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हिन्द स्वराज : एक पुस्तक के सौ साल !

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अजीब संयोग है कि जब देश में वैश्वीकरण और तेज औद्योगीकरण की तूफानी पछुआ हवाओं का अभी-अभी एक दौर गुजरा है, अमेरिका समेत पूँजीवाद के पुरोध पश्चिम देश तीन-चैथाई सदी के भीतर ही दूसरी बार मन्दी की चपेट में हैं और आर्थिक सुधरों के प्रबल पक्षधर डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ज्यादा सीटें लेकर सत्ता में लौट आयी है ठीक उसी साल महात्मा गाँधी की विवादास्पद पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ अपने प्रकाशन के सौ साल पूरे कर रही है. हालाँकि, हमारे यहाँ किसी पुस्तक का शताब्दी वर्ष मनाने का कोई रिवाज नहीं है. भले ही हम यह दावा करते रहें कि दुनिया की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद हमारे यहाँ रची गयी लेकिन बुनियादी तौर पर हम निहायत ही पुस्तक द्रोही लोग हैं. हम पुस्तक को धर्मग्रन्थ बनाकर पूजना तो जानते हैं लेकिन उसे कायदे से विमर्श का विषय नहीं बनाते! धर्म ग्रन्थ तो वैसे भी हमारे लिए सदा से ईश्वरीय रहे हैं. इसलिए उनके विरुद्ध थोड़ा-सा भी कुछ कहा जाने पर हम तुरन्त खड्गहस्त हो जाते हैं. खैर, ‘हिन्द स्वराज’ का शतीवर्ष होने पर उस पर कायदे से चर्चा होने का तो इसलिए भी सवाल नहीं उठता कि इधर के सालों में गाँधी ही लगभग फालतू चीज़ और हर तरह से एक भारी भरकम बोझ माने जा चुके हैं! उनका जिक्र अब उनके ब्रह्मचर्य और बुढ़ापे तक निर्वसन महिलाओं के साथ सोने के प्रयोगों के मामले-भर में होता है. जहाँ तक ‘हिन्द स्वराज’ का सवाल है उसके साथ दिलचस्प बात यह रही है कि अपने प्रकाशन के साथ ही वह विवाद का केन्द्र भी रही, साथ ही रद्द भी कर दी गयी.

‘हिन्द स्वराज’ गाँधी ने 13 से 22 नवम्बर 1909 के बीच ब्रिटेन से दक्षिण अफ़्रीका लौटते वक्त यात्रा के दौरान जहाज पर लिखी थी. पुस्तक मूल रूप से गुजराती में लिखी गयी थी. और इसका प्रकाशन दक्षिण अफ्रीका से निकाले जा रहे ‘इंडियन ओपीनियन’ में 11 और 18 दिसम्बर 1909 के दो अंकों में धारावाहिक रूप में हुआ था. बाद में इसका पुस्तकाकार प्रकाशन हुआ. भूमिका वगैरह सहित मुश्किल से 70-80 पेज की इस पुस्तिका के बाद में अंग्रेजी, मराठी सहित कई भाषाओं में अनुवाद हुए.

पुस्तक में व्यक्त विचारों के बारे में स्वयं गाँधी ने भूमिका में स्पष्ट कहा था, ‘जो विचार यहाँ रखे गये हैं, वे मेरे हैं और मेरे नहीं भी हैं. वे मेरे हैं क्योंकि उनके मुताबिक बरतने की उम्मीद करता हूँ. वे मेरी आत्मा में गढे़-जड़े हुए जैसे हैं. ये विचार असंख्य हिन्दुस्तानियों और यूरापियों के हैं.’ दरअसल, इसे लिखने के पहले उन्होंने थोरो, रस्किन, टालस्टाय वगैरह के अलावा कई प्राचीन भारतीय ग्रन्थों को भी पढ़ा था. उस समय की राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों पर भी उनकी नशर थी. मोटे तौर पर वे उस समय के भारत के हिंसावादियों और दक्षिण अफ्रीका के अपने विरोधियों की आलोचना का इस पुस्तक के माध्यम से जवाब देना चाहते थे. उल्लेखनीय है कि उन दिनों गाँधी दक्षिण अफ्रीका में जिस तरह के प्रयोग कर रहे थे उन्हें लेकर कई तरह की चर्चाएँ जारी थीं. अलग-अलग ढंग से उनका विरोध हो रहा था. हालाँकि वे 1891 में लिखे अपने कुछेक लेखों के माध्यम से अपने प्रयोगों के बारे में अपना पक्ष स्पष्ट कर चुके थे. इस पुस्तक का लक्ष्य उन्होंने ‘सत्य को खोजना, खोजे गए सत्य को अमल में लाना और ऐसा करते हुए देश सेवा करना’ माना था.

पुस्तक में कुल बीस अध्याय हैं जो प्रश्न-उत्तर शैली में लिखे गए हैं और अपेक्षाकृत काफी छोटे-छोटे हैं. कई जगह बातें सूत्रा रूप में कही गई हैं.

गाँधी के सारे लेखन, भाषण इत्यादि की खासियत उनकी आम फहम बातचीत की शैली है. उनके व्यक्तित्व की सादगी उनके लेखन और भाषणों में भी मौजूद रही है. उनके भाषण जिस तरह से धीमे पिच पर बिना ज्यादा आरोह-अवरोह के चलते हैं वहीं कुछ उनके लेखन में भी होता है. किसी तरह की लफ्रफाजी या भाषा की जादूगरी नहीं, शैली की आतंकित करने वाली गम्भीरता नहीं! एक तरह का सीध-सपाटपन! और ऐसा इसलिए था कि वे बुनियादी तौर पर लेखक नहीं थे. लेखन और पत्रकारिता तो उनके मूल काम के साधन-भर थे. जिसमें बात सीधे और दो टूक कहनी थी. हालाँकि, बीच में कहीं-कहीं वे कटीले व्यंग्य और हास्य का सहारा लेते चलते हैं. लेकिन आक्रामक ही नहीं होते. बहुत सख्त बात भी वे बिना ज्यादा आक्रामक हुए कहते हैं.

पुस्तक में व्यक्त विचारों के मोटे तौर पर दो केन्द्र हैं। भारतीय लोगों की तत्कालीन दशा और पाश्चात्य सभ्यता. वैसे, पुस्तक की सामग्री में एक खास तरह की तात्कालिकता देखी जा सकती है. यूँ भी गाँधी का सारा विराट चिन्तन एक खास तरह की तात्कालिकता से ही निकला है. जबकि उनके सोच का चरित्र और दिशा शाश्वत की तलाश रही है. उनकी आध्यात्मिक दृष्टि हर किस्म की तात्कालिकता और सांसारिकता को आध्यात्मिक टच देती है. आध्यात्मिकता उनके व्यक्तित्व का मूल सारांश थी लेकिन तात्कालिक प्रश्नों को वे उनकी तात्कालिक सांसारिकता में ही देखते-समझते थे. तात्कालिक प्रश्न उनके लिए हमेशा सबसे प्राथमिक और जरूरी रहे. वे अकेले व्यक्ति थे जो स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान तमाम किस्म के तात्कालिक और कभी-कभी लगभग फिजूल लगने वाले मुद्दों और प्रश्नों से जूझते रहे. जबकि, बाकी लोगों के लिए वे मुद्दे और प्रश्न उस समय अप्रासंगिक और अनावश्यक रहे. उन लोगों का शोर स्वतंत्राता प्राप्ति पर था. वे सब पहले आजादी हासिल करना चाहते थे और उसके बाद दीगर सवालों-मुद्दों पर सोचना ठीक समझते थे. तब तक के लिए ऐसे प्रश्नों को स्थगित रखना बेहतर मानते थे. लेकिन गाँधी स्थगित न करते हुए उनसे जूझते थे. यही वजह थी कि वे एक साथ बहुत सारे मोर्चों पर सक्रिय मिलते हैं. दरअसल स्वतन्त्राता प्राप्ति उनके लिए अन्तिम लक्ष्य नहीं था. वे उसे एक अवसर एक जरिये की तरह समझते थे और उसका इस्तेमाल एक खास तरह का ‘स्वराज’ कायम करने के लिए करना चाहते थे. इसी स्वराज की झलक ‘हिन्द स्वराज’ में देखने को मिलती है. पुस्तक के बारे में उन्होंने दावे के साथ कहा था कि वह ‘द्वेष धर्म’ की जगह ‘प्रेम धर्म’ सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है और ‘पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल’ खड़ा करती है.

इस पुस्तक में कई अलग-अलग छोटे-बड़े मुद्दों पर विचार किया गया है. मसलन, कांग्रेस और उसके कार्यकर्ता, बंगभंग, सामाजिक-राजनैतिक अशान्ति-असन्तोष, स्वराज, तत्कालीन इंग्लैंड की हालत, सभ्यता का दर्शन, सच्ची सभ्यता, देश की दशा, स्वतन्त्रता का प्रश्न, इटली और हिन्दुस्तान, गोला-बारूद, सत्याग्रह-आत्मबल, शिक्षा, मशीन, राष्ट्र, राष्ट्र की भाषा इत्यादि. जाहिर है इनमें से कई विषय आपस में बेमेल लगते हैं साथ ही हिन्द स्वराज की अवधरणा के सन्दर्भ में असम्बद्ध भी! पुस्तक के नाम से यह आभास होता है कि उसमें भारत के भावी स्वरूप को लेकर कोई चरणबद्ध सुव्यवस्थित योजना या कार्यक्रम पेश किया गया होगा. जबकि पुस्तक में बहुत सारी जगहों पर सीधे-सीधे इस तरह की कोई बात दिखाई नहीं देती. बल्कि, पढ़ते हुए लगता है एक ट्रांस में जो भी मुद्दे दिखाई देते या सूझते गये उन पर वे लिखते चले गये. यूँ भी भारत में चल रहे स्वतन्त्राता संघर्ष में तब तक उनका सीध प्रवेश नहीं हुआ था. उनके प्रयोगों का क्षेत्र उन दिनों अफ्रीका था और वे भारत के घटनाक्रम को एक तरह से बाहर से देख रहे थे. लेकिन, जब वे भारत लौट आये और स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय हो गये तब भी उनके हिन्द स्वराज में व्यक्त विचारों में कोई बदलाव नहीं आया. बल्कि वक्त के साथ वे विचार और मजबूत ही हुए. जिसे उनका दुराग्रह भी समझा गया.

‘हिन्द स्वराज’ के केन्द्रीय विषय भाषा, मशीन, सभ्यता और शासन पद्धति हैं. हालाँकि, आज की तुलना में ये विषय 1909 में इतने केन्द्रीय, चिन्ताजनक और भयावह नहीं हो पाये थे. दरअसल, तब तक भारतीय समाज का आज जितना अधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण नहीं हो पाया था. बल्कि समाज का अधिकांश स्वरूप मध्ययुगीन ही था. शहरों का एक छोटा-सा वर्ग ही अंग्रेजी पढ़ा-लिखा था और थोड़ा-बहुत आधुनिक हो पाया था. यही वर्ग सरकारी नौकरियों में था. कुछ राय बहादुर, खान बहादुर किस्म के अंग्रेजों के कृपापात्रा और हितैषी लोग थे जो अंग्रेजी जीवन पद्धति को भोंडी नकल में अपनी शान समझते थे. भाषा के तौर पर अंग्रेजी का आज जैसा बोल-बाला और सर्वग्रासी आतंक नहीं था. वह नौकरी हासिल करने का जरिया शरूर थी लेकिन सरकारी नौकरी का उस वक्त उतना आकर्षण भी नहीं था. उसे खेती और व्यापार-व्यवसाय से अहम माना जाता था. और फिर रोजगार के दूसरे अवसर भी सुलभ थे. रही बात मशीनों की तो बावजूद कपड़ा मिलें और कारखाने लग जाने के आज जितना मशीनीकरण तब तक नहीं हुआ था. हालाँकि, जितना भी हुआ था उसने दस्तकारी और पारम्परिक उद्योगों को काफी दूर तक नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया था.

जहाँ तक शासन पद्धति के रूप में इंग्लैंड के पैटर्न वाली संसदात्मक शासन प्रणाली का प्रश्न है ब्रिटेन जैसे संसदात्मक ढाँचे का विकास होना अभी शेष था. ब्रिटेन में मेंग्नाकार्टा के बाद संसदात्मक शासन प्रणाली विकास स्वाभाविक क्रम में हुआ था. जबकि हमारे यहाँ वह लाद ली गयी. बाकी बहुत सारी चीशों की तरह. अपनी कोई देसी प्रणाली तो खैर हमने विकसित की ही नहीं! इस तरह के जनतन्त्रों को वाम चिन्तन ‘बुर्जुआ’ कहता था. गाँधी ब्रिटेन की संसद को ‘बाँझ और वेश्या’ कहते हैं.

इन केन्द्रीय विमर्शो के अलावा गाँधी ने हिन्द स्वराज में रेल, आधुनिक चिकित्सा पद्धति, आधुनिक न्याय व्यवस्था जैसी चीशों का भी विचार किया है और उन्हें सिरे से नकारा और रद्द कर दिया है.

गाँधी का यह सारा विमर्श पूर्व बनाम पश्चिम के विमर्श के रूप में सामने आता है. पश्चिमी या आधुनिक सभ्यता की हिन्द स्वराज में वे जो सख्त टीका करते नजर आते हैं, उसका प्राथमिक एवं अनिवार्य सन्दर्भ भारतीय सभ्यता है. वे ब्रिटेन में रहे और पढ़े थे. बरसों उन्होंने पश्चिमी परिधान पहना था. जाहिर है उन्होंने पश्चिम को भीतर से देखा था. उनका आकलन बाहरी आदमी का आकलन नहीं था. लेकिन, जैसा कि हिन्द स्वराज के आलोचकों का कहना रहा है कि गाँधी इस पुस्तक में जिस भारतीय सभ्यता या पूर्व को रोल मॉडल बनाकर पश्चिम की आलोचना करते हैं वह बुनियादी तौर पर मध्युगीन, जड़ और कालातीत हो चुका है. अव्यवहारिक भी! जबकि गाँधी इन आरोपों को विकास के इकहरे और तयशुदा रोल मॉडल के प्रति दुराग्रही आसक्ति का नतीजा मानते हैं. यूँ जैसा कि खुद उन्होंने पचासों जगह कहा है, ‘राम राज्य’ उनका मूल आदर्श रहा है. जिसमें दैहिक, दैविक और भौतिक ताप नहीं व्यापते! ब्रिटेन के संसदात्मक जनतन्त्र को कोसने के पीछे उनके आलोचक एक कारक उनके इस राम राज्य की कल्पना को भी मानते हैं. जो उनके मुताबिक हर तरह से निर्दोष, निष्कलुष और आदर्श था. वे उसी में व्यक्ति की सच्ची मुक्ति देखते हैं. इस तरह से देखें तो उनका एक तरह की मध्ययुगीन या सामन्तीय जीवन पद्धति और व्यवस्था का समर्थन करना समझ में आ सकता है. राजतंत्र इसी पद्धति के अनुकूल था. गाँधी रामराज्य के ढंग के श्रेष्ठतम राजतन्त्र और सामन्ती जीवन पद्धति इन दोनों के पक्ष में खड़े मिलते हैं. हालाँकि, यह थोड़ा-सा जल्दबाजी में किया गया सरलीकरण लग सकता है. कहा भी जाता रहा है कि हिन्द स्वराज के पीछे की मूल भावना को कुछ तयशुदा सरलीकरणों के जरिये नहीं समझा जा सकता. वे जिस तरह के एक नये इन्सान और तन्त्र की बात करते हैं उन्हें इन पिटे-पिटाये ढाँचों में रिड्यूस करके नहीं देखा जा सकता. वैसे भारतीय संसदीय जनतन्त्र का जो घिनौना रूप पिछले कुछ सालों में उभरा है, उसे देखकर गाँधी का इंग्लैंड की संसद के बारे में कहा हुआ बुरा-भला भारतीय संसद के मामले में ज्यादा सही लग सकता है.

गाँधी अंगरेजी शिक्षा पद्धति के सख्त खिलाफ थे. उनका सारा शोर व्यावहारिक, श्रमोन्मुखी और एक श्रेष्ठ मनुष्य बनाने वाली शिक्षा पर था. जाहिर है रोजगार और मानवीय मूल्य उनकी निगाह में ज्यादा जरूरी थे. वे इस तरह की शिक्षा के इतने ज्यादा आग्रही थे कि उन्होंने अपने बच्चों को भी यही शिक्षा देनी चाही. उनके बड़े बेटे का उनसे नाराजगी का एक कारण यह भी था. हिन्द स्वराज में जिस तरह की शिक्षा की बात की गई है वह समाजोपयोगी, श्रमोन्मुखी होने के साथ-साथ बेहतर मनुष्य बनने का लक्ष्य हासिल करने की तरफदार है. बुनियादी तालीम का विचार इसी से निकला था, जो काम करते हुए सीखने पर शोर देता है. सिर्फ सीखना वहाँ अलग से कोई काम नहीं है. प्राथमिकता के लिहाज से समाजोपयोगी शिक्षा को वे ज्यादा अहमियत देते हैं. कृषि, ग्रामोद्योग और दस्तकारी जिसके केन्द्र में थे. और चीजों की तरह यहाँ भी ‘आत्मा का विकास’ मूल ध्येय था. इसीलिए नैतिकता पर शोर था. उनका सत्य के प्रति आग्रह उनके हर सोच, कार्यक्रम और योजना का निर्धारक और नियन्त्रक तत्व रहा है. जाहिर है शिक्षा का भी था.

मशीन सम्बन्धी उनके बहुचर्चित और विवादास्पद विचार भी ‘हिन्द स्वराज’ में हैं. इन विचारों की अलग-अलग तरह से कापफी आलोचना हुई थी और उन्हें हास्यास्पद भी बताया गया था. और पूछा गया था अगर गाँधी यन्त्र के इतने विरोधी हैं तो उनका अपने चरखे के बारे में क्या खयाल है जो भी एक मशीन है! जबकि, गाँधी का कहना था कि वे मशीनों के नहीं बल्कि मशीनों के पीछे जारी पागलपन के विरोधी हैं. मशीनों के पक्ष में हमेशा समय और श्रम की बचत का तर्क दिया जाता है. वे भी इसका समर्थन करते थे लेकिन जरूरी मानते थे कि यह बचत किसी खास वर्ग की नहीं बल्कि सारी मानव जाति की होनी चाहिए. इसलिए, वे सारे यन्त्रों को नष्ट करना नहीं बल्कि उनकी जरूरी हद बाँधना चाहते थे. उनके लिए वे यन्त्र स्वागत योग्य थे जो ‘मनुष्य की आत्मा’ के विकास में सहायक होंगे. हर चीज को लेकर अपने आध्यात्मिक एप्रोच के चलते वे मशीनों की चर्चा करते समय भी आत्मा के विकास पर जोर देते हैं. मशीनें पूँजीवादी और समाजवादी दोनों तरह के विकास का मुख्य केन्द्र रही हैं. जबकि, गाँधी का जोर मशीन केन्द्रित नहीं श्रम केन्द्रित विकास पर रहा था. और इस मामले में सामन्ती उत्पादन पद्धति पर जोर देते थे. जिसमें छोटे औजारों द्वारा घर-परिवार के स्तर पर उत्पादन किया जाता था. जाहिर है यह पहले से चली आ रही पद्धति थी. जिसमें नया परिवर्तनकारी कुछ नहीं था. और मोटे तौर पर ग्राम केन्द्रित थी. गाँधी के आलोचकों ने उसे यथास्थितिवादी, पिछड़ा और नयी परिस्थितियों के प्रतिकूल बताकर उसका विरोध किया था. कांग्रेस और गाँधी के नेहरू जैसे अनुगामी नेताओं तक ने उसे अव्यवहारिक करार दिया था. आजादी मिलने के बाद देश के विकास की जो रूपरेखा तैयार की गयी वह तीव्र औद्योगीकरण वाली थी. तीव्र औद्योगीकरण की वकालत पूँजीवाद और समाजवाद दोनों करते थे. नेहरू भी इसके समर्थक थे. ऐसे में, देश के विकास की नींव भी तीव्र औद्योगीकरण पर रखी गई. हालाँकि, दिखावटी तौर पर गाँधी के ग्रामोद्योगों की बात भी साथ-साथ की जाती रही. बड़े उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने का सरकार पर उन दिनों उद्योगपतियों का दबाव भी काफी था. कुछ भीमकाय बुनियादी उद्योग इसी लिए डाले गये थे. तीव्र औद्योगीकरण के लिए सरकारी और निजी क्षेत्रों वाला मिश्रित अर्थव्यवस्था का ढाँचा खड़ा किया गया था. जो बाद में चलकर अगर साम्यवादी अर्थव्यवस्था के ढहने से पैदा हुए धमाकों को बर्दाश्त करने में मददगार रहा तो मंदी के ताशा झटकों को बर्दाश्त करने में भी.
‘हिन्द स्वराज’ में जो अतिवाद नजर आता है उसी की वजह से शायद गाँधी 1909 में यह मान और कह रहे थे कि देश अभी इस स्वराज के लिए तैयार नहीं है. सिर्फ अहिंसा ही ऐसी चीज थी जिस पर तब वे काम होता देख रहे थे. दरअसल, जो बातें वे सीधे-सीधे कह रहे थे वे उतनी सीधी नहीं थीं, लोगों को अटपटी भी लग रही थीं. मसलन उनका यह कहना कि हिन्दुस्तान को रेलों, वकीलों और डॉक्टरों ने कंगाल बना दिया है. या रेल संक्रामक रोगों को भी एक से दूसरी जगह ले जाती है, रेलों से अकाल पड़े हैं दुष्टता बढ़ती है, बुराई तेजी से फैलती है! और कि सत्याग्राही के लिए ब्रह्मचर्य अनिवार्य है, पति-पत्नी संसर्ग केवल सन्तानोत्पत्ति के लिए होना चाहिए। पश्चिमी सभ्यता क्षय रोग की तरह है और यन्त्र में एक भी गुण नहीं है. मनुष्य इस तरह पैदा किया गया है कि अपने हाथ-पैर से बने उतनी ही आने-जाने की हलचल उसे करनी चाहिए. स्वनियन्त्रण की क्षमता पैदा करने वाली शिक्षा ही सच्ची शिक्षा है. अंग्रेजी शिक्षा गुलाम बनाने वाली है. इस शिक्षा को प्राप्त कर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है. वगैरह, वगैरह!

गाँधी अपनी इस तरह की बातें बिना किसी लाग-लपेट के इतने सीधे ढंग से कहते हैं कि अनगढ़, उथली या सतही लगती हैं. उन्हें इसी तरह लिया भी गया था. गोपालकृष्ण गोखले ने इस पुस्तक को ‘कच्चा’ कहा था और दूसरे कुछ लोगों ने इसे गाँधी की निजी सनक! उन्हीं के एक मित्र ने इसे एक ‘मूर्ख आदमी की रचना’ बताया था. छपने के बाद के बीस साल पुस्तक को लेकर लगातार विवाद रहा. लोगों का मानना था कि गाँधी को जल्दी ही अपनी गलती का आभास हो जाएगा और वे पुस्तक के अगले संस्करण में उसका सुधार कर लेंगे. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ. गाँधी को कुछेक जगह भाषा ही सुधारने की जरूरत पड़ी. बाकी उनके विचार और मजबूत होते गये. उल्लेखनीय है कि प्रकाशन के बाद मुम्बई सरकार ने इसे जब्त कर लिया था. गाँधी चाहते और मानते थे कि स्वतन्त्र भारत का संविधान ‘हिन्द स्वराज’ के अनुसार हो. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ. कांग्रेस ने उस पर विचार तक करना जरूरी नहीं समझा. जबकि गाँधी नेहरू से लगातार आग्रह करते रहे कि वे ‘हिन्द स्वराज’ को लेकर उनसे चर्चा करें. ताकि स्वतन्त्र भारत की इमारत उसके मुताबिक खड़ी की जा सके. नेहरू पुस्तक से पूरी तरह असहमत थे. अपनी असहमति उन्होंने छुपाई भी नहीं. कई आलोचकों की तब धरणा थी कि हिन्द स्वराज के जरिये जो समाज निकलेगा या बनेगा वह जड़, पिछड़ा हुआ और मुर्दा होगा. अब तो खैर उदारीकरण, वैश्वीकरण और तीव्र औद्योगीकरण के दौर में ‘हिन्द स्वराज’ अजायबघर में रखने की चीज ही लग सकता है. पूँजीवादी नव बौद्धिकों की फौज उसे बात करने लायक तक नहीं मान सकती.

पिछले साठ-पैंसठ सालों में देश वहाँ आ गया है जहाँ से ‘हिन्द स्वराज’ बहुत दूर की असम्भव और अस्वाभाविक चीज लगता है. पिछले दस-पन्द्रह सालों में नव उदारवादी चिन्तकों ने पूँजी केन्द्रित विकास के मॉडल का जितना ढोल पीटा है और पूँजीवादी प्रेस ने उसका जिस तरह से जयगान किया है उसने हिन्द स्वराज में बताये मॉडल की तो ठीक किसी भी दूसरे वैकल्पिक मॉडल पर विचार करने की गुंजाइश नहीं रहने दी है. नर्मदा बचाओ जैसे आन्दोलनों ने ‘विराट की जगह लघु केन्द्रित विकास’ के मॉडल की जब बात उठायी तो उसे विकास विरोधी, राष्ट्र विरोधी और देश को पिछड़ा बनाये रखने का षड्यन्त्र करार दिया गया. बाद में तो वह आन्दोलन पुनर्वास जैसे कुछेक प्रश्नों तक ही सीमित होकर रह गया.

‘हिन्द स्वराज’ का महत्त्व इसलिए भी है कि वह सौ साल पहले भाषा, विकास, सांस्कृतिक पहचान, सभ्यता जैसे बहुत बुनियादी किस्म के और जरूरी सवाल खड़े करता है. और पश्चिम का क्लोन बनने से आगाह करता है. वह विकास के अध्कि मानवीय मॉडल की पैरवी कर रहा था. जाहिर है जिसमें सेंसेक्स, शेयर बाजार, मल्टी नेशनल्स के लिए जगह नहीं थी. बाजार की चमक और आतंक नहीं थे. आजादी के बाद नेहरू और कांग्रेस के पास मौका था कि वे ठीक-ठीक ‘हिन्द स्वराज’ में वर्णित मॉडल की तरह चाहे नहीं लेकिन, उसकी मूल प्रेरणा और गन्तव्यों को आधार बनाकर इस महादेश के लिए विकास का अलग मॉडल विकसित करते. अगर ईमानदारी से इस तरह की कोशिश की जाती तो आज एक सौ बीस करोड़ वाले भारत के साथ-साथ तीसरी दुनिया के कई दशों के लिए भी रोल मॉडल बन पाता. लेकिन, वह अवसर निरर्थक जाने दिया गया. अब तो खैर इस तरह की कोई उम्मीद की नहीं जा सकती. अब तो अरबपतियों की बढ़ती तादाद को गिनने और उस पर गर्व करने का दौर है. ऐसे में सवाल हो सकता है कि ‘हिन्द स्वराज’ के प्रकाशन के सौ साल होने पर उसे किस तरह से याद किया जाये! और किया भी जाये या नहीं!!

संपर्क- 155, एल.आई.जी, मुखर्जी नगर, देवास, म.प्र.-455001



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