अस्मिता-विमर्शों के बारे में एक सेमीनार की तैयारी के दौरान इंटरनेट छानते हुए अचानक ही एक वेबसाइट मिली जिस पर इस बात की खोज चल रही थी कि ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ यानी ‘व्यक्तिगत और राजनीतिक अभिन्न हैं’ का विचार आया कहाँ से? पहली बार इस शब्द बन्ध का किसने इस्तेमाल किया? तलाश की शुरुआत करते हुए कहा गया था कि यह शब्दबन्ध 1980 के आसपास अनेक स्त्रीवादी संकलनों में खण्ड अथवा अध्याय के शीर्षक की तरह उगना शुरू हुआ लेकिन बिना किसी पाद-टिप्पणी या सन्दर्भ-संकेत के. क्रान्तिकारी/सांस्कृतिक स्त्रीविमर्श के इतिहासों मे कहा जाता है कि साठ के दशक में यह मुहावरा व्यापक प्रचलन में आ चुका था लेकिन कहीं किसी आलेख या वक्ता या दल या तारीख का सन्दर्भ नहीं दिया जाता.
इस वेबसाइट से गुजरते हुए अचानक यह अहसास हुआ कि वाकई अब स्त्रीविमर्श के लिए एक आप्तवाक्य, एक नारा, एक मुहावरा बन चुका यह शब्दबन्ध अपने जड़मूल के हिसाब से इतने लम्बे अर्से तक लापता रहते हुए भी शाखाओं और फूल पत्तों के जरिये देश-देशान्तर में अपनी छतरी तानता-पसारता चला गया, इस बात का प्रमाण कि विचार अपने अमूर्त रूप में देशकाल की स्थानीयता लांघकर जहाँ भी अनुकूल हवा पानी मिले वहीं पनपने लगते हैं. हिन्दी के अपने स्त्री-विमर्श के लिए भी यह शब्दबन्ध अपने मूल अंग्रेजी स्वरूप में ही इतना परिचित और अंतरंग बन चुका है कि उसके प्रयोग के पहले उसके अर्थ और व्याख्या और मूल मंशा को जानने की जरूरत भी महसूस नहीं होती. वैयक्तिक बनाम सामाजिक या वैयक्तिक बनाम राजनीतिक को प्रतिपक्षों की तरह पढ़ने के आदी इलाकों में इसे असहमति और नकार के भाव के साथ कुछ जूझती सी मुद्रा में पढ़ा जाता है या फिर उनके बाहर अपनी समझ की सीमा के हिसाब से शब्दबन्ध को ही केन्द्र में रखते हुए उसका भाष्य कर लिया जाता है.
मंैने खुद भी अपने किसी आलेख में ऐसा ही करते हुए इसे अनुमानतः अपनी तरह से व्याख्यायित कर लिया था- अन्याय और उत्पीड़न के व्यक्तिगत अनुभवों और समस्याओं की साझेदारी एक समुच्चय में विपुल होकर राजनीतिक प्रतिपक्ष बन जाती है. इसकी पढ़न्त कहीं और इस विचार की तरह भी पाई थी कि हर व्यक्तिगत वक्तव्य भी राजनीतिक ही होता है क्योंकि लेखक या वक्ता के पास इतिहास में अपनी एक व्यक्तिगत स्थिति होती है जो उसकी मंशा को निर्धारित करती है. इसका सीधा अर्थ यह कि निरपेक्ष या तटस्थ कोई वक्तव्य नहीं होता और नीयत हर एक की संदिग्ध होती है.अन्ततः एक आप्तवाक्य की तरह यह शब्दबन्ध स्त्री-विमर्श के दायरों के बाहर भी विभिन्न सन्दर्भों में प्रयुक्त और परिभाषित होने लगा. उदाहरण के लिए विकासशील देशों में सहभागी शोध के सिलसिले में उठने वाली नैतिक और राजनैतिक समस्याओं को सम्बोधित भूगोल के एक पोजीशन-पेपर का नाम पर्सनल इज पॉलिटिकल रखा गया है जिसमें कहा गया है कि ‘‘अधिकतर सहभागी-शोध ज्ञान के सृजन की प्रक्रिया में शक्ति-सम्बन्धों का मूलोच्छेद करने की बजाय उनको वस्तुतः सबल बनाते हैं. इसके स्थान पर एक अधिक संवादपरक शोध की जरूरत है जिसमें हमारी अकादमियों के भीतर के तथा अन्य जिन संस्थाओं में शोधकार्य होता है उनके संघर्षों को शामिल किया जा सके.’’ कहने का मतलब यह कि अब तक यह मुहावरा ऐसी निर्गुण सत्ता धारण कर चुका है कि उसे किसी भी संदर्भ में डालकर सगुण बनाया जा सकता है.
मंैने अपने आलेख में इसे जूलिएट मिशेल के नाम से उद्धृत किया था क्योंकि पहले-पहल उन्हीं के उल्लेख से इसका परिचय पाया था. लेकिन दरअस्ल शायद ही कोई स्त्रीविमर्शकार हो जिसने किसी न किसी बिन्दु पर इस मुद्दे पर कोई न कोई विचार प्रकट न किया हो. लेकिन मुहावरे का सही उद्गम अज्ञात और विवादास्पद है. बहुत सी दूसरे दौर की स्त्री वादियों ने इस मुहावरे का या इसके निहितार्थ का अपने लेखन, भाषण, चेतनाउद्बोधन और अन्य गतिविधियों मेँ इस्तेमाल किया है. तलाश में सैकड़ों लोगों की भागीदारी की मदद से वेबसाइट पर अन्ततः मूल आलेख को खोज निकाला गया. दिलचस्प था वेबसाइट पर यह देखना कि धुरन्धरों के बीच इस शब्दबन्ध के स्वत्वाधिकार की दावेदारी और खींचातानी चल रही है. दिलचस्प था यह जानना भी कि यह शब्दबन्ध किसी चिन्तक या विचारक या सिद्धान्तकार या शब्दकुशल शैलीकार की गढ़न्त नहीं बल्कि साठ के दशक के महिला-मुिक्त-आन्दोलन की एक कार्यकर्ताओं कैरोल हानिश द्वारा लिखित दृष्टिकोण-प्रस्तुति-पत्र का शीर्षक था जो 1969 में लिखा और न्यूयॉर्क रैडिकल विमेन की एक बैठक में पढ़ा गया, ‘नोट्स फ्रॉम सेकेण्ड इयर: विमेन्स लिबरेशन इन 1970’ में छपा और लेखिका, कैरोल हानिश, इस बात से बरसों कत्तई अनजान रहीं कि वह बार बार, कितनी बार पुनःमुद्रित और वितरित होता रहा, दुनिया भर की भाषाओं में बहस का विषय बना रहा और अकादमिक हल्कों में एक क्लासिकल की हैसियत को प्राप्त हुआ- आलेख से भी अधिक उसका शीर्षक.
कैरोल हानिश ‘न्यूयॉर्क रैडिकल विमेन’ नामक दल की संस्थापक सदस्यों में से एक रही हैं. उन्होंने स्त्री मुक्ति आन्दोलन की आरंभिक गतिविधि के रूप में अपने दल में व्यक्तिगत अनुभवों की साझीदारी का कार्यक्रम आरंभ किया था और व्यक्तिगत व राजनीतिक के फासले को लेकर चलने वाली बहसों में निर्णायक भूमिका निभाई थी.
रॉबिन मोरगन की ‘सिस्टरहुड इज पॉवरफुल’ नामक पुस्तक का प्रकाशन भी 1970 में ही हुआ था. इसकी विषयवस्तु में यह रेखांकित किया गया है कि उस आन्दोलन में स्त्रिायों के व्यक्तिगत जीवन का जो हो रहा था अर्थात स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुँच, घरेलू काम काज की जिम्मेदारी का पूरा बोझ, स्वयं अपने ही घर में संभवत: यौनिक हमले का शिकार होने की नियति- ये सब राजनीतिक मुद्दे हैं. इसका उद्देश्य स्त्री को अपने जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों को लेकर राजनीतिक रूप से सक्रिय होने के लिए और यह निश्चय करने के लिए प्रेरित करना है कि राजनीतिज्ञों को स्त्री के जीवन की ओर ध्यान देना और देखना ही पड़े कि कानून स्त्री के साथ कैसे अनदेखी का व्यवहार करता है.
रॉबिन मोरगन का दावा है कि इस शब्दबन्ध का प्रथम प्रयोग उनका है लेकिन वेबसाइट का निष्कर्ष यह है कि रॉबिन मोरगन की प्रस्तावना भले ही कुछ मिलती जुलती है लेकिन शब्दबन्ध यह नहीं है.
और अगर प्रस्तावना ही देखनी हो तो इन सबसे पहले क्लाॅडिया जोन्स ने 1949 के अपने आलेख ‘ऐन एण्ड टु द निग्लेक्ट ऑफ द प्रॉब्लम्स ऑफ द नीग्रो विमेन’ में कहा था कि ‘‘इसका मतलब ऐसे हालात से छुटकारा पाना होगा कि कुछ प्रगतिशील और साम्यवादी आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर तो नीग्रो लोगों के पक्ष से लड़ते हैं लेकिन सामाजिक आदानप्रदान या अन्तर्जातीय विवाह के मुद्दे पर अपनी हदें बन्द कर देते हैं. ऐसे मामलों को राजनीतिक नहीं बल्कि व्यक्तिगत करार देने का मतलब अमरीकी जीवन में नीग्रो के सवाल पर निकृष्टतम प्रकार के सोशल-डेमोक्रैट या बुर्जुआ-लिबरल चिन्तन का अपराधी होना है.’’
जहाँ तक व्यक्तिगत के राजनीतिक होने के विचार की बात है, सी.राइट मिल्स की 1959 में प्रकाशित ‘सोशल इमैजिनेशन’ में सूत्र खोजे जा सकते हैं लेकिन सी. राइट मिल्स ने भी इस मुहावरे का प्रयोग नहीं किया है.उनकी पुस्तक में सार्वजनिक मुद्दों और व्यक्तिगत समस्याओं के मिलनबिन्दुओं पर, व्यक्तिगत जीवनी और इतिहास के सम्बन्धों पर विचार किया गया है.
माना जा सकता है कि यह विचार तो प्राक्-स्त्री विमर्श है और स्त्री-विमर्श ने स्त्री-उत्पीड़न के संदर्भ में इसका विशेषीकरण किया है लेकिन मसला तो इस मुहावरे की दावेदारी का है. खोज निकाला गया आलेख कैरोल हानिश का था इसलिए शीर्षक का श्रेय भी उन्हीं का होना था लेकिन रॉबिन मोरगन कह रही थीं कि वे एक भाषण में इसका प्रयोग पहले कर चुकी थीं और ग्लोरिया स्टीनम का कहना था कि इस मुहावरे को गढ़ने का दावा यह कहने के बराबर है कि ‘वल्र्ड वॉर टू’ मेरा गढ़ा हुआ मुहावरा है.
2006 में कैरोल हानिश का आलेख एक नये परिचय के साथ पुनःप्रकाशित हुआ. इस सारी बहस के मद्देनजर रिकॉर्ड के लिए उन्होंने दर्ज किया कि उनके आलेख का शीर्षक ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ उन्होंने नहीं दिया, शायद संकलन के संपादक-द्वय शूलामिथ फायरस्टोन और ऐन कोड्ट में से किसी ने दिया रहा होगा. वे दोनों भी न्यूयॉर्क रैडिकल फेमिनिस्ट्स की सदस्याएँ थीं और उनके सम्पादन में छपी ‘नोट्स फ्रॉम सेकेण्ड इयर: विमेन्स लिबरेशन इन 1970’ अपने नाम से आन्दोलन के दूसरे वर्ष का लेखाजोखा प्रतीत होती है.
लेकिन श्रेय के सवाल का निपटारा इतनी आसानी से नहीं हो सकता था. जिसके इतने दावेदार हों उसका श्रेय किसी को भी न दिया जाए तो बेहतर. वेबसाइट के निष्कर्ष के अनुसार संभावना यह है कि संपादकद्वय ने यह शीर्षक तो चुना होगा लेकिन मुहावरा गढ़ा नहीं होगा क्योंकि शायद संकलन के पहले ही, 1969 के भी पहले से ही वह हवा में तैर रहा होगा, संपादक-द्वय ने उसका इस्तेमाल भर किया होगा. शायद रॉबिन मोरगन ने सबसे पहले कहा होगा और कैरोल हानिश ने सबसे पहले लिखा होगा.
कैरोल हानिश का आलेख वस्तुतः एक ‘पोजीशन-पेपर’ अथवा दृष्टिकोण-प्रपत्र है.उनके लिए यह आलेख किसी दार्शनिक मन्थन का मानसिक उहापोह या समाजशास्त्रीय सैद्धान्तीकरण का कोई बौद्धिक व्यायाम नहीं, एक वास्तविक व्यवहारिक राजनीतिक कार्यक्रम के औचित्य की व्याख्या है और आज भी व्यापक स्त्रीजगत के संदर्भ में, हमारे भारतीय संदर्भ में भी, प्रासंगिक प्रतीत होता है.
आन्दोलन के आरंभिक दिनों में ही कैरोल हानिश स्त्री-चेतना-उद्बोधन कार्यक्रम की सूत्रधार बनीं. इस कार्यक्रम का उद्देश्य आन्दोलन के दायरे को गैर-राजनीतिक स्त्रीजगत तक फैलाना और इसका स्वरूप स्त्रिायों का एकसाथ बैठना और अपने उत्पीड़न की चर्चा करना था. पेशेवर राजनीतिक आन्दोलनकारियों के अनुसार एक दूसरे की रामकहानी सुनकर एक दूसरे के आँसू पांेछने और दिलासा देने का यह कार्यक्रम अधिक से अधिक एक मानसिक और भावात्मक उपचार कहा जा सकता था, राजनीति तो बिल्कुल नहीं. पूछा भी गया कि स्त्री-मुक्ति का नया मोर्चा क्या कुल इतना ही था? स्त्री पुरुष दोनों- इस नुक्ताचीनी में समान रूप से शामिल थे.
कैरोल साठ के दशक की याद करते हुए कहती हैं कि वह नागरिक-अधिकार-समर्थन और वियतनाम-युद्ध-विरोध और इसी तरह के अन्य बहुत से प्रतिरोध-आन्दोलनों का समय था. सारी दुनिया में अन्याय के प्रतिरोध में खड़े होने वाले ये क्रान्तिकारी मुक्तिविचारक स्त्री-मुक्ति आन्दोलन लेकर आम तौर से बहुत ही नर्वस थे. ये सभी प्रतिरोध दल, जिनमें से हम जैसे अनेक उपजे, सब के सब पुरुष-प्रधान थे. ‘‘कभी कभी वे कबूल भी कर लेते कि औरतें उत्पीड़ित हैं, लेकिन इस संशोधन के साथ कि केवल व्यवस्था द्वारा. यह मानने को भी वे तैयार थे कि समान काम के लिए समान भुगतान और ऐसे ही कुछ अन्य अधिकार स्त्रिायों को मिलने चाहिये. लेकिन हमारी तथाकथित ‘व्यक्तिगत’ समस्याआंे- खास तौर से यौनिक समस्याओं और साज-सँवार, गर्भपात जैसे उन सारे ‘शारिरिक मुद्दों’ को सार्वजनिक क्षेत्र में लाने के दुस्साहस- के लिए हमें इतना नीचा दिखाया जाता कि बेहद. घर और बच्चों की सारसँभाल में पुरुष की साझेदारी की हमारी माँग भी उन्हें एक औरत और उसके मर्द के बीच की व्यक्तिगत बात लगती थी. उनका दावा था कि अगर सिर्फ औरत अपने बूते उठ खड़ी हो और अपनी जिन्दगी की जिम्मेदारी खुद सँभाल ले तो स्त्री मुक्ति के एक अलग आन्दोलन की कोई जरूरत नहीं. जो व्यक्तिगत पहल द्वारा सुलझने से बाकी रह जाएगा उसका निपटारा ‘क्रान्ति’ से हो जाएगा. तो हम अपना मुँह बन्द रखें और कत्र्तव्य निभाएँ और जो इशारा भी किया कि मर्द हमारा शोषण करते हैं तो भगवान ही मालिक है.’’
और केवल पुरुष ही नहीं, न्यूयॉर्क रैडिकल विमेन और अन्य स्त्रीवादी आन्दोलनों में बेशक ऐसी स्त्रियॉं भी शुरू से ही थीं जो उद्बोधन कार्यक्रम के विरुद्ध थीं, जिनका दावा था कि स्त्री स्वयं अपने उत्पीड़न में सहयोग के लिए तत्पर होती है एक ऐसा तर्क जिसकी जड़ंे राजनीतिक कम, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अधिक हैं. कैरोल बताती हैं कि ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ का सिद्धान्त और आलेख इस बहस की गरमागरमी में बाकी रैडिकल आन्दोलन के हमलों के जवाब में लिखा गया था. यह समझना जरूरी है कि परचा सीधे संघर्ष में से निकला था, आन्दोलन के भीतर मेरे व्यक्तिगत संघर्ष से नहीं, बल्कि जो लोग एक स्वतंत्र स्त्री मुक्ति मोर्चे को रोकने या उन दिशाओं में धकेलने की कोशिश कर रहे थे जो उनके हिसाब से कुछ कम खतरनाक थीं, उनके खिलाफ पूरे मुक्ति मोर्चे के संघर्ष से. बौद्धिकों और चिन्तकों और पेशेवर राजनीतिक आन्दोलनकारियों के अहंकार के विपरीत कैरोल हानिश पूरी विनम्रता से दर्ज करती हैं कि इस परचे में प्रस्तुत सिद्धान्त मेरे अकेले दिमाग की उपज नहीं है, यह एक आन्दोलन में से निकला है- स्त्री मुक्ति आन्दोलन से, उस आन्दोलन के भी एक दल-विशेष से- न्यूयॉर्क रैडिकल विमेन, और न्यूयार्क रैडिकल विमेन के भीतर भी एक गुट विशेष से जिसे स्त्री-पक्ष-विचार घटक कहा जाता है. न्यूयार्क रैडिकल विमेन के जो सदस्य इस विचार के विरुद्ध थे उनका भी वे आभार मानती हैं. उनकी मदद भी स्त्रीपक्ष की संकल्पना में शामिल है. उनके विरोधी तर्कों ने नये सिद्धान्त को सान पर चढ़ाने के लिए विवश किया और उस हद तक उसके विकास, परिष्कार और अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित किया जिससे उसे अधिक से अधिक व्यापक और ग्राह्य बनाया जा सके.
क्रान्तिकारी आन्दोलनों और साधारण जनसमुदाय के बीच के फासले का प्रकारान्तर से एक विश्लेषण भी इस प्रस्तुतिपत्र को महत्त्वपूर्ण बनाता है. एक बहुत ईमानदार आत्माक्षात्कार के जरिये कैरोल हानिश अपनी आत्मछवि का मूल्यांकन और पुनर्गठन करती हैं.वे ‘‘आन्दोलनकारी होने के नाते मैं एक सबल स्त्री होना चाहती हूँ और कबूल नहीं करना चाहती कि मेरी कोई सचमुच की अपनी समस्याएँ हैं जिनका कोई निजी समाधान होता होगा, सिवाय उनके जिनका सीधा वास्ता पूँजीवादी व्यवस्था के साथ है. लेकिन इस वक्त इस कहानी को वैसा ही कहा जाना है जैसी कि वह सचमुच है और वही कहा जाना है जो अपनी जिन्दगी के बारे में मेरा अपना विश्वास है, न कि वह जो मुझसे हमेशा कहने को कहा जाता रहा है.तो इन बैठकों में शामिल होने की वजह व्यक्तिगत समस्याओं को सुलझाना नहीं है, इन बैठकों का एक नतीजा वस्तुतः यह आविष्कार है कि व्यक्तिगत समस्याएँ वस्तुतः राजनीतिक समस्याएँ भी हैं. वक्त के इस मोड़ पर कोई समस्या व्यक्तिगत नहीं है.केवल एक सामूहिक समाधान के लिए एक सामूहिक कर्म है. मैं इन बैठकों में गयी और अब भी जाती रहती हूँ क्योंकि वह राजनीतिक समझ मैंने इन बैठकों में पाई जो अपनी सारी पढ़ाई, सारी ‘राजनीतिक बहसों’ और ‘राजनीतिक कर्मों’ समेत आन्दोलन में मेरे चार वर्षों ने मुझे नहीं दी. मैं अपना रंगीन चश्मा उतारने और इस भयानक सच का सामना करने को मजबूर हुई कि एक औरत की हैसियत से मेरी जिन्दगी वाकई कितनी मनहूस है.मुझे उस हर बात के बारे में एक नयी समझ मिल रही है जो ‘दूसरे लोगों’ के संघर्ष में भाग लेने वालों के ‘उदात्त’ भाव और ‘गूढ़’ बौद्धिक समझदारी के सर्वथा विपरीत है.’’
स्त्री मुक्ति आन्दोलन का उद्बोधन कार्यक्रम शायद पहला ऐसा व्यवहारिक राजनीतिक कार्यक्रम रहा होगा जिसे सम्बोधित समुदाय की जरूरतों के हिसाब से गढ़ा गया. अन्यथा होता प्रायः ऐसा है कि आन्दोलन के नेता अपने आन्दोलन की जरूरतों के हिसाब से समुदाय को गढ़ने की कोशिश करते हैं. कैरोल हानिश दुखती रग पकड़ती हैं और आत्मविश्लेषण के ईमानदार क्षण में मानती हैं कि ‘‘आन्दोलन के लिए काम करने वाले हम जैसे लोग संकीर्ण हो जाने की प्रवृत्ति रखते हैँ. स्त्री समुदाय हमारे साथ खड़ा नहीं होता तो हम मान बैठते हैँ कि वे गैर-राजनीतिक हैं, इसीलिए. इसमें सोचने लायक कोई बात देखने की जरूरत नहीं समझी जाती. झुण्ड के झुण्ड स्त्रिायों ने आन्दोलन छोड़ दिया है. जाहिर वजह यह है कि जिन मर्दों का दमन से मुक्ति की राजनैतिक मुद्रा का दोमुँहापन इतना खुल्लमखुल्ला है, उनका गन्दपसारा सँभालते हुए हम थक चुके हैं और आजिज आ चुके हैं, लेकिन दरअस्ल मुद्दा इससे कहीं बढ़कर है.’’ मुद्दा न केवल एक स्वतंत्र स्त्री मोर्चे की स्थापना और उसके व्यापक विस्तार का, बल्कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अपने रूख-रवैये में संशोधन का भी है- ‘‘जब तक हम यह कहते रहेंगे कि आपको हमारी तरह सोचना और हमारे जादुई दायरे का अंग बनना पड़ेगा तब तक हम असफल होते रहेंगे.’’ इसी रुख-रवैये के कारण इन उद्बोधन कार्यक्रमों को ‘नाभि-दर्शन’ और ‘उपचार-कार्यक्रम’ कहा जा रहा था.
कैरोल हानिश मानती हैं कि शुरू में यह स्पष्ट नहीं था कि व्यक्तिगत अनुभवों की साझेदारी में से कोई ठोस नतीजे कैसे निकाले जाएँ और उन्हें एक दूसरे से जोड़ा कैसे जाए. ये स्त्रियॉं वैकल्पिक जीवन शैली या मुक्त स्त्री की जीवन-पद्धति की पैरोकार स्त्रियॉं नहीं थीं. अनुभवों की साझेदारी से जल्दी ही इस नतीजे पर पहुँचना संभव हुआ कि पुरुष के साथ रहना हो या उसके बिना, समुदाय में रहना हो या जोड़े में या अकेले, विवाहित या अविवाहित, मौजूदा हालात में हर विकल्प एक खराब विकल्प है. यौन शुचिता या स्वच्छंद प्रेम या समलैंगिकता या कोई भी और जुगत हो, हालात यही हैं कि हर स्थिति खराब है और हर खराब स्थिति के साथ कुछ अच्छी चीजें हैं, कुछ बुरी. कोई भी तरीका ‘ज्यादा मुक्त’ नहीं है, केवल एक खराब स्थिति का दूसरा खराब विकल्प हैं. इतनी होशियार तो औरतें हैं ही कि अकेले संघर्ष में न जूझें, रोजगार की दुनिया की चूहादौड़ में शामिल होने की तुलना में घर पर रहना ज्यादा खराब नहीं है. दोनों ही खराब हैं.
धीरे धीरे दो ऐसे आयाम उभरे जिन्हें ‘उपचार’ के अन्तर्गत रखा जा सकता है. पहला उपचार आत्मधिक्कार के भाव से छुटकारा पाना है. स्त्री को समझना है कि अपनी असफलताओं और उत्पीड़न के लिए उसे खुद को या अपनी किस्मत को दोष देना बन्द करना होगा. दूसरा उपचार यह समझना है कि स्त्री के उत्पीड़न से किसको लाभ मिलता है. इन दोनों आयामों को मिलाकर स्त्रीपक्ष का निर्माण होता है.
स्त्री-पक्ष के विचार ने स्त्री उत्पीड़न की लैंगिक भूमिका के सिद्धान्त को चुनौती देने में मदद की जिसके अनुसार स्त्री ऐसा आचरण इसलिए करती है कि ‘समाज ने उसे ऐसा ही सिखाया है’ और वही उसका संस्कार और वही उसकी भूमिका है. लेकिन समाज की सिखाई हुई ऐसी अनेक बातें हम सभी सोच और याद कर सकते हैं जो उनके हिसाब से चलने की वजहों के हट जाने के बाद हमने छोड़ दीं.किसी भी वक्त ये वजहें हटाई और बातें छोड़ी जा सकती हैँ. उद्बोधन या अनुभवों की साझेदारी ही वह बुनियादी कार्यक्रम था जिसकी वैज्ञानिक व्याख्या ने स्त्री-पक्ष के विचार को उभारा. यह हमारे अपने जीवित, वास्तविक अनुभवों पर और इस बात के परीक्षण पर आधारित था कि स्त्री के उत्पीड़न से ‘किसको लाभ’ होता है.यह समझ कि हमारी उत्पीड़क परिस्थितियों में हमारा अपना दोष नहीं है, कि यह , उस वक्त की शब्दावली में, हमारे अपने दिमाग का खलल मात्रा नहीं है, हमारी मुक्ति की लड़ाई के लिए अधिक साहस की शक्ति के साथ साथ अधिक ठोस और वास्तविक बुनियाद भी बनी. ‘‘जिनका मानना है कि इस विषय पर कहने को जो भी अच्छे शब्द हैं, उन्हें मार्क्स, एन्गेल्स, लेनिन, माओ और हो (ची मिन्ह) पहले ही कह चुके हैँ और हम औरतों के पास उनमें जोड़ने को कुछ नहीं है, वे भले ही इन दलों और बैठकों को वक्त से पिछड़ा हुआ मानते रहें,’’ अन्यथा इसे एक राजनीतिक उपचार कहा जा सकता है जिसकी जरूरत पूरे समाज को है.
अकेली औरत को उसके उत्पीड़न का दोष देने की बजाय एक आन्दोलन की तरह पुरुषप्रधानता से लड़ने की जरूरत की पहचान वह बिन्दु था जहाँ से स्त्री-पक्ष का विचार शुरू हुआ. इसमें स्त्री-विपक्ष के पुराने विचार को चुनौती दी गयी थी जो स्त्री के उत्पीड़न की आत्मिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक, तथाकथित ऐतिहासिक व्याख्याओं द्वारा इस बात का भौतिकवादी विश्लेषण करता था कि स्त्रियॉं जो करती हैं, वैसा क्यों करती हैं और इतना ही करके छोड़ देता था. एक बार यह मोर्चा अपनाया गया कि औरत खुद गड़बड़ नहीं, उसके साथ गड़बड़ी की जाती है तो व्यक्तिगत लड़ाई से फोकस हटा और वर्ग व दल संघर्ष के फोकस में आया और पुरुष-प्रधानता से लड़ने के लिए एक स्वतंत्र स्त्री-आन्दोलन की आवश्यकता उजागर और प्रमाणित हुई.
अस्मिता और निजी अनुभवों का विश्लेषण स्त्री के लिए मुक्तिजनक होता है. इस विश्लेषण द्वारा जितना ही वे अपने जीवन और चैतन्य का कायाकल्प करती हैँ, उतना ही वे परिवर्तन की संभावना का अहसास पाती हैं और जानती हैं कि वे मुक्ति के लिए क्रान्ति की प्रतीक्षा में निर्भर नहीं बैठ सकतीं. खयाल यह है कि अपने विचारों को जीना होता है, उनके लिए खतरे उठाने होते हैं, केवल उन्हें पकड़े बैठे रहने से कुछ नहीं होता.
एक आलेख की तरह ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ शायद बहुत प्रभावशाली न प्रतीत हो. लेखिका कोई शैलीकार नहीं, एक नया आन्दोलन रचते हुए, रास्ता टटोलते हुए आगे बढ़ने की हिचकिचाहट हर शब्द से फूटी पड़ती है लेकिन एक व्यवहारिक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में उसकी उपलब्धियाँ असंदिग्ध हैं. वे रेखांकित करती हैं कि एक व्यक्ति के वैयक्तिक अस्तित्व, विश्वासों, विचारों और राजनीतिक अनुसरण में कोई अन्तर नहीं होता. इस उपलब्धि का आत्मविश्वास 2006 में पुनःप्रकाशन के साथ जुड़े नये परिचय में उद्घाटित होता है जो उन्हें लगभग एक शैलीकार भी बना देता है. सैंतीस वर्षों के अन्तराल के बाद पीछे मुड़कर देखते हुए वे इस आलेख की समीक्षा और संशोधन भी करती हैं.
वे याद करती हैँ कि 1968 के सितम्बर में, पर्सनल इज पॉलिटिकल लिखे जाने के छः महीने पहले, मिस अमेरिका प्रतियोगिता के प्रतिरोध कार्यक्रम से समझ में आया था कि जो स्त्रीपक्ष का जो विचार हम विकसित कर रहे थे वह दल के बाहर किसी कार्रवाई के सवाल पर कितना महत्त्वपूर्ण था. स्त्रीपक्ष से तात्पर्य व्यक्तिगत कहकर रफादफा कर दी जानेवाली नितान्त स्त्रीविषयक समस्याओं को एक स्वतंत्र आन्दोलन के रूप में देख पाने की जरूरत, सामान्य स्त्री समुदाय तक आन्दोलन को पहुँचाने की जरूरत और उससे जुड़ी एक राजनीतिक कार्रवाई.‘राजनीतिक’ का तात्पर्य घर-परिवार और समाज में शक्ति-सम्बन्धों के ढाँचे में परिवर्तन और विलोपन न कि राजनीतिक दल की सदस्यता और चुनाव. आन्दोलन और प्रतिरोध कार्यक्रम का ही एक हिस्सा स्त्री-विपक्ष भी था. स्त्रीपक्ष का सन्देश यह था कि सौन्दर्य-प्रतियोगिताओं के सौन्दर्य के प्रतिमानों का आतंक और उसका दबाव सब स्त्रिायों का दमन और उत्पीड़न करता है, यहाँ तक कि प्रतियोगियों का भी. लेकिन प्रतिरोधी दल के स्त्री विपक्ष हिस्से के ‘अप अगेन्स्ट द वॉल मिस अमेरिका’ और ‘मिस अमेरिका इज ए बिग फॉल्सी’ जैसे पोस्टरों ने प्रतियोगियों को प्रतिमानों के दबाव से उत्पीड़न खड़ा करने वाले मर्दों और मालिकों की बजाय हमारा ही दुश्मन बना दिया.
एक अच्छा राजनीतिक सिद्धान्त राजनीतिक संघर्ष या राजनीतिक विवाद से निकलकर आता है.अपने आप में सिद्धान्त एक शब्दगुच्छ है, सोचने में दिलचस्प, लेकिन जब तक कि वास्तविक जीवन में परीक्षित न हो जाए तब तक ले देकर महज शब्द. व्यवहार के प्रयास में अनेक सिद्धान्तों ने अनेक अचम्भे अता फरमाए हैं, सकारात्मक और नकारात्मक दोनों.
अपने पिछले कथन मे समीक्षा और संशोधन के लिए कैरोल ये दो कथन चुनती हैं- ‘‘स्त्रियॉं चतुर हैं कि अकेले संघर्ष नहीं करतीं’’, और ‘‘घर में होना रोजगार की दुनिया की चूहादौड़ में होने से ज्यादा बुरा नहीं है.’’
पहले का मतलब यह नहीं है कि स्त्रियॉं तनिक भी संघर्ष न करके चतुर हैं ंजैसा कि कुछ स्त्रीपक्ष विचार वालों ने समझ लिया है. स्त्रियॉं अकेले संघर्ष न करके वे कभी कभी चतुराई का परिचय देती हैं, जब वे जीत नहीं सकतीं और नतीजा उत्पीड़न से भी बुरा होता है.लेकिन व्यक्तिगत संघर्ष से भी कुछ न कुछ तो मिलता ही है, व्यक्तिगत स्तर पर ही सही. जब स्त्रीमुक्ति आन्दोलन में भाटा हो, या वह गैर मौजूद हो तो यही कुल मिलाकर है जो किया जा सकता है. जब स्त्री-मुक्ति-आन्दोलन ज्वार पर हो तब भी हमें सन्देश को हमेशा आगे धकेलते रहने की जरूरत है क्योंकि हमारा उत्पीड़न हमेशा एकान्त परिस्थितियों में घटित होता है. और जिस बात के लिए आन्दोलन की लड़ाई है, उसे व्यवहार में लाने के लिए फिर भी व्यक्तिगत कर्म की जरूरत पड़ती है. यह बात अपनी जगह सही है कि व्यक्तिगत संघर्ष हमेशा सीमित ही हो सकता है और संघर्ष को व्यापकता देने के लिए आज तक जितने भी आन्दोलन देखे गये हैं, उनसे कहीं ज्यादा सबल एक जारी आन्दोलन जरूरी है लेकिन जब तक वह आन्दोलन जारी नहीं होगा तब तक हम उसकी प्रतीक्षा में कैद नहीं बैठे रह सकते. दूसरे कथन के संदर्भ में वह स्वयं को संशोधित करते हुए कहती हैं कि ‘‘मुक्त होने के लिए स्त्री के पास अपना बटुआ होना चाहिये.’’ स्त्री सार्वजनिक/सरकारी कार्यशक्ति का हिस्सा हुए बिना स्वतंत्र नहीं हो सकती. इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि शिशु-देखभाल के सार्वजनिक/सरकारी प्रबन्ध और स्त्री-समानता को ध्यान में रखते हुए दफ्तरों के पुनर्गठन के लिए संघर्ष में संगठित होने के अलावा घर के मोर्चे पर भी शिशु-देखभाल और घरेलू कामकाज में पुरुष की भागीदारी का आग्रह बनाए रखना जिससे कि सारा बोझा अकेली औरत ही ढोती हुई न पाई जाए.
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