ईश्वर का अपना देश’ कहा जाने वाला केरल प्रदेश पिछले कुछ दशकों से विकास ‘अध्येताओं और नीति-निर्माताओं के बीच विशेष चर्चा का विषय रहा है. यह चर्चा ‘केरल मॉडल’ के नाम से मशहूर है. सामाजिक विकास के जो मानक निर्धारित किए गये हैं उन पर यह राज्य खरा उतरता है. ऐसा विशेषज्ञों का मानना है. इन मानकों में भूमि-सुधार व पुनर्वितरण, साक्षरता, स्वास्थ्य सुविधाएँ, शिशु मृत्युदर, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, न्यूनतम वेतन, नौकरियों में आरक्षण आदि शामिल हैं. उत्पादक राज्य न होने और कमतर आय-स्तर वाला होने के बावजूद प्रगति के वांछित सोपान तक पहुँचने की स्थिति ने ही इसे ‘मॉडल’ का दर्जा दिलवाया है. लेकिन, विकास का यह मॉडल पूरी तरह दुरुस्त हो, ऐसा भी नहीं है. 1994 में त्रिवेंद्रम में सम्पन्न इंटरनेशनल कांग्रेस में कई वक्ताओं ने इस ‘केरल मॉडल’ की विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाया.1 अलग-अलग हुए अध्ययनों में भी ‘केरल मॉडल’ की कमियाँ रेखांकित की गयीं. ‘लैंड रिफार्म’ में सर्वाधिक गरीबों की उपेक्षा, शिक्षा और रोजगार के अवसरों में जातिवाद की मौजूदगी, गरीबी का अब भी बना रहना इनमें से कुछ बिन्दु हैं.2 राज्य में स्त्रिायों की स्थिति भी चिन्ता का विषय है. 3 इस मॉडल के टिकाऊपन के सम्बन्ध में भी शंकाए की जा रही हैं. खाड़ी देशों से आने वाला धन जिस ‘नकली वैभव’ का आधार है वह कब भरभराकर गिर जाए, कहा नहीं जा सकता. केरल की सामाजिक गतिशीलता पर सात वर्षों तक फील्डवर्क और शोध करने वाले फिलिप्पो ओसेला और केरोलिन ओसेला की टिप्पणी है कि मलयाली अपने राज्य की उपलब्धियों पर और देश-दुनिया में उसकी प्रतिष्ठा पर गर्व करते हैं. गाँव में रहने वाले लोग भी गैट समझौते की आलोचना करते हुए, पूर्वी यूरोप की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा करते हुए देखे जा सकते हैं. लेकिन, वे पश्चिम एशिया में जा बसने की योजनाएँ बनाते हैं. वे ‘केरल मॉडल’ का हिस्सा नहीं होना चाहते.4 लेखक-द्वय का मानना है कि यहाँ के सामाजिक विकास के फायदों का बेहद असमान वितरण हुआ है.5 जाति-व्यवस्था पर शोध करने वाले ओलिवर मेंडलसॅन और मारिका विकजियानी का निष्कर्ष है कि यद्यपि अन्य राज्यों से केरल में अछूतों की स्थिति बेहतर है लेकिन यहाँ ‘‘अछूतों’ पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है.’’ राज्य के औसत सामाजिक विकास से उनका स्तर बहुत नीचे है. मार्क्सवादी संस्कृति जाति जनित हीनताओं से उबरने के लिए ‘क्षतिपूरक भेदभाव’ के प्रति ‘शत्राुतापूर्ण’ रवैया रखती है. केरल के अछूत राज्य की सामान्य कल्याणकारी नीतियों से लाभान्वित हुए हैं.6 उनके लिए अलग से कोई कल्याणकारी योजना नहीं चलायी गयी है.
बहरहाल, केरल के वामपंथी शासन की समीक्षा अभी हमारा मकसद नहीं है. यहाँ तक पहुँचने से पहले इस राज्य के सामाजिक इतिहास की संक्षिप्त चर्चा करना जरूरी है. इतना बेशक जोड़ देना चाहिये कि विश्व के इतिहास में केरल की वामपंथी सरकार जनतांत्रिक तरीके से चुनी गयी दूसरी मिनिस्ट्री थी. पहली कम्युनिस्ट मिनिस्ट्री स्पेन में सन् 1939 में चुनी गयी थी. केरल की जनता ने पहले-पहल वामपंथी सरकार का चुनाव सन् 1957 में किया था. ई एम एस नम्बूदिरीपाद इसके पहले मुखिया या मुख्यमंत्री थे.
केरल सरकार की स्थापना एक नवम्बर 1956 को हुई. यह तीन रियासतों को मिलाकर बनाया गया प्रांत था-त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार. आजादी प्राप्ति के तुरन्त बाद 1949 में त्रावणकोर और कोचीन को एक कर राज्य बना था. बाद में राज्य पुनर्गठन समिति ने भाषाई आधार पर इसके वर्तमान-भौगोलिक स्वरूप के निर्धारण की सिफारिश की. लगभग 39000 वर्ग किलोमीटर में फैला पतले आकार वाला यह राज्य अरब सागर और पश्चिमी घाट के मध्य स्थित है. इसकी सीमाएँ पूरब में तमिलनाडु और उत्तर-पूरब में कर्नाटक राज्य का स्पर्श करती हैं. किंवदंती है कि क्षत्रियों का विनाश करने वाले विष्णु के छठे अवतार परशुराम ने यह इलाका बसाया था. मसालों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध यह राज्य प्राचीन काल से ही विदेशी व्यापार का केन्द्र रहा है. ईसापूर्व समय से ही यहाँ विदेशी जहाज व्यापार हेतु आते रहे हैं. कालक्रम में असीरियन, अरब और रोमन व्यापारी इस प्रदेश में आये. वास्को डिगामा का जहाज 1498 में कालिकट आया था और ‘पूर्व’ व ‘पश्चिम’ के मध्य व्यापारिक सम्बन्ध का मार्ग खुल गया था. ‘केरल’ का प्राचीनतम उल्लेख सम्राट अशोक के शिलालेख में हुआ है. यह शिलालेख ई.पू. 257 का है. रामायण, महाभारत तथा तमाम पुराणों में इस नाम का उल्लेख मिलता है. ईसाई और इस्लाम धर्मानुयायी इन धर्मों की स्थापना के तुरन्त बाद केरल पहुँचे और यहाँ डेरा जमाया. अलबरूनी ने अपने वृतांत में मालाबार की चर्चा की है. अलबरूनी का समय 970-1039 ई. है. कहा जाता है कि पहले यह इलाका जाति-वर्ण से अपरिचित था. ब्राह्मण यहाँ बाहर से आये और कठिन संघर्ष के बाद अपनी सत्ता स्थापित की7. इसके बाद तो यह ब्राह्मणवाद-जातिवाद का बहुत मजबूत गढ़ बन गया. यहाँ के जाति-व्यवहार की जटिलता और कट्टरता देखकर विवेकानन्द ने इसे ‘पागलखाना’ कहा था.8
केरल का सामाजिक पदानुक्रम मोटे तौर पर देश के अन्य भागों में रहने वाले हिन्दुओं जैसा रहा है. लेकिन कुछ बातों में यहाँ की सामाजिक वास्तविकता अन्य जगहों से हटकर है. समाज में सर्वोच्च स्थान ब्राह्मणों का रहा. ब्राह्मणों में भी नम्बूदरी ब्राह्मणों का. नम्बूदरी ब्राह्मणों को मालाबार या मलयाली ब्राह्मण भी कहा जाता है. माना जाता है कि इन्हें परशुराम ने बाहर से लाकर बसाया था. अन्य ब्राह्मणों में तमिल ब्राह्मण तथा कन्नड़ ब्राह्मण हैं. तमिल ब्राह्मण हालाँकि बहुत पहले आकर बस गये थे और उनकी संख्या भी नम्बूदरी ब्राह्मणों से अधिक थी लेकिन उनका वैसा प्रभाव नहीं रहा. कन्नड़ ब्राह्मणों में अधिकांश मन्दिरों के पुजारी रहे जबकि नम्बूदरी ब्राह्मण जमींदार. तमिल ब्राह्मण अन्य पेशों- व्यापार-व्यवसाय की तरफ भी गये. नम्बूदरी ब्राह्मण अन्य ब्राह्मणों से पूरी तरह छुआछूत बरतने के लिए मशहूर रहे हैं. परम्परया नम्बूदरी परिवार में सिर्फ बड़ा लड़का ही नम्बूदरी युवती से विवाह कर सकता था. परिवार के दूसरे लड़के अपने से नीची (मुख्यत: नायर) जाति की स्त्रिायों से ‘सम्बंधम्’ कायम करते थे. नम्बूदरी ब्राह्मण आठ उपजातियों में बंटे थे.9
ब्राह्मणों के बाद क्षत्रिय थे. इनकी संख्या अपेक्षाकृत कम थी. नम्बूदरियों की तरह ये भी जमींदार थे. मालाबार गजेटियर के अनुसार अपने को क्षत्रिय व सामंत बताने वाले मूलतः नायर थे.10 नायर और क्षत्रियों के सामाजिक जीवन व प्रथाओं में बहुत समानता थी. क्षत्रिय के बाद नायर थे. नायरों का मुख्य कार्य खेती और सैनिक के रूप में सेवा देने का था. नायर तमाम उपजातियों में बंटे थे. मोटे रूप में इन्हें ऊँची जातिवाले नायर और शूद्र नायर के रूप में रखा जा सकता है. इनमें आपस में विवाह और खानपान का सम्बन्ध नहीं था. नायरों का सामाजिक ढाँचा मातृसत्तात्मक था. वर्णक्रम में नायर किस कोटि में आते हैं यह मुश्किल सवाल है. बहुत से विद्वान सभी नायरों को शूद्र मानते हैं. यह ठीक नहीं है.11 नायरों की नम्बूदरियों से निकटता जगजाहिर है. केरल में वैश्य जाति नहीं रही. दुकान और व्यापार का काम ईसाइयों, मुस्लिमों और यहूदियों ने किया.12 स्पृश्य जातियों में नायरों की संख्या सर्वाधिक रही. 1816, 1836 और 1856 की जनगणनाएँ नायरों ने ही की थीं. पहली वैज्ञानिक जनगणना 1875 में हुई. इसके अनुसार वे कुल संख्या के 20» थे13 नायरों में कुछ के पास अपनी जमीनें थीं, कुछ ब्राह्मण-क्षत्रिय जमींदारों के यहाँ कृषिकार्य की देख-रेख करते थे, कुछ पट्टे या बटाई पर जमीन लेकर खेती करते थे और कुछ स्वतंत्र काश्तकार थे.14 शूद्र जातियों में सबसे बड़ी संख्या ईषव की थी. आज भी इस जाति का संख्या-बल सबसे ज्यादा है.15 ईषव को इल्लुवन, तियन, चोक आदि नामों से भी जाना जाता है. ये पूरे प्रदेश में आबाद रहे हैं. दक्षिण त्रावणकोर में इन्हें ईषव, कोचीन और उत्तरी त्रावणकोर में चोवन या चोगन, मालाबार में तिया या तियर या दक्षिणी कर्नाटक में बिल्लव के नाम से पुकारा जाता था.16 सरकारी दस्तावेजों में इन्हंे ‘ईषव’ या ‘तिया’ लिखा जाता रहा है. ईसाई और इस्लाम में सबसे अधिक धर्मान्तरण इसी जाति के लोगों ने किया. इसके बावजूद इनकी संख्या सबसे ज्यादा रही. ईषव अनेक उपजातियों में बँटे हुए रहे. श्रीनारायण गुरु और एस.एन.डी.पी. योगम् के द्वारा इस समुदाय को संगठित करने का ऐतिहासिक कार्य किया गया. ईषव की छवि ताड़ी चुवाने वाली जाति की रही है. लेकिन, यह पूरी तरह सच नहीं है. इस जाति के लोग दूसरे धंधों जैसे चटाई निर्माण, बुनाई, खेती आदि में भी रहे हैं. सवर्णों के लिए ईषव अछूत थे.
शूद्र के बाद अछूत जाति थी. इनमें सबसे बड़ी संख्या पुलय जाति की थी. तमाम विद्वानों ने पुलय को केरल का मूल निवासी बताया है17 पुलय को ‘चेरुमा’ या ‘चेरुमन’ भी कहा जाता है. कुछ लेखक मानते हैं कि ये दो अलग जातियाँ थीं.18 पुलय कृषिकार्य से सम्बद्ध थे. इस कोटि की अन्य जातियों में परय, कनक्कन, कुतन तथा वेत्तुवन हैं. चाण्डाल जाति इनसे भी नीची मानी जाती थी. इस जाति-समूह में उल्लतन नयदि, मलयन तथा कदन जातियाँ हैं. मछुआरा जातियों में वलन, अरयन तथा मुक्कुवन हैं. कनियन जाति छाता बनाने और ‘ज्योतिष गणना’ करती थी. विलकुरूप धनुषबाण बनाने और उसका प्रशिक्षण देने का काम करते थे. अछूतों के कपड़े धोने के लिए वेलन जाति थी. पुल्लुवन जड़ी-बूटी से इलाज करने वाले थे. पल्लवन छाता-टोकरी बनाते थे, साथ में नजर व भूत उतारने का काम भी करते थे. इनकी स्त्रिायाँ दाई का काम करती थीं. ईषव लोगों के यहाँ जन्म-मृत्यु के अवसर पर उनके सम्बन्धियों को खबर पहुँचाने का काम पन्नन के ही जिम्मे था.19
केरल में प्राचीन और मध्यकालीन युगों के जातिगत क्रूरता के साक्ष्य लगभग नहीं मिलते. इसका मतलब यह नहीं कि इस क्रूरता का अस्तित्व ही नहीं था. असल बात यह है कि वर्ण-जाति की क्रूरता का दस्तावेजीकरण ही नहीं हुआ. इन अत्याचारों का व्यौरा कौन देता? जिनके पास ऐसा करने की क्षमता थी, अधिकार था वे ही उत्पीड़नकारी थे. उत्पीड़न का दर्द भला उन्हें क्यों सालता? जो उच्च वर्णों की क्रूरताएँ झेल रहे थे उन्हें भाग्य और कर्मफल का सिद्धांत थमाकर चुप करा दिया गया था. ज्ञान (पठन-पाठन और लेखन) के क्षेत्र में उनका प्रवेश ही वर्जित था. वे साक्ष्यों को दर्ज करते भी कैसे? जहाँ थोड़ा-बहुत अवसर था वहाँ उन्होंने किया. उनके गीत और लोककथाएँ इसका सबूत हैं. जब इस्लाम का प्रवेश हुआ, एक विकल्प खुला. धर्मान्तरण हुए. धर्मान्तरण ज्यादातर शूद्र और दलित जातियों ने ही क्यों किये? लूट पाट और तलवार के बल पर धर्मान्तरण हुआ होता तो सबसे ज्यादा ‘उच्च वर्णी’ धर्मान्तरित होते. जिन्होंने धर्मान्तरण किया उनके पास लुटाने को क्या धरा था? वे जिन्दगी का कौन-सा सुख भोग रहे थे कि जान-माल की रक्षा के लिए धर्म बदलते? उन्होंने धर्म बदला तो बहुत कुछ इसलिए कि रोज-रोज की हिंसा, अपमान और घृणा से छुटकारा मिले. लेकिन इस्लाम के प्रचारकों, अनुयायियों ने जाति-वर्णजन्य उत्पीड़नों को कलमबद्ध करने में कोई रुचि नहीं दिखाई. जैसे उनके लिए यह सब सहज स्वाभाविक था. इस बात की पुष्टि के लिए हम कहीं और न जाकर हिन्दी का सूफी साहित्य देख सकते हैं. मध्यकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य में जहाँ संत-भक्त कवियों के बीच जाति वर्ण के स्वीकार-अस्वीकार, जातिजनित हिंसा और घृणा को लेकर तकरार चल रही थी. लोग अपना-अपना पक्ष चुन रहे थे उस समय ‘इस्लाम में गहरी आस्था’ वाले सूफी कवियों ने कौन-सा पक्ष चुना? जौनपुर से लेकर दिल्ली के बीच, 1200 से लेकर 1900 के बीच, मुल्ला दाउद (‘चंद्रायन’ 1380) से लेकर ख्वाजा अहमद (‘नूरजहाँ’ 1905) के बीच इतने प्रबंध-काव्य लिखे गये मगर किसी ‘हिन्दू जीवन पर आधारित’ प्रबंध में वर्ण-जाति जनित हिंसा को जगह मिली? इस हिंसा का दस्तावेजीकरण पहले-पहल ईसाई मिशनरियों ने, ईस्ट इंडिया कम्पनी तथा बाद में ब्रिटिश अधिकारियों ने किया. 18वीं उन्नीसवीं सदी के सवर्ण-वर्चस्व के साक्ष्य आज हमें उन्हीं के कारण मिलते हैं. उन्हें इसका प्रतिफल क्या मिला? विद्वानों के एक वर्ग ने कहना शुरू किया कि ‘ब्राह्मण-वर्चस्व का मिथ’ अंग्रेजों ने गढ़ा है!
केरल में जातिगत हिंसा का स्वरूप क्या था? अछूत लंगोटी ही पहन सकते थे. उनका अधोवस्त्र अधिक से अधिक घुटने तक हो सकता था. अछूत औरतों को कमर से ऊपर वस्त्रा पहनने की मनाही थी. उनकी अपनी जमीन नहीं हो सकती थी. वे छप्पर के अलावा और कोई घर नहीं बना सकते थे. उन्हें मुख्य मार्ग पर चलने की प्रायः मनाही थी. सड़क के किनारे चलते हुए वे खास तरह की हांक लगाते रहते थे जिससे उनके उधर से निकलने की सूचना ऊँची जातिवालों को मिलती रहे. अगर कोई वर्णधारी उस रास्ते से गुजरे तो उन्हें सड़क के किनारे को कटीली झाड़ियों और कीचड़ में कूद जाना पड़ता था. कीचड़ में डूब जाने या कटीली झाड़ियों से शरीर छिल जाने पर मालिकों का अहं तुष्ट होता था.20 अछूत मालिकों से कितनी दूरी पर रहें इसका निश्चित नियम था. अंग्रेज अधिकारी ग्रेमी ने नोट किया कि ‘पुलयन, वलूवन और परयन जातियों के लोग ब्राह्मणों और नायरों से 72 कदम की दूरी बनाकर रखते थे, तियन (ईषव?) से 48 कदम की दूरी पर रहना होता था. कुन्नुकुम जाति के लोग ब्राह्मणों और नायरों से 64 कदम की दूरी पर तथा तियन से 40 कदम की दूरी बनाकर रखते थे. अन्य (निम्न) जातियों के लोग ब्राह्मणों और नायरों से सामान्यतः 48 तथा तियन से 24 कदम की दूरी रखते थे.21 अछूत अपने को मालिकों के सामने ‘अदियन’ (दास) कहते थे और अपने घर को घर नहीं बल्कि ‘गोबर का ढेर’ बताते थे. अगर कोई पुलयन विवाह करना चाहता था तो वह पहले अपने मालिक से विनती करता था. विवाह का सारा खर्च मालिक के जिम्मे रहा करता था. फ्रांसिस बुकानन बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी की चिकित्सा-सेवा में थे. उस समय के भारत के गर्वनर-जनरल मार्किवस वेलेजली के आग्रह पर उन्होंने दक्षिण भारत की यात्रा की थी. मालाबार इलाके में वे नवम्बर 1800 से जनवरी 1801 के बीच घूमे. उन्होंने विस्तार से अपने यात्रा-अनुभवों और तत्कालीन सामाजिक जीवन का व्यौरा दर्ज किया है. हिसाब लगाकर उन्होंने बताया है कि एक पुलय के विवाह में 16 शिलिंग के लगभग खर्च आता था22 विवाह के बाद मालिक को एक ही जगह दो सेवक मिल जाते थे.
केरल में दास प्रथा थी. दास अछूत जातियों के लोग ही हुआ करते थे. ये कृषि दास होते थे. अछूत होने के कारण इनसे घरों में काम नहीं लिया जा सकता था. इनकी बड़े पैमाने पर खरीद-बिक्री होती थी. 1836 की जनगणना के अनुसार अकेले त्रावणकोर में कृषि दासों की संख्या सवा लाख से ऊपर थी.23 केरल में दास प्रथा के स्वरूप, इतिहास और अंत की चर्चा अगली बार.
सन्दर्भ-
1. ए के जी सेन्टर फॉर सिसर्च एंड स्टडीज तिरुअंतपुरम से पाँच भागों में प्रकाशित शोध-सार ‘‘इंटरनेशनल कांग्रेस ऑन केरल स्टडीज’’ 1994. ‘सोशल मोबिलिटी इन केरल’ में पृष्ठ 20 पर उद्धृत.
2. ‘सोशल मोबिलिटी इन केरल: माडर्निटी एंड आइडंेटिटी इन कॅन्फ्लिक्ट’ (2000) फिलिप्पो ओसेला एंड केरोलिन ओसेला, प्लूटो प्रेस, लंदन, प्रथम संस्करण, पृ.20.
3. ‘सोशल चेंज इन केरल: इनसाइट्स फ्राम माइक्रोलेवल स्टडीज’ (2007) संपादक- के.एन.नायर और विनीता मेनन, दानिश बुक्स, दिल्ली, पृ. 2.
4. ‘सोशल मोबिलिटी इन केरल’, पृ. 20’
5. वही, पृ. 20.
6. ‘द अनटचेबल्स: सबाॅर्डिनेशन, पावर्टी एंड द स्टेट इन माडर्न इंडिया’ औलिवर मेंडलसन एंड मारिका विकजियानी, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज, पृ. 119. ‘सोशल चेंज इन केरल’ में उद्धृत, पृ. 47-48.
7. ‘केरल, द रेन रेंन लैंड’, (1958) आर. वेलायुधन, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सेाशल अफेयर्स, नयी दिल्ली, ‘दलित मूवमेंट इन साउथ इंडिया’ (2004) स्वप्ना एच. सामेल, सीरियल्स पब्लिकेशंस, दिल्ली, पृ. 307.
8. केरल में अपने फील्ड वर्क के दौरान विवेकानंद’ के इस उद्गार का जिक्र सबसे पहले मैंने त्रिचूर में चर्चित युवा मलयाली कवि. पी. एन. गोपीकृष्णन से बातचीत में सुना. यह बातचीत केरल साहित्य अकादमी के अतिथिग्रह में दिनांक 1.10.2009 को हुई थी. बाद में कई अन्य लोगों ने विवेकानन्द के इस कथन की ओर ध्यान दिलाया.
9. दलित मूवमेंट इन साउथ इंडिया,
पृ. 319.
10. वही, पृ. 320.
11. वही, पृ. 322.
12. ‘इमर्जन्स ऑफ अ स्लेव कास्ट: पुलयाज ऑफ केरल’, (1980) के. सारदामोनी, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली. पृ. 14.
‘दलित मूवमेंट एन साउथ इंडिया’
पृ. 317
13. ‘दलित मूवमेंट इन साउथ इंडिया’, पृ. 321.
14. ‘इमर्जन्स ऑफ अ स्लेव कास्ट’ पृ. 27.
15. ‘सोशल मोबिलिटी इन केरल’
पृ. 27.
16. ‘दलित मूवमेंट इन साउथ इंडिया’, पृ. 326.
17. इमर्जन्स ऑफ अ स्लेव कास्ट,
पृ. 44
18. वही, पृ. 47 व आगे. एक निजी बातचीत में आलोचक व मलयाली कवि कृष्णन उन्नीपी ने बताया कि चेरुमन व पुलय भिन्न जातियाँ हैं. सारदामोनी का मानना है कि शुरू में ये भले ही अलग-अलग जातयाँ रही हों लेकिन बाद में इन्हें एक माना जाने लगा. देखें, पूर्वोक्त. स्वप्ना की मान्यता भी यही है. देखें ‘दलित मूवमेंट इन साउथ इंडिया’, पृ. 332 व आगे.
19. ‘दलित मूवमेंट इन साउथ इंडिया’, पृ. 329-332.
20. रिपोर्ट ऑन स्लेवरी, 1841 से ‘इमर्जेंस ऑफ अ स्लेव कास्ट’ में उद्घृत, पृ. 61.
21. ‘रिपोर्ट ऑन स्लेवरी’ पृ. 129 से सारदामोनी द्वारा उद्धृत, पृ. 61.
22. ‘इमर्जेंस ऑफ आ स्लेव कास्ट’ पृ. 53 फ्रांसिस बुकानन का यात्रा-वृतांत ‘अ जर्नी फ्राम मद्रास थ्रू द कंट्रीज ऑफ मैसूर, कनारा एण्ड मालाबार’ शीर्षक से लंदन से 1807 में प्रकाशित हुआ.
23. ‘स्लेवरी इन केरल’, (1986) के.के. रामचंद्रन नायर, मित्तल पब्लिकेशन, दिल्ली, पृ. 14, दलित मूवमेंट इन केरल पृ. 342-43.
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