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साहित्य का साथ पत्रकारिता को संवारता है-राजेन्द्र यादव

साहित्य का साथ पत्रकारिता को संवारता है-राजेन्द्र यादव

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राजेन्द्र यादव का नाम यूं तो हिंदी साहित्य से जुड़ा है लेकिन हंस में अपने लगभग हर संपादकीय के जरिये उन्होंने जिस तरह पत्रकारिता को आत्मसात् किया वह अन्यत्र कहीं दुर्लभ है। पत्रकारि‍ता में साहि‍त्‍य की मौजूदगी और वक्‍त के साथ उसकी बदलती स्‍थि‍ति पर उन्‍होंने प्रति‍भा के साथ बड़ी बेबाकी से बात की।

क्या आप मानते हैं कि साहित्य और पत्रकारिता का तालमेल बेहतर सृजन की नींव होता है?
ऐसा कोई जरूरी नहीं है। लेकिन यह तो है ही कि अगर ऐसा तालमेल होता है तो कुछ बेहतर चीजें सामने आती हैं। शुरू से साहित्यकार ही पत्रकार होते थे। अज्ञेय, धर्मवीर भारती, कन्हैयालाल नंदन आदि के नाम इसका उदाहरण हैं।उनके सामने समाचारों व अखबारों की वह धारणा नहीं थी, जो अंग्रेजी पत्रकारिता में थी।
 
क्या आपको लगता है कि अंग्रेजी अखबारों का हौव्वा हिंदी पत्रकारिता पर छाया रहता है?
मैं पहले की बात करूं तो अंग्रेजी पत्रकारिता में भाषा को लेकर, पत्रकारिता के पैरोकारों को लेकर एक तरह की सजगता होती थी। जबकि हिंदी पत्रकारिता में यह एकतरह से प्रिजूडिस के तौर पर काम करते थे। तब उतना सर्कुलेशन वगैरह भी नहीं था इस वजह से पाठकों का उतना लिहाज भी नहीं था। हमें भी इस तरह के प्रिजूडिस जानते हुए पढऩे में मजा आता था। तो एक ये वो दौर था पत्रकारिता का। हौव्वा जैसी कोई बात नहीं है लेकिन फर्क तो साफ है।
 
तो उस दौर की पत्रकारिता के बाद?
उसके बाद पत्रकारिता की दूसरी पीढ़ी का जन्म हुआ इमरजेन्सी के बाद। इसके बाद जो टर्निंग प्वाइंट आया वो था बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद। इस दौरान जो पत्रकार हुए या जो पत्रकारिता हुई उसमें साहित्य कहीं पीछे छूट गया। अब नजर खबर पर ज्यादा थी उसके परिमार्जन पर कम। इन पत्रकारों की भाषा बहुत समृद्ध नहीं थी। अंग्रेजी से अनुवाद करने का चलन बहुत तेजी से बढ़ा। खुशवंत सिंह या कुलदीप नैयर के कॉलम इसका उदाहरण हैं। आज भी ये अनुवाद होकर हिंदी में छपते हैं। अनुवाद का यह सिलसिला यूं तो अच्छा था लेकिन इसमें वह गहराई नहीं रह गई जो ओरिजनल राइटिंग में होती है।
 
यानी अब भी अंग्रेजी पत्रकारों का ही दबदबा था?
नहीं, हिंदी में भी अच्छे पत्रकार थे। ओरिजनल हिन्दी पत्रकारों में राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी का नाम जेहन में उभरता है। हालांकि ये लिस्ट बहुत लंबी नहीं है। इन दोनों लोगों ने साहित्यिक संस्कारों से दूर हुए बगैर पत्रकारिता को नए आयाम दिए।
 
आजकल की पत्रकारिता के बारे में क्या सोचते हैं आप?  क्या वो  पत्रकारिता के संस्कार जो पिछली पीढ़ी ने दिये वो हैं अब भी या पत्रकारिता उनसे आगे बढ़ चुकी है। क्योंकि वक्त अब काफी बदल चुका है?
आजकल के अखबारों से, मीडिया से उस तरह की भाषा की उम्मीद करना या वैसी स्तरीय पत्रकारिता की आशा करना खुद को ही कष्ट में डालने जैसा है। आजकल जो पत्रकार हैं, वो बाकायदा कोर्स करके आते हैं, उसके बावजूद उनके पास न साहित्य के संस्कार हैं, न पत्रकारिता के संस्कार हैं। यूं भी आजकल पत्रकारिता किस संस्कार  को अपना रही है यह समझ से परे है। चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। हर जगह खबर के नाम पर जो परोसा जाता है, वह किसी की भी समझ से परे है।
 
आपका आशय किस तरह की खबरों से है, जरा क्लियर करिये?
भूत प्रेत की स्टोरी दिखाना, अफेयर्स की कहानी दिखाना यह कौन सी पत्रकारिता है। एब्सर्ड है यह तो। इसने तो पत्रकारिता का बंटाधार कर दिया है। चैनल बदलते वक्त उंगलियां थक जाती हैं लेकिन हम एक सीरियस वक्तव्य के लिए तरस जाते हैं। साहित्य, संस्कृति, संगीत, थियेटर और कला जैसी चीजों के लिए तो लगता है कि कहीं जगह ही नहीं बची है। अगर कहीं कुछ थोड़ा बहुत दिखता भी है तो ऐसा लगता है कि खानापूरी हो रही है या कोई रवायत है इन सब्जेक्टस पर काम करने की उसे निभाया जा रहा है। यही हाल हिंदी अखबारों का है। अच्छे कंटेट का अभाव है, उनके प्रेजेन्टेशन का अभाव है और सबसे बड़ी बात यह है कि अखबार जैसी चीज से विचार ही गायब है। ज्यादातर अखबार किसी न किसी राजनैतिक पैरोकारों को फॉलो करते हैं उसके बाद उनकी
भाषा से लेकर ट्रीटमेंट तक ऑथेंटिक नहीं रहता। कई बार तो काफी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
 
आपको क्या लगता है इसका क्या कारण है? खबरें कम हैं या जानबूझकर खबरों का डिटोरेशन किया जा रहा है?
खबरें कहां कम हैं। खबरों का तो महासागर है। पत्रकारिता का अप्रोच बदल गया है। सस्ती, लोकप्रियता वाली पत्रकारिता पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात ये है कि किसी को चिंता भी नहीं है इसकी।
 
खबरों की विश्वसनीयता भी कम हुई होगी तब तो?
बिलकुल। अखबारों के सामने, बल्कि चैनलों के सामने भी सबसे बड़ा संकट विश्वसनीयता का। यह संकट हिंदी अखबारों के सामने जितना बड़ा है, वह काफी खतरनाक है। जबकि अंग्रेजी अखबारों की स्थिति काफी ठीक है। मैं खुद तीन-चार हिंदी के अखबार मंगाता हूं और दो अंग्रेजी के। हिंदी का अखबार पढऩे में जनसत्ता को छोड़कर मुझे पांच से दस मिनट का समय लगता है, जबकि अंग्रेजी अखबार मैं काफी इत्मीनान से देर तक पढ़ता हूं। अंग्रेजी अखबार खबरों पर ठीक से काम करके उन्हें तरतीब से देते हैं जबकि हिंदी में लापरवाही साफ झलकती है। इसका कारण यह भी है कि जो लोग इस फील्ड में आ रहे हैं वे न तो भाषा से समृद्ध हैं और न ही विचार से।
 
तो क्या अंग्रेजी के पत्रकार साहित्य से आ रहे हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है। लेकिन फिर भी अंग्रेजी के पत्रकार काफी अनुशासित हैं काम के मामले में।
 
तो साहित्य की कमी ने पत्रकारिता को कमजोर किया है?
नहीं, ऐसा नहीं है। पत्रकारिता अपने क्लियर विजन से, सोच से, विचार से की जाती है। साहित्य का उससे जुडऩा बिलकुल जरूरी नहीं है। लेकिन पत्रकार को कम से पढऩा तो चाहिए ही। जहां तक साहित्य और पत्रकारिता की बात है तो जिस तरह जिस तरह साहित्य ने पत्रकारिता को पोषित किया है, उसी तरह पत्रकारिता ने भी साहित्य को पोषित किया है। कई बार अखबारों में कुछ इतनी अच्छी रिपोटर्स देखने को मिल जाती हैं कि निगाह वहां ठहर जाती है। यह एक बहुत बड़ा सच है कि दुनिया के सारे बड़े साहित्यकार पहले पत्रकार रहे हैं। चाहे वे मार्खेज हों, हेमिंग्वे हों, ग्राहम ग्रीन हों। जो लोग पत्रकारिता से जुड़े होते हैं और साहित्य से भी वे दोनों ही क्षेत्रों के साथ बहुत अच्छी तरह से न्याय कर पाते हैं। चूंकि उनका दिमाग खुला होता है, वे किसी कमरे में बैठकर कहानियां नहीं लिखते इसलिए उनकी कहानियां ज्यादा लाइव होती हैं। मराठी में अरुण साधू और बंगाली में भवानी सेन गुप्त का नाम इस प्रसंग में लेना जरूरी है। इन्होंने बहुत अच्छी रचनाएं दीं और ये बहुत अच्छे पत्रकार भी हैं। जो लोग साहित्य से जुड़े होते हैं और पत्रकार भी होते हैं उनमें एक अलग तरह की तराश होती है। यह तराश उन्हें भीड़ से अलग करती है।


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