होता था. पहली बारिश होते ही आम तेजी से पकने शुरू हो जाते. हल्की हवा भी चलती तो टप-टप टपकते रहते

...पेड़ पर पके आम का स्वाद भी क्या होता है. कृत्रिम रूप से पकाये आमों में भला वह स्वाद कहाँ ...हम किसानों को खेती-बारी के नुस्खे सिखाने वाले कार्यक्रम जरूर बनाते रहते हैं, मगर खुद अपने हाथों से उगाये फल और सब्जियों का स्वाद कभी नहीं ले पाये. जब तक स्कूल-कॉलेज में रहे, खेती-बारी से दूर रहे. फिर नौकरी के चलते गाँव से ही नाता टूट गया....

वह गन्ध् अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ रही थी. वे थोड़ा झँुझलाये, है किस चीज की गन्ध् यह आखिर ...बाहर से किसी पूफल की गन्ध् तो आ नहीं सकती. यों भी यह गन्ध् किसी पूफल की नहीं है, वे यह दावे के साथ कह सकते हैं. वे दरवाजे से हट गये. गलियारे से चलते हुए डिब्बे के दूसरे सिरे तक गये. अब भी सारे लोग सो रहे थे ...पता नहीं कब की नींद बटोरकर लोग ट्रेन में चढ़ते हैं. उनका मन हुआ कि सबको झकझोरकर जगा दें और पूछें कि यह गन्ध् किस चीज की है ...मगर इस तरह तो लोग उन्हें कोई पागल ही समझेंगे.

फिर वे उस सिरे से लौटते हुए सारे सोये यात्रिायों और उनके आसपास रखी चीजों पर गहरी नजर डालते हुए आगे बढ़ने लगे ...यह भी तो पता नहीं चल रहा कि यह गन्ध् किस खाने पीने की चीज की है ...शायद किसी ने कोई ऐसी महक वाला तेल चुपड़ रखा हो, किसी महिला ने परफ्यूम छिड़क रखा हो, जिसकी गन्ध् हो यह ...नहीं नहीं. कितनी बार वे कहें कि यह खुशबू किसी फूल तेल इत्रा वगैरह की नहीं है. इन सबसे बिलकुल अलग है. किसी खाने पीने की चीज से मेल खा सकती है, क्योंकि खाने पीने की चीजों की गन्ध् में ही इतनी विविधता हो सकती है. तेल फूल की सारी गन्ध जानी-पहचानी होती हैं.

उन्हें याद आया कि जब वे बचपन में गाँव के स्वूफल में पढ़ा करते थे, कोई-कोई बच्चा अचार का तेल चुपड़कर आ जाता था. दिन भर पूरा स्कूल उस अचार की गन्ध से भरा रहता. ऐसा अक्सर सर्दी के मौसम में होता था, क्योंकि तब शरीर में खारिश रोकने के लिए तेल लगाना जरूरी होता था और ज्यादातर घरों में तब तक सरसों खत्म हो चुका होता था. ऐसे में लोग अचार का तेल निकालकर काम चलाते थे. जब वह खत्म हो जाता तभी दुकान की शरण लेते...मगर इस डिब्बे में कोई ऐसा क्यों करके आएगा भला ...यों भी यह अचार की गन्ध् नहीं है. कितनी बार एक ही बात पर माथापच्ची की जाये.

वे फिर सीट पर आकर बैठ गये. बाहर उजाला बढ़ गया था. कोई स्टेशन आने वाला था. उसके आउटर की पटरियों और बिजली के खम्भों को देखकर उन्होंने अन्दाजा लगाया. गाड़ी की रफ्रतार भी कम होती जा रही थी. शायद रुकेगी. न भी रुके. धीमी होकर निकल ले. अगर रुकेगी तो नीचे उतरकर वे चाय पीयेंगे. वे सोच ही रहे थे कि रेल का बैरा चाय की आवाज लगाते हुए नजदीक आया. उन्होंने एक चाय ली और पीने लगे. इस बीच गाड़ी ने यह स्टेशन पार कर लिया. वे देख भी नहीं पाये कि उसका नाम क्या था ...अच्छा हुआ कि चाय ले ली.
चाय पीने के बाद उन्होंने खिड़की के परदे फिर से खींच दिये और लेट गये. चाय पीने के बाद उन्होंने महसूस किया वि वह गन्ध् कुछ कम हो गयी. चाय का स्वाद और उसकी गन्ध् ही नथुनों में अभी बसी हुई थी. उन्हें याद आया कि कॉलेज में जब वे पढ़ते थे, उनके दोस्त एक जुमला बोला करते थे, अगर तुम्हें यह जानना है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत कैसे एक है तो रेलवे स्टेशन की चाय पीओ, पूरे देश में स्टेशनों की चाय का स्वाद एक मिलेगा ...लेटे-लेटे वे सोचने लगे कि इसी को कहते हैं, खामखयाली. दिमाग किसी काम में न उलझा हो तो इसी तरह बेलगाम दौड़ता है. उन्हें याद आये अपने दोस्त प्रोपफेसर जगनाथन. वे बता रहे थे कि एक दिन जब वे यूनिवर्सिटी जाने के लिए आधे रास्ते में दूसरी बस लेने जा रहे थे तो किस तरह एक विचार ने उन पर हमला किया था. उन्होंने पान वाले से एक पान लिया. पान मुँह में दबाया और पान वाले ने जो एक रुपये का सिक्का वापस किया था उसे पर्स में डालने के लिए वे चलते हुए जेब से पर्स निकालने लगे. पर्स तो निकल आया, मगर सिक्का हाथ से फिसलकर नीचे गिर गया. जब वे सिक्का उठाने के लिए झुके तभी उस विचार ने उन पर हमला किया था.

सिक्का उठाकर जैसे ही पर्स में रखा, देखा कि नीचे एक और सिक्का पड़ा है. उन्होंने झुककर उसे भी उठा लिया. स्वाभाविक रूप से नीचे देखा तो एक और सिक्का वहीं पड़ा है. इस बार उन्होंने अगल-बगल ध्यान से देखा. थोड़ी दूर पर एक पान की दुकान और उस पर खडे़ एक-दो लोग. कुछ दूर आगे बस स्टैंड. उन्होंने गौर से देखा, सिक्का एक ही था. उन्होंने उसे भी उठाया. मगर नीचे नजर गयी तो वैसा ही एक और सिक्का. अबकी उन्हें हैरानी हुई. यह जरूर कोई चमत्कार है. उन्हें थोड़ी सी घबराहट भी हुई. तभी एक आदमी उनके पास से गुजरा. उन्होंने उसे रोका, भाई साहब मेरे साथ कुछ अजीब सा हो रहा है. ये देखिये, यह जो एक रुपये का सिक्का नीचे दिखायी दे रहा है, पाँचवीं बार मुझे मिल रहा है. वह आदमी ठिठका, मगर उन्हें कुछ इस तरह देखा जैसे वे सनकी हों. उन्होंने उसके मन को पढ़ते ही बात आगे बढ़ायी, नहीं विश्वास हो रहा ना, अभी दिखाता हूँ. उन्होंने वह सिक्का जमीन से उठा लिया. उसे जैसे ही उन्होंने जेब में रखा नीचे फिर एक सिक्का तैयार था. उन्होंने पास खड़े व्यक्ति की ओर इशारा किया, देखा. देखते रहिये. फिर उन्होंने वह सिक्का भी उठा लिया और उसकी जगह एक और सिक्का तैयार. ऐसा तीन-चार बार हुआ तो उस व्यक्ति ने आवाज लगाकर पान की दुकान पर खड़े लोगों को बुला लिया, अरे इध्र आओ, यह देखो चमत्कार. इस तरह वहाँ लोग इकट्ठा होते गये. तरह-तरह की चर्चा, तरह तरह की युक्तियां. किसी ने कहा कोई और हाथ लगाकर देखो सिक्का बनता है कि नहीं. मगर जैसे ही कोई हाथ लगाता सिक्का गायब हो जाता. सिर्फ प्रोपेफसर साहब के हाथ में ही आता. इस तरह सिक्के बटोरते हुए उनके पैंट की दाहिनी तरफ की जेब भर गयी थी. बार-बार झुकने से कमर भी दुखने लगी थी. ऐसे में किसी ने सलाह दी कि पान की दुकान से स्टूल ले आया जाये. स्टूल आ गया. अब वे उस पर बैठकर सिक्का उठाने लगे.

तभी उनके कान में किसी के टीवी चैनल वाले से फोन पर बतियाने की आवाज पड़ी. इसका मतलब देखते न देखते टीवी पर उनकी तस्वीर आने लगेगी. टीवी वाले उनसे इन्टरव्यू लेंगे. उनसे क्या-क्या पूछा जा सकता है और उन्हें क्या-क्या जवाब देना है, वे सिक्का उठाते हुए सोचते रहे. थोड़ी देर में एक टीवी वाले की गाड़ी हाजिर हो गयी. लोगों ने अलग होकर उसके कैमरे के लिए जगह बनायी. अब उनका प्रसारण शुरू हो गया. रिपोर्टर ज्यादातर वही-वही सवाल पूछ रहा था, जिनकी वे पहले ही कल्पना कर चुके थे.

भीड़ बढ़ती जा रही थी. मुश्किल से आध घंटा बीता होगा कि वहाँ बहुत सारे टीवी चैनल वाले जमा हो गये. उनसे तरह-तरह के सवाल पूछे जाने लगे. तब तक उनकी सारी जेबें और झोला सिक्कों से भर चुके थे. अब वे जमीन पर पालथी मारकर बैठ गये थे और सिक्के अपनी गोद में जमा करने लगे थे. मगर टीवी वालों के सवालों के बीच उन्हें अचानक ध्यान आया कि वे तमाशा बन चुके हैं. आज यूनीवर्सिटी में एम. फिल के विद्यार्थियों का इन्टरव्यू है. उन्हें इसके लिए जल्दी पहुँचना था, मगर वे दो घंटे से इस तमाशे में फँसे हुए हैं. तकनीक के विरोध और आदर्शवादिता के चलते मोबाइल फोन न रखने का नतीजा उन्हें पहली बार पता चल रहा था. अगर मोबाइल होता तो विभाग के लोग उनसे सम्पर्क कर जान सकते कि वे कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं. यह भी तो अन्दाजा नहीं कि सिक्का मिलने का सिलसिला कब तक जारी रहेगा. उन्हें याद आया कि जब गणेशजी ने दूध पीना शुरू किया था तो सुबह से शुरू होकर आधी रात तक पीते रहे थे. अमेरिका में तो सुना कि अगले दिन तक यह सिलसिला चला था ...पता नहीं यह सिक्का मिलने का सिलसिला कब तक चलेगा ...इस बीच विभाग में इन्टरव्यू रुका रहेगा. क्या करूं, समझ में नहीं आ रहा. वे सिक्का उठाते हुए सोचे जा रहे थे.

...इन्टरव्यू का क्या है. यह तो हो ही जायेगा. मैं न पहुँचूंगा तो लोग कोई न कोई विकल्प सोचेंगे ही. क्या मैंने ही इन्टरव्यू का ठेका ले रखा है. अचानक तबीयत खराब हो जाती, मेरी न सही मेरी पत्नी की ही हो जाती, किसी बच्चे की ही हो जाती और उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ता तो भी विभाग में इन्टरव्यू तो होता ही न. या घर से निकलते ही मैं किसी गाड़ी के नीचे आ जाता, इस दुनिया में ही न रहता तो क्या मेरे लिए इन्टरव्यू रुकते ...फिर क्यों परेशान हो रहा हूँ. यहाँ पैसे मिल रहे हैं. जब तक मिलते रहें, सिक्के ही सही, एकाध लाख तो बटोर ही लूंगा. वेतन से इतने पैसे बचाने में कितने साल लगेंगे, क्या पता. वे पैसे जमा करते रहे. टीवी और अखबार वालों के सवालों का जवाब देते रहे. थोड़ी देर बाद सवालों का सिलसिला थम गया था. अब वहाँ खड़े लोग ही ज्यादा बताये जा रहे थे. अब उनकी सिर्फ तस्वीरें खींची जा रही थीं. टीवी के रिपोर्टर बीच-बीच में अपने स्टूडियो से फोन पर सम्पर्क बनाकर सूचना दे रहे थे. प्रोफेसर साहब के सामने तोप की तरह कैमरे तने हुए थे.

कैमरों की तोप के रूप में कल्पना करते ही उनका पूरा शरीर झनझना उठा. मैं तो सीधे टीवी पर दिखाया जा रहा हूँ. अब तक विभाग के लोगों को भी यह खबर पहुँच चुकी होगी. मेरे विरोधियों ने वाइस चांसलर को भी मेरी करामात टीवी पर दिखा दी होगी. वह चिल्ला रहा होगा, ढोंग
...चमत्कार,

...अंधविश्वास. निश्चय ही उसने मेरे खिलाफ केस बना लिया होगा. मेरे टर्मिनेशन का लेटर लेकर कोई मेरे घर पहुँचता ही होगा. कुछ सिक्कों की कीमत पर नौकरी ...यूनीवर्सिटी में कमाई प्रतिष्ठा ...फिर ये सिक्के भी क्या पता घर जाकर मिट्टी बन जाएँ. बचपन में कितनी कहानियों में वे ऐसा होता सुन आये हैं ...नहीं. उन्हें यह लोभ त्यागकर विभाग की तरफ भागना ही होगा ...इस तरह से प्रोफेसर साहब पर विचार का हमला रुका.

प्रोफेसर साहब के इस विचार-हमले के बारे में सोचते हुए जानकी प्रसाद मन ही मन मुस्कराये. ऐसे न जाने कितने विचार, खामखयाली आशंकाएँ आदमी पर रोज हमले करते हैं. कुछ देर आदमी उनसे जूझता रहता है, फिर सामान्य दिनचर्या में लौट आता है. मगर यह गन्ध् कुछ अलग तरह से परेशान कर रही है. समझ में क्यों नहीं आ रहा कि यह है किस चीज की. जानी पहचानी होती हुई भी दिमाग उसे पकड़ क्यों नही पा रहा. अब तक उन्होंने यह तो अन्दाजा लगा लिया कि यह गन्ध् गँवई है. शहरी कतई नहीं. तभी तो उसे समझने जानने के लिए उनका मन अधिक अकुला रहा है. इस गन्ध् की डोर पकड़कर बार-बार गाँव की स्मृतियों को पकड़ उसी तरफ भाग रहा है ...शरीर की भी अजीब क्रिया है. मस्तिष्क अपने आप आदमी को उन स्थितियों और समय से जोड़ देता है जिसके बिम्ब उससे टकराते हैं.

वह गन्ध् थोड़ी कम जरूर हो गयी थी, मगर खत्म नहीं हुई. जब-जब विचारों की शृंखला उसकी उपस्थिति को धुँधला कर दे रही थी, वह कम महसूस की जा पा रही थी, बस. जानकी प्रसाद ने ध्यान दिया कि उनकी ऊपर वाली बर्थ पर हलचल शुरू हो गयी है. दरअसल उस पर दो बच्चे सो रहे थे. वे जाग गये थे. उन्होंने अपने आप अन्दाजा लगाया कि पहले एक जागा होगा फिर दूसरे को जगाया होगा. थोड़ी देर वे कुनमुनाते रहे. फिर उनमें से एक नीचे उतरा और बगल की उपरी बर्थ पर सोयी अपनी माँ के पास गया. वह उसे जगाकर कुछ माँग रहा था. मगर माँ नींद में थी इसलिए वह मना कर रही थी. फिर बच्चे ने अपने आप सबसे निचली बर्थ के नीचे रखे बैग को टटोलकर निकाला और उसमें से उसने बिस्किट और नमकीन का पैकेट निकाला और अपनी बर्थ पर चढ़ गया. कुछ देर शांति रही. बस प्लास्टिक के थैलों की खड़खड़ाहट रह-रहकर आ रही थी. यानी वे चुपचाप खा रहे थे.

थोड़ी देर बाद जब चाय वाला उधर से गुजरा तो बच्चों ने उसे रोका और माँ को जगाने लगे, `माँ चाय के पैसे दे दो.´ तब तक चाय वाले ने उनके हाथों में चाय के कप पकड़ा दिये थे. उनकी माँ ने शायद अधनींद में इस बात का अन्दाजा लगा लिया था. उसने लेटे-लेटे अपनी बगल में रखा पर्स उठाया और पेट पर रखकर उसमें से कुछ पैसे निकालकर बच्चों की तरफ बढ़ा दिये. फिर वह चादर खींचकर सो गयी.
जानकी प्रसाद लेटे-लेटे उपर से आ रही ध्वनियों से बच्चों की गतिविधियों का अन्दाजा लगा रहे थे. उन्हें अपने बच्चों का बचपन याद आ रहा था. जब वे उन्हें लेकर गाँव जाया करते थे तो वे भी इसी तरह ऊधम मचाया करते थे. उनकी पत्नी उन पर झुंझलाती रहती थी. कभी-कभी जब वे बच्चों का पक्ष लेते तो उन्हें भी दो-चार बातें सुनने को मिल जाया करती थीं ...अब तो कितने साल हो गये, पत्नी और बच्चे गाँव जाते ही नहीं. वे अकेले ही जाते हैं. बच्चे बड़े हो गये हैं. दो-एक साल में नौकरी भी करने लगेंगे. अब गाँव से उनका नाता ही नहीं रह गया है. पिताजी थे तो उनकी जिद पर बच्चे और पत्नी वहाँ चले भी जाया करते थे. अब बिलकुल नहीं जाते. छोटे भाई का परिवार वहाँ रहता है. उनसे पत्नी की पटती नहीं. उन्हें लगता है कि वे हमारे हिस्से की जायदाद का मुफ्र्त लाभ ले रहे हैं. बच्चों को वहाँ जाने के बाद खुले में नहाना, दिशा मैदान के लिए खेतों में जाना पड़ता है, वहाँ के लोगों की बातचीत उन्हें समझ नहीं आती, इसलिए वहाँ वे सहज नहीं महसूस कर पाते ...मगर जानकी प्रसाद क्या करें. उनका तो आध जीवन वहीं गुजरा है. वहाँ का खान-पान, वहाँ के रीति-रिवाज तीज-त्योहार, मेले-ठेले अब भी याद आते हैं. खेतों से तोड़कर मक्का, गन्ना, चना, मटर, मूँगफली वगैरह खाने का उनका अब भी मन करता है. इसलिए तो वे साल में कम से कम एक बार गाँव जरूर जाते हैं. अगर दफ्र्तर से कभी उधर का कार्यक्रम बना तो गाँव भी हो आते हैं.

जब गाँव की याद आयी तो उन्हें महसूस हुआ कि गन्ध और तेज हो गयी है ...मगर कम्बख्त है किस चीज की, समझ क्यों नहीं आ रहा. वे अपनी बर्थ पर उठ बैठे. एक बार फिर से उठकर बेसिन तक गये. हाथ मुँह धेया और गेट पर खड़े हो गये. थोड़ी देर बाहर देखते रहे फिर लौट पडे़. डिब्बे के दूसरे सिरे तक गये. अब कई लोग जाग चुके थे. उनमें से कुछ चाय पी रहे थे, कुछ कम्बल लपेटे गुड़मुड़ी हुए बैठे थे. जानकी प्रसाद ने सब पर निगाह डाली, मगर गन्ध् का सुराग नहीं मिल पाया. वे फिर अपनी बर्थ पर लौट आये. इस बीच उफपर की सीट वाले बच्चों ने देखा कि नीचे की बर्थ खाली है तो वे नीचे उतर आये थे. जानकी प्रसाद को देखते ही वे एक तरफ खिसक गये. उन्होंने एक तरफ को ओट लगाकर बैठते हुए बच्चों से बातचीत शुरू कर दी. तुम्हारा नाम क्या है, किस क्लास और स्कूल में पढ़ते हो, कहाँ रहते हो, कहाँ से आ रहे हो, पिताजी क्या करते हैं, वगैरह. बच्चों ने शुरू-शुरू में बड़े उत्साह के साथ सवालों के जवाब दिये मगर पारिवारिक मसलों पर जैसे ही सवाल शुरू हुए, बच्चों ने बातचीत में रुचि लेनी कम कर दी. जैसे बातचीत से उनके व्यत्तिगत मसलों, खेलने-ऊधम मचाने में बाध पहुँच रही है. छोटा वाला अनमने भाव से कुछ सवालों का जवाब दे भी रहा था, मगर बडे़ वाले को जैसे जानकी प्रसाद में रुचि नहीं रह गयी थी. वह उठकर उफपर की बर्थ पर चला गया था. छोटे वाले ने भी उसकी देखा-देखी वैसा ही किया. जानकी प्रसाद उनकी अरुचि को ताड़ गये थे. उन्होंने मन ही मन खुद से सवाल किया कि आखिर बच्चों से बात करना उन्हें क्यों नहीं आता.

फिर सोचा, शायद ज्यादातर बुढ़ाते लोगों के साथ यही समस्या है. ये तो बच्चे हैं, उनका बेटा और बेटी तो कॉलेज में पहुँच गये हैं, वे तक उनसे महज काम की बातें करते हैं. अपनी माँ से फिर भी खुलकर बहुत सारी बातें कर लेते हैं. पता नहीं क्यों उनसे संकोच करते हैं. सामान्य व्यवहार की बातें ही ज्यादा होती हैं उनके बीच ...शायद इसलिए भी कि उनमें पिता का अहंकार अधिक उन्हें दिखाई देता है. हर बात में नसीहत, डांट-फटकार, गुस्सा ...यह दूरी शायद खुद उन्होंने बनाई है, अपने और बच्चों के बीच.

...मगर मैं तो फिर भी बच्चों से काफी खुला हूँ. कपड़े-लत्ते के चुनाव, खान-पान, सिनेमा, क्रिकेट वगैरह को लेकर उनसे खुलकर बातचीत कर लेता हूँ. मैं तो अपने पिता के सामने पड़ता ही बहुत कम था. जहाँ वे होते उनके आसपास जाने से बचता था. उन्होंने जो कपड़े सिला दिये वही पहन लेता था. अपनी पसन्द बताने की हिम्मत तो उनकी जीवन भर नहीं हुई. नाटक-सिनेमा वगैरह के बारे में बातचीत तो दूर, देखने तक छूट नहीं थी. गाँव में अगर कहीं नाच देखने जाता था तो चोरी-छिपे, इस बात का एहतियात रखते हुए कि कोई ऐसा व्यक्ति उन्हें नाच देखते हुए न देख ले जो पिता को सूचना दे सकता हो ...खैर, वह जमाना और था. अब घर-घर में टीवी है, जब कोई फिल्म आ रही होती है तो पूरा घर साथ देखता है. बच्चे माँ-बाप के सामने ही फिल्मी गीत गुनगुनाते रहते हैं. शादी-विवाह में उनके सामने नाचते हैं. इन सब चीजों पर रोक लगाएँ तो पिछड़े हुए माने जाएँगे... लगाने की जरूरत ही क्या है. मैं खुद टेलीविजन की नौकरी करता हूँ. सरकारी चैनल होने के कारण और मेरी ड्यूटी कृषि कार्यक्रमों पर होने के नाते भले मैं तथाकथित सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने वाले कार्यक्रमों से दूर हूँ, पर अगर मेरी ड्यूटी बदल दी जाए तो क्या मैं भी वही सब कार्यक्रम तैयार नहीं करूंगा जो मेरे दूसरे सहकर्मी करते हैं ...बदलते समय और जरूरतों के मुताबिक खुद को ढालना ही तो प्रगति की निशानी है. मैं गाँव से आया हूँ, इसका मतलब यह तो नहीं कि वहाँ की रूढ़ियों-बुराइयों-तंग मानसिकता से भी चिपका रहूं.

आज गाँव के लोग शहर वालों के पहनावे, खान-पान, रहन-सहन, मान्यताओं, सांस्कृतिक बोध की खिल्ली चाहे जितनी उड़ाएं, कौन नहीं चाहता कि उनका बेटा-दामाद शहरी बने. शहर में जाकर सलीके से रहना सीखे ...जितनी बार गाँव जाता हूँ, कोई न कोई अपने बेटे का दुखड़ा लेकर मेरे पास आ जाता है. हर किसी को यही लगता है कि सरकारी महकमे में अफसर हूँ तो बहुत सारी नौकरियाँ मेरे पास हैं. जिसे चाहूं नौकरी दे सकता हूँ ...मैंने भी गाँव से पढ़ाई की है, मगर तब स्थितियाँ ऐसी नहीं थीं. आज बच्चों का पढ़ाई पर यकीन कम, नकल पर भरोसा ज्यादा रहता है. मैं तो आज भी चाहूं तो बारहवीं के बच्चों को फिजिक्स और मैथ्स पढ़ा सकता हूँ, मगर किसी विद्यार्थी से उसकी किताब से कोई सवाल पूछ दीजिये तो जमीन देखने लगता है. डिग्रियाँ जरूर उन्होंने हासिल कर ली हैं, मगर बोध सिरे से गायब है. मगर तुर्रा यह कि उन्हें अफसर बना दो तो अपनी काबीलियत के झंडे गाड़ देंगे ...अरे, हुनर है तो प्रतियोगिता में बैठो. साबित करो अपने को. क्यों सिफारिश के भरोसे बैठे हो. मगर नहीं, उन्हें लगता है कि जैसे डिग्री हासिल की है वैसे ही नौकरी भी हासिल कर लेंगे. हर किसी के पास ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि किसने कितना घूस देकर कितनी बढ़िया नौकरी हासिल की. किसके किस रिश्तेदार मंत्री या विधायक की लग्घी पकड़ाकर अपने दामाद या बेटे को किस ऊँचाई पर बिठा दिया.

माँ-बाप भी पुश्तैनी जमीन-जायदाद बेचकर अपने नौनिहालों के लिए जÂत का रास्ता तलाशने में लगे हुए हैं ...मेरे कुछ रिश्तेदार इसीलिए मुँह फुलाये बैठे हैं कि उनके बेटों को नौकरी नहीं दिलायी. किसी ने नेता-मन्त्री से सिफारिश नहीं की. अगर कोशिश की होती तो वे अब तक ना जाने कितना दो नम्बर का पैसा पीट चुके होते.

जानकी प्रसाद का मन खिन्न हो गया. वे फिर सीट से उठे. दरवाजे की तरफ बढ़ ही रहे थे कि चाय वाला आता दिख गया. उन्होंने उससे चाय ली और बैठकर पीने लगे. खिड़की से बाहर देखते रहे. उन्होंने अब ध्यान दिया कि जब ऊपर वाली बर्थ के बच्चे नीचे आये थे तो उन्होंने खिड़की का पर्दा हटा दिया था ...वही निचाट खेत, कहीं-कहीं कुछ हरियाली. कहीं भी चले जाओ, सब जगह गाँव का चेहरा एक सा है ...गाँव वाले करें भी क्या. अब खेती से इतना मिलता नहीं कि लोग इज्जत से बसर कर सकें. खाने-चबाने भर का हो जाता है, उसी पर संतोष कर लेते हैं. शहर की तरफ क्यों न भागें भला. बच्चे, चाहे जैसे हो, पढ़ लिख गये हैं. बाबू बनने के सपने पाले हुए हैं. खेत के कीचड़ पानी में पैर रखना अपनी तौहीनी समझते हैं. ले देकर बूढ़े अधेड़ ही गाँव की जमीन से चिपके हुए हैं. जवान सारे सुबह ही खा पीकर गाँव छोड़ देते हैं. कस्बों-बस अड्डों पर बैठे देश-दुनिया की बातें करते रहते हैं. बहुत सारे किसी न किसी नेता के पिछलग्गू बन गये हैं. कुछ ने कस्बों-बस अड्डों पर कोई दुकान खोल ली है. बिक्री न हो, बैठने का ठिकाना तो बना लिया है. जो ऐसा नहीं कर पाते वे गुड़गाँव, फरीदाबाद, नोएडा का रुख करते हैं. वहाँ की फैक्ट्रियां में दिहाड़ी मजदूरी करके गाँव में कमाऊ पूत का रुतबा हासिल करते हैं. बहुत सारे सिक्योरिटी एजेंसियों में भर्ती होकर, गार्ड की वर्दी पहने फैक्ट्रियों, रिहाइशी कालोनियों के फाटक पर चौकीदारी करते हैं....
 


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