(रायपुर इप्टा का हबीब तनवीर पर केन्द्रित राष्ट्रीय आयोजन)
‘‘आधुनिकता दृष्टि है, मूल्य नहीं आधुनिक रंगमंच की बात करते हुए हमारा पहला आशय एक दृष्टि सम्पन्न रंगमंच से है. एक ऐसा रंगमंच जो हमारे समय को, हमारे समाज को,.......हमारे जीवन के जितने अंतद्र्वन्द्व हैं, तनाव हैं, सुख-दुःख हैं, .......संवेदनाएँ हैं, मनुष्य के सारे प्रपंच हैं; इन सबको समेटे हुए हो. एक ऐसा रंगमंच जो मनुष्य के रूप में हमें ज्यादा बेहतर बना रहा हो. ऐसा रंगमंच, चाहे वह देश के किसी कोने में, शहर या कस्बा या गाँव में, कहीं भी हो रहा हो, उसका रिश्ता हमारे लोक रंगमंच से कैसा है और कैसा होना चाहिए, यह हमारी चिन्ता और विमर्श का विषय है. यह रिश्ता तब जटिल और भ्रामक हो उठता है जब हम लोक को अँग्रेजी के फ़ोक का अनुवाद मान बैठते हैं. अँग्रेजी के फोक से अलग है हमारा लोक. हमारा लोक भदेस नहीं है. वह हमें रूढ़ियों में जकड़ता नहीं बल्कि, रूढ़ियों से मुक्त करता है. हमारा लोक हमें संवत्सरों के पार ले जाता है. वह हमें संवेदना के स्रोत सौंपता है. क्या हमारा लोक रंगमंच आधुनिक नहीं?अगर वह आधुनिक नहीं तभी हम किसी दूसरे रंगमंच की कल्पना कर रहे हैं. आज हिन्दी रंगमंच के सामने यह एक बड़ा संकट है कि हम किसे आधुनिक मानें? क्या आप हबीब तनवीर के रंगकर्म को लोक रंगकर्म नहीं कहेंगे? और अगर कहेंगे, तो क्या वह आधुनिक नहीं है?’’ ऐसे ही कुछ प्रश्नों के साथ ‘लोक रंगमंच से आधुनिक रंगमंच का रिश्ता’ विषय पर मैंने रायपुर इप्टा की संगोष्ठी में बात शुरू की थी. मेरे सामने संस्कृत रंगमंच के अवसान के बाद पारम्परिक रंगमंच के उदय का इतिहास था और उस रंगमंच की समृद्ध, जीवंत और जनपरम्परा के गर्भ से उपजे वे नाट्यरूप थे, जो आज भी हमारे जीवन के अन्तद्र्वन्द्वों को अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं. नाटककार-रंगकर्मी राकेश ने लोक रंगमंच और आधुनिक रंगमंच के सम्बन्धों की कई ऐसी परतों को खोला, जिस पर बातें करने में आज लोग कतराने लगे हैं. उन्होंने कहा- ‘‘ सारे कलाकर्म का जो मूल रिश्ता बनता है, वह संवेदना के साथ ही बनता है. और मैं यह समझता हूँ कि मनुष्य के विकास की जो समूची यात्रा है उसके साथ-साथ कलाओं ने जो यात्रा की है, उनके मूल में, उनके विकास में संवेदना ने ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. वे तमाम नाटककार और उनकी रचनाएँ, चाहे शेक्सपीयर हों या कालिदास या ब्रेख़्त, अगर आज भी प्रासंगिक हैं, तो इसका कारण उन रचनाओं के भीतर बुनी गई मानवीय संवेदनाएँ ही हैं. जिस रंगमंच के मूल में मनुष्य है, उस रंगमंच का काल आज भी आधुनिक है.......आज हम एक कठिन दौर से गुजर रहे हैं. आज मनुष्य के पक्ष की राजनीति से रंगमंच अपने को अलग नहीं कर सकता. आज इस राजनीति की कलाकर्म को जरूरत है. आज कविता करना भी एक राजनीति है. इस समाज में प्रेम पर पंचायतों का कब्जा हो रहा है. प्रेम जैसी मानवीय संवेदना जिसकी आधुनिकता असंदिग्ध है. यह सब एक निर्मम राजनीति का हिस्सा है. कहाँ कबीर का प्रेम और कहाँ यह पंचायतों के जकड़न में बँधा हुआ प्रेम. कबीर की आधुनिकता आज भी जीवित है. अपने समय की सामाजिक हलचलों से अलग होकर किसी कलाकर्म को पारिभाषित करने की कोशिशें निरर्थक होती हैं. आज वंचितों के हक का सवाल, सामाजिक न्याय का सवाल या महिलाओं की जीवन स्थितियों और उनके लिए होनेवाले संघर्षों से हम रंगमंच को अलग नहीं कर सकते. इसको अपनी चिन्ता में शामिल किए बिना आधुनिकता कैसी! आज सत्ता ऐसा बहुमत चाहता है जिसमें सवाल नहीं हों. बाजार, धर्म और सत्ता तीनों को ऐसा ही बहुमत चाहिए. अगर आप सवाल करेंगे तो बाजार का सामान नहीं बिक सकता,.....अगर आप सवाल करें तो धर्म के कर्मकांड नहीं होंगे, ......अगर आप सवाल करेंगे तो कोई सत्ता बहुत दिनों तक टिक नहीं सकती. कलाकर्म ऐसे बहुमत की पक्षधरता नहीं करता. यह तो अल्पसंख्यकों को सम्बोधित होता है. ........हमारे लोक में ताकत है. भरोसा है अपने दर्शकों पर. यही कारण है कि वे अपनी बात बड़ी सहजता से रखते हैं और एक ही बात के न जाने कितने अर्थ निकाल सकते हैं
........हबीब तनवीर इसलिए बड़े नहीं थे कि उन्होंने नाचा में काम किया या छत्तीसगढ़ी में काम किया बल्कि, इसलिए बड़े थे कि उन्होंने लोक के सहज विवेक को स्थापित किया.’’
अपनी विशिष्ट रंगभाषा के लिए चर्चित रंगकर्मी प्रोबीर गुहा ने भाषा की समस्त जकड़नों को तोड़ते हुए अपने जीवनानुभवों और रंगानुभवों के माध्यम से अपने विचारों को सम्पे्रषित किया- ‘‘मैं रायपुर में पहली बार तब आया था, जब मैं बिल्कुल युवा था. सन् 1978 में एक नाटक के प्रदर्शन के सिलसिले में आया था. उन अनुभवों की मेरे निर्माण में जो भूमिका रही है, मैं उसे स्वीकार करता हूँ. मेरे लिए लोक वही है जो मेरे पास सुरक्षित है और आधुनिक है, पर जिसे जाने बिना हम कुछ अन्य खोजते रहते हैं. हमें मालूम है कि हमारे पास क्या सुरक्षित रखा हुआ है, पर उसे जाने-बूझे बिना हम आधुनिकता तलाशते फिरते हैं. अभी चारों ओर यही हो रहा है. मैं अपने जीवन को आपके सामने विश्लेषित करते हुए अपनी बातें रखना चाहूँूगा.
.........मैं जब छात्रा था, पूरी तरह एक राजनीतिक कार्यकर्ता भी था.......मैं वामपंथी राजनीति से जुड़ा था. वामपंथी राजनीति दो भागों में बँटी और मैं अति वामपंथ यानी नक्सलवाद के साथ हो गया. वहाँ मैं विभ्रम का शिकार हुआ और फिर अलग हो गया. मुझे लगा कि यह मेरी जगह नहीं है. मैं राजनीतिक रहूँगा, पर दलीय राजनीति के आचरण को स्वीकार नहीं करूँगा. यहाँ से मेरी असली समस्या शुरू हुई..... कि मैं करूँगा क्या? मुझे कुछ करना तो है, पर क्या? मैं गाँव से आया था. वहीं युवा हुआ. आज भी ग्रामीणों का जीवन मेरी मुख्य चिन्ता है.........फिर मैंने रंगमंच के बारे में सोचना शुरू किया. इसने मुझे कई कारणों से प्रभावित किया. एक तो यह पूरी तरह सेक्युलर होता है और दूसरा यह कि यहाँ आप अकेले कोई निर्णय नहीं लेते.......यहाँ आप व्यक्तिवादी नहीं हो सकते. मैं थिएटर वर्कशाॅप नामक एक बड़े ग्रुप से जुड़ा, पर बाद में मुझे लगा कि इसे देखने तो कुछ ही लोग आते हैं. ये लोग ही हर जगह शहर में उपस्थित हैं. और वे लोग जो देहातों-कस्बों में रहते हैं, जिनकी बहुत बड़ी तादाद है,......वे नहीं आते. साथ ही वहाँ की रंगपद्धति......मेकअप....लाइट
.....वगैरह सब तामझाम मुझे असहज बनाते. मैं फिर विभ्रम का शिकार बना और वहाँ से बाहर निकल गया. फिर मैंने बादल सरकार का रंगमंच देखा और मुझे लगा कि, अरे!.....यही तो है मेरा रंगमंच. फिर मैंने बादल दा के साथ काम किया. उनके सारे प्रोडक्शन देखे......कुछ समय बाद मुझे लगा कि यह रंगमंच भी शहरी है,.....मेरा नहीं है. मुझे अपने गाँव के लोगों के लिए रंगमंच चाहिए.......फिर मुझे लगा कि शायद मुझसे थिएटर होगा ही नहीं और मुझे थिएटर करना छोड़ देना चाहिए......पर अपनी इस सोच से मैं पूरी तरह सहमत नहीं था. इस बीच ग्रोटोवास्की की एक पुस्तक मेरे हाथ लगी. उसे पढ़ने के बाद मुझे लगा कि यह रास्ता सम्भवतः मुझे मेरी मंजिल तक ले जाए. मैंने अपने कस्बे में, जिसका नाम खरदा है, ‘लिविंग थिएटर’ नाम से एक ग्रुप बनाया. मैंने दो-तीन नाटक लिखे और मंचित किये. पर मुझे अहसास हुआ कि इसमें नया कुछ नहीं है. यह भी एक तरह की पुनरावृत्ति है. मैं किसी की नकल करना नहीं चाहता था, पर इसमें सभी थे....बादल दा,....मनोज दा.... मैंने स्वयं से कई सवाल किए. मुझे लगा कि मेरे पास तो अपनी कोई परम्परा ही नहीं है.......मैं क्या करूँ?......फिर मैं छऊ करनेवालों के पास गया. मैंने अपने को डीकन्डीशन करने के लिए परम्परा का सहारा लिया. फिर तो सारा देश और कई एशियाई देश मेरी पाठशाला बन गए. मैंने लोकशैलियों से अपने को प्रशिक्षित किया. ........लोक रंगमंच की हमारी परम्परा का सामुदायिक सक्रियता की दृष्टि से पहले बहुत महत्त्व रहा है और आज भी है. इसका अपना दर्शन है. यहाँ उत्सव है और इसके पीछे भी दर्शन है. हमारी लोक विधाओं के पास अभिव्यक्ति की असीम शक्ति है और यह शक्ति इसे आधुनिक बनाती है. छऊ का प्रदर्शन खास अवसर पर होता है. पुरुलिया एक सूखाग्रस्त क्षेत्र है. इस क्षेत्र में जीवन जीना बहुत कठिन है. भूख, अभाव और कठिन श्रम के बाद नृत्य का पूर्वाभ्यास. यह नृत्य जीवन को विस्तार देता है. उसे विशालता देता है. यह समूह की कलात्मक उपज है. कृषि के लिए जल चाहिए. जल के लिए, देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यह किया जाता है. यह विश्वास कि अगर नृत्य सही ढंग से नहीं हुआ तो देवता प्रसन्न नहीं होंगे, इसे संचालित करता है. यह विश्वास हमारी लोक परम्परा की सबसे बड़ी ताकत है. यह है हमारे लोक का दर्शन. यह सामाजिक बन्धनों में हमें बाँधता है और समाज तथा समय के प्रति जिम्मेवार बनाता है. यह हमेशा नई चुनौतियाँ पेश करता है. यह हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त करता है और हमेशा नया बनाए रखता है. हमारे रंगमंच को अगर नया, जिम्मेवार और कलात्मक रहना है, उसे लोक को ग्रहण करना पड़ेगा.’’
अंतिम वक्ता थीं लखनऊ की रंगकर्मी वेदा राकेश. वेदा ने हबीब तनवीर से जुड़े कुछ संस्मरणों से अपनी बात आरम्भ की और कहा-‘‘लोक नाट्य की विशेषता उसकी सहजता ही है. यह सत्ता से भिड़ने की ताकत रखता है.’’
यह संगोष्ठी रायपुर में 5 जून से 8 जून 2010 तक चलने वाले रायपुर इप्टा के आयोजन प्रथम हबीब तनवीर नाट्य समारोह का हिस्सा थी. इसका संचालन युवा रंगकर्मी डा. योगेन्द्र चौबे ने और अध्यक्षता प्रभाकर चौबे ने की. इप्टा के संयोजक सुभाष मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापन किया. पहले दिन समारोह का उद्घाटन किया ‘नया थिएटर’ के पुराने अभिनेता रामचरण निर्मलकर ने. हबीब तनवीर के साथ बीते दिनों को याद करते हुए उन्होंने मंच से कई रोचक संस्मरण सुनाए. कवि विनोद कुमार शुक्ल और प्रोबीर गुहा मंच पर थे. उद्घाटन के बाद रायगढ़ की नाट्यसंस्था ‘गुड़ी’ ने रंगसंगीत और ‘नया थिएटर’ ने ‘चरणदास चोर’ मंचित किया. प्रस्तुति बेहद लचर रही. यह अक्सर होता है कि बड़ी प्रतिभाओं के देहावसान के बाद उनके नाटकों की पुनप्र्रस्तुतियाँ अपनी आभा खो देती हैं. ‘गुड़ी’ के रंगसंगीत में भी रंग कम था और अफरा-तफरी ज्यादा थी. दूसरे दिन हबीब तनवीर के साथ लम्बे समय तक जुड़े रहनेवाले दीपक तिवारी और पूनम तिवारी ने रंगसंगीत प्रस्तुत किया. पूनम के गायन में नाट्य का भांडार छिपा हुआ है. वह कुशलता के साथ अपने स्वर के आरोह-अवरोह, अपनी देहभाषा तथा अपने पदसंचालन से मंच पर संगीत प्रस्तुत करते हुए नाट्य रचती हैं. रायपुर इप्टा ने योग मिश्र के निर्देशन में ‘गाँव के नाम ससुराल और मोर नाम दामाद’ प्रस्तुत किया. इस प्रस्तुति का सबसे सबल पक्ष यह था कि यह हबीब तनवीर की प्रस्तुति की नकल नहीं थी और निर्देशक ने नया रचने का प्रयास किया था. संजय महानन्द, हेमंत निषाद, शशिमोहन सिंह और प्रभाकर वर्मा ने अपने अभिनय से प्रस्तुति को सम्प्रेषणीय बनाया. तीसरे दिन के रंगसंगीत में भी नाट्य अनुपस्थित रहा. इस समारोह में भिलाई इप्टा और दुर्ग इप्टा ने बच्चों के नाटकों का मंचन किया. बिलासपुर इप्टा ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कहानी ‘लड़ाई’ को राजकमल नायक के निर्देशन में ‘सत्यव्रत’ शीर्षक से मंचित किया. प्रस्तुति सरलीकरण का शिकार अवश्य हुई और राजकमल नायक की प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं थी. पर इस कठिन समय में सत्य, ईमान और शुभमूल्यों का रूपक रचने के लिए राजकमल नायक प्रशंसा के पात्र हैं. इस प्रस्तुति में निर्देशक द्वारा जीवंत क्षणों को रचने का प्रयास दीख रहा था, पर अभिनय की रूढ़ियाँ बाधा बन रही थीं.
हबीब तनवीर की स्मृति में आयोजित इस नाट्य समारोह ने अभी यात्रा आरम्भ की है. रायपुर इप्टा के एक अन्य प्रतिष्ठित आयोजन ‘मुक्तिबोध नाट्य समारोह’ की ऊँचाई तक इसे जाना होगा. रायपुर इप्टा ने आनेवाले सालों में इसे बाल रंगकर्म पर केन्द्रित करने की घोषणा की. सुभाष मिश्र के नेतृत्व में मिन्हास हसन, अरुण काठोटे, जीवेश चौबे, ललित देवांगन आदि रंगकर्मियों की सक्रियता और कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल, कथाकार आनंद हर्षुल, लेखक-पत्रकार प्रभाकर चौबे, शिक्षाविद् सच्चिदानन्द जोशी आदि की दर्शकदीर्घा में निरन्तर उपस्थिति ने आयोजन को स्पन्दित किए रखा.
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-पीरमुहानी, मुस्लिम कब्रिस्तान के पास, कदमकुआं, पटना 800 003