कबीर पर लिखी गई पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’ पिछले कई महीनों से तीखी बहस और विमर्श का सबब रही है. हिन्दी में अकसर आलोचना की पुस्तकें बेहद नीरस और उबाऊ होती हैं और उनको पढ़ना भी कष्ट साध्य होता है. इसके विपरीत यह पुस्तक बतरस के रस से भरी है और इसे पढ़ना कई तरह के इतिहासों, किंवदंतियों, विश्वासों, दृष्टियों और मान्यताओं से गुजरना है. हालाँकि पुस्तक के कई पक्ष हैं और उन सब पर संक्षेप में बात करना भी एक स्तम्भ में न संभव है न वांछनीय. इसलिए यहाँ उसके कुछेक पहलुओं पर ही चर्चा होगी.
लेकिन सबसे पहले यह याद करना जरूरी होगा कि जिसे हिन्दी में भक्तिकाल कहा जाता है, वह न सिर्फ साहित्य की दृष्टि से बल्कि इतिहास के नजरिए से भी बेहद उर्वर और गुत्थियों से भरा समय है. संयोग से इसे भारतीय इतिहास का मध्यकाल भी कहा जाता है इसलिए यूरोप केन्द्रित मानसिकता इसे मध्यकालीनता से जोड़ देती है. यूरोप में मध्यकालीनता बर्बरता और जबदी हुई मनोवृत्ति का समय माना जाता है. यही वजह है कि यूरोपीय मध्यकालीनता की छायाएँ भारतीय मध्यकाल पर पड़ती हैं और इस वक्त को अवमूल्यित करने का प्रयास होने लगता है. सच्चाई यह है कि भारतीय मध्यकाल अर्थ, वाणिज्य और विचार की दृष्टि से तो अपने साहित्य के कारण भी बेहद सृजनात्मक रहा है. इसी समय में कबीर हुए. जाहिर है कि उन्हें जानने और समझने के लिए एक जटिल प्रक्रिया से गुजरना होगा. यह पुस्तक यही करती है.
कबीर की कविता को समय को समझने के लिए उन ‘दृष्टियों’ से भी सामना करना होगा जो यूरोपीय व भारतीय विद्वानों द्वारा निर्मित की गई हैं. वैसे यह भी ध्यान में रखना होगा कि यूरोपीय दृष्टि भी एक नहीं है और उसकी कई परतें हैं, और भारतीय दृष्टि में कई तरह के परस्पर विरोधी तत्व हैं. कबीर एक हैं पर उनकी कई मूर्तियाँ बन गयी हैं. वे निर्गुण संत थे पर सगुण साहब भी बना दिए गये हैं. कबीर के अनुयायी भी कई प्रकार के हैं और अध्येताओं के लिए भी उनके अलग-अलग रूप हैं. कबीर के एक बड़े अध्येता हजारी प्रसाद द्विवेदी की भाषा में कहें तो ‘नाना’ प्रकार के कबीर हैं. पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक की एक खासियत यह भी है कि वह कबीर की इन ‘नाना’ प्रकार की मूर्तियों की निर्माण-प्रक्रियाओं की पड़ताल भी करती है. कबीर की कविता और व्यक्तित्व के बारे में क्यों इतने मिथक बने, क्यों इतनी तरह की व्याख्याएँ प्रचलित हुईं, कौन-सी व्याख्या प्रामाणिक होने के करीब है, वहीं यूरोप केन्द्रित और उपनिवेशवादी मानसिकता वाले विद्वानों ने कबीर के बारे में अध्ययन करते हुए अपने पूर्वग्रहों का आरोपण किया- ऐसे कई प्रश्नों और उनके जवाबों का साक्षात्कार यहाँ होता है.
वैसे तो कबीर और रामानंद को लेकर इस स्तंभ में पहले भी चर्चा हो चुकी है, पर इस प्रकरण को लेकर पुस्तक के अध्याय द्वितीय सेतु जगतरण कियो...रामानंद और कबीर’ को पढ़ते हुए कुछ नए सवाल मन में उठे, जिसकी चर्चा यहाँ करना चाहूँगा. रामानंद कबीर के गुरु थे या नहीं, इस पर काफी बहसें हुई हैं ओर ये आज भी जारी हैं. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने शोध, अध्ययन और विश्लेषण से यह दिखाया है कि रामानन्द कबीर (रैदास और पीपा के भी) गुरु थे. पर उनके शोध, अध्ययन और विश्लेषण का एकमात्र नतीजा इसी निष्कर्ष पर पहुँचना है- ऐसा मानना सरलीकृत समाधान ही कहा जाएगा.
दरअसल यही प्रसंग- जो किताब के भीतर एक समांतर किताब है- भारतीय भक्ति आन्दोलन के भीतर चले एक वैचारिक, बौद्धिक और सामाजिक संघर्ष का विशद खाका पेश करता है. इसे पढ़ने के बाद मसला सिर्फ यह नहीं रह जाता कि कबीर के गुरु रामानंद थे या नहीं. बड़ा, व्यापक और महत्वपूर्ण वह प्रक्रिया हो जाती है जो भारतीय भक्ति आन्दोलन के भीतर चलती रही (जो शायद आज भी चलती है) यह प्रक्रिया लगभग साढ़े छह सौ साल चली. खास बात यह कि भक्ति आन्दोलन के अवसान के बाद भी चलती रही. उसकी आवाज बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक सुनाई देती रही और अध्ययन किया जाए तो शायद आज भी उसके स्वर को सुना और पहचाना जा सके. आखिर साढ़े छह सौ-सात सौ साल तक चलती आ रही एक विचारधारा यों ही खत्म तो नहीं हो गई होगी!
यह प्रक्रिया थी रामानुजी परम्परा और रामानंदी परम्परा के टकराव की. दोनों के बीच संघर्ष की. रामानुजी परम्परा भी वैष्णव है और रामानंदी भी. पर रामानुजी परम्परा द्विजवाद की रही और रामानंदी परम्परा ने द्विजवाद के बाहर निकलकर अद्विजों को गले लगाया. पर इसी कारण रामानुजी परम्परा नेे रामानंदी परम्परा को अवमूल्यित करना शुरू किया. पर रामानंदी भी चुप बैठने वाले नहीं थे. उन्होंने भी रामानुजी परम्परा कोे चुनौती दी. बल्कि यह कहना चाहिए कि लगातार चुनौतियाँ दीं. बात इतनी आगे बढ़ी कि रामानंदियों ने परम्परा का नया इतिहास रच डाला और रामानंदी परम्परा के नये रामानंद रचे गये. नये रामानंद यानी रामानुजी परम्परा से मुक्त रामानंद. और यह काम हुआ बीसवीं सदी में भगवदाचार्य के हाथों.
पर भगवदाचार्य की चर्चा आगे बढ़े इसके पहले कुछ और बातों पर गौर जरूरी है. जैसे जोधपुर के राजा जयसिंह की भूमिका को लेकर इतिहास तो हमें बताता है पर लोकस्मृति में उसकी व्यापक अनुगूँज नहीं है. जयसिंह को राजा के अलावा वास्तुकार और ज्योतिषविद के रूप में सभी याद करते हैं. पर यह बात लोकस्मृति में बहुत कम है कि जिसे आप का, यानी लगभग पिछले पौने तीन सौ साल का हिन्दूधर्म है, खासकर उसकी जो आचार-विचार की लिखित-अलिखित नियमावली है उसपर जयसिंह का पर्याप्त असर है. पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक पढ़ने से तो ये लगता है, और इस दिशा में शोध और अध्ययन होना चाहिए, कि अगर जयसिंह न होते तो शायद उत्तर भारत में रामानंदी परम्परा और ज्यादा मजबूती से उभरती. वैसे तो धार्मिक सामाजिक परम्परा को सिर्फ जय-पराजय के सन्दर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए, पर ये तो कहना पड़ेगा कि अगर जयसिंह ने रामानंदियों पर दबाव न बनाया होता और रामानुजियों का पक्ष न लिया होता तो उत्तर भारत का धार्मिक-सांस्कृतिक वातावरण कुछ और होता.
जरूरत इस बात की है कि इतिहास के उन पन्नों को फिर से खोला जाए और नयी परिकल्पनाएँ की जाएँ. परिकल्पनाएँ इतिहास नहीं होतीं, पर उनके बिना इतिहास न जाना जा सकता है न लिखा. मेरे सामने, पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब पढ़ते हुए कुछ सवाल पैदा होते हैं- जैसे कि क्या जयसिंह न होते तो उत्तर भारत में भक्ति आन्दोलन आगे भी जारी रहता, क्या सामंतवाद के प्रभुत्व ने अद्विजों और अंत्यजों के आध्यात्मिक उभार को रोका और इसी कारण उनकी सामाजिक स्थिति को और नीचे की तरफ धकेला, क्या मुगल सत्ता और राजपूत राजाओं के गठजोड़ ने मध्य और निम्न जातियों के उभार को अवरुद्व किया, क्या वैष्णव भक्ति और आन्दोलन की धारा दूसरी तरफ मुड़ गई? क्या यह आकस्मिक है कि जयसिंह के बाद कबीर, पीपा, रैदास, मीरा जैसी शख्सियतें नहीं उभरीं? यह मार्के की बात है कि अंग्रेजों के भारत आने और यहाँ प्रभुत्व जमाने के पहले ही भक्ति आन्दोलन अपनी ताकत खोने लगा था. लेकिन क्या खोने लगा था? क्या उस पर गलता बैठक (जिसे जयसिंह ने आयोजित किया था) की छाया उसके ऊपर पड़ी! पड़ी तो कितनी पड़ी?
पर यह तो मानना पड़ेगा कि जय सिंह के बाद भी रामानंदी पूरी तरह हाशिए पर नहीं गये? हालाँकि उसके व्यौरे पर विशद अध्ययन की आवश्यकता है, पर यह गौर तलब है कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में रामानंदी भगवदाचार्य का उदय और उनका रामानंद की नयी निर्मित रचना एक सतत और निरन्तर प्रवाहित बौद्धिक धारा की गतिशीलता के बारे में बहुत कुछ कहती है. भगवदाचार्य ने यह प्रतिपादित किया और यह धारणा बनाने में वे बहुत हद तक सफल भी रहे कि रामानंद का रामानुजी परम्परा से कोई लेना देना नहीं था और संस्कृत के आचार्य रामानंद ही असल रामानंद थे देशभाषा में रचना करने वाले आध्यात्मिक गुरु रामानंद कोई और थे. भगवदाचार्य की सफलता और विफलता बीसवीं सदी के सामाजिक धार्मिक इतिहास का एक अहम अध्याय है. दुर्भाग्य से भगवदाचार्य के बारे में भी लोकस्मृति क्षीण ही हो रही है.
रामानंद और भगवदाचार्य के बारे में इतनी विशद चर्चा से यह भ्रामक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस पुस्तक में वही प्रमुख रूप से उद्घाटित हुआ है. ऐसा नहीं है. पुस्तक में कबीर की कविता, उनकी नारी सम्बन्धी मान्यताएँ, उनकी भक्ति, औपनिवेशक पद्धति से कबीर को समझने की कोशिशों की पड़ताल- ये सब भी विस्तार से व्याख्यायित हुआ है. चूँकि उनमें से कई की चर्चा अन्यत्रा हो चुकी है, इसलिए भी यहाँ उनके बारे में ज्यादा नहीं लिखा गया है.
इस किताब से गुजरते हुए यह ध्वनि भी बार-बार सुनाई देती है (वैसे ध्वनि को कविता का गुण माना गया है, पर दरअसल वह साहित्यमात्रा का गुण है) मध्यकाल और भक्तिकाल के बारे में अभी बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जाना बाकी है.दुर्भाग्य है कि विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि वहाँ साहित्य को पढ़ने और समझने वाले ही नहीं रह गये हैं. नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, नित्यानंद तिवारी, मैनेजर पांडे वाली आखिरी पीढ़ी भी जिसके पास मध्यकाल को समझने की दृष्टि और समझ थी. पुरुषोत्तम अग्रवाल अपनी पीढ़ी के अकेले अध्यापक थे (अब वे अध्यापक नहीं हैं) जो मध्यकाल के इतिहास और भक्ति-कविता के गहराई में जाकर समझने और उसे व्याख्यायित करने वाला अध्ययन और समझ रखते हैं. मध्यकाल को समझने के लिए आधुनिक दृष्टि और सम्वेदना चाहिए जो आज के हिन्दी अध्यापकों के पास नहीं है. आज का हिन्दी अध्यापक (शायद इसके कुछेक अपवाद हैं) अगर बहुत उबलता भी है तो नवजागरण तक पहुँचता है और वहाँ से धड़ाम से गिर जाता है. यानी फिर बैतलवा धरती पर.
सवाल सिर्फ कबीर का नहीं है. तुलसीदास, सूरदास, जायसी, मीराबाई वगैरह का भी है. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, रामचंद्र शुक्ल, माता प्रसाद गुप्त, हजारी प्रसाद द्विवेदी, वासुदेव शरण अग्रवाल सरीखे अध्येताओं ने मध्यकालीन साहित्य, तुलसीदास, सूरदास, जायसी, कबीर वगैरह संतों-भक्तिों-कवियों के बारे में हमारी दृष्टि का निर्माण किया. पर स्थिति यह है कि विदेशी या पश्चिमी अध्येता तो भक्तिकाल और मध्यकाल पर प्रामाणिक शोध कर रहे हैं पर भारतीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों में आलस्य का साम्राज्य बढ़ रहा है.
भक्तिकाल और मध्यकाल के बारे में बहुत कुछ हमारी स्मृति में है और बहुत कुछ स्मृति से गायब भी हो गया है ‘अकथ कहानी....’ उन स्मृतियों की व्याख्या करती है और विस्मृतियों का एहसास कराती है उन विस्मृतियों से उलझना होगा, ताकि उन्हें सुलझाया जा सके. ©
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